हिमालय की वादियों में ट्रेनिंग

बात उस समय की है जब मैं हिमालय की वादियों में ट्रेनिंग पर था। वैसे मैं मैदानी क्षेत्र का रह्ने वाला हुँ और पर्वतीय भ्रमण का यह मेरा प्रथम अवसर था। होस्टल में पूरे देश के प्रतिभागी थे। गर्ल्स व बॉयस होस्टल साथ-साथ थे। उनमें एन्ट्रेंस अलग-अलग थी, पर अन्दर एक गलियारे से जुड़े थे, जिसके मध्य में केयर-टेकर ऑफ़िस था। केयर-टेकर एक हँसमुख पहाड़ी लड़की थी, जिसने अभी ब्रह्मचर्य आश्रम की अन्तिम वेला में प्रवेश किया ही था; नाम था `रुबी`।

मुझे घूमने का शुरु से ही बड़ा शौक रहा है। जब तक किसी भी जगह का चप्पा-चप्पा न घूम लूँ, मुझे चैन नहीं पड़ता। होस्टल में सामान व्यवस्थित करने के बाद मैंने रुबी से आस-पास घूमने की जगहों के बारे में जानकारी ली और सुबह जल्दी तैयार होकर अकेला ही घूमने चला गया और वहीं से सीधे ट्रेनिंग पर दस बजे पहुंच गया। शाम को ट्रेनिंग से लौटकर रुबी को डिजिटल कैमरे में घूमने की फोटो दिखायीं तथा अन्य जगहों के विषय में विचार विमर्श किया। अब तो ये मेरा रोज का क्रम हो गया।

रविवार को छुट्टी के दिन सभी का घूमने का प्रोग्राम बना। ट्यूरिस्ट बस कर ली गयी। रुबी से कहा तो वह भी चलने के लिये तैयार हो गयी। वह बस में पीछे गर्ल्स के साथ बैठी थी। मैं सबसे अगली सीट पर अकेला बैठा था। मैं अचानक उठा और उसे हाथ पकड़कर आग्रहपूर्वक आगे ले आया ताकि वह रास्ते के स्थानों के बारे में विस्तार से बताती जाए। साथियों ने हमें साथ बैठा देखकर बहुत हास-परिहास किया, किन्तु हमने कोई परवाह नहीं की। उस दिन ठंड थी, कोहरा भी था; रास्ते में उसने जब मेरा हाथ पकड़कर कहा कि ‘देखो! कितनी ठंड है, हाथ बर्फ से हो गये हैं’ तो लगा शरीर में बिजलियाँ कौंध गयीं; पर मैं संयत रहा। पूरे दिन, समूह से बेपरवाह हम साथ-साथ घूमते फिरते रहे। मैंने विभिऩ्न पोज़ में उसकी बहुत सी फोटो लीं और पानी में अठखेलियाँ करते हुए एक वीडियो भी बनायी।

अगले दिन साथियों ने रुबी का नाम लेकर मुझे बहुत छेड़ा। शाम को रुबी से साथ कॉफी पीने का आग्रह किया तो वह मुस्करा दी। फिर तो हर शाम कॉफी का सिलसिला चालू हो गया। होस्टल से निकलते समय इशारों में बात हो जाती, मैं बस स्टॉप पर इंतजार करता और वह ऑफिस बंद करके पहुँच जाती। हम रोज नए-नए रेस्त्राओं में जाते। शुक्रवार को कैफे में तय हुआ कि रविवार को टैक्सी रिजर्व कर घूमने चलेंगे, वह सुबह सात बजे स्टॉप पर मिलेगी।

शनिवार को ट्रेनिंग में एक प्रोजेक्ट वर्क मिला, जिसे सोमवार को जमा करना था। अधिकांश साथियों ने रविवार को करना निश्चय किया, किन्तु मैंने शनिवार को ही देर रात तक उसे पूरा कर लिया, क्योंकि रविवार को घूमने जो जाना था। लेकिन इस कारण शनिवार को रुबी से मिलना न हो सका। अगले दिन सुबह मैंने स्टॉप पर रूबी का इंतजार किया, पर वह नहीं आयी और फोन भी स्विच ऑफ रहा। मैं खिन्न मन से अकेला ही पैदल घूमने चल पड़ा। शाम लौटने तक आठ-दस कोस की चलाई हो गयी, पैर में छाला भी पड़ गया।

अगले दिन शाम को बहाने से रुबी को होस्टल के कमरे में बुलाया। दोनों एक दूसरे पर खूब बरसे। पता चला कि शनिवार को न मिलने के कारण वह अगले दिन नहीं आयी और गुस्से में फोन भी स्विच ऑफ कर दिया। लेकिन जब उसने मेरी वस्तुस्थिति को जाना और पैर का छाला देखा तो सारा गुस्सा काफूर हो गया। वह बोली, `कल तुम मेरे साथ घूमने जाते तो क्या करते?` “ढेर सारी गप-शप, अच्छे रेस्त्रां में खाना-पीना और क्या ?” वह बोली, `चलें!` “अन्धे को क्या चाहिए? दो आँखें!” हम घंटों चर्च की सीड़ियों पर बैठकर बतियाते रहे, फिर पास के रेस्त्रां में मन-पसन्द खाना खाया। अब रोज शाम का यही क्रम हो गया।

एक दिन शाम को उसके साथ एक बाला और थी। उसने परिचय कराया, `यह नीलू है। गतवर्ष ट्रेनिंग में थी, तभी से फास्ट फ्रेन्ड है`। बातों ही बातों में पता चला कि वह दो दिन के ऑफीशियल टूर पर आई है, और कुछ दूर एक गेस्ट हाउस में ठहरी है। प्रतिदिन की भाँति हमने रेस्त्रां में खाना खाया, फिर गेस्ट हाउस गए। नीलू का कमरा काफी बड़ा था; कमरे में दो सिंगल बेड, डाइनिंग टेबल, ड्रेसिंग टेबल, अलमारी, अटैच बाथरूम- सब बहुत अच्छे स्तर के थे। रुबी को बहुत पसन्द आए। हमने थोड़ी देर गप-शप की; इसी बीच नीलू बोली, “रुबी! क्यों न तुम कल रात को यहीं रुक जाओ? रातभर ढेर सारी बातें करेंगे। अपने साथ इसे भी रोक सकती हो, एक पलंग पर हम हो जायेंगे और एक पर ये।” रुबी ने स्वीकृति दे दी और मुझे तो मानो बिन माँगे मन चाही मुराद मिल गयी।

अगली शाम हम तीनों टहलने निकले और रेस्त्रां में खाना खाकर गेस्ट हाउस पहुँच गये। रास्ते में नीलू बीयर शॉप पर रुकी, इसी बीच मैंने कुछ ड्राई फ्रूट्स व स्नेक्स ले लिए। गेस्ट हाउस पहुँचने पर नीलू ने जाम की तैयारी कर ली; पर मैंने साथ देने से मना कर दिया, क्योंकि इसके पहले कभी नहीं `पी` थी। लेकिन उन दोनों ने बहुत आग्रह तथा दलीलें यथा- फलों से निर्मित है, बहुत हल्की है, कुछ नहीं होगा, ठंड दूर करेगी; कहकर मेरे लिये `वाइन` तथा अपने लिये `वोद्का` का जाम बनाकर `चीयर्स` कहने के लिए तैयार कर ही दिया।

उस दिन ठंड काफी थी। मैं फ्रेश होने बाथरूम गया। कुर्ता-पायजामा पहनकर बाहर आया तो देखा कि दोनों अलग-अलग पलंग पर, कम्बल ओढ़े, सम्मुख करवट लिए बातों में मशगूल हैं। मैं अभी सोच ही रहा था कि कहाँ बैठूँ, कि इतने में रुबी बोली, `संकोच न करो, यहीं आ जाओ`। मन ने कहा `नेकी और पूछ-पूछ`। मैं भी रुबी के पीछे करवट से लेट गया और उन दोनों की वार्ता का आनन्द लेने लगा। इसी बीच रुबी का हाथ मेरी ओर फिसला और सीधे शिश्न पर पड़ा, जो पायजामे के अंदर तना खड़ा था। मैं तनिक घबराया, किन्तु जब रुबी ने उसे जोर से दबाया तो सारी आशंका निर्मूल हो गयी।

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अब भला किस बात का इंतजार था, मैं रुबी के और निकट आ गया और हाथ से उसके मदमाते शरीर की गहराइयों और उभारों को नापने का प्रयत्न करने लगा। रेशम सी काया का पहला स्पर्श मदहोश करने वाला था। हाथ नाभि की गहराई मापते हुए ऊपर वक्षस्थल की ओर बढ़ा। स्तनों को दबाने के मखमली अहसास ने तो मुझे मस्त कर दिया। धीरे-धीरे स्तनों को अंतः वस्त्रों के निर्मम बन्धन से मुक्त कर, उनसे उन्मुक्त रुप से खेलने लगा। उन्हें दबाते, मसलते उनका पान करने के लिए व्यग्र हो उठा किन्तु विवश था। अब हाथ निचली गहराइयों को नापने के लिए मचलने लगा था। शनैः शनैः घाटी में प्रवेश हुआ, हाथ चिकनी घाटी में ठहरता ही नहीं था। अंततः अंगुलियों ने द्वार पा ही लिया। योनि स्निग्ध स्राव से लबरेज थी। अंगुलियाँ उसमें स्नान को व्यग्र थीं ही, बहुत देर तक कुंड में डुबकियाँ लगाती रहीं पर गहराई का पार न पा सकीं।

इसी बीच कटि प्रदेश मुक्ति अभियान जारी रहा, और उसे भी अंतः वस्त्रों से आजाद करा दिया। रुबी तो मानो इस सबसे बेखबर बातचीत में तल्लीन थी। हाथ अब स्वतंत्र रूप से कटि प्रदेश में भ्रमण कर रहा था। पुट्ठों के मादक स्पर्श से तो जैसे नशा सा छाने लगा। हाथ की यात्रा, उरोजों के उत्ताल शिखर से रसातल की गराइयों तक निर्बाध जारी थी। अब और नहीं रुका जाता था। `नागराज` का बुरा हाल था। वह तो न जाने कब से फुंकार रहा था। आखिर उसे आजाद कर ही दिया। करवट में बातें पूर्ववत जारी थीं, उसमें बिना व्यवधान किये, हौले-हौले जैसे ही `नागराज` ने भगोष्ठ को स्पर्श किया, मानो बदन में भूचाल आ गया। चिरप्रतीक्षित मिलन की वेला आ गयी थी। थोड़े ही प्रयास में वह उसके पूर्ण आगोश में ऐसे समा गया मानो जन्मों का प्यासा हो। मन मयूर झूम उठा, रोम-रोम पुलकित हुआ और समय मानो ठहर सा गया।

अब मैं भी बातचीत में रसपूर्वक भाग लेने लगा, तन-मन तृप्त जो था। `नागराज`, योनिकुंड में सोमरस पान कर रहा था और हाथ चूचकों से अठखेलियों में व्यस्त था। मेरे आग्रह पर नीलू ने अपने बचपन से लेकर अब तक की स्टोरी सुनायी। इसके अतिरिक्त फिल्म, हॉबी, परिवार, विवाह, सेक्स आदि विषयों पर देर तक चर्चा होती रही। बातों ही बातों में पता चला कि गतवर्ष होस्टल में रुबी ने नीलू को एक अलग कमरा इश्यू कर दिया था, जिसके कारण वह ट्रेनिंग खूब एन्जॉय कर सकी। मन ने कहा, `आज का आनंद उसी का प्रतिफल है`। बातचीत में सब इतने मशगूल थे कि मध्य रात्रि कब आ गयी, पता ही न चला।

नीलू बोली, `चलो अब सोना चाहिए। बहुत देर हो गयी है, नींद भी आ रही है`। उसने लाइट ऑफ करके नाइट लैम्प जला दिया और बाथरुम गयी। होठ तो इस क्षण की न जाने कब से प्रतीक्षा कर रहे थे। इधर बाथरूम का गेट बंद हुआ और उधर अधरों का मिलन। प्यासे अधर एक दूसरे को निगल लेना चाहते थे। अब जिह्वा भी मिलन को बेकरार थी। रुबी ने पूरी जीभ को मुख के अंदर लेकर इस कदर जोर से चूसा कि जन्नत की खुमारी छा गयी। इधर बाथरूम का गेट खुला और उधर अधरों का बिछोह।

हम सोने का नाटक करने लगे और नीलू भी सो गयी। हमें नींद कहाँ थी? आज तो जन्नत की रात थी। हम तो नीलू में गहरी नींद के आगोश की प्रतीक्षा कर रहे थे। इधर नीलू ने दूसरी ओर करवट ली और उधर हमने खुलकर अंगड़ाई ली। बाजुएँ कब से कसमसा रही थीं। मैंने रूबी को बाजुओं में कसकर जोर से भींच लिया, मानो इक दूजे में समा जायेंगे। कुछ देर इसी स्थिति में ‘दो प्राण एक देह` सरीखे रहे। अब शरीर अग्र भाग से सीधे मिलन को बेक़रार था। किन्तु ‘लंगड़’ को डिस्टर्ब किए बिना! इसमें बहुत सावधानी की जरुरत थी।

अब रुबी को अपने ऊपर लेते हुए मैं सीधा लेट गया। मैंने अपने पैर तनिक फैलाये, उठाए, अंदर की ओर मोड़े और रूबी के पैरों के ऊपर रख दिये। एक बार फिर रुबी को दोनों हाथों और पैरों से जकड़कर जोर से दबाया। उसके नरम और कोमल शरीर का अहसास बड़ा मादक था। जंघाएँ तो मानो ऐसे गोल, सुडौल, व चिकने पुट्ठों को हमेशा के लिए जज्ब कर लेना चाहती थीं। अब कम्बल हटा दिया और रूबी को धीरे से बैठकर चक्की के पाट की भाँति लिंग की धुरी पर 180 डिग्री घूमने को कहा। अब क्या था, रुबी का चिरप्रतीक्षित दीदार होने वाला था, कुछ उपरि वस्त्र अभी भी अड़चन कर रहे थे। दोनों ने एक दूसरे के सहयोग से उन्हें भी मुक्त कर दिया।

नाइट लैम्प के लाल मन्द प्रकाश में रुबी के गुलाबी बदन, पतली कमर और सेब जैसे स्तन देखकर नशा दुगना हो गया। कुछ अंगों की मिलन की साध बाकी थी, दोनों ही बेकरार थे, अब और देर न कर रुबी ने पैर पीछे की तरफ सीधे किये और जंघा का जंघा से, नाभि का नाभि से, चूचक का चूचक से मिलन करा अपने रसीले होठ अधरों पर टिका दिये। दोनों ने एक दूसरे को बाजुओं से कसकर दबाया, सभी अंगों में इक दूजे को निगल लेने की होड़ लगी थी।

लिंग तो मानो स्तम्भित हो गया था, योनि बारम्बार अभिषेक कर रही थी। रुबी ने अधरों से कपोलों का स्पर्श कर उनकी भी क्षुधा मिटाई। अब होठ दुग्धपान को अधीर थे, स्तन भी कुचले जाने को आतुर थे, अब और न तरसाकर रुबी ने चूचक होठों से रगड़ा। वो तो कब से मौके की तलाश में थे, एक ही बार में आत्मसात कर गये। बारी-बारी से दोनों स्तनों का काटन, मर्दन, चूसन चालू था। रूबी दोनों हाथों को कभी बदन पर जोर से रगड़ती, कभी चिकोटी काटती। वह अब तेजी से योनि को लिंग पर रगड़ने लगी, कभी चारों दिशाओं में जोर लगाती, कभी गोल-गोल घुमाती। फिर हाथों से मुख को थाम तेजी से होठों को पीने लगी, और स्तनों से वक्षस्थल को दबा, सीत्कार की आवाज के साथ योनि से लिंग पर ऊपर- नीचे आघात करने लगी। अब लिंग का भी संयम टूटने लगा था, दोनों हाथों ने रुबी को कसकर दबाया, योनि ने तेजी से स्पंदन किया और लिंग ने उसे अमृतवर्षा से लबालब कर दिया।

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दोनों इस मदहोश हाल में देर तक पड़े रहे। जब थोड़ा होश आया तो रुबी बोली `मैं फ्रेश होकर आती हूँ`, जब वह बाहर आयी तो अप्रत्याशित रूप से स्नान करके गीले बदन थी। मैं तो उसके इस रूप को अपलक देखता ही रह गया। मैं बोला, `तुम्हारे इस रूप का दीदार पूर्ण प्रकाश में करना चाहता हूँ`। उसकी मौन स्वीकृति मानो कह रही थी,`नेकी और पूछ-पूछ`! नीलू मुँह ढककर गहरी नींद में सो रही थी। मैंने धीरे से लाइट जलाई और रूबी को निहारा, जो पलंग पर आँख बंद कर लेटी थी। दूधिया प्रकाश में रुबी की कमनीय काया देखकर थोड़ी देर तो सुध-बुध ही खो बैठा। नेत्र इस दृश्य को हमेशा के लिए नैनों में बसा लेना चाहते थे। उसके गुलाबी, कोमल, मखमली बदन में बालों का नामो-निशाँ न था। मैं रुबी को ताबड़तोड़ नख से शिख तक चाटने, चूमने लगा। उसके एक-एक रोम को पी जाना चाहता था।

जंघा, स्तन और गालों को तो जितना चबाता, क्षुधा और बढ़ती जाती। कई राउंड चुम्मा-चाटी के चले, लेकिन मुख से योनि-रस पान करने की हसरत पूरी न हो सकी; दरअसल वह मुख मैथुन के विरुद्ध थी, और हम तो उसकी अदा व रजा के दीवाने थे ही। अब योनि लार टपका रही थी और लिंगराज भी मचल रहे थे; सो रुबी के दोनों पैर अपने कंधों पर रख, सुपाड़े को चिकने भगोष्ठ पर टिका, हाथों से चूचियाँ कसकर पकड़ जैसे ही जोर का झटका मारा, रुबी की हल्की चीख के साथ लिंग, योनि में समाता चला गया और सभी गहराइयों को पार कर गया। कुछ देर तक ऐसे ही बने रहे, चाहते थे समय यहीं ठहर जाए।
रुबी पैर फैलाते हुए बिस्तर पर सीधे हो गयी और मैं उसके ठीक ऊपर। होठों ने एक बार फिर से चूचियों से खेलना, उन्हें दबाना, काटना, मसलना और पीना शुरु कर दिया। इसके बाद चेहरे की बारी थी, होठों ने गर्दन, कान, कपोल, और पलकों पर चुम्बन की झड़ी लगा दी। गालों को मुख में लेने के बाद तो छोड़ा ही नहीं जाता था। अब अधरों में इक दूजे को पीने की होड़ थी, जिह्वा भी इक दूजे से मिलन कर रही थी। मैंने रुबी को बाहों में भरकर जोर से दबाया ताकि उसकी गंध मुझमें समा जाए और वह रोम-रोम में बस जाए। लिंग भी योनि से अठखेलियाँ कर रहा था, कभी ऊपर आकर उसे तरसाता, तो कभी त्रिशंकु की तरह अधर में अटका रहता, तो कभी छपाक से एकदम अंदर धँस जाता। रूबी कब पीछे रहने वाली थी, वह भी पैर क्रॉस कर लिंग को ऐसे जकड़ लेती कि बेचारा हिल-डुल भी न पाता। देर तक दोनों की उठा-पटक चलती रही।

लिंग अब योनि की दीवारों पर अगल-बगल धक्का लगाते हुए मथानी की भाँति उसे मथने लगा। मथने में कटिप्रदेश की आपसी रगड़ का अहसास बड़ा सुखद था। अब लिंग ने सीधी छळांग शुरू की, तेजी से नीचे जाता और छपाक की आवाज के साथ तल का स्पर्श कर ऊपर आ जाता। धीरे-धीरे गति बढ़ने लगी; रुबी भी आह, ओह, उई, अरे–, मार डाला की आवाजों से उत्साहवर्धन कर रही थी। अब दोनों चरम पर थे, दोनों ने एक दूसरे को कसकर भींचा और इक दूजे को प्रेम रस से सराबोर कर दिया। इसी मदहोशी में न जाने कब आँख लग गयी।

रात में एक बार अचानक आँख खुली, देखा- लाइट जल रही थी, नीलू गहरी नींद में थी और रुबी निर्वस्त्र टाँग फैलाए बेसुध सो रही थी। उसके अंग-प्रत्यंग से मादक यौवन छलका जा रहा था। उसे देख मन फिर बेकाबू हो उठा। शेर के मुँह में खून लग चुका था, वह अब कहाँ रूक सकता था? वह उठा और प्रचण्ड वेग से योनि पर झपट पड़ा। अचानक सीधे आक्रमण से वह थोड़ा अकुलाई, मचलाई और छ्टपटाई किन्तु जैसे ही वह पूरा समाया वह शांत हो गयी। एक बार फिर चुम्बन, चूँटी, चूसन, काटन, कुचलन, मर्दन, और घर्षण का दौर चला; ज्वार आया, और दोनों उसमें एक जान होकर न जाने कब तक बहते रहे।

सुबह रूबी जगा रही थी, `आज ट्रेनिंग पर नहीं जाना क्या?`; मैं घबड़ाकर उठा, घड़ी देखी- समय कम था, फटाफट तैयार होकर चलने को उद्यत हुआ। नीलू अभी भी सो रही थी। रुबी बोली, `सॉरी!` मैं हतप्रभ हो गया। मन ने कहा, काश ऐसी भूल बारम्बार हो। मैंने रूबी का आलिंगन कर मस्तक को चूमा और प्रस्थान किया। दिनभर हम दोनों उनींदे रहे, यादों औ ख्वाबों में खोये रहे।

चंद रोज बाद ही ट्रेनिंग से वापसी की घड़ी आ गयी; चलते समय मैने कैमरे की फोटो व वीडियो की एक डीवीडी तथा `स्मृति चिह्न` रुबी को दिया और उसने छ्लके नयनों से विदा किया।

कुछ समय बाद सर्विस भी बदल गयी और पहाड़ बहुत पीछे छूट गये, रह गयी तो बस उसकी मधुर याद।

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