सौतेली माँ के साथ चूत चुदाई की यादें

मेरी कहानी
पापा की चुदक्कड़ सेक्रेटरी की चालाकी
का आगे का भाग मैं आप सभी प्रिय पाठकों की सेवा में भेज रही हूँ. मैंने बहुत कोशिश की, इसे हिन्दी में (देवनागरी में लिखने की) जो हो भी गई थी मगर बदक़िस्मती से ना तो सेव हो पाई ना ही उस का मेल हुआ और ना ही डाउनलोड हुई, रिज़ल्ट ये हुआ कि सब डिलीट हो गई. तब मुझे फिर से पूरी कहानी लिखनी पड़ी.

मुझे बहुत से पाठकों के मेल मिले हैं और उसमें से कुछ ने चुदाई भरी चैट करने की भी कोशिश की है. मगर मैं कहना चाहती हूँ कि मैं एक शादीशुदा औरत हूँ और अपने घर को और अपने परिवार को सबसे पहले देखना ज़रूरी होता है. इसलिए मैं किसी से भी इस तरह की चैट नहीं कर सकती. मैं नहीं चाहती कि मेरी शादी शुदा लाइफ में कोई भूचाल आ जाए.

मैं उन सबका धन्यवाद करती हूँ, जिन्होंने मेरी कहानी को पढ़ा और उनको मेरी आपबीती को जानकर अच्छा लगा. मेरी पहली कहानी
मैं कॉलगर्ल कैसे बन गई
एक सच्ची चुदाई की कहानी थी, जो मेरी ना हो कर किसी और की थी. मेरी किसी फ्रेंड ने जो किसी ऑफिस में काम करती है, उसी ने उससे मिलवाया था. उससे प्रॉमिस किया था कि उसकी कहानी लिख कर नेट पर डालूंगी और उसका कभी जिक्र नहीं होगा. मैंने इसलिए मैंने इस चरित्र को खुद पर ढाल कर कहानी लिखी है,
जिससे यह समझा जाए कि यह मेरी कहानी है. मुझे लगता है कि मैं इसमें किसी हद तक सफल भी रही हूँ. मगर यह कहानी एक कहानी ही है और इसके सभी पात्र कपोल कल्पित हैं.

आपने मेरी पिछली कहानी में पढ़ा था कि मेरी सौतेली माँ बिंदु ने मुझे अपने सगे बेटे से चुदवा दिया था, जोकि मेरे पापा की जानकारी में नहीं था. बिंदु माँ ने मुझे सेक्स का आदी बना दिया था, जिस कारण अब मुझे बिना लंड लिए चैन ही नहीं पड़ता था. लेकिन उसके हरामी बेटे आशीष की गंदी मानसकिता के चलते बिंदु खुद भी अपने बेटे आशीष की कामवासना का शिकार हो गई. उसके बेटे आशीष ने अपनी सगी माँ को मेरे सामने चोद दिया था.

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अब आगे..

अब बिंदु मुझसे खुल कर बात नहीं करती थी क्योंकि उसको उसी के रियल बेटे ने मेरे सामने चोदा था. उसे मुझसे आँख मिलाने में झिझक होती थी. मगर वो मुझे चुदक्कड़ बना चुकी थी. अब लंड मुझे सपनों में भी नज़र आता था. फिर एक दिन मैंने ही उनकी झिझक को दूर किया.

एक दिन मैं उनसे बोली- आप मेरी माँ तो नहीं हैं, मगर होतीं तो मुझे इस तरह से ना चुदवातीं. अब मैं आपको सबके सामने माँ जैसा आदर दे भी दूँ मगर आपको अकेले में आपके नाम से ही बुलाऊंगी और आपको अपनी फ्रेंड मानूँगी ना की माँ.

बिंदु माँ मेरा मुँह देखती रहीं, मगर कुछ ना बोल पाईं. फिर मैंने उनसे कहा- देखिए बिंदु जी, अब जो होना था सो हो गया. जिस लंड ने मुझे चोदा है, वो ही आपको भी चोद गया. अब तो हम एक दूसरे की सौतन जैसी ही हुई ना. फिर एक दूसरे से किस बात कि शर्म करनी. अब खुल कर चुदवाओ, जब तुमने ही मुझे चुदवाना सिखाया है, तो आगे का पाठ भी तो आप ही सिख़ाओगी ना. आज के बाद तुम भी खुल कर चुदो और मुझे भी चुदवाओ. अब शर्म छोड़ो, हम दोनों एक ही नाव में सवार हैं. डूबना या तैरना साथ साथ ही है.

इसके साथ ही मैंने उनको माँ मानना छोड़ दिया और उनके लिए आगे इस कहानी में भी एक फ्रेंड जैसा सम्बोधन ही लिखूंगी.

मेरी इस भाषा को सुनकर बिंदु नॉर्मल हो गई और उसके हाव भाव से लगता था कि अन्दर से वो खुश है क्योंकि वो समझती थी कि शायद मैं पापा को कुछ ना बता दूं.

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अब रोज़ पापा के ऑफिस चले जाने के बाद हमारा दोनों का नंगा नाच शुरू हो जाता था. एक दूसरे के मम्मों को दबाना चूचियों को चूसना, चुत चुसवाना और चूसना आम बात हो चली थी. वो रोज़ मुझे नई नई ब्लू फ़िल्में दिखाती थी, जिसका असर ये हुआ कि मुझ पर जवानी की चुदास उम्र से पहले ही चढ़ गई. मैं उस समय जवानी की दहलीज पर थी, मगर चुदाई के मामले में एक 25 साल की चुदक्कड़ औरत की उम्र को भी पार कर चुकी थी.

जब जब तीन चार दिन की छुट्टियां होती थीं, आशीष हॉस्टल से घर आ जाता था. वो रात को मुझे चोदता था… और सुबह पापा के ऑफिस चले जाने के बाद हम दोनों को चोदता था. मेरे मम्मे अब पूरे संतरे बन चुके थे, निप्पल पूरे बेर की तरह के तन चुके थे.

खैर इस तरह से सब कुछ वासना का खेल होता रहा. जब वार्षिक छुट्टियां हुईं तो आशीष अपने साथ अपने किसी फ्रेंड को भी ले आया.
वो घर आकर बोला कि इसके मम्मी पापा विदेश में हैं और इधर यह अकेला रह गया था इसलिए इसे मैं साथ ले आया.

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