सावली सलोनी जवान लड़की

आज पूरे बारह साल बाद बंगलोर स्टेशन आना हुआ. यही पढाई पूरी करके दिल्ली गया था. कितना कुछ बदल गया है यहाँ. टाक्सी लेकर फ्लैट में आया. कामवाली बाई काम कर रही थी. साली कांता लग रही थी. थोड़ी सावली है पर चलेगी. उसकी चाल में एक मस्ती है, और यही मस्ती राजलक्ष्मी की याद ताज़ा करती है. सावली सी, गठीला बदन, उभरे वक्ष, और वही मस्ती भरी चाल. वह जींस में भी जचती थी और सलवार में भी. उसके बाल घुंगराले-घुंगराले, मंद मंद मुस्कान, नशीले आँखें, बस सब कुछ बहुत ही आकर्षक था. वह सुन्दर नहीं थी, फिर भी बड़ी आकर्षक थी.

राजी – मैं राजलक्ष्मी को यही बुलाता था – और मैं शुरू-शुरू में बिलकुल भी बात नहीं करते थे. पर, जैसे-जैसे साल गुजरा हम दोनों हाय-हेल्लो करने लगे. कॉलेज से दिसम्बर के महीने में पिकनिक जाने का प्लान बना. नंदी हिल्स जाना तय हुआ. और हम सब निकल पड़े नंदी हिल के ओरे. बहुत ही मजे में दीन गुजरा, वापस आते-आते सब चूर-चूर हो गए थे. बंगलोर आते आते लग-भग रात के ८.३० बज गए थे. सब यहाँ वहा उतर गए. बस मैं और राजी रह गए थे कॉलेज की बस में. राजी बोली “सुनो प्रदीप अगर तुम बुरा न मनो तो क्या मुझे आज ड्रॉप कर दोगे?” मैं थोडा सा संकोच करा, पर बोला – “ठीक है”. इससे पहले आज तक मैं राजी के घर नहीं गया था. जब हम दोनों उसके घर पहुचे तो लग-भग रात के दस बज गए थे. उसका घर थोड़े सुन-सान से एरिया में था. घर की बत्ती भी नहीं जल रही थी. जैसे ही मैं बाइक रोका, वह बोली – “प्रदीप, तुम्हे जल्दी तो नहीं है न?”. मैं बोला, “नहीं”. “मैं लाइट जला लूं फिर चले जाना.” मैं बोला – “ठीक है.”

पर, जैसे ही उसने घर की बत्ती जलाने की कोशिश की तो वह जली नहीं. फयूस चला गया था. मैंने घर का फयूस ठीक किया और जब समय देखा तो सवा गयारह बज गए थे. राजी बोली, “बहुत रात हो गयी है. तुम खाना खा के चले जाना.” मैंने बहुत मना किया, पर वह एक नहीं मानी, बोली “मम्मी ने बना रखा है. मेरी कस्सिन की शादी है, मम्मी-डैडी वही गए हैं सुबह ही लौटेंगे. हम दोनों टेबल पर बैठ कर खाना खा ही रहे थे की बत्ती फिर से गुल हो गयी. राजी उठी पर न जाने क्या हुआ, वह टेबल से टकरा के गिर पड़ी. मैं अँधेरे में उस तक पंहुचा, और यहाँ वहां ढूंढते हुए मेरा हाथ उसके वक्षो पर चला गया. मैं सहम सा गया. न जाने वह मेरे बारे में क्या सोचेगी, आखिर है तो मेरी क्लास्स्मेट. मैंने उसे सॉरी कहा और उसे एक हाथ से सँभालते हु फिर से कुर्सी पर बिठा दिया. उसका पैर कुर्सी के कोने से टकरा गया था और वह टेबल के साइड से टकरा के गिरी थी. उसके पीठ पर जोर की चोट लगी थी. उसे बड़ा दर्द हो रहा था. पर मैं क्या करता. मैंने बहार जाकर फिर से फयूस ठीक किया और, वापस आ गया. जैसे ही वापस आया, मैंने देखा की राजी आइयोदेक्स लगा रही थी पीठ पर. मैं दरवाज़े की आड़ में उसे देखता रहा. उसका सलवार कमीज पीठ की ओर से उठा हुआ था, और मुझे उसका सावला बदन दिख रहा था. मेरे कान लाल होने लगे, मुझे चुल मचने लगी. मैं मौके की तलाश में लग गया. मैं वापस लौट गया, और ज़ोर से पैर पटकता हुए वहा आया. मेरी आवाज सुन कर, राजी ने तुरंत सलवार नेचे कर दी और फिर से कुर्सी पर बैठ गयी.

यह कहानी भी पड़े  गाँव के खेत में पुष्पा भाभी की चुदाई - 2

हम दोनों खाना खाने के बाद जैसे ही उठे, मैंने देखा की राजी उठ नहीं पा रही है. मैंने उसे सहारा देते हुआ कहा, “तुमको अगर बुरा न लगे, तो क्या मैं आइयोदेक्स लगा दूँ?” वो बोली – “बुर्रा नहीं लगेगा, पर तुम्हे देर हो जाएगी.” मैंने तब तक आइयोदेक्स हाथ में उठा लिया था, और ढक्कन खोलते हुए मैं उसके पास आ गया. वह कुर्सी पर ही बैठी थी, पर मैंने उसे सहारा देते हुए सोफे पर उलटे लिटा दिया. मैंने धेरे से उसकी सलवार ऊपर की और हलके-हलके से उसकी पीठ पर आइयोदेक्स लगाने लगा. उसकी पीठ पर सूजन आ गयी थी सो मैं बहुत ही धेरे से लगा रहा था. उसकी उठी हुई सलवार मुझे उसकी गांडो के दर्शन करा रही थी. मुझे मजा आने लगा. और मेरे हाथ धीरे-धीरे उसे सहलाते हुए उसकी ब्रा की ओर बढे. वह समझ के भी अनजान रही. मैं बोला – “क्या मैं तुम्हारे ब्रा का पिछला हिस्सा खोल दू ? यह सफ़ेद है और इस पर आइयोदेक्स लग रहा है. और यह हट जाये तो हाथ भी फ्री हो जायेगा.” वह नहीं बोलती इससे पहली ही मैंने उसे खोल दिया. उसमे उसके वक्षो का तनाव था. और वह मुझे तनाव दे गया. उसका बदन बहुत ही मोहक लग रहा था. मैं उसकी गर्मी महसूस कर पा रहा था. मुझे बहुत आनंद आने लगा. और मैं फिर से उसे धीरे-धीरे उसके पीठ सहलाने लगा.
राजी का हाथ भी हलके से हिलने लगे. वह सोफे को अपने पंजो से दबाने लगी. मैंने धीरे-धीरे से उसकी पीठ को सहलाते हुए, उसके कंधे पे हाथ रख दिया. हम दोनों इतने थके हुए थे पिकनिक से आ के की मुझे यकीन है, उसे बड़ा मजा आ रहा था होगा. जैसे ही मैंने उसके कन्धों को सहलाना चालू किया, उसने मेरे हाथो को अपने सर और कंधे के बीच में दबा दिया. मैं समझ गया, और उसके कंधे की हलकी-हलकी मालिश करने लगा. अगले ही शनं मैंने देखा की उसने अपने दोनों खंधे अपने सर की ओर दबा लिया है, और हलके से अपने बालो को झटकाया. मैं होश खो बैठा, सोचा जो होगा देखा जायेगा, मैंने अपने हाथ उसके गांड पे रख दिए, और उन्हें सहलाने लगा. वो कुछ नहीं बोली तो मैंने उसके पैजामे के ऊपर से ही उसके गांड को चूमना चालू कर दिया, उसका भी होश खोने लगा, और मेरा भी. उसने लम्बी सी सासे भरना चालू कर दिया, और मेरे शरीर में एक कम्पन सी होने लगी. मैंने उकसे गांड को चुमते हुआ, अपना हाथ, उसके उठे कुरते वाले हिस्से पे रखा और कोने से अपने हाथ उसके वक्षो की ओर ले गया. उन्हें पकड़ के मैं उन्हें धीरे-धीरे से सहलाने लगा. उसका ब्रा और कुरता रूकावट पैदा कर रहे थे, पर मैं उठ कर उसके गांड पे बैठ गया और अपने दोनों हाथों से उसके वक्षो को सहलाने लगा. वो काफी बड़े थे, पर मैंने अभी उन्हें देखा नहीं था. उसका निप्पल कडा हो गया. हम दोनों पिकनिक से इतने थक चुके थे की हम दोनों को इसमें बड़ा मजा आ रहा था.

यह कहानी भी पड़े  दो रंडियों का कॉलेज टूर मे चुदाई

मैंने धीरे से उसे सिधे लिटा दिया, और दोनों हांतों से उका कुरता उठा दिया, और खीच कर उतार दिया. अब बस उसका ब्रा था, पर मैंने उसे नहीं उतारा. मैं उसके वक्षो को दबाने लगा, और एक झटके से मैंने अपना मुह उसके निप्पल पे रकते हुए उन्हें चुसना चालू कर दिया. व़ोह बहुत प्यारे थे. बिलकुल मखमल की तरह नर्म और बेहद गर्म. उसकी बदन की गर्मी में दिसम्बर की सर्दी दूर होने लगी. मैं उसके काले-काले निप्पल चूसते हुए अपना पैंट उतारने लगा, और फिर मैंने अपने लंड को बाहर निकाल लिया. मैं अपने लंड को उसके बदन पर फेरने लगा. मुझे बड़ा आनंद आ रहा था. उसे फेरते हुए मैं, उसके मुह के पास आ गया. वो संकोच करने लगी. उसको मुह में लेने की आदत नहीं थी. पर मैं एक नहीं सुना, और अपना लंड उसके मुह में डाल दिया. उसकी नर्म और गर्म मुह मुझे पागल करने लगा. मैंने धीरे से झुकते हुए उसका पैजामा उतार दिया और उसकी चड्डी के ऊपर से उसे सहलाने लगा, उसे मजा आने लगा और उसने मेरा लंड सहलाना चालू कर दिया, मैंने एक ऊँगली से उसकी चड्डी को खिसकाते हुए उसके बुर को चूमने लगा. वह सह नहीं पाई और मुझे खीच के हटा दिया. मैं सिधे हो के उसके ऊपर लेट गया, और उसके छाती को दबाते हुए उसे चूमने लगा. वह बड़ी ही मस्त थी, और बिलकुल गर्म. शब्द बयां नहीं कर सकते की मुझे कितना मजा आ रहा था. मैं उसके होंटो को चुमते हुए अपना लंड उसके चूतके अन्दर धीरे-धीरे डालने लगा. उसकी का यह पहली चुदाई थी, और वह डर गयी पर मैंने धीरे-धीरे उसके बुर को सहलाते हुए महसूस किया की वह बहुत गीला हो चूका है. मैंने अपना लंड फिर से उसके अन्दर डालना शुरु किया और शब्द बयां नहीं कर सकते की मुझे कितना प्यारा एहसास हुआ. मुझे बेहद मजा आने लगा, धीरे-धीरे मेरा पूरा लंड उसकी चूत में समाह गया. वह कर्हाने लगी, ऊई माँ …. अआह … आह … ऊह … उम .. और हम दोनों एक दुसरे को चूमने लगे, मैंने उसे होंटों को काटना चालू कर दिया और उसने मेरे … हम दोनों का जीभ एक दुसरे के मुह में जा रही थी, और हम दोनों को बड़ा मजा आ रहा था. तकरीबन पंद्रह मिनट तक उसके चूत को चोद के मेरा लंड थक गया, और मैंने अपना वीर्य उसकी चूत में गिरा दिया. हम दोनों एक दुसरे से लिपट के वाही सोफे पर सो गए. सुबह जब मैं उठा तो वह भी उठ गयी, हम दोनों बिना कुछ कहे सुने अपना कपडा पहनने लगे, तब मैंने देखा की वो कितनी खूबसूरत थी. उसका गठीला बादाम बहुत ही प्यारा था. उसके वक्ष हलके से गहुआ रंग के थे. मैं फिरसे उसकी ओर बढ़ा पर उसने अपना हाथ अपनी छाती पे रख लिया. मैं इशारा समझ गया, और अपने कपडे पहेन कर अपनी गाडी से निकल पड़ा.
अगले दिन सभ कुछ पहले जैसे हो गया. वह और मैं अपने-अपने रस्ते चलने लगे. पर मैं उसकी बदन की नरमी और गर्मी आज तक भुला नहीं पाया …….

Dont Post any No. in Comments Section

Your email address will not be published.


error: Content is protected !!