पड़ोसी दादा जी के साथ चोदा चोदी का खेल

padosi-dada-ji-ke-sath-choda-chodi-ka-khelयह कहानी है मेरे पहले चोदा चोदी के खेल की! मेरा नाम पूर्वी है.. हमारे घर के पास एक फैमिली रहती है.. वे सब हमारे परिवार से काफी घुल-मिल गए हैं। एक तरह से हमारे परिवार एक रिश्ते की डोर से बंध गए थे।

उनके दादा जी मेरी पढ़ाई में मेरी बहुत हेल्प करते हैं। मैं अभी 12 वीं की परीक्षा की तैयारी कर रही हूँ.. मेरा अधिकाँश समय उनके दादाजी जी के पास ही ज्यादा समय बीतता है। दादाजी की पत्नी का देहांत हुए पूरे 5 साल हो गए हैं.. वो भी अभी जवान मर्द और पहलवान जैसे दिखते हैं।

एक बार मैं अपने स्कूल से आई, तो देखा कि घर के सामने एक गाड़ी खड़ी हुई थी और सभी तैयार होकर मेरा इंतजार कर रहे थे।
पूरी गाड़ी भरी हुई थी..

जैसे ही मैं पहुँची तो मम्मी ने कहा- चल जल्दी बैठ, आज पिकनिक के लिए जा रहे हैं। रात तक आ जाएंगे।
मैंने अपना बस्ता रखा और गाड़ी की ओर देखा तो कोई सीट खाली ही नहीं थी तो मम्मी ने कहा- तू आगे दादा जी की सीट में बैठ जा.. बाद में मेरे साथ पीछे बैठ जाना।

मुझे बड़ा अटपटा सा लगा, तब भी मन मार के मैं दादा जी की गोद में बैठ गई।

कुछ देर ही चले तो गाड़ी को धचके लगने लगे। मैं गिरने को हुई तो दादा जी ने मुझे अपने ओर खींच लिया और अपने हाथों को मेरे सीने के ऊपर से जकड़ लिया। मैं एकदम हक्की-बक्की रह गई.. तब भी बैठी रही। बार-बार गड्डे में गाड़ी गिरने से दादा जी के हाथों का कसाव और अधिक होने लगा।

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मैंने महसूस किया कि दादा जी का लंड खड़ा हो चुका था.. जो नीचे से मेरी गांड के नीचे रगड़ खा रहा था।
अब मैं भी मस्त होने लगी और उनके लंड की छुअन का आनन्द को लेने लगी। मुझे मालूम था की यह चोदा चोदी का खेल क्या होता है और कैसे खेला जाता है.

थोड़ी देर में ठंड बढ़ने लगी और तभी दादा जी के हाथ मेरी शर्ट के ऊपर से मेरे मम्मों को सहलाने लगे थे। मैंने अपने सर को नीचे झुका लिया।

मेरी गांड की दरार दादा जी का लंड के ठीक ऊपर ही फंसी थी। धीरे-धीरे दादा जी हिलने लगे और उनका खड़ा लंड मेरी चुत की ओर अग्रसर होने लगा था। मेरे मुँह से ‘उह..हु..’ की आवाज आने लगी।

थोड़ी देर में हम पिकनिक स्पॉट पर पहुँच चुके थे। आज कुछ अलग ही अनुभव हो रहा था.. मजा दुगना होने लगा।
हम सबने खूब मजा किया और वापसी होने के समय मम्मी ने मुझसे पूछा- तुझे पीछे आना हो तो आजा!
मैंने कहा- नहीं रहने दो।

सब गाड़ी में बैठने से पहले अपनी टंकी खाली करने चले गए.. मैंने भी पेशाब की और सबकी नजरें बचा कर अपनी पेंटी अपने उतार कर अपने स्कर्ट की जेब में रख ली और दादा जी की गोद में बैठ गई।

रात हो चली थी और अँधेरा भी काफी होने लगा था। ड्राइवर ने लाईट बंद कर दी.. और फिर शुरू हो गया मस्ती भरा चोदा चोदी का खेल।

इस बार तो दादा जी की पैंट की चैन खुली होने की वजह से उनका लंड सीधे ही मेरी गांड से टच होने के लिए उठ चुका था। मैंने उनकी ओर देखा, वो प्यार से अपना हाथ मेरे दूधों में फिराने लगे। मैं समझ चुकी थी कि आज मैं चुद ही जाऊँगी, उनकी हरकतों से ऐसा लगने लगा था।

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