रिक्शा वाले चाचा और मेरी कुँवारी जवानी

हेलो फ्रेंड्स, मेरा नाम दीपक है. ये कहानी मेरी एक पातिका डिंपल (बदला हुआ नाम) की है. जिसने मुझसे अपनी सच्ची कहानी बताई और मुझसे लिखने की रिक्वेस्ट की. ये कहानी डिंपल की ज़ुबानी पढ़िए.

मेरा नाम डिंपल है और मई उप के अल्लहाबाद से हू. मेरी फॅमिली मे हम टीन लोग है, पापा, मा और मई. ये कहानी मेरी पहली चुदाई की है. जब मैने नयी-नयी कॉलेज मे अड्मिशन ली थी, तब पापा ने कॉलेज जाने के लिए एक रिक्शा लगवा दिया.

रिक्शा-वाला 45 साल का और भोली सी शकल वाला था. उनका नाम रिज़वान था. उनको मई रिज़वान चाचा बोलती थी. कॉलेज मे मेरे साथ मेरी कुछ पुरानी फ्रेंड्स भी थी. हम सबकी जवानी अभी निखार ही रही थी और इन सब के बीच हमे कॉलेज के नाम पर थोड़ी और आज़ादी भी मिल गयी थी.

मेरी सहेली शीतल कॉलेज मे सेक्स स्टोरीस की बुक्स और नॉवेल लाती थी. हम सब कॉलेज की लाइब्ररी मे कोने की टेबल पे, सेक्स स्टोरीस की बुक्स अपने नोट्स मे छुपा के पढ़ती थी.

मेरी हालत उन बुक्स की स्टोरीस पढ़ कर और सोच कर सबसे ज़्यादा खराब हो जाती थी. काई बार मई इतनी गरम हो जाती थी, की क्लास बंक करके पूरा टाइम कॉलेज के वॉशरूम मे बैठी रहती थी.

मेरे घर मे मेरी मों थोड़ी स्ट्रिक्ट थी, इसीलिए मई सेक्स स्टोरीस की बुक्स घर लाने से डरती थी. एक बार ग़लती से एक सेक्सी कहानियो की बुक मई अपने बाग मे भूल गयी और कॉलेज के बाद, जब रिक्शे से घर के लिए निकली, तो रास्ते मे अचानक मुझे याद आया, की बुक मेरे बाग मे रह गयी.

मैने बाग मे देखा, तो दर्र से मई सहम गयी. फिर कुछ समझ नही आया, तो मैने वो बुक धीरे से बाग से निकाल कर, रिक्शे की सीट की साइड मे तोड़ा सा गॅप था, उसी गॅप मे डाल दी.

नेक्स्ट दे मॉर्निंग मे मई रिक्शे से कॉलेज के लिए निकली, तो अचानक मेरा ध्यान सीट की साइड मे गया. मैने देखा, तो बुक हल्की सी दिख रही थी. मैने धीरे से उंगली डाल कर बुक निकाली और तुरंत बाग मे डाल ली और फिर मुझे चैन की साँस आई.

लाइब्ररी मे जब मैने वो बुक ओपन की, तो मेरे होश उडद गये, क्यूकी ये बुक वो नही थी, जो मैने कल रखी थी. अब मई काफ़ी दररी हुई थी. मैने बुक अपनी फ्रेंड्स को दे दी और शाम को कॉलेज से लौट-ते टाइम जब रिक्शे मे बैठी, तो शरम से लाल थी.

लेकिन रिज़वान चाचा बिल्कुल नॉर्मल दिखे. घर जाकर भी मेरी हालत खराब रही, की कही रिज़वान चाचा को पता ना चल गया हो.

अगली सुबा मई फिर कॉलेज के लिए रिक्शे मे बैठी और साइड मे देखा, तो बुक फिरसे साइड मे हल्की सी दिखी. मई दर्र तो रही थी, बुत थोड़ी हिम्मत करके, मैने बुक निकाल कर बाग मे डाल ली.

फिरसे जब मैने लाइब्ररी मे बुक ओपन की, तो पाया की ये बुक कामुक तस्वीरो और कहानियो से भारी थी. मेरी दर्र से हालत तो खराब थी, लेकिन सब कहानियो ने मेरी वासना को दर्र पर हावी कर दिया.

मई अब समझ गयी थी, की बुक्स ज़रूर चाचा ही रख रहे होंगे. अब हर दिन मई रिक्शे मे से नयी बुक ले आती और मेरी सहेलिया उन बुक्स को ले जाती. फिर कुछ दिन बाद, मैने देखा, की अब सीट मे कोई बुक नही है.

ऐसे ही टीन दिन चला. फिर अचानक एक दिन मैने सीट की साइड मे, एक बुक फ़ससी हुई देखी और उसे भी धीरे से निकाल कर बाग मे डाल लिया. कॉलेज मे उतरने के बाद, मई जैसे ही गाते से अंदर जाने लगी, तो मैने देखा, की चाचा सीट हटा के देख रहे थे और हल्का सा मुस्कुरा दिए. मई समझ गयी, की ये सब चाचा की ही करतूत थी.

शाम को जब मई रिक्शे से वापस आ रही थी, तो थोड़ी डोर खाली रास्ते मे चाचा बोले-

चाचा: डिम्पी बिटिया, बुक वापस रख देना, मई किराए पर लता हू.

मई शरम से लाल हो गयी और कुछ नही बोल पाई. जब मई घर पर उतरी, तो चाचा बोले-

चाचा: ठीक है ना बिटिया.

मैने हा मे सिर हिला दिया और सीधे घर मे चली गयी. मई नेक्स्ट दे शाम को कॉलेज से लौट रही थी, तो चाचा ने बोला-

चाचा: बेटी बुक्स वापस करनी है, लाई हो?

मैने हा मे सिर हिला दिया, तो वो बोले-

चाचा: वही रख देना, मई वापस कर दूँगा.

अब ये मेरा डेली का रुटीन हो गया था. चाचा डेली न्यू बुक्स सीट मे रख देते और कॉलेज जाते टाइम मई बुक ले लेती और वापसी मे उसी मे रख देती. कुछ दीनो बाद, चाचा ने रिक्शे मे न्यू सीट लगवा दी, जिसमे साइड से बुक निकाली या रखी नही जेया सकती थी.

पहले तो मई न्यू सीट देख कर तोड़ा सा खुश हुई, बुत साइड मे उंगली नही जेया पाई, तो थोड़ी उदास हो गयी. चाचा खाली रास्ते मे बोले-

चाचा: बेटी सीट अब उठा करके, बुक निकालनी या रखनी होगी, तो यही खाली रास्ते मे तोड़ा उठ कर सीट उठा कर बुक ले लेना और शाम को ऐसे ही रख देना.

फिर चाचा तोड़ा सा रिक्शा रोके और बोले: सीट तोड़ा सा उठा कर निकाल लो बुक.

मई हल्का सा उठी और सीट उठा कर बुक ले ली और तुरंत बाग मे रख ली. अब ऐसे ही दिन बीतने लगे. मेरी चाचा से शरम थोड़ी सी कम कर दी अब. चाचा से अब थोड़ी बात भी कर लेती और चाचा मेरी पसंद की कहानियो वाली और कामुक पिक्चर वाली बुक लाने लगे.

चाचा एक दिन बोले: बेटी बस पढ़ती हो, या कभी कुछ करने का मॅन भी होता है.

मई बस इतना ही बोल पाई: होता तो है.

चाचा बोले: मई तो सब कहानी पढ़ चुका हू और कुछ तो मेरी फॅवुरेट भी है. अगर कभी मॅन हो तो बताना, साथ मे बैठ कर पढ़ेंगे.

मई ये सोच कर अंदर से इतनी उतावली हो गयी, क्यूकी अभी तक लाइब्ररी मे चुप कर कहानी पढ़ रही थी. मैने पूछा चाचा से-

मई: कहा पढ़ेंगे?

चाचा बोले: मेरे रूम पर आराम से पढ़ सकती हो, खाली ही रहता है.

और फिर वो बोले: जब भी मॅन हो, एक दिन पहले बता देना. मई कुछ और भी अची बुक्स रूम पर रख दूँगा.

ये बात पूए दिन मेरे अंदर चलती रही, क्यूकी मई भी अकेले बैठ कर बुक को पढ़ना चाहती थी. नेक्स्ट दे शाम को मैने घर जाते समय चाचा से पूछा-

मई: चाचा मई कल आपके रूम पर बुक्स पढ़ सकती हू?

तो चाचा बोले: हा क्यू नही, कल कॉलेज के टाइम मे तुमको सीधे अपने रूम पर छोढ़ दूँगा और फिर शाम को घर पर ला दूँगा.

मई मान गयी और ओक बोल दिया. अगली सुबा मई जल्दी से रेडी हो गयी और देखा, तो चाचा भी जल्दी आ गये थे. मई बिना कुछ बोले रिक्शे मे बैठ गयी और चाचा के साथ चल दी. जैसे ही खाली रास्ता आया, चाचा बोले-

चाचा: बिटिया सीट से लिफ़ाफ़ा निकाल लो.

मई हल्का सा उठी और लिफ़ाफ़ा निकाल लिया. उसमे बुर्क़ा था. फिर चाचा बोले-

चाचा: तुम कॉलेज ड्रेस मे हो और ऐसे मेरे रूम मे जाओगी, तो सही नही होगा. इस बुरखे को अपने बाग मे डाल लो और कॉलेज से पहले जो पब्लिक टाय्लेट है, वाहा अंदर जेया कर उपर से पहन कर आ जाना.

मई तो बुक्स की कहानियो के इतने नशे मे थी, की सब मान लिया. चाचा ने पब्लिक टाय्लेट से तोड़ा सा आयेज रिक्शा लगा लिया और 2 रुपय का चेंज मुझे दे दिया. मई समझ गयी, की ये टाय्लेट वाले को देने के लिए है.

मई अंदर गयी और बुर्क़ा पहन लिया. बाहर आई और सीधे रिक्शे मे बैठ गयी. चाचा रिक्शा लेकर अपने रूम की तरफ चल दिए. उनका रूम भूत ही पतली-पतली गलियो के अंदर एक कोने मे था. चाचा ने अपने रूम से पहले एक पार्किंग मे रिक्शा रोकी और बोले-

चाचा: मई रिक्शा लॉक करके पहले अपने रूम मे जौंगा और फिर तुम 2 मिनिट रुक के रूम मे आ जाना.

मैने ऐसा ही किया और उनके रूम मे जाते ही मई भी चली गयी.

आयेज की कहानी नेक्स्ट पार्ट मे. ये कहानी का फीडबॅक आप मुझे मेरी एमाइल पर भेज सकते है.

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