मा की चुदाई के बाद चाची की बारी

मा की चुदाई कहानी अब आयेज-

पापा के घर आने के बाद मम्मी को छोड़ने का मौका मिलना मुश्किल हो गया था. उपर से दादी और चाची की नज़र हमेशा मम्मी पर टिकी रहती थी, जैसे उन्हे कुछ अंदाज़ा हो. इस वजह से अनिरुढ़ भाई के फ्लॅट पर मम्मी का उनसे चुदाई करना भी बंद हो गया.

अब तो अनिरुढ़ भाई भी मुझे रोज़ ताना देने लगे. आराव, कुछ सोच यार. यामिनी जी से कब मिलवा रहा है? उनकी आँखों में मम्मी को छोड़ने की भूख सॉफ झलक रही थी, जैसे वो सिर्फ़ इंतेज़ार कर रहे हो की कब उनकी बारी आए.

लेकिन इस सख़्त माहौल के बावजूद, मम्मी और मेरी चाहत थोड़ी भी कम नही हुई. जहाँ भी एक छ्होटा सा चान्स मिलता, हम दोनो बिना वक़्त गवाए एक-दूसरे में खो जाते. कभी चुपके से लंबी और गहरी किस, जिसमे मम्मी अपनी जीभ मेरी जीभ के साथ लपेट कर मुझे पागल कर देती.

कभी मम्मी सफाई के बहाने मेरे कमरे में आती, दरवाज़ा बाँध करती और घुटनो के बाल बैठ जाती. उसके होंठ मेरे लंड को पकड़ कर उस पर फिरते और फिर वो बिना कुछ कहे चूसना शुरू कर देती. कभी धीरे-धीरे, कभी ज़ोर से डीप थ्रोट ले कर मुझे सीधा स्वर्ग में पहुँचा देती.

कभी-कभी तो ऐसा भी होता की छ्होटे से वक़्त का फ़ायदा उठा कर मैं मम्मी की सारी उठा देता और उसी पल उनकी चुदाई कर लेता. सब कुछ इतनी जल्दी, इतनी गर्मी में होता की समझने का भी टाइम नही मिलता. उनकी साँसें तेज़ हो जाती, मेरे झटको के साथ मम्मी के होंठ डब जाते, ताकि कोई आवाज़ ना निकल जाए.

पर एक बात पक्की थी, घर वालों के बीच च्छूप-च्छूप कर रोमॅन्स और चुदाई करने का अपना ही मज़ा था. हर चोरी के पल में एक अलग ही थ्रिल था. दोनो के दिल में दर्र भी था की कहीं कोई देख ना ले, लेकिन वहीं दर्र हमे और ज़्यादा गरम कर देता. जैसे हर रिस्क लेने का मतलब हर बार नयी मस्ती और नया सुकून था.

एक बार हम सब किसी रिश्तेदार के फंक्षन में गये थे. उस दिन मम्मी ने एक बहुत ही खूबसूरत सारी पहनी थी. सच कहूँ तो मम्मी की अदाओं ने सभी की नज़र अपनी तरफ खींच ली थी. लग ही नही रहा था की वो किसी आम घर की सिंपल बहू थी. उस दिन वो एक-दूं जवान, खूबसूरत और चमकती हुई लग रही थी.

वहाँ मेरी बुआ भी आई हुई थी. उनका नेचर वैसे ही तोड़ा बिंदास है, बातों में बिल्कुल शरम नही करती. बस जैसी सोचती है, वैसी बोल देती है.
उन्होने मम्मी को देखते ही च्चेड़ दिया-

बुआ: अर्रे वाह यामिनी भाभी, आज कल तो आप और भी खूबसूरत लगने लगी हो. और सच बोलूं तो तुम्हारा बदन तो अब और भी घाटीला हो गया है.

मम्मी (तोड़ा शर्मा कर, हल्की सी मुस्कान के साथ): अर्रे दीदी, आप भी ना, ऐसा कुछ नही है.

बुआ (मम्मी को और भी चिढ़ते हुए): लगता है भैया ने आज कल कुछ ज़्यादा ही ध्यान देना शुरू कर दिया है तुम पर.

उनकी बात सुन कर पास खड़ी चाची और एक-दो और बुआ भी हँसी-मज़ाक में मम्मी को च्चेड़ने लगी. पापा भी वहाँ थे; उन्होने सब बात सुनी और बस चुप-छाप मुस्कुरा कर रह गये.

लेकिन उस सब के बीच मैने देखा, मम्मी ने एक पल के लिए मुझे तिरछी नज़र से देखा. जैसे उनकी आँखों में एक च्छूपा हुआ राज़ था जो सिर्फ़ मैं समझ सकता था. उससनज़र में शर्माहट भी थी, और एक अलग ही गरम इशारा भी.

और सबसे इंट्रेस्टिंग बात, चाची भी मम्मी की तारीफ सुन कर क्लियर्ली थोड़ी जेलस लग रही थी. जैसे उन्हे लग रहा हो की पूरी महफ़िल में सबसे ज़्यादा चमक तो मम्मी ही रही है.

फंक्षन में मैं यही सब देख रहा था. मम्मी जब महफ़िल में इधर-उधर चलती, तब अपनी अदाओं से सभी मर्दों को अपनी तरफ खींच लेती. मेरी नज़र पढ़ी तो देखा, 2–3 अंकल मम्मी को एक-टक्क घूर रहे थे. पहले तो चुप-छाप देखते रहे, फिर आपस में हँसी-मज़ाक करने लगे.

एक ने अपने दोस्त से हाथ जोड़ कर कहा: अर्रे भाई, किस्मत तो इनके पति की है. सोचो, ऐसी बीवी घर में हो तो और क्या चाहिए.

दूसरे ने तुरंत बोला: बिल्कुल, हमारी बीवियाँ तो यामिनी भाभी के सामने कुछ भी नही है. इनकी अदायें ही अलग है.

फिर तीसरा अंकल हल्का सा हँसी के साथ बोल पड़ा: भाई, जिसके पास ऐसी बीवी हो ना, उसकी हर रात रंगीन होती होगी. बस सोच के ही मज़ा आ जाता है.

उनके बात पर सब हंस दिए, लेकिन मैं मम्मी को देख रहा था. वो सब सुन रही थी या नही, ये मैं नही कह सकता. लेकिन उनके चेहरे पर एक अलग ही ग्लो था. और मुझे लग रहा था, मम्मी के हुस्न की आग सिर्फ़ घर के अंदर ही नही, बल्कि पुर खानदान में लग चुकी थी.

मम्मी को फंक्षन में इतना अटेन्षन मिलता देख मैने क्लियर्ली फील किया की सुनीता चाची के मॅन में जलन सी हो रही थी. जब भी कोई मम्मी की तारीफ करता, चाची एक आर्टिफिशियल स्माइल देती, पर उनकी आँखों में इरिटेशन च्छूप नही पा रही थी.

चाची की उमर तब 36 साल थी. थोड़ी व्हेआतिश स्किन है, मम्मी जितनी फेर नही, लेकिन उनका चेहरा और नक्श बड़े ही अट्रॅक्टिव है. उनकी आँखों में एक अलग ही चर्म है. और उनका फिगर 34सी-30-36 है, मतलब कुवर्व्स बिल्कुल सही जगह पर.

मुझे तब रियलाइज़ हुआ की चाची भी धीरे-धीरे अपने लुक पर ध्यान देने लगी है. अब वो आचे से सारी ड्रेप करती, ब्लाउस फिटिंग तोड़ा टाइट रखने लगी थी.

और सच कहूँ, एक दिन जब चाची ने ब्राइट रेड सारी पहनी थी. मैं लिटरली उनसे नज़र नही हटा पाया. सारी के नीचे से उनकी कमर और कर्व का जो शेप निकल कर आ रहा था, वो पहली बार मुझे चाची का नया रूप दिखाया.

उस दिन मैने समझा की जलने-जलने में ही सही, चाची ने अपने आप को और सेडक्टिव बना लिया था. और जो हुआ, वो मेरे लिए एक तरह से अछा ही था. मम्मी के साथ-साथ अब मुझे चाची का भी जिस्म देखने को मिल रहा था.

मैं अक्सर च्छूप कर चाची को नोटीस करता था. उनके ब्लाउस में कसे बूब्स और गांद का उभर देख कर मज़ा आ जाता था. कभी कभी तो मॅन में ऐसा भी ख़याल आता की काश मम्मी के साथ-साथ चाची की भी चुदाई करने का चान्स मिल जाए तो ज़िंदगी का असली मज़ा वही होता.

लेकिन मैं इतना भी जानता था की सुनीता चाची का नेचर तोड़ा अलग है. वो बिंदास लगती है, पर अंदर से अपने इमेज और मर्यादा को बहुत सीरियस्ली लेती है. इसलिए उनसे सीधे-सीधे कुछ एक्सपेक्ट करना मुश्किल था. पर मॅन के कोने में ये फॅंटेसी ज़रूर जाग चुकी थी की एक दिन मम्मी और चाची दोनो मेरे साथ एक ही बिस्तर पर हो.

एक शाम मेरे घर पर अनिरुढ़ भाई डिन्नर के लिए आए. टेबल पर सभी लोग बैठे थे, लेकिन मैने तुरंत नोटीस किया की उनकी नज़र सिर्फ़ मम्मी पर ही नही बल्कि चाची पर भी टिक-टिक कर रही थी.

मम्मी तो हमेशा की तरह ग्रेस्फुल लग रही थी. लेकिन उस दिन चाची ने भी खुद पर ख़ास ध्यान दिया था. उनकी रेड-ग्रीन बॉर्डर वाली सारी कमर से चिपक रही थी, ब्लाउस से उनका फुल फिगर और भी निकल कर सामने आ रहा था.

जब चाची ने परोसने के लिए झुक कर तली अनिरुढ़ भाई के आयेज रखी, तो उन्होने हल्का सा स्माइल दिया. और चाची ने भी पलट कर उनको एक धीमी सी मुस्कान दी. बस वही पल था जिसमे मैने पहली बार उन दोनो के बीच एक च्छूपी हुई हलचल महसूस की.

मैने देखा अनिरुढ़ भाई के चेहरे पर च्छूपा हुआ लालच और चाची का हल्का सा नखरा मिला कर देखना. उस वक़्त मुझे लगा की शायद अब सिर्फ़ मम्मी ही नही, बल्कि चाची भी मेरी कहानी का हिस्सा बनने वाली थी.

मैने सोचा, साला अनिरुढ़ भाई मेरी मम्मी की चुदाई का मज़ा तो ले ही रहा है. अब अगर चाची की हरकत ऐसी रही, तो किसी दिन उसकी छूट में भी अपना लंड डाल देगा.

ये ख़याल आते ही एक पल के लिए मुझे बुरा लगा, जैसे कोई मेरी ही चीज़ चुराने आ रहा हो. मम्मी का तो वो खूब मज़ा ले चुका था. और अब अगर चाची भी उसके जाल में फ़ासस गयी तो मैं कैसे बर्दाश्त करता?

पर अंदर ही अंदर मुझे ये तसल्ली थी की शायद चाची की वो स्माइल बस एक कॅषुयल कर्टसी थी, कुछ ख़ास नही. लेकिन फिर भी अनिरुढ़ भाई को मैं अच्छी तरह जानता था. उनमें एक अलग ही चर्म था, एक ऐसी कशिश जो औरतों को अपनी तरफ खींच ही लेती थी.

मुझे लगने लगा था की जिस तरह मम्मी उसके पास खुद को खोल चुकी थी, उसी तरह चाची भी धीरे-धीरे उसके नशीले जादू में आ सकती है.

एक दिन मैं और अनिरुढ़ भाई उनके फ्लॅट पर डिन्नर के बाद कॅषुयल बातें कर रहे थे. थोड़ी देर गुप-शुप चली. फिर उन्होने अचानक सुनीता चाची का ज़िकार कर दिया. मैं एक-दूं से चौंक गया. उनकी आँखों का चमक मुझे सब समझा गयी.

मैं: अनिरुढ़ भाई, मम्मी के बाद अब आपकी नज़र चाची पर है क्या?

अनिरुढ़ भाई (ज़ोर से हंस पड़े): अर्रे यार, तू भी ना कैसी बातें करता है.

मैं (आँखों में आँख डाल कर): मैं आपको बहुत आचे से जानता हू भाई. अब मुझसे क्या च्छुपाना?

अनिरुढ़ भाई (तोड़ा मुस्कुराए, जेसे पकड़े गये हो): आराव, तू बहुत होशियार है, इशारे में ही सब समझ जाता है.

मैं (सीरीयस हो गया और उन्हे सीधा चेतावनी दे दी): अनिरुढ़ भाई, चाची मम्मी जैसी नही है. मम्मी मेरी थी, इसलिए मैने आप दोनो को मिलवाया. लेकिन चाची का नेचर बिल्कुल अलग है. वो कब क्या कर बैठे, किसी को नही पता. आप उनसे डोर ही रहो.

वो चुप रहे, बस हँसी दबाने की कोशिश करते हुए मुझे घूरते रहे. उस पल मुझे महसूस हुआ की अनिरुढ़ भाई के दिमाग़ में सच में सुनीता चाची घुस चुकी थी.

अनिरुढ़ भाई को देख कर मुझे बिल्कुल लग रहा था की मम्मी की तरह वो अब चाची को भी पत्ता लेंगे. उनके चेहरे का कॉन्फिडेन्स मुझे वही पुरानी कहानी याद दिला रहा था, जब मम्मी धीरे-धीरे उनके जाल में फस गयी थी.

मैं भी अंदर ही अंदर सोचने लगा की क्यूँ ना चाची को भी अपने मॅन की करने दिया जाए. वैसे भी मुझे हमेशा क्यूरीयासिटी रही है, क्या चाची भी चाचा से वैसे सॅटिस्फाइड है? या मम्मी की तरह वो भी अपने पति को चीट करने की इक्चा रखती है?

ये ख़याल आते ही मेरे अंदर एक अजीब सा जुनून भर गया. अगर चाची भी इस रास्ते पर चल पड़ी तो मुझे उनका असली रूप देखने का चान्स मिलेगा. लेकिन अनिरुढ़ भाई को ये समझ ही नही आया था की एक ही घर की दो औरतों के साथ अफेर चलना कितना ख़तरनाक हो सकता है. वो बस अपने चर्म पर मस्त थे, पर मैं अपने दिमाग़ से सब देख रहा था.

मेरे दिमाग़ में उस वक़्त अजीब सी उलझन चल रही थी. सोच इतनी गहरी थी की मैं खुद से भी उसे पूरा समझ नही पा रहा था. या शायद समझ कर भी उसे दिखना नही चाहता था.

दिल के एक कोने में कुछ दर्र था, और दूसरे कोने में एक अंजानी सी खुशी. दोनो एक साथ मिल कर मुझे और भी बेचैन कर रहे थे.

बस इतना कहना काफ़ी है की जो कुछ भी मेरे अंदर चल रहा था, उसका असर मम्मी की ज़िंदगी पर ज़रूर पड़ने वाला था. कैसे? कब? ये मैं भी उस वक़्त शब्द में नही ला पाया.

ऐसे-ऐसे दिन निकलते गये. अब हाल ये था की अनिरुढ़ भैया सिर्फ़ मम्मी के बारे में ही नही, बल्कि चाची को लेकर भी इधर-उधर की बातें करने लगते थे. उनकी बातों में हमेशा एक ऐसा इनडाइरेक्ट सा हिंट होता, जैसे कुछ चुपके जानना चाह रहे हो.

घर का माहौल भी अब बदलने लगा था. दादी को अब चाची पर भी तोड़ा-तोड़ा डाउट होने लगा था. कभी ताना मार देती, “आज-कल घर की बहुएँ तो मर्यादा में रहना भूल गयी है.”

कभी तीखा बोलती, “लगता है अभी जेया कर जवानी चढ़ि है. तभी इतना शौक दिख रहा है.” मैं चुप रहता था, लेकिन अंदर ही अंदर सब समझ रहा था. लेकिन एक बात बिल्कुल क्लियर थी. जब भी दादी ऐसी बातें बोलती, मम्मी और चाची एक-दूसरे की तरफ देख कर हल्की सी शर्मा जाती थी. लेकिन दोनो में से कोई भी जवाब नही देता था. उसके बाद से चाची भी मम्मी के साथ ज़्यादा आचे से बिहेव करने लगी थी.

तोड़ा-तोड़ा असर पापा और चाचा पर भी दिखने लगा. मम्मी ने एक दिन खुद ही बताया की तेरे पापा अब मेरे साथ पहले से ज़्यादा अछा बिहेव करते है और मौका मिलते ही चुदाई कर लेते है. मैने ये भी नोटीस किया की चाचा भी अब हमेशा चाची का कहना मानने लगे थे. पहले उनके बीच रोज़ किसी ना किसी बात पर झगड़ा होता रहता था, लेकिन अब वो सब ऑलमोस्ट ख़तम हो गया था.

अब जब भी हम लोग किसी फंक्षन में जाते, तो मम्मी और चाची दोनो ही अपने लुक और स्टाइल की वजह से सब का ध्यान खींच लेती थी. घर के अंदर का माहौल बदल रहा था, और बाहर लोगों की नज़र भी इन दोनो पर टिक जाती थी.

एक दिन मम्मी के कॉलेज फ्रेंड्स ने एक गेट-टुगेदर पार्टी रखी थी.

मम्मी ने पापा से कहा: चलिए मेरे साथ चलते है.

पापा ने कॅष्यूयली बोल दिया: तुम आराव को ले जाओ मैं बिज़ी हू.

मम्मी ने एक पल के लिए मुझे देखा, और बस हल्का सा स्माइल किया. उस स्माइल में एक अजीब सी कॉन्फिडेंट फीलिंग थी जैसे उन्हे पता था आज की शाम कुछ अलग होने वाली थी.

और उस मोमेंट पर मुझे भी लगने लगा ये पार्टी सिर्फ़ एक नॉर्मल गॅदरिंग नही होगी. कुछ ऐसा होगा जो मम्मी को और भी ज़्यादा बदल देगा और शायद मेरी ज़िंदगी को भी.

तो दोस्तों आपको नेक्स्ट पार्ट में बतौँगा की अब ये कहानी में आयेज क्या हुआ. आपको स्टोरी अची लगी हो तो मूडछंगेरबोय@गमाल.कॉम पर मैल करे.

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