गुल की मोहब्बत

ये कोई कहानी नही बल्कि मेरे जीवन का हिस्सा है. इसे मैने बिल्कुल वैसा ही लिखा है जैसे ये बिता. इसमे केवल प्रेम है, विशुद्ध प्रेम. यह मोहब्बत है गुलनाज़ की.

खत-खत, खत-खत, दरवाजे पर दस्तक हुई तो मैं उनिंदा सा उठा, दरवाजा खोला तो सामने वो खड़ी थी. झट से मैने पूछा की कौन सी उंगली से दरवाजा खटखटाया था?

तो उसने अपनी पहली उंगली सामने कर दी.

मैं उसे पकड़ कर फूँक मरने लगा तो उसने अपना हाथ च्छुदाया और अंदर आकर अपना समान रखने लगी.

मैं तब तक बिस्तर पर आ बैठा था और वो भी मेरे बिल्कुल सामने कुर्सी डालकर बैठ गयी. भयंकर गौस्से में, खा जाने वाली निगाआों से मुझे देखते हुए.

हन, रात को शराब पी थी… लेकिन न्षे मैं इतना बड़ा कौन सा कांड कर दिया की ये हयदेराबाद से देल्ही आ पहुँची?

ये सोच कर मैं अंदर तक सिहर गया. टा न्ही कहाँ-कहाँ से पसीना च्छुतने लगा. बचा-कूचा हॅंगओवर भी दूं दबा कर भगा निकला मुझे अकेला छोड़ उस शेरनी के आयेज. जो अब मेरा क्या हाल करने वाली थी मुझे नही पता.

उसने कुछ कहने के लिए जैसे ही मूह खोला तो मैने पहले ही कह दिया की सॉरी यार ग़लती हो गयी और अब फूटा परमाणु बॉम्ब से भी घाटक गुल बॉम्ब.

गुल- नाहिंग़ल्ती और आप? आप तो कभी ग़लती करते ही नहीं. आप तो सिर्फ़ मीठी-मीठी बातें करते हो. अरे ग़लती तो मुझसे हुई है और वो भी बहुत बड़ी की आप से दिल लगा बैठी.

उसकी जाली-कटी सुनकर मुझे भी तोड़ा गुस्सा आया और मैने भी कह दिया की क्यों लगाया था मुझसे दिल? मैने तो माना किया था और आज भी कर रहा हूँ.

मैने अपनी बात ख़तम भी नही की थी की गुल लगी रोने … और मैं भी पठार दिल मूह फेर लिया.

वो रोते-रोते उठी मेरा चेहरा लिया अपने हाथों में और मेरी आँखों में देख कर कहने लगी- ये जो आपने अभी खा वो दिल से कहा है? ईमान से कहा है?

मैं- जीतने दिल और ईमान से तुमने कहा.

अब बैठ गयी मेरे पास भर लिया बाहों में और लगी चूमने. चेहरे का कोई हिस्सा ऐसा नही छोड़ा जहाँ चूमा ना हो.

मैं- मुझे ये तो बताओ की तुम तो अगले हफ्ते आने वाली थी आज क्यों आई हो?

गुल- पहले आप मेरे एक सवाल का जवाब दें.

मैं- पूछो.

गुल- मैने सुना है की शराब पीने के बाद कोई झूठ नही बोलता.

गुल- क्या ये सच है?

मैं- हन बिल्कुल सच है.

मेरे इतना कहते ही उसने मुझे फिर से बाहों में भर लिया.

गुल- पता है अपने कल क्या किया?

मैं- यार … अब जो भी किया मैं तो पहले ही सॉरी बोल चुका हूँ.

गुल- अपने कल रात शराब पी कर मेरे पास फोन किया और मुझे यहाँ भूलने के लिए पता है क्या कहा?

मैं- मैने तुम्हें बुलाया था? और क्या कहा?

गुल- जान.

मैं- हन बताओ क्या कहा?

गुल- जान. जान कहा मुझे पहली बार आपने. इसलिए मुझे आना पड़ा.

मैं- हैं? तो ये कौन सी बड़ी बात हो गयी?

गुल- आपके लिए तो कुछ भी बड़ा नही होता लेकिन कोई मेरे दिल से पूछे? मैं तो हमेशा तरसती रही हूँ आपके प्यार के लिए.

मैं- मैं तुम्हें पायर करता हूँ या नही? यह बिस्तेर इस बात का गवाह है.

गुल- आप हैं ना पत्थर थे, पत्थर हो और पत्थर ही रहोगे.

ये क्या हाल बना रखा है? गयरह बाज चुके हैं अभी तक नहाए भी नही. मैं क्यूँ गयी थी आप को अकेले छोड़ कर? चलो उठो और न्हा लो, मैं तब तक खाना बनती हूँ.

अब वो चली किचन में और मैं बातरूम में नहाने.

दोस्तो, ये कोई कहानी नही है बल्कि मेरे जीवन का हिस्सा है. इसे मैं बिल्कुल वैसा ही लिखना चाहता था जैसे ये बीता है.

इसमें केवल प्रेम है, विशुद्ध प्रेम. यह मोहब्बत है गुल की. इतनी टूटकर मोहब्बत की उसने. शायद कोई नही कर सकता.

खैर, अब मैं नहा चुका था और गुल आई चाय और ओमेलेट लेकर और लगाई अपने हाथ से खिलाने मुझे. नाश्ते के बाद वो बर्तन रखकर वापस आई.

अब देखा उसे गौर से. नीले रंग का हाफ स्लीव कुर्ता, सफेद चुस्त पाजामी, कुल्हों से नीचे तक के बाल, काली आँखें, गोरा रंग.
देखता ही रह गया.

हर बार यही होता है. उसके हुस्न के जाल में उलझ कर रह जाता हूँ फिर उसी से रास्ता पूछना पड़ता है बाहर निकालने का. वो है ही इतनी खूबसूरत की कोई भी उलझ जाए.

बैठी मेरे पास और बाहों में भर कर लगी किस करने.

चूमते-चूमते ही मेरे सारे क्पड़ी उतार दिए और मैने भी उसके क्पड़ी उतार दिए लेकिन पैंटी छोड़े दी.

गुल- ये पैंटी क्यों छोड़े दी जान?

मैं- इसे तुम खुद उतरना.

गुल- अच्च्छा. ये बात है तो गुल का वादा है की पैंटी आप ही निकालॉगाए … मैं न्हीं.

मैं- चलो देखते हैं कौन जीतता है?

इतना कह कर मैं चूमने लगा उसके बूब्स को. बड़ी-बड़ी चुचियाँ और उनके गौलाबी निप्पल.

गुल सीत्कार उठी- आ. जान ज़ोर से, एक हफ्ते से तड़प रही हूँ. ज़ोर से दब्ाओ आ … आ …

मैं- मैं भी तो तड़प र्हा था तुम्हारी आ सुनने के लिए.

गुल- आ. सी … मेरी छूट मचल रही है.

मैं- मेरा भी लंड मचल रहा है.

अब वो हुई पिच्चे और मेरा लंड पकड़ कर मूँह में भर लिया और लगी चूसने. अपनी जीभ से लंड की मालिश सी करने लगी.

गुल को अचंक जैसे कुछ याद आया और वो उठकर 69 की पॉजीटिओन में आ गयी और मेरा लंड पकड़ कर बोली- आपने कहा था ना की पैंटी तुम खुद उतरना.

मैं- हन.

गुल- अब देखते हैं पैंटी कौन उतरेगा.

और फिर से गपगाप लंड चूसने लगी. बताओ ऐसी ज़िद कौन करता है? लेकिन ये करती है.

अब उसकी ज़िद के सामने मैने घुटने टेक दिए. उतार दी पनटी.

उसने मेरे लंड को लका सा काट कर अपनी जीत की घोसना की तो मैं मुस्कुरा कर रह गया.

अब उसकी छूट और गंद मेरी आँखों के सामने तीन मैने मूह में भर ली उसकी गुलाबी छूट और उसकी गंद के भूरे छेड़ पर अंगूठा फिरने लगा.

गुल- आ. हन जान खा जाओ मेरी छूट को इसने तडफा रखा है मुझे.

मैं- तुम भी इस लंड को खा जाओ ये भी तुम्हें ही याद कर रहा था.

मेरे इतना कहते ही गुल ने पूरा लंड मूह में ले लिया और लगी चूसने.

इधर मैं उसकी छूट को चाटने लगा.

थोड़ी देर बाद उसने लंड को छ्चोड़ा और उठकर लंड पर अपनी छूट टीका दी.

मैने नीचे से धक्का मारना चाहा तो रोक दिया- क्या बात? आपको बड़ी जल्दी है.

मैं- इतनी हसीन छूट अगर लंड पर टिकी हो तो किसे जल्दी नही होगी?

गुल- अच्छा ये बात है?

मैं- हन यही बात है.

जैसे ही मैने कहा गुल एकद्ूम लंड पर बैठ गयी और तभी चीख कर खड़ी हो गयी.

गुल- ये बड़ा हो गया है क्या?

मैं- क्यों क्या हुआ?

गुल- दर्द हुआ.

मैं- अरे कुच्छ नही है. चलो तुम नीचे आओ मैं ऊपर से करता हूँ.

गुल- नही, आज तो मैं ही करूँगी. एक हफ्ते बाद मिले हो आप.

और ये कह कर फिर से अपनी छूट में लंड घुसा लिया और होने लगी ऊपर-नीचे- आ … जान, आ आ.

थोड़ी देर ऐसे ही करने के बाद गुल उठी और घोड़ी बन गयी, मैने पीछे से लंड घुसाया.

गुल- आ. जान जल्दी-जल्दी करो छोड़ दो मुझे बुरी तरह आ … आ …

थोड़ी देर बाद मैने उसे नीचे किया और खुद ऊपर आ गया.

अब गुल ने मेरा लंड पकड़ कर छूट पर लगाया और मैने एकद्ूम झटका मारा सीधा पूरा का पूरा अंदर.

गुल- आ. जानू छोड़ दो, फाड़ दो मेरी छूट को. और मेरी कमर पर पैर लपेट लिए.

कुछ देर ताबदेड़तोड़ चुड़कर गुल बोली- आ. जान मैं आ रही हूँ और तेज करो और तेज ऊन … आ … ह. और हम दोनो साथ में झाड़ गये.

गुल मुझसे लिपट गयी और किस करने लगी फिर मैने उसे नॅपकिन दिए तो उसने पहले मेरा लंड पोंचा फिर अपनी छूट और नंगी ही मेरे पास लेट गयी.

मैं- मज़ा आया?

उसने शर्मा के मूह फेर लिया.

मैने उसका चेहरा अपनी ओर किया- बताओ. मज़ा आया?

गुल- जान. आपके साथ हमेशा ही मज़ा आता है.

मैं- तो फिर चाय पीला दो.

गुल- पता है इस शहेर में रह कर मुझे दो लातें लगी हैं.

मैं- कौन सी?

गुल- पहले आप और दूसरी चाय.

ये कहते-कहते वो उठी और कुच्छ ढूँढने लगी.

मैं- क्या ढूँढ रही हो?

गुल- मेरी ब्रा-पनटी कहाँ हानि?

मैं- ब्रा पनटी. लेकिन क्यूँ?

गुल- मुझे चाय बनाने जाना है.

मैं- गुल तुम्हें इस बंद मकान में कौन देखेगा मेरे अलावा?

गुल- ओह सॉरी हयदेराबाद.

मैं- अब चाय तो बना लो.

और वो नंगी ही किचन में चली गयी.

जो गुल को एक नज़र भी देख ले वो दीवाना तो हो ही जाता है. आशिक़ का कौल निभाने या अपनी आँखों को गरमाने मैं भी जा पहुँचा रसोई में … जहाँ वो नंगी ही चाय बना रही थी.

मैं उसके नंगे कुल्हों पर हाथ फिरने लगा और जब कुल्हों के बीच मे उंगली घुसाई तो गुल उचक पड़ी. शरारती सी मुस्कान फैल गयी उसके सुर्ख होंतों पर- क्यों जनाब क्या इरादा है?

लेकिन मैं उसके होठों और मुस्कान में फँसा क्या कह पता?

मैं- तेरे हुस्न को देखा, तेरी आँखों में डूबा,

कौन बचाए इन सागर की लहरों से?

गुल- जनाब शायराना मूड में हैं.

मैं- कोई आदमी शायराना मूड में कब होता है?

गुल- हटो चाय बन गयी है, मैं डाल कर लाती हूँ तब बात करेंगे इस शायराना मूड पर.

दोस्तो, मेरा जीवन उसके साथ इतना हसीन और रोमॅंटिक रहा है की कभी-कभी मैं खुद यक़ीन नही कर पता की वो सब सच था या सपना. शायद वक़्त उसकी सभी यादों को मिटा दे लेकिन एक चीज़ कभी नही मिट सकती.

जब हम दोनो बिच्चो की कगार पर खड़े थे और अंदर से किर्छ-किर्छ हुआ लेकिन बाहर से मजबूत दिखने का नाटक करते हुए मैं गुल को लगातार टीन दिनों तक समझा रहा था की जिंदगी आयेज बढ़ने का नाम है. मैं तुम्हारी ज़िंदगी का एक पड़ाव था. अब वक़्त इस पड़ाव से आयेज बढ़ने का है.

और उस वक़्त उसकी आँखों में जो मोटे-मोटे आँसू आते थे शायद वक़्त भी उन्हे भुला ना पाए.

आप लोग भी सोच रहे होंगे की मैं कहाँ ये प्यार-मोहब्बत की बातें ले बैठा?

तो दोस्तो, एक बात गाँठ बाँध लो की जहाँ प्यार है वहीं संभोग होता है. बिना पायर या तो वेश्यावृति होती है या फिर

खैर, मूल बात पर आते हैं. वो एक ट्रे में चाय लेके आई. मैने उसके हाथ से ट्रे लेकर एक कप उसे दिया और दूसरा खुद लेकर ट्रे रख दी.

गुल- क्यूँ जनाब. शेर ख़तम हो गये या बाकी हैं मुझ नाचीज़ के लिए?

मैं- हन गुल, शेर ख़त्म हो गये. और मैं एक अहम मसले पर तुमसे बात करना चाहता हूँ.

गुल- यही की गुल मुझे छोड़े कर चली क्यों न्हीं जातीं, यही ना?

मैं- गुल मेरी बात तो…

दोस्तनो, आपको ये घटा कैसी लगी मुझे ज़रूर बताएँ.

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