सुषमा और राज की बढ़ती नज़दीकिया

इधर सुषमाजी और राज की कहानी को भी पनपना ही था। चलिए सुनते हैं क्या हुआ सुषमाजी और मेरे पति के बिच।

सुषमा और राज की कहानी राज की जुबानी

जब सेठी साहब टीना को लेकर कार में निकले थे उस समय मैं ऑफिस में था। शाम को घर लौटते समय कुछ सब्जी फल इत्यादि सुषमाजी के लिए ले आया। जब तक टीना वापस नहीं लौटती, मेरा खाना अब उन्हीं के वहाँ होना था। पहुँचने के पहले ही मैंने फ़ोन कर बता दिया था तो सुषमाजी भी मेरा इंतजार कर रहीं थीं। मेरे पहुँचते ही मैंने पाया की सुषमाजी ने टेबल पर चाय नाश्ता तैयार रखा हुआ था।

सुषमाजी के बारे में एक बात कहनी पड़ेगी। हालांकि वह सेठी साहब के साथ रह कर बड़ी ही ज़मीनी बातें करतीं थीं, सुषमाजी का अंतर्मन बड़ा ही संवेदनशील था। मैंने उनके अंदर छिपा हुआ एक अत्यंत संवेदनशील इंसान, जो एक कलाकार या कला को समझने और सराहने वाला होता है, पाया।

जब भी हम कोई कला या ऐसी ही कोई संवेदनशील बातें करते, सुषमाजी अक्सर भावुक हो जातीं। इसी कारण मेरा और सुषमाजी का स्वाभाविक तालमेल पहली ही मुलाक़ात से हो गया था। मैं संगीत और कला का दीवाना था। सुषमाजी संगीत और कला के संसार में पहले से ही डूबी हुई थीं।

सुषमाजी ने मुझे जल्दी फ्रेश होकर आने के लिए कहा। करीब आठ बजे फ्रेश होकर घर का कुछ काम निपटा कर मैं सुषमाजी के वहाँ जब पहुंचा तो सुषमाजी ने मेरे लिए ड्रिंक और कुछ नमकीन बगैरह रखे हुए थे। उन्हें मालुम था की सेठी साहब के साथ अक्सर मैं ड्रिंक करने का आदि था। सुषमाजी कभी एकाद ड्रिंक पी लेती थीं। मेरे आग्रह करने पर उन्होंने मेरा साथ देने के लिए अपना जाम भी थोड़ा सा भरा।

अक्सर सुषमाजी दिन में साड़ी या लंबा गाउन पहनी हुई होती थीं पर उस शाम चेक्स वाला स्कर्ट और ऊपर एक हल्कासा टॉप पहने हुए वह जब मेरे सामने बैठीं तो बरबस मेरी नजर बार बार उनकी खुली हुई जाँघों और टॉप में से बड़े ही अच्छी तरह उभरे हुए उनके स्तन मंडल पर जाकर अटक जातीं थीं जिन्हें उन्होंने जरूर देखा। मेरी नजर को देख कर वह शर्मा कर हँस देतीं और अपनी जाँघें कुछ कस कर जोड़ती हुईं फिर से बातों में लग जातीं।

सुषमाजी और मेरे बिच में वह बात नहीं थी जो सेठी साहब और टीना के बिच में हो सकती है। सेठी साहब की तरह मैं सेक्स में आक्रामक नहीं हूँ। पुरुष और स्त्री के बिच का विजातीय आकर्षण मुझ पर भी हावी होता है पर सेठी साहब की तरह व्हिस्की की किक की तरह एकदम धमाके से नहीं, बल्कि हलकी वाइन की तरह होले होले। शायद मेरी यह बात सुषमाजी को काफी अच्छी लगी थी।

मैं यह बात कतई नहीं मना करूंगा की मेरे मन में सुषमाजी के हर एक अंग को करीब से देख कर उसे छूने और उन्हें बड़ी शिद्दत से प्यार करने की बड़ी तगड़ी इच्छा थी। बल्कि उनको पहली बार देखते ही उनके बदन की नंगी छबि देखने के लिए मैं दिन रात तडपता रहता था। पर मैंने कभी उस बात को ना ही उजागर किया ना ही मेरे दिमाग पाए हावी होने दिया। सही मौका मिलते ही सब कुछ होगा यह मैं जानता था और सही मौके की तलाश में ही रहता था। जल्द बाजी से मामला बिगड़ सकता है यह मैं भली भाँती समझता था।

सुषमाजी भी सेठी साहब की तरह ही एक अच्छी मेजबान थीं। अपने मेहमान को कैसे प्रसन्न करना वह भलीभांति समझती थीं। मुझे बातों में उलझाए वह अपना गिलास वैसे ही भरा हुआ रखे हुए मेरे गिलास में एक के बाद एक ड्रिंक भरती जाती थीं। मैंने एक दो बार यह महसूस भी किया पर सुषमाजी की बातें इतनी मधुर और आकर्षक होती थीं की समय और शराब का कोई ख्याल ही नहीं रहा।

मैंने भी बातों बातों में सुषमाजी को उनका गिलास खाली करने पर मजबूर किया और एक और ड्रिंक उनके गिलास में भी डाली। शायद सुषमाजी मेरे आग्रह का इंतजार कर रहीं थीं। उस गिलास को खाली होने में पहले गिलास जितना समय नहीं लगा।

मैंने महसूस किया की माहौल काफी नाजुक सा हो रहा था पर वह बात नहीं बन पा रही थी जो मैं और शायद सुषमाजी भी चाहतीं थीं। कहीं ना कहीं कुछ कमी सी महसूस हो रही थी। अचानक मेरी नजर ड्राइंग रूम में दीवारों पर लगे बड़े शास्त्रीय संगीतकारों की तस्वीरों पर पड़ी। शायद सुषमाजी को खोलने की चाभी मुझे मिल गयी थी।

मैंने सुषमाजी के करीब जा कर उनका हाथ थाम कर कहा, “सुषमाजी, इस मीठे वातावरण को अगर संगीतमय बना दिया जाए तो सोने में सुहागा लग जाए।”

मैंने देखा की मेरी बात सुन कर सुषमाजी के मुंह की रौनक बढ़ गयी। उन्होंने फ़ौरन अपना मोबाइल उठाया और मेरी और बड़ी ही प्यार भरी नज़रों से देखते हुए कहा, “अब मैं समझी की टीना जैसी कामिनी सुंदरी को तुमने अपने चंगुल में कैसे फसाया। तुम्हें स्त्रियों की नाजुक संवेदनाओं को जगाने में महारथ प्राप्त है। मैं तुम्हारी संगीत में रूचि देख कर कभी से सोच रही थी की एक दिन मैं तुम्हें अपने प्यारे संगीतकारों की कला से ना सिर्फ परिचित कराउंगी बल्कि उनमें से कुछ के घरानों से जो हमारे परिवार के निजी ताल्लुकात थे उसके बारे में बात भी करूंगी।”

यहां मैं मेरे रसिक पाठकगण जो अपनी महबूबाओं को अपनी बनाना चाहते हैं अथवा अपनी प्यारी रूढ़िवादी पत्नियों को खुले सम्भोग की दुनिया में शामिल करवाना चाहते हैं उनसे निवेदन है की वह अपनी पत्नियों खुलने का पूरा अवसर दें। जो अपनी मेहबूबा या पत्नी को पसंद है वह बात करें, जैसा उनको पसंद है वैसा माहौल बनाएं।

एक बात पति या प्रेमी हमेशा ध्यान रखें की स्त्रियों में पुरुषों से कई गुना अधिक सेक्स कूट कूट कर भरा हुआ होता है। हम पुरुषों को यह बात नहीं मालुम। हम हमारी मेहबूबा या पत्नियों के सूखे रवैय्ये से यह सोचने लगते हैं की स्त्रियां सेक्स में ज्यादा रूचि नहीं रखतीं।

इसका कारण यह है की अक्सर पत्नियां बस पति के प्रति अपना फर्ज निभाने के लिए जब पति का मन करता है तब अपनी टाँगें खोल कर उन्हें अपने बदन को अर्पण कर पति को सम्भोग करने देतीं हैं। अपना योगदान यातो रखती ही नहीं या फिर पति को खुश करने के लिए एन्जॉय करने का ढोंग करतीं हैं।

पर वास्तविकता अलग है। स्त्रियों में भगवानने जन्मजात ही सम्भोग के मामले में पुरुषों से कहीं ज्यादा रूचि और उग्रता कूट कूट कर भरी है। पर समाज में अपयश के डर और पति पर अविश्वास के कारण पत्नियां उस उग्रता को बड़ी ही बखूबी छिपा कर अपने जहन के किसी अँधेरे कोने में गाड़ कर रख देतीं हैं।

अपने जन्म से ही रूढ़िवादी उपदेशों को सुनते रहने के कारण सामाजिक मर्यादाओं का सच्चे मन से पालन करते हुए कई बार पति के लाख मनाने पर भी विवाहिता अपनी सम्भोग की उग्रता वाली सख्सियत को अँधेरे कूप से बाहर निकालने में अपने आपको असमर्थ पातीं हैं।

रूढ़िवादी सामाजिक ग्रंथियों से बाहर निकालने के लिए हम पतियों को बड़े ही धैर्य और संवेदना से काम करना होगा ताकि हमारी पत्नियां हमारी संवेदना को समझ पाएं और संभोगिक प्रक्रिया में हमारा खुल कर साथ दे कर वह स्वयं भी उस अप्रतिम आनंद का आस्वादन कर सकें और हमें भी कराएं।

हरेक पति को अपनी पत्नी की यह मानसिकता और संवेदना की कदर करते हुए बड़ी नाजुकता और प्यार से उन जटिल ग्रंथियों को एक के बाद एक कर खोलना होगा। जब कोई धागा या रस्सि या हमारे पाजामे का नाडा भी उलझ जाता है तो उन गांठों को खोलने के लिए हमें बड़े ही धैर्य और हलके से उन्हें खोलना पड़ता है। उस वक्त जल्दबाजी या समय ज्यादा लगने के कारण होती झुंझलाहट का प्रदर्शन करने से पुरा मामला और ज्यादा उलझ सकता है।

इसी लिए पति को चाहिए की पत्नी की संवेदना का ध्यान रखें और पत्नी से सम्भोग करते समय उसे बार बार सम्भोग के आनंद के बारेमें बात करे और खुले सम्भोग के लिए उकसाता रहे। ऐसा करते हुए वह पत्नी के विरोध या अवहेलना को ज्यादा गंभीरता से ना ले और अपनी पत्नी में छुपी हुई वह सम्भोग की आक्रामकता को उस अँधेरे कूप से बाहर निकालने की कोशिश में बिना थके लगा रहे। साथ साथ में वह पत्नी को मौक़ा दे की वह दूसरे कोई आकर्षक पुरुष के साथ मौक़ा मिलने पर उसे आकर्षित करे या दूसरे पुरुष से आकर्षित हो कर मौक़ा पाकर उससे सम्भोग करे।

सुषमाजी के मामले में ऐसी कोई बाधा नहीं थी। टीना से सुषमाजी के बारे में मेरी बात के बाद मैं सुषमाजी की संवेदनाओं से भलीभाँति परिचित था। मैं जानता था की सम्भोग को सुषमाजी बहुत अच्छी तरह एन्जॉय करतीं थीं। जरुरत थी को एक सही माहौल की जो बन रहा था और फिर एक चिंगारी की जो उस माहौल को आग में बदल दे।

सुषमाजी ने अपने जाने पहचाने एक बड़े संगीतकार का एक कॉन्सर्ट में अपनी सितार पर बजाया हुआ राग ब्लूटूथ के द्वारा अपने साउंड सिस्टम पर बजाना शुरू किया। वातावरण एक रोमांचक और उन्मादक संगीत की ध्वनि से गूंज उठा। संगीत अत्यन्त मधुर और रोमांचक था और मैं सुषमाजी को देख रहा था जो संगीत की मादकता में झूम रही थी। मैं भी संगीत की मादकता का आस्वादन करते हुए सुषमाजी के साथ संगीत की लहरों में बहने लगा।

फर्श पर बिछाये हुए एक ही गद्दे पर हम दोनों एक दूसरे के करीब बैठ कर कभी आँखें मूंद कर उस मधुर संगीत का आस्वादन कर रहे थे तो कभी एक दूसरे की आँखों में देख एक दूसरे के मन के भाव पढ़ते हुए शायद सही मौके का इंतजार कर रहे थे जब हम दोनों अपने मन की बात को उसके अंजाम तक पहुंचा सकें। कौन पहला कदम आगे बढ़ाएगा शायद वही असमंजस में हम दोनों उलझे हुए थे।

थोड़े समय के बाद सुषमाजी ने संगीत का वॉल्यूम कुछ कम किया और मेरी और देख कर बोलीं, “तुम पूछ रहे थे ना की यह कौन है?”

मैंने सकारत्मक अंदाज में जब अपनी मुंडी हिलायी तो उन्होंने उस मशहूर उस्ताद सितार वादक उस्ताद एहसान अली खान का नाम लेकर अपने कानों को छूते हुए कहा, “उस्तादजी मेरे पिताजी के अच्छे खासे दोस्त थे और जब भी कभी उनका कोई बड़ा कॉन्सर्ट होता था तब वह हमें अवश्य बुलाते थे।”

सितार की धुन में मैं भी खो गया था। मैंने देखा की बात करते करते सुषमाजी की आँखें नम हो रहीं थीं। सही मौक़ा आ चुका था। मैंने सुषमाजी के करीब खिसक कर उन्हें अपनी बाँहों में भर दिया और उनके आंसुओं को हलके से पोंछते हुए बोला, “संगीत जीवन का अमृत है। संगीत की एहमियत का कोई हिसाब नहीं। संगीत प्यारों का प्यार है और भगवान की साधना है।”

सुषमाजी ने मेरी और नजर उठा कर देखा, थोड़ा मुस्कुरायी और बोली, “इस रिकॉर्ड से मुझे ज्यादा लगाव इस लिए है क्यूंकि यह गाना मेरे सामने बजाया गया था। उस्ताद एहसान अली खान मेरे पिताजी के समकालीन थे और उन्होंने मुझे भी संगीत शास्त्रीय नृत्य की तालीम दी है। यह गाना जब रिकॉर्ड हुआ तब मैं छोटी थी और उस्तादजी ने मेरे सामने ही इसे बजाया था। उस समय मैं उनके इस गाने पर नाच रही थी।उस समय मैं गुरूजी से शास्त्रीय नृत्य की तालीम ले रही थी।

मुझे इण्टर स्कूल कम्पटीशन में मेरे नृत्य के कई पारितोषिक मिले हुए थे। मुझे अपनी धून पर नाचते देख मेरे गुरूजी इतने भावुक हो गए की यह राग उन्होंने करीब एक घंटे तक बजाया और मैं उनकी धुन पर एक घंटे तक नाचती रही। उस माहौल को मैं आज तक भूल नहीं पायी हूँ। पर पिछले कुछ सालों से सांसारिक झंझट के चलते वह सब छूट गया।”

मैंने खड़े हो कर सुषमाजी को खिंच कर खड़े करते हुए कहा, “सुषमाजी, आज इतने सालों के बाद मैं आपका वह नृत्य उस्तादजी के संगीत की ले के साथ देखना चाहता हूँ। आशा है आप मुझे निराश नहीं करेंगी।”

सुषमाजी ने मेरी बात का यकीन नहीं करते हुए कहा, “यह स्कर्ट पहन कर तुम मुझे नाचने के लिए कह रहे हो? वह ज़माना अलग था। मैं छोटी सी दुबली पतली तरवराहट से भरी एक किशोरी लड़की थी। आज मैं एक शादीशुदा मोटी औरत बन गयी हूँ। अब वह चुलबुलाहट और जोश कहाँ?”

मैंने ज़िद करते हुए कहा, “सुषमाजी, आप क्या हैं, कितनी छोटी, बड़ी, पतली, मोटी, खूबसूरत इत्यादि हैं वह देखने वाले की नज़रों पर छोड़ दो। सवाल यह नहीं है की आप बचपन के मुकाबले कैसा नाचोगी। सवाल आपके प्रशंशक, यानीं के मैं आपको वही उस्तादजी के संगीत में वही नृत्य करते हुए देखना चाहता हूँ। सवाल कला और कला के चाहने वालों की फरमाइश का है। एक सच्चा कलाकार कभी अपने चाहने वालों की फरमाइश को नहीं टालेगा।”

सुषमाजी ने मेरी आँखों में आँखें मिलाकर यह जानने की कोशिश की कहीं मैं मजाक तो नहीं कर रहा। मेरी आँखों में गंभीरता का भाव देख कर वह बोलीं, “अरे बाबा, सालों बीत गए मेरे नाचे हुए। ऊपर से यह कपडे। मैं कैसे नाचूं? छोडो, जाने दो, बादमें कभी मैं तुम्हें जरूर वह नृत्य करने दिखाउंगी।”

मैंने जब जिद पकड़ी और सुषमाजी ने यह देखा की मैं नहीं मानने वाला, तब अपने हथियार डालते हुए उन्होंने कहा, “ठीक है, तुम इतनी ज़िद कर रहे हो तो मैं तुम्हें कुछ स्टेप्स दिखाती हूँ। पर अगर मेरा नृत्य ठीक ना हो तो मेरा मजाक मत करना।”

मैंने सुषमाजी की बात का कोई जवाब नहीं दिया और उनके नाचने का इंतजार करने लगा। सुषमाजी ने मोबाइल फ़ोन पर उस्तादजी का सितार वादन दुबारा शुरुआत सी शुरू किया और सीधे खड़े हो कर दोनों हाथों को और पॉंवों को सटा कर रखते हुए सरस्वती वन्दना करते हुए उस्तादजी की सितार की धुन के साथ नृत्य करना शुरू किया।

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