ड्राइवर ने ऑफीस में आके मालकिन को चोदा

ही फ्रेंड्स, मैं कल्पना केपर अपनी कहानी का अगला पार्ट लेके आप सब के सामने वापस आ गयी हू. मेरी पिछली कहानी को अपना प्यार देने के लिए आप सब का धन्यवाद. उमीद है की आप इस पार्ट को भी उतना ही प्यार देंगे.

पिछले पार्ट में आप सब ने पढ़ा की मुझे अपने ड्राइवर पंकज के लंड का चस्का लग गया था. तो जब हम वापस अपने शहर जेया रहे थे मैं उससे फिरसे चुड गयी. चूड़ने के बाद मैं गाड़ी में वापस जाके बैठ गयी. अब आयेज बढ़ते है.

मैं नंगी गाड़ी में बैठी थी, पीछे की सीट पर. पंकज गाड़ी के बाहर खड़ा कपड़े पहन रहा था. फिर मैने भी आयेज होके आयेज वाली सीट से अपने कपड़े उठाए, और पहनने लग गयी. मैं बहुत तक गयी थी. फिर पंकज गाड़ी ड्राइव करने लगा, और मुझे नींद आ गयी.

जब तक मेरी आँख खुली, तो हम घर पहुँच चुके थे. पंकज ने मुझे आवाज़ दी-

पंकज: मेडम, मेडम.

फिर मेरी नींद खुली तो वो बोला-

मैं: हा क्या हुआ?

पंकज: मेडम घर आ गया.

मैं: ओक.

मेरे दिमाग़ मैं बहुत सारी चीज़े चल रही थी. फिर मैं गाड़ी से उतरी, और घर के अंदर जाने लगी. जाने से पहले मैने पंकज को बोला-

मैं: पंकज आप आज की छुट्टी लेलो, लंबे सफ़र में आप तक गये होगे.

पंकज: जी मेडम.

ये बोल कर मैं घर मैं चली गयी. फिर मैं अपने रूम में गयी, और सो गयी. कुछ घंटो बाद मेरी नींद खुली, और मैं उठ गयी. मुझे जो कुछ पंकज के साथ हुआ उसके ख़याल आ रहे थे. मुझे लगने लगा की मुझे ये नही करना चाहिए था, और मुझे अफ़सोस होने लगा. फिर मैने सोचा की बस अब और नही करूँगी ऐसा कुछ भी.

फिर मैं बातरूम में जाके फ्रेश हुई, और नहा धो कर रेडी हो गयी. उसके बाद मैने ब्रेकफास्ट किया, और ऑफीस के लिए निकल पड़ी. आज पंकज नही था, तो गाड़ी मैने खुद ड्राइव की. फिर ऐसे ही सारा दिन काम में निकल गया.

अगले दिन मैं उठी, और ऑफीस जाने के लिए रेडी हुई. आज पंकज आया हुआ था, और बाहर गाड़ी में मेरी वेट कर रहा था. मैने आज एक ओनेपीएसए ड्रेस पहनी थी ऑरेंज कलर की. फिर मैं गाड़ी में जाके बैठ गयी, और पंकज गाड़ी ड्राइव करने लगा. वैसे तो मुझे पंकज की ईमानदारी पर भरोसा था, लेकिन फिर भी मैने उसको बोल दिया-

मैं: पंकज जो कुछ हमारे बीच हुआ, वो बस यही तक था. अब तुम भी सब भूल जाओ, और मैं भी भूल जौंगी.

पंकज: जी मेडम.

मुझे पंकज से कुछ ऐसे ही जवाब की उमीद थी. उसकी जी मेडम सुन कर मेरे मॅन का बोझ हल्का हो गया. लेकिन ये बस मेरा वहाँ था, क्यूंकी उस वक़्त तक मैं नही जानती थी, की मेरे साथ आयेज क्या होने वाला था.

फिर हम ऑफीस पहुँच गये, और मैं जाके अपने कॅबिन में बैठ गयी. मैं रोज़ की तरह काम में बिज़ी थी, और फिर लंच टाइम हो गया. लंच करके जब मैं कॅबिन में आई, तो पंकज पहले से मेरे कॅबिन में बैठा था.

पंकज बहुत कम मेरे कॅबिन में आता था. कभी कोई ज़रूरी काम होता था, तो ही वो मेरे कॅबिन में आता था. तो मुझे लगा की कोई ज़रूर बात होगी. तो मैने उससे पूछा-

मैं: हा बोलो पंकज, कोई काम था.

पंकज कुर्सी पर दूसरी तरफ मूह करके बैठा था. जब उसने मेरी आवाज़ सुनी, तो वो खड़ा होके मेरी तरफ घूम गया. मैं आयेज बढ़ रही थी. तभी वो भी आयेज बढ़ा, और उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया. इससे पहले मैं कुछ समझ पाती, उसने अपने होंठ मेरे होंठो पर चिपका दिए, और मेरे होंठ चूसने लगा.

तभी मैने उसको पीछे हटाने की कोशिश की, लेकिन उसने मुझे अपनी बाहों में कॅसा हुआ था. फिर मैने ज़ोर का धक्का मार कर उसको अपने से अलग किया. मैं उसको बोली-

मैं: पंकज ये क्या है? मैने बोला था ना की जो हो गया सो गया.

पंकज: ऐसे कैसे हो गया मेडम. पहले आपने मुझे अपना स्वाद चखा दिया, लेकिन अब मुझे कह रही है की भूल जाओ. मैं ऐसे नही भूल सकता.

ये बोलते ही उसने मुझे खींच कर अपनी बाहों में भरा, और फिरसे किस करने लगा. मैं पीछे ना हो जौ, इसलिए उसने मुझे ज़ोर से जाकड़ लिया, और मेरे सर के पीछे भी हाथ रख लिया ताकि किस ना टूटे. उसका बदन मेरे बदन से चिपका हुआ था, और उसका खड़ा लंड मेरी जांघों से टच हो रहा था.

अब मुझे भी गर्मी चढ़नी शुरू हो गयी थी, तो मैं उसका साथ देने लगी. जब उसने देखा की मैं साथ दे रही थी, तो उसने दोनो हाथ मेरी गांद पर रख दिए, और गांद दबाते हुए मेरी ड्रेस उपर उठा दी. अब वो पनटी के उपर से मेरे चूतड़ मसल रहा था.

मेरी छूट गीली होनी शुरू हो चुकी थी, और मैं कंट्रोल खो रही थी. फिर उसने मेरी ड्रेस को मेरे कंधो से नीचे करके मेरे बूब्स बाहर निकाल लिए, और उनको चूसने लगा. साथ-साथ वो मेरी गांद के चियर में हाथ फेरता रहा. मेरी छूट अब गीली हो चुकी थी.

फिर उसने मुझे घुमाया, और टेबल पर झुका कर आधा उसपे लिटा दिया. उसने मेरी पनटी उतरी और अपना लंड बाहर निकाल कर मेरी छूट पर रगड़ने लग गया. मैं आहह आ करने लगी. फिर एक ही झटके में उसने पूरा लंड मेरी छूट में डाल दिया. दर्द से मेरी आ निकल गयी. लेकिन मैने ज़्यादा आवाज़ नही की, ताकि किसी को पता नही चल जाए.

अब पंकज तेज़ी से मेरी छूट में लंड अंदर-बाहर करके मुझे छोड़ने लगा. उसने मेरी पीठ पर हाथ रख कर मुझे टेबल पर दबा दिया, और पीछे से घपा-घाप मुझे छोड़ता रहा. उसकी स्पीड बढ़ती गयी, और मेरी छूट से पानी निकलता गया. मैं झाड़ चुकी थी, और लंड अंदर-बाहर होने से छाप-छाप की आवाज़े आ रही थी.

फिर वो भी ज़ोर के धक्के मारते हुए आ आ करने लगा. लेकिन इस बार उसने पानी बाहर नही निकाला, और मेरी छूट के अंदर ही निकाल दिया. मुझे उसका गरम-गरम पानी अपनी छूट में महसूस हो रहा था. फिर उसने मुझे छ्चोढा, और अपनी पंत पहनने लगा. मैं हाँफती हुई कुर्सी पर बैठ गयी, और उसको बोली-

मैं: पंकज अब ये कब तक चलेगा. तुम्हे ऐसा नही करना चाहिए था.

पंकज: मेडम जब तक मेरा मॅन नही भरता तब तक तो आपको ये करना ही पड़ेगा.

मैं समझ गयी थी, की अब उसने मुझे अपनी रंडी समझ लिया था. फिर वो मेरे कॅबिन से बाहर चला गया.

इसके आयेज क्या हुआ, वो आपको अगले पार्ट में पता चलेगा. अगर आपको कहानी का मज़ा आ रहा हो, तो इसको अपने फ्रेंड्स के साथ भी ज़रूर शेर करे.

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