पाखंडी बाबा की वासना का शिकार

हेलो दोस्तों, ये एक सच्ची कहानी है. मेरा नाम रचित है. मैं बदायूं का रहने वाला हूँ. . मेरी प्रज्ञा दीदी की शादी मैनपुरी में हो गयी थी. मैं भी हर ६ महीने में प्रज्ञा दीदी के घर जाता था. मेरे जीजा विवेक बहुत ही अच्छे आदमी थे, पर उनकी माँ और मेरी दीदी की सास बहुत ही चंट औरत थी. वो दीदी को हर बात पर टोकती रहती थी. खैर किसी तरह जिंदगी चल रही थी. पर एक समस्या इन दिनों सामने आ गयी. दीदी के शादी के ४ साल हो गये, पर बच्चा न हुआ. मैं दीदी के घर होली में गया तो देखा की उनकी सास बात बात पर दीदी को बच्चा न होना का ताना मारती रहती है. मुझको ये देख बहुत दुःख हुआ. मैंने जीजा जी से इस बारे में बात की तो वो बोले की पुराने लोग ऐसे ही होते है. उनकी सोच ऐसी ही होती है.

मैंने, जीजाजी और दीदी ने यही हल निकला की डॉक्टर से इलाज करवाया जाए. पर दोस्तों २ और साल गुजर गये. प्रज्ञा दीदी के बच्चा न हुआ. मैं दिन पर दिन टेंशन में आ गया. अब दीदी भगवान भरोसे हो गयी और मंदिर मंदिर के चाकर लगाने लगी. कुछ दिन बाद उनकी किसी सहेली से बताया की कुछ दूर पर एक बाबा बैठता है. झाड़ फुक करके उन लोगों का बच्चे पैदा कर देता है.

रचित! मुझको ऑफिस जाना है, इसलिए तुम अपनी दीदी को उन बाबा के पास ले जाओ! जीजा से कहा.

मैंने प्रज्ञा दीदी को अपनी स्प्लेंडर पर बैठाया और ३० किमी मैनपुरी के देहात में ले गया. वो बाबा उस देहात में अभी जल्दी ही प्रसिद्ध हुआ था. काफी भीड़ लगती थी उसके पास. वो कोई फ़ीस नही लेता था. पर आने वाले लोग जो श्रद्धा से उनको दे देते थे, वो वही ले लेता था. उनकी एक बड़ी सी झोपडी थी. मैं प्रज्ञा दीदी को उनके पास ले गया. समयसा बताई. उसने मेरी दीदी को निचे से उपर तक देखा. प्रज्ञा दीदी काफी खूबसूरत थी. किसी राजकुमारी से कम नही लगती थी. उनकी आँखे बड़ी बड़ी थी, भोहे, होंठ, गाल एक एक चीज बड़ी खूबसूरत थी. बाबा मेरी दीदी को पहली बार देखा तो घूर के देखता ही रह गया. फिर वो मुस्काया.

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बेटी! तुमको ३ महीने तक हर शुक्रवार मेरे पास आना पड़ेगा!! वो बबवा बोला. प्रज्ञा दीदी तो वैसे ही नसीब की मारी थी. उनकी सारी सहेलियों के बच्चे हो गये थे. बस उनके ही नहीं हुए थे.

ठीक है बाबाजी! दीदी ने कहा. उसने मुझको बाहर रोक दिया और दीदी को लेकर अंदर चला गया. दीदी १ घंटे बाद वापिस आई. पता नहीं वहाँ अंदर क्या हुआ. बाद में जब मैं दीदी को लेकर लौटने लगा तो वो बोली की मेरे भाग्य में संतान सुख नहीं है. बाबा ने कहा की यदि दीदी उनके साथ ३ महीने तक सम्भोग करे तो सायद उनको संतान हो जाए.

अब तुम ही बताओ रचित! मैं क्या करू ?? प्रज्ञा दीदी ने मुझसे पूछा. मैं मोटरसाइकिल चलाता जा रहा था, सोचता जा रहा था. २ घंटे बाद मैं जब दीदी को लेकर गहर पंहुचा तो मैंने कहा की अगर बाबा से सम्बन्ध बनाने से बच्चा हो जाता है तो दीदी कर लो. तुम्हारी सास और दूसरे घर वालों की कीच कीच तो नहीं सुन्नी पड़ेगी. ये गुप्त बात मेरे और दीदी के बीच में थी. अगले शुक्रवार मैं फिर दीदी को लेकर बाबा के पास पंहुचा. दीदी आज हल्की हरी रंग की साडी में थी. बड़ी खिली खिली लग रही थी. बाबा उनको देख के आसक्त हो गया. उसने मुझको बाहर ही रुकने को कह दिया. प्रज्ञा दीदी को हाथ पकड़ के अंदर ले गया. मैं बाहर कुटीया में वेट करने लगा. आप ये कहानी नॉन वेज स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.

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उस बाबा का नाम नरेन्द्र बाबा था. वो खुद को साईं का नया अवतार बताता था. अंदर उसने एक आलिशान कमरा बना रखा था. वो दीदी को अपने बेडरूम में ले गया. प्रज्ञा दीदी तो किसी तरह बस बच्चा चाहती थी, इसलिए ये करने को तैयार हो गयी थी. बाबा की बड़ी बड़ी दाढ़ी थी.

दीदी को अंदर ले जाते ही उसने दीदी से लिप्टा झपटी शुरू कर दी. उसने दीदी का पल्लू एक ओर सरका दिया. दीदी को उसने अपने बदल में बैठा दिया. उनके होठ चूसने लगा. दीदी ने कुछ नहीं कहा. क्यूंकि दीदी को बच्चा चाहिए था, दीदी के दोनों मस्त मस्त गोल गोल मम्मे देखके बाबा को लालच आ गया.

बेटी! इसको खोलो! बाबा बोला. मेरी दीदी तो बड़ी सीधी साधी थी, उन्होंने अपने ब्लोउज के बटन खोल दिए. बाबा ने जल्दी से उनका ब्लौज़ उतार दिया. बाबा प्रज्ञा दीदी के मस्त गोल गोल माम्मो को पीने लगा. मेरी दीदी बहुत ही संस्कारवान थी. शादी से पहले उनका किसी लडके से कोई अफ्फैर नही नही था. न ही वो शादी से पहले किसी लडके से चूदी थी. प्रज्ञा दीदी को इस बाबा ने चुदना कुछ ठीक नहीं लग रहा था. पर इंसान मजबूरी में क्या नहीं करता है. मेरी दीदी भी मजबूर थी.

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