चार सहेलियों को बजाया – 1

उस दिन शनिवार था और मैं कंचन के यहाँ जा रही थी कि राज शर्मा कंचन के घर से बाहर निकलता हुआ दिखाई दिया, वो मुझे बहुत ही अजीब निगाहों से घूर रहा था, मन तो किया की एक थप्पड़ लगा दू, लेकिन फिर मैने सोचा कि जाने दो बेचारा देख ही तो रहा है वो मेरे बगल से निकला तो एक अजीब सी सेक्सी स्मेल मेरे दिमाग़ मे दौड़ गयी. मैने सोचा कि ऐसी स्मेल तो हमारे रूम मे तभी आती है जब हम दोनो पति पत्नी चुदाई करते है.

तो क्या वो लड़का कंचन के घर मे चुदाई करके गया है, किसकी कंचन की… क्या कंचन का उस लड़के के साथ चक्कर है. कंचन इस तरह की औरत है क्या. मैं इन ख़यालों मे खोई हुए थी कि कंचन ने मुझे पकड़ कर हिलाया, “संध्या क्या हुआ किन ख़यालों मे खोई है?”

मैं जैसे नींद से जागी, “उम्म्म्म कुछ नही बस ऐसे ही.” कंचन के भी बाल बिखरे हुए थे कपड़े अस्त-व्यस्त थे. ड्रॉयिंग रूम मे भी वही स्मेल फैली हुए थी, अब मैं पक्के तौर पर कह सकती थी कि कंचन अभी अभी उस लड़के से चुद्वा कर निपटी थी.

“संध्या तू बैठ मैं 2 मिनिट मे नहा कर आती हूँ.” इतना कह कर वो बाथरूम मे अपना पाप धोने चली गयी.

तभी मैने देखा कि सामने वाली तबील के नीचे कुछ पड़ा हुआ है, झुक कर उठाया तो वो क रब्बर का लंड था, जो अभी भी गीला था चूत का रस उस पर सूखा नही था. पर मेरा गला ज़रूर सुख गया था, हाथ काँप रहे थे और मैने काँपते हाथो से उसको नाक के पास लेजाकार सूँघा, वा क्या स्ट्रॉंग सुगंध थी कंचन की चूत की, तो क्या मेरे मैन गेट खोलने की आवाज़ से ही उनका खेल बीच मे बंद हो गया था.

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मैने वो लंड वापिस वही रख दिया, और न्यूज़ पेपर उठा कर उसे पलटने लगी. थोड़ी ही देर मे कंचन आ गयी और मेरे सामने बैठ गयी.

“कंचन वो लड़का कॉन था जो अभी अभी गया है?” मेरे सवाल पर वो थोड़ा चौंकी फिर नॉर्मल होते हुए बोली, “अरे वो निक्की को कल से पढ़ाने आने वाला है, नया ट्यूसन टीचर.”

“ट्यूशन टीचर या तेरी चुदाई का टीचर…..” मैने मन ही मन सोचा.

फिर मैं ज़्यादा देर वहाँ नही रुकी और वापिस आ गयी, मुझे ये बात अच्छी नही लगी लेकिन मन ही मन उस लड़के के बारे मे लगातार सोचे जा रही थी. उसका मुस्कुराता हुआ चेहरा कसा गतिला बदन मेरी आँखन के सामने था.

रात को जब मेरे पति मेरी चुदाई कर रहे थे तो मेरे मन मे यही विचार था कि मुझे मेरे पति नही राज शर्मा मेरी चुदाई कर रहा है और इस मुझे ये बहुत रोमांचित कर गया. मैं ज़ोर ज़ोर से अपनी गांद उछाल कर चुद्वा रही थी.

लेकिन जब वो पल गुजर गया तो मन ग्लानि से भर गया………..

दूसरी सुबह मैं अपने पति से नज़रें नही मिला पा रही थी, मुझे लग रहा था कि जिस रास्ते पर मैं निकल पड़ी हूँ वो सही रास्ता नही है, ये मैं ग़लत करने जा रही हूँ. फिर एक पल के लिए लगता कि इसमे क्या ग़लत है.

मैं इन्ही ख़यालों मे खोई हुए थी कि दरवाज़े की घंटी बज उठी.

“अरे शबाना तू, आज मेरी याद कैस आ गयी तुझे.” मैने दरवाज़ा खोल कर उसको अंदर आने का इशारा करते हुए कहा

“एक काम है तुझसे इस लिए यहाँ आई हूँ, नही तो तू मेरे घर वालो को जानती ही है हमेशा मुझ पर नज़रें गड़ाए रहते है. जैसे कि मैं जाकर किसी भी मर्द के नीचे लेटने वाली हूँ.” शबाना ने सोफे पर बैठते हुए कहा.

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शबाना की आँखे एक दम लाल हो रही थी और वो कुछ घबराई हुए लग रही थी. मैने उससे जब बहुत ज़ोर देकर पूछा तब वो बताने को तैयार हुई वो भी वही देख कर आई थी, राज और कंचन की चुदाई उसने बोलना शुरू किया, “संध्या वो कंचन सोफे पर ही उससे चुद्वा रही थी, जब तू आई तो गेट की आवाज़ से दोनो ने एक मिनिट मे ही कपड़े पहन लिए और वो प्लास्टिक का लंड टॅबिल के नीचे फेंक दिया.”

मैने मन ही मन डरते हुए पूछा, “ तो क्या वो दो दो लंड डाल कर चुद्वा रही थी.”

“अरे नही वो तो उसकी गांद मार रहा था और रब्बर का लंड तो कंचन खुद चूत मे डाल रही थी.” कहते हुए शबाना शर्मा गयी

अब मुझे अपनी बेवकूफी याद आई उस रब्बर के लंड को उठा कर मैने अपनी नाक के पास करके स्मेल जो किया था.

“उस लड़के के जाते ही मैं भी वहाँ से निकल गयी, लेकिन मुझे कंचन ने देख लिया था.” कह कर शबाना चुप हो गयी

तभी फिर से दरवाज़े की घंटी बज उठी और कंचन दरवाज़े पर अपने बड़े बड़े मम्मे और चौड़ी गांद लेकर खड़ी थी, अब मुझे उसकी गांद बड़ी होने का राज समझ मे आया.

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