कमसिन बेटी की महकती जवानी-3

अब तक की सेक्स स्टोरी में आपने पढ़ा था कि पद्मिनी के बापू ने रात को उसकी चूत में उंगली डाल कर चैक कर लिया था कि उसकी बेटी अभी कुंवारी है. फिर उसके चूतड़ों की दरार में अपना लंड रगड़ कर माल निकाल कर सो गया था.
अब आगे..

सुबह को यूँ तो हर रोज़ बापू पहले उठता है और चाय बना कर खेत जाने से पहले पद्मिनी को जगा कर जाता था और हर रोज़ उसको चाय देकर, जब वह जग जाए तब ही घर से निकलता था.

पद्मिनी उसके बाद नहाती थी और स्कूल के लिए तैयार होकर घर से निकलती थी. स्कूल जाते वक़्त बापू के खेत के पास से गुज़रती और घर की चाभी उसको देकर तब स्कूल जाती. हर रोज़ ऐसा चलता था.

मगर इस सुबह को जब पद्मिनी की आखें खुली तो देखा कि बापू उसको उठाने के लिए नहीं आया था और रात की गुज़री हुई सेक्स की लज्जत को सोचकर बापू से आँख मिलाने को शरमा रही थी. वो मन ही मन सोच रही थी कि कहीं बापू भी शायद उससे इसी लिए आँख नहीं मिला पाया और चुपचाप खेत चला गया होगा.

पद्मिनी उठी और कमरे से निकली, तो गुसलखाने में जाते वक़्त किचन के पास से गुज़रना पड़ता था. उसने देखा कि बापू किचन में बैठा रेडियो सुन रहा था, जो धीरे से बज रहा था.
जब बापू ने देखा कि पद्मिनी गुसलखाने में जा रही है, तो बापू जल्दी से उठकर उसकी तरफ आया और कहा- अरे जाग गयी मेरी गुड़िया.. कैसी रही रात?

पद्मिनी आँख मसलते हुई बोली- आज आप अभी तक यहीं हो बापू, खेत नहीं गए और अभी तक लुंगी में हो.. तैयार नहीं होना खेत जाने के लिए क्या?
तो बापू ने कहा कि आज थोड़ी देर से खेत जाऊंगा, आज मैं अपनी गुड़िया को स्कूल की यूनिफार्म में तैयार होते देखना चाहता हूँ.

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पद्मिनी एक अंगड़ाई लेते हुए गुसलखाने में नहाने के लिए चली गयी. बापू से तो अब उसका यौवन नहीं देखा जा रहा था. रात को कैसे अपने लंड को उसने उसकी गांड के बीचों बीच रगड़ कर अपना पानी छोड़ा था. ये याद करके उसका लंड फिर से एकदम से खड़ा हो गया और अपनी लुंगी के नीचे उस ने लंड को सीधा किया.

गुसलखाने के पास खड़े होकर बापू से पद्मिनी को आवाज़ दी- मैं तब तक तेरे स्कूल की यूनिफार्म को इस्तरी कर देता हूँ बेटी.
पद्मिनी ने जवाब दिया- मैं इस्तरी कर चुकी हूँ बापू… कल रात आप कितने बजे वापस आए थे, मुझको नींद लग गयी थी. आपने मुझको जगाया क्यों नहीं?
उसने नहाते हुए कुछ ऊंची आवाज़ में नादान बनते हुए बापू से पूछा.
तो बाहर गुसलखाने के दरवाज़े के पास खड़े बापू ने जवाब दिया- क्या तुझको कुछ नहीं पता रात के बारे में?
पद्मिनी ने अपनी जीभ को दांतों में दबाते हुए भोली बनने की कोशिश करते हुए बोली- क्या कुछ नहीं पता रात के बारे में बापू? क्या हुआ था रात को? कुछ हुआ था क्या?
बापू ने कहा- नहीं कुछ नहीं बस ऐसे ही…

बापू पद्मिनी को कमरे में इंतज़ार करने को चला गया. वह देखना चाहता था कि पद्मिनी कैसे गुसलखाने से बाहर निकलेगी, क्या पहनकर आएगी और उसको कौन सा हिस्सा उसके जिस्म का दिखेगा. कुछ दस मिनट इंतज़ार के बाद पद्मिनी कमरे में आयी, तो सर के बालों को एक तौलिया में लपेटा हुआ था और पद्मिनी ने एक कुर्ता जैसा पहना हुआ था. ये कुर्ता ठीक उसके घुटनों पर तक ही आता था, मगर ये कुर्ता स्लीवलैस था और पद्मिनी पर काफी बड़ा लग रहा था. इस वजह से उसकी चूचियां साफ़ दिख रही थीं. एकदम गोल गोल नरम मुलायम, जैसे कि दो छोटे से सेब हों या ऐसा लगता था कि छोटे छोटे से बैलून हों, जिसमें थोड़ा पानी भर दिया गया हों. उसकी चूचियां ठीक वैसी ही नर्म दिख रही थीं. बापू खूब आखें फाड़ फाड़ कर देख रहा था.

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वैसे हर रोज़ तो पद्मिनी उसी ड्रेस को गुसलखाने से पहन कर निकलती थी, मगर उस वक़्त कभी भी बापू घर पर नहीं हुआ करता था.. तो पद्मिनी बेफिक्र रहती थी.. और वो इस वक्त अन्दर ब्रा भी नहीं पहनती थी. वो सिर्फ स्कूल की यूनिफार्म पहनने के वक़्त ही ब्रा पहनती थी.

बापू बिस्तर पर बैठ कर पद्मिनी को निहार रहा था.. उसको लग रहा था कि अपनी स्वर्गवासी पत्नी को जवान देख रहा है. वैसे ही वह भी उसी कमरे में अलमारी के आइने के सामने सजती संवरती थी. यहाँ पद्मिनी ने अपनी माँ की जगह ली हुई थी, जवान, कुंआरी, खूबसूरत.. बस समझो कि जानलेवा माल थी.

बापू से रहा नहीं गया और उसने कहा- तू कब इतनी खूबसूरत और जवान हो गयी, मुझको पता ही नहीं चला, इतने सालों से मेरे बगल में सोती है, तो और मैं आज तुझको ऐसे देख रहा हूँ. तू बिल्कुल अपनी माँ पर गयी है मेरी गुड़िया, तुझपे बहुत प्यार आ रहा है. ज़रा मेरी बाँहों में तो आजा मेरी प्यारी बिटिया.

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