जालिम लंड पापा का

दोस्तो एक मस्त चकाचक कहानी पेशेखिदमत है आपके

‘हां विनोद, मैंने निशा से बात कर ली है, और वो तैयार है. तुम पहाड़ी के पीछे जंगल पहुँचो और मैं निशा को लेकर आता हूँ…….अरे रितु की चिंता मत करो, वो सो रही है.’ मेरे पापा विनोद अंकल से बात कर रहे थे. मैने गलती से उनकी बाते सुन ली थी, पर मुझे ये समज नहीं आ रहा था की पापा निशा को लेकर जंगल में क्यूँ जा रहे हे. मैंने उनके पीछे जाने का तय किया.

दोस्तों मैंने अपने बारे में बताया नहीं, मेरा नाम रितु है, मैं २२ साल की लड़की हूँ और अभी अभी ही दो महीने पहले मेरी शादी हुई है. दो महीनो के बाद मैं अपने गाँव अपने पापा से मिलने आई थी. निशा मेरे घर में काम करनेवाली 19 साल की लड़की थी, दिखने में ठीक थी. मेरे पापा घर में अकेले रहते है. मेरी मम्मी का स्वर्गवास 4 साल पहले हो चूका था. मेरा छोटा भाई है पर वो पढने के लिए दिल्ली गया है.

मेरे पापा अपने गाँव में सब से अमीर है और उनकी बात कोई टालता नहीं है. उनका नाम राजेश्वर सिंह चौधरी है, और वो सच में अपने गाँव के चौधरी ही है. मैंने बचपन से ही पापा को कड़क और मजबूत शख्स की तरह देखा है. उनकी चाल, बोलने का तरीका सब मर्दाना लगता है. हां तो कहानी पर वापस आते है. निशा को लेकर मैंने पापा को बुलेट पर जाते हुए देखा.

मुझे कुछ गलत लगा, वैसे मैंने कभी अपने पापा के बारे में गलत नहीं सोचा की वो गलत काम कर सकते है, हाँ मैं जैसे जैसे जवान होती गयी वैसे वैसे मुझे अपने पापा के कडकपन, उनके गुस्से, उनकी मर्दाना बातो पर और मर्दाना ताकत की ओर खिंचाव होने लगा. पर कभी जिक्र नहीं किया, पापा से नजदीक होने की हिम्मत भी नहीं हुई. पापा जैसा ही मैं अपना पति चाहती थी, पर वो मिला तो भी सॉफ्टवेर इंजिनियर, काफी मासूम और सीधासाधा. मेरा पति भी अच्छा है पर सख्त नहीं है.

यह कहानी भी पड़े  होस्टल का डर

हाँ तो पापा ने निशा को बुलेट के पीछे बिठाया और जंगल के रस्ते की ओर चले गए, मैं भी उनके पीछे पीछे चल पडी. वो बुलेट पर थे तो आसानी से पहुँच गए पर मैं चलते जा रही थी, मैं पीछा तो नहीं कर सकती थी पर मुझे रास्ता पता था. करीब आधे घंटे बाद मैं वहां पर पहुँची, मैंने उन्हें ढूंढना शुरू किया, पर वो मिले नहीं.

फिर थोड़ी देर बाद मुझे पहाड़ी से अजीब आवाज़ सुनाई दी, मैं जंगल के रास्ते से ऊपर की ओर चढ़ने लगी वैसे वैसे आवाज़ तेज़ होती गयी. मुझे आसानी से पता चल गया की ये आवाज़ चुदवाने की है और धीरे धीरे मैंने निशा की आवाज़ को पहचान लिया. एक मिनट के लिए मैं रूक गयी, की कहीं मैं गलत तो नहीं कर रही. अगर पापा को पता चल गया तो क्या होगा.

पर फिर सोचा की शायद विनोद अंकल निशा को चोद रहे हो और पापा सिर्फ उसे छोड़ने आये हो तो..ये सोचकर मैं फिर से आगे चली. आगे चलते ही मैंने पापा की बुलेट को देखा, और पीछे हट गयी फिर मैंने इधर उधर देखा कि कैसे देखूं कि पापा को पता ना चले.

फिर मैंने एक पत्थर देखा और पत्थर के ऊपर चढ़ कर देखने लगी, अब मैं उनसे थोडा सा ऊपर थी, तो उन्हें पता चलने की गुंजाइश कम थी. फिर मैंने ऊपर हो कर देखा तो निशा कुत्ते की स्टाइल में थी और पापा निशा को जमकर चोद रहे थे..पापा और निशा पूरे नंगे थे. मैंने कभी पापा को ऐसे नहीं देखा था.

यह कहानी भी पड़े  बारिश में मिला चुदाई का आनंद

पापा को और पापा के लंड को देखकर मैं हैरान हो गयी..पापा जबरदस्त दम लगाकर निशा को चोद रहे थे, निशा की जांघे लाल लाल हो गयी थी मतलब पापा उसे आधे घंटे से चोद रहे थे. पापा ने उसके बालों को पकड़ के रक्खा था उसका सर भी पीछे खींचकर रक्खा था और वो कुतिया की तरह चुदवा रही थी. मैं एक दम सुन्न हो गयी थी.

‘विनोद..तुम भाई अगली बार से मत आना, तुम कुछ करते नहीं हो और बस बैठ के देखते रहते हो..क्यूँ निशा.’ पापा ने निशा को धक्के मारते हुए कहा.

‘ह ह…ह ह्ह्ह्ह…हां बापजी.’ मेरे पापा को गाँव में सब बापजी कह कर बुलाते थे.निशा की जबान लडखडा रही थी, वो काफी थक गयी थी. पापा रूकने का नाम नहीं ले रहे थे. पापा के पाँव के थपेड़ो की आवाज़, ऊपर से निशा की जबरदस्त चुदाई की आवाज़ सुनकर मेरी चूत भी गीली हो गयी. पता ही नहीं चला कब मेरा हाथ मेरी चूत पर चला गया.

मैं उन दोनों को देखकर साड़ी के ऊपर से ही अपनी चूत मसलने लगी. निशा कुतिया की तरह झुकी हुई थी और उसने अपने दोनों हाथ बुलेट पर लगा कर रक्खे थे. पापा के लंड के धक्के इतने जोरदार थे कि उसकी छाती बुलेट की सीट से टकरा रही थी. मैंने देखा की निशा बुलेट की सीट को मुट्ठी में लेने की कोशिश कर रही थी, मेरा अंदाज़ा सही था वो अब झाड़ने वाली थी.

Pages: 1 2 3 4 5 6 7

error: Content is protected !!