जीवन मामा से चुदाई कहानी

सागर मेरा बहुत अच्छा दोस्त था, हमारे घर बचपन से आमने सामने थे और हमारी फ़ैमिली में बहुत घरेलू टर्म्स थे, जिस कारण हम भी अच्छे गहरे दोस्त थे! वैसे सागर मुझे बहुत अच्छा भी लगता था मगर उससे कभी काम की बात नहीं हो पायी थी! हम कई बार अंडरवीअर पहन के साथ नहाते थे और कभी बारिश में भी… ऐसे में, मैं सिर्फ़ सागर का मखमली बदन निहारता रहता था बस… उसके शरीर के कटाव, उसकी गाँड की गोल फाँकें और उस पर से सूती अंडरवीअर जो भीगने के कारण गाँड से चिपक जाती और उनके बीच की घाटी को साफ़ दर्शाने लगती थी!

संजीव भैया के साथ काँड के बाद मैं थोडा ठरकी होने लगा था इसलिये अब कोई लडका देखता तो सोचता था कि उसकी गाँड का छेद कैसा गुलाबी होगा और उसका लँड कितना बडा होगा और वो मेरे साथ वो सब कैसे करेगा जो संजीव भैया ने मुझे सिखाया था! अभी मेरी गाँड को केवल एक ही लँड मिला था मगर उस एक लँड ने मेरे मन में लाखों सपने भर दिये थे और मेरा ये कन्फ़्यूज़न भी खत्म कर दिया था कि मुझे लडकियाँ क्यों नहीं पसन्द आती थीं!
तभी मेरी ज़िन्दगी में जीवन मामा आये! वैसे तो वो सागर के मामा थे और गोरखपुर यूनिवर्सिटी से बी.ए. सैकण्ड ईअर कर रहे थे मगर मैं सागर का दोस्त था इसलिये वो मेरे भी मामा हो गये थे! मामा पहले भी हमेशा ही आते रहते थे! जब उनकी यूनिवर्सिटी में छुट्*टी होती वो सबसे मिलने आ जाते थे! मैं मामा से पहले हज़ारों बार मिल चुका था मगर सील टूटने के बाद जब उनको पहली बार देखा तो ना जाने एक अजीब सा नशा चढ गया उनको देखकर मुझे और मैं उनकी तरफ़ भी आकर्षित होने लगा! जीवन मामा टैरिकॉट की पैंटें पहनते थे!

काफ़ी अच्छा मस्क्युलर शरीर था उनका और इस बार जब उनका लँड ज़िप से उभरता दिखा तो मैं पागल सा होने लगा! फ़िर उनकी बडी सी मस्क्युलर मर्दानी गाँड देखी और उनके भरे भरे मस्क्युलर बाज़ू… मामा के हाथ भी बडे बडे थे और बडी बडी उँगलियाँ! मामा गेहुँए रँग के थे और हल्की हल्की मूछ रखे हुये थे और डेली अपना चेहरा शेव करते थे! घर पर अक्सर वो सिर्फ़ पैंट और बनियान ही पहनते थे जिस पर मैने पहले तो ध्यान नहीं दिया था मगर इस बार उनकी गदरायी बाज़ुओं से मेरी नज़रें हट नहीं रही थीं!

मामा जब भी आते, सागर के ही कमरे में सोते थे उसके ही बैड पर और हम दोनो को काफ़ी घुमाते फ़िराते थे! पिक्चर भी दिखाने ले जाते थे और कोल्ड-ड्रिंक्स पिलाते थे, जिस वजह से मैं और सागर उनका और बेसब्री से इन्तज़ार करते थे! उस बार भी हमने उनके साथ घूमना फ़िरना शुरू कर दिया! इस बार जब मैं मोटरसाईकल पर उनके पीछे चिपक के बैठा तो मेरे बदन में एक नयी अनुभूति हुई, वो जो संजीव भैया के साथ अकेले छुपने में हुई थी! मेरे पीछे सागर मुझे पकड के बैठा था! मगर ऐसा नहीं था कि उस बार सिर्फ़ मेरी ही नज़रें बदली थीं, मामा की आँखों में मुझे एक नया सा नशा दिखने लगा था! असलियत तो ये थी कि वो भी काफ़ी ठरकी थे और ना जाने कब से मेरे बडे होने का वेट कर रहे थे! इस बार उन्हें भी लगने लगा था कि मैं अब शायद उनके काम के लायक हो गया हूँ! अंदर ही अंदर वो भी काफ़ी खुश थे कि वो अब मुझे अपनी वासना का शिकार बना सकते थे, वो भी बिना शोर शराबे के…

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मेरी आदत थी, सुबह आँख खुलते ही सीधे सागर के घर चला जाता था! सिर्फ़ उसकी मम्मी जगी हुई काम में लगी रहतीं थीं, बाकी सब सो ही रहे होते थे! सागर के एक छोटा भाई और बहन थे और उसके पापा अजित राजपूत एक बैंक में मैनेजर थे! उस दिन जब मैं सागर के कमरे में घुसा तो मेरे होश उड गये! जीवन मामा केवल लुंगी पहने थे जो उनकी जाँघों तक उठी हुई थी और उन्होने सागर की तरफ़ ना सिर्फ़ करवट ले रखी थी बल्कि उन्होने अपना एक पैर पलटे हुए सागर की कमर और गाँड के ऊपर चढाया हुया था! उनका एक हाथ भी सागर के सर के पास था! देखने में तो लगा कि दोनों शायद सो रहे थे, मगर मेरे कमरे में घुसते ही मामा सीधे हो गये जिससे मुझे पता चला कि केवल सागर सो रहा था! मामा उसके बदन को रगडकर उसे अपनी ठरक का निशाना बनाने में लगे हुये थे! मुझे देखकर हल्का सा हडबडा गये!

“आओ, तुम तो बिल्कुल अलार्म की तरह आते हो सुबह सुबह…” उन्होने मुझसे कहा!
“जी मामा जी, सागर को उठाओ ना… आज भी छुट्*टी है, घूमने चलेंगे…” मैने कहा!
“अरे, इतनी सुबह सुबह कहाँ जायेंगे? अभी ५ बज रहे हैं! तुम भी थोडी देर और सो जाओ…” उन्होने मेरा हाथ पकड के बैड पर खींचते हुये कहा!
“नहीं मामा, अब नहीं सोना…” मैने ऐसे ही ज़िद की!
“अरे, सो जाओ…” उन्होने कहा! मामा ने अभी तक अपनी लुंगी ठीक नहीं की थी और उनका पूरा मस्क्युलर बदन दमक रहा था! छाती का एक एक कटाव साफ़ दिख रहा था! सीने पर हल्के हल्के बाल थे और बालों की एक लाइन उनकी छाती से होती हुई उनकी नाभि तक जा रही थी और फ़िर वहाँ से उनकी लुंगी की गाँठ के पीछे छुप जा रही थी!
“चल, लेट जा थोडी देर…” उन्होने मेरा हाथ पकड कर एक तरफ़ लिटा लिया! दूसरी तरफ़ सागर लेटा था! मैं जब उनके ऊपर से होकर सागर से छेडछाड कर उसको उठाने की कोशिश करने लगा तो जीवन मामा ने मेरे हाथ पकड लिये और पटक के लिटा लिया!
“चलो, सो जाओ अभी और सागर को भी सोने दो… उठाओ मत…” उन्होने मुझ पर अपनी एक मस्क्युलर, भारी सी जाँघ रख दी और मुझे दबा के लिटा लिया! मैने थोडा सा तो ना नुकुर किया मगर मामा की मर्दानी जाँघ की गर्मी हल्के हल्के मेरे सर चढ के बोलने लगी और मेरे अंदर काम की चाहत जगने लगी, जिससे मैं चुपचाप लेट गया!
“उँह… हटिये एक मिनिट…”
“क्या हुआ साले… लेट नहीं सकता चैन से?” मैने कहा तो मामा ने पूछा!
“जी मामा, करवट तो लेने दीजिये!” मैने कहा और अपना लँड बिस्तर पर रगड कर लेट गया! मुझे डर था कि कहीं मामा मेरा खडा लँड महसूस ना कर लें! मुझे शर्म तो आ ही रही थी! बस उस समय ऐसा समझो कि शर्म और कामदेव में लडाई चल रही थी! मामा ने भी मेरा दिल नहीं तोडा और तुरन्त ही अपनी जाँघ मेरी कमर पर रख दी और उनका एक हाथ मेरी पीठ पर आ गया! उनका शरीर गर्म था और मेरी बनियान से जो हिस्से बाहर थे उनको आग में झुलसा रहा था!
मैं कुछ देर के बाद इस अहसास का मज़ा लेने लगा और ऐसे ही सोने का नाटक करने के लिये अपनी आँखें बन्द कर लीं! इस बीच मामा के उठने की आवाज़ आई! वो बाथरूम में मूतने गये थे! मैने बिस्तर पर लेटे सागर को देखा, जिसकी पीठ मेरी तरफ़ थी! उसने अपने घुटने हल्के से मोड रखे थे, जिस कारण उसकी गाँड साफ़ दिख रही थी! क्योंकि खिडकी का पर्दा बराबर था इसलिये अंधेरा ही था मगर उसमें भी आँख गडाने के बाद मुझे दिख ही गया कि सागर की निक्*कर पूरी तरह से ऊपर नहीं थी और उसकी गाँड की फ़ाँकें ऊपर से काफ़ी दिख रहीं थी जिनको शायद मामा रगड रहे थे! तभी मामा के निकलने की आवाज़ आई तो मैने फ़िर आँखें बन्द कर लीं! मामा कमरे में दूसरी तरफ़ गये, उन्होने दरवाज़ा अंदर से बन्द कर लिया! मुझे चिटखनी लगने की आवाज़ आई! वो जब पास आये तो उन्होने बैड के पास कुछ रखा, मगर मैने देखा नहीं और आँख बन्द करे पलट के लेटा रहा! फ़िर मामा मेरे और सागर के बीच आकर लेट गये! उन्होने पहले सागर को हल्के से हिलाकर आवाज़ दी!
“सागर… उठा है या सो रहा है? मगर जब सागर ने कोई जवाब नहीं दिया तो उन्होने मुझे हिलाया!
“अरे अम्बर, तुम भी सो गये क्या?” मैं भी चुपचाप लेटा रहा जिससे वो समझे कि मैं भी सो गया हूँ! इस बार मामा ने सीधे मेरी गाँड पर अपनी जाँघ रख दी और अब वो हल्के हल्के अपनी जाँघ से मेरी गाँड रगडने लगे! मेरा दिल तेज़ तेज़ धडकने लगा! मैं जीवन मामा को ना जाने कबसे जानता था! आज वो मुझे अपना बनाने की तरफ़ पहला कदम उठा रहे थे! उनका हाथ मेरी बनियान के ऊपर से मेरा बदन सहला रहा था! काफ़ी अच्छे बडे बडे और गरम हाथ थे मामा के! फ़िर मुझे वो अहसास हुया जिससे मेरा शरीर जैसे पिघलने लगा! मेरी कमर पर मामा का लोहे जैसा लँड दबने लगा था और बीच बीच में हुल्लाड मार रहा था!

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