गरम हुई बहन, भाई के लंड पर चड़ी

ही दोस्तों, अगर आप लोग मेरे साथ इस पार्ट तक जुड़े हुए हो, तो आपको मेरे बारे में पता ही चल गया होगा. तो यहा अपने बारे में ज़्यादा बता के टाइम बर्बाद करने से अछा मैं सीधा अपनी कहानी पे आती हू.

दोस्तों एक बात बता डू. चाहे मर्द हो या औरत, तलब (फीलिंग्स) सब के अंदर होती है. मर्द वो मूठ मार के शांत होते है. वही हम गर्ल्स ( वो तो आप लोग समझदार हो ही). इसी तलब ने मेरे अंदर से सेक्स वासना को बाहर आने पे मजबूर कर दिया था.

एक तो 2 दिन अब्बू से चूड़ने की लत ने आदत लगा दी थी. उपर से ये एग्ज़ॅम की टेन्षन. उफ़फ्फ़ अब मैं बेचारी करती भी तो क्या? तो वही जब फिंगरिंग करते टाइम मैं पानी-पानी हुई पड़ी थी, तो गाते खोल के मुराद भाईजान सामने खड़े थे.

उस टाइम अल्लाह कसम, वो भाईजान जैसे नही थे. बल्कि वो भाईजान के रूप में एक जिन थे, जो कह रहे हो, “हुकुम मेरे आका! क्या ख्वाहिश है आपकी?” मैं भी झड़ने के बाद जैसे और गरम हो चुकी थी. अपने नंगे बदन को च्छुपाने की बजाए, अपनी ब्रा को निकाल कर मुराद भाईजान के सामने अपने बूब्स को अपने हाथो से मसालने लगी.

उस वक़्त बेशक भाईजान कुछ भी कह रहे हो. मुझे बस उनके मूह से एक ही शब्द सुनाई दे रहा था, “हुकुम मेरे आका!”. और तभी जैसे भाईजान रूपी जिन ने मेरे मॅन की ख्वाहिश को जान कर अपनी पंत की ज़िप खोल एक हथियार निकाला, जिससे मेरी तलब शांत हो सके.

वो हथियार काला था. मगर दिल वाला था. क्यूंकी वो हथियार अभी भी काम आता है. मैं बूब्स को सहलाते हुए, और भाईजान अपने हथियार (लंड) को मसालते हुए बेड के उपर चढ़ आए.

हम दोनो एक-दूसरे का समान अदला-बदली कर लिए. भाईजान ने मेरे बूब्स को, और मैने उनके लंड को अपने हाथो में ले लिया. फिर एक अजीब सी चीज़ हुई, जो शायद मेरे और मुराद भाईजान के बीच अभी तक नही हुई थी.

हम दोनो ने एक-दूसरे को लीप तो लीप किस करना शुरू कर दिया. वैसे किस करने से पहले उन्होने कुछ बातें कही, और सिर्फ़ मेरे कानो में गयी. और मुझे अभी तक याद नही की भाईजान ने बोला क्या था. धीरे-धीरे उनका एक हाथ मेरे जिस्म को छूटा हुआ नीचे मेरी छूट तक पहुँचा, जो जस्ट अभी-अभी झड़ने के वजह से गीली थी.

उसमे भाईजान ने बीच वाली उंगली घुसाई. “उफफफ्फ़”, एक कामुक सी आवाज़ मेरे मूह से निकली. फिर उसके बाद मेरी छूट में एक से 2 उंगलियाँ हो गयी. बचपन से लेकर वो आज का दिन था जो वापस अपने भाईजान की गोद में आ गयी थी.

फराक बस इतना था की, बचपन में भाईजान मुझे खिलाने के लिए गोद में लेते थे. और आज भाईजान मेरी लेने के लिए मेरे साथ खेल रहे थे. मैं तो जैसे चरम सुख की उचाईयो में थी.

वैसे हू भी क्यूँ ना, भाईजान अभी मेरी छूट जो चाट रहे थे. गीली छूट को और गीली करना कोई भाईजान से सीखे ( सच, अभी भी वो भाईजान से फर्स्ट टाइम वाला चुदाई एक्सपीरियेन्स सोचते वक़्त मेरी छूट पानी छ्चोढ़ देती है).

थोड़ी देर में भाईजान कुछ बोले, और फिरसे मेरी छूट पे मूह लगा के चाटने लगे. लेकिन मुझे उनकी बातें ना सुनाई दे रही थी, और ना मैं सुनना छाती भी थी. बस ये जो चल रहा था, बस चलता रहे यही चाहती थी.

उस छूट की चटाई से मैं इतनी उत्तेजित हो उठी, की मैने भाईजान का सर पकड़ कर अपनी छूट में ही दबा दिया, जिससे की मेरी छूट और उनका मूह जुड़ा ही ना हो. लेकिन अगले ही पल जैसे वो मेरी छूट से अलग हो गये, मुझे पता लग गया था, की ये सब तो शुरुआत थी. असली चीज़ तो अभी आने वाली थी. उस वक़्त अगर अब्बू होते, तो पक्का 10 मिंटो तक पहले मेरे मूह में अपना लंड डाल कर मेरे बूब्स के साथ खेलते.

लेकिन भाईजान जिनका लंड पहले से ही बिल्कुल तन्ना हुआ था, और लंड पे से उभरती हुए नास्से उफफफ्फ़, लंड को और सेक्सी बना रही थी. उनकी बस एक बात मैने सुनी, “कॉंडम लगौ क्या?”. उनकी बात सुन कर उस टाइम ज़्यादा ना सोचते हुए मैं बोली, “जैसे ज़्यादा मज़ा आ जाए!”

ये कह कर भाईजान पे ही छ्चोढ़ दिया. वैसे भाईजान था तो असली बहनचोड़! आख़िर बेहन को बिना कॉंडम के छोड़ने का मौका भला कोई भाईजान छ्चोढना छएहेगा. तो वही मुराद भाईजान ने भी किया ( वैसे अभी की बात करे तो बिना कॉंडम लाए तो भाईजान को अपनी छूट चाटने नही देती).

भाईजान की फॅवुरेट पोज़िशन, “डॉगी स्टाइल”, बिल्कुल कुटिया बना के, एक कुत्ते की तरह एक कुटिया ( यानी मेरी) की छूट की चुदाई करने लगे. बीच-बीच में काई बार लंड मेरी छूट में से फिसल कर बाहर आ जाता, जिसे कभी भाईजान, तो कभी मैं थूक माल कल वापस से मेरी छूट में घुसा देते. (इसमे भी एक अलग ही मज़ा था यार. अब वो फीलिंग कैसे बतौ? ये तो पता नही).

पहले तो मेरी कामुक आवाज़ धीमी थी. लेकिन बाद में जैसे-जैसे भाईजान अपनी रफ़्तार बढ़ते, उसी दर्र से कही मेरी आवाज़ भी ना बढ़ जाए इसीलिए भाईजान ने मेरे मूह में मेरी ही लाल रंग की पनटी भर दी थी.

घुटनो में मेरे अब दर्द होने लगा था. इसलिए भाईजान ने पोज़िशन बदली, और मुझे सीधा करके, मेरी टाँगो को हवा में उठा के फैला दिया. फिर खुद मेरी टाँगो के बीच में घुसा कर फिरसे लंड और छूट पर थूक माल कर, मेरी छूट में लंड डाल दिया, और हम दोनो के होंठ मिले.

होंठो और लंड छूट का ये मिलन बहुत लंबा चला. और ये दोनो एक-दूसरे से ऐसे चिपके थे, जैसे बिछड़े आशिक़. जिन्हे अब बिछड़ना पसंद नही. लेकिन जैसे, वो बिछड़ने वाला पल भी आ ही गया हो, और लंड भाईजान का मेरी छूट से अलग होने वाला हो. लेकिन अलग होने से पहले लंड ने अपने अंदर का सारा का सारा धार मेरी छूट में निकाल कर भर दिया था ( जैसे कोई वॉल्केनो से गरम-गरम लावा बाहर आया हो).

मैं भाईजान के निढाल होते हुए लंड को थाम कर, एक-एक बूँद निकाल कर जांघों पर लगाने लगी. मेरी छूट जो भाईजान के लंड से ओवरफ्लो हो चुकी थी. उस पर अपना मूह लगा कर सारा का सारा एक चुस्की में गतक गयी. और मेरी छूट से निकलती धारा को भी भाईजान ने होंठो से सूखा दिया.

उसके बाद कुछ सवाल-जवाब भाईजान और मेरी तरफ से हुए, जो मुझे अभी तक याद नही. और उसके बाद मेरी और शायद भाईजान की भी आँख लग गयी थी. अम्मी की आवाज़ से मेरी आँखें खुली तो देखा मेरा सर मुराद भाईजान की चेस्ट पे था. सर को भाईजान बड़े प्यार से सहला रहे थे ( भाईजान मुझसे पहले उठ गये थे. बस मेरी नींद खराब ना हो, इसलिए वही का वही लेते रहे).

अम्मी की आवाज़ थोड़ी और तेज़ हुई, और मेरी आँखें खुल कर चौड़ी हो चुकी थी. तो मुझे ध्यान आया की तलब-तलब में मैं रात को मुराद भाईजान को अपनी चूत दे बैठी. मुझे बहुत शरम आई. फिर जल्दी से उठ कर बिना भाईजान का मूह देखे, हा उनके लंड को ज़रूर एक बार निहार कर, बातरूम में भाग गयी.

अम्मी की आवाज़ सुन कर भाईजान भी जल्दी-जल्दी अपने कपड़े ( जितना जल्दी जो सके कक्चा पहने और जैसे-तैसे मेरे रूम से बाहर निकल गये). तो मॅन और जज़्बात को यहा रोकती हू, और आप से फिर अगले पार्ट में मिलती हू आगे की कहानी के साथ.

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