सेक्स कहानी अब आयेज-
डॉक्टर (मेरी तरफ देख कर दहशत भारी नज़रों से): रीता जी, आपका फिगर तो कमाल का है. ये तो किसी जवान लड़की को भी शर्मा दे.
मैं (तोड़ा नाराज़ होते हुए): आज आपने इसीलिए मुझे बाहर बिता कर रखा था?
डॉक्टर: अर्रे मेरी जान, ऐसा नही करता तो अभी इतनी हसीन औरत के जिस्म का मज़ा कैसे लेता?
मैं शर्मा गयी, पर उनकी तारीफ से मेरे अंदर की आग और भड़क गयी. वो मेरे पास बैठ गये, और मेरे ब्लाउस को निकाल कर मेरा एक बूब पकड़ कर निपल चूसने लगे, ज़ोर से, प्यास से. उनकी जीभ की हर हरकत से मेरी चुचियाँ तंन गयी. मैं भी उनके बालों को शिद्दत से सहलाने लगी.
उन्होने फिर मेरी गर्दन और कान के निचले हिस्से पर किस करना शुरू किया. उनकी साँसें मेरे गालों को सुलगा रही थी. हर किस के साथ मेरे जिस्म में सिहरन दौड़ रही थी, और मैं मदहोश होती जेया रही थी. मेरी उंगलियाँ बेखुद हो कर उनकी पंत के उपर से उनके लंड को मसल रही थी.
मैं सॉफ महसूस कर पा रही थी की उनका लंड पूरी तरह से खड़ा हो गया था, एक-दूं पत्थर की तरह सख़्त और गरमा-गरम. मेरे हाथो में उनकी मर्दानगी का एहसास मुझे और भी उत्तेजित कर रहा था.
अचानक वो खड़े हुए और मुझसे तोड़ा डोर चले गये. मैने एक पल के लिए सोचा, ये क्या कर रहे होंगे? मुझे ऐसे अधूरा छ्चोढ़ कर? मेरे जिस्म में एक अनोखी तड़प उठ रही थी.
मैं बेचैन हो कर अपना ब्लाउस उठा ही रही थी की मेरी साँसें थम गयी. वो पुर नंगे हो कर मेरे सामने आए. उनका लंड बिल्कुल काला था, एक-दूं गहरा काला, और उस पर कॉंडम पहले से ही लगा हुआ था, जो उसके भारी-भरकम रूप को और भी उभरता था.
मेरी आँखें उनके लंड पर जेया कर रुक गयी, जैसे वो किसी जादुई शक्ति से उनसे जुड़ गयी हो. वो काला था, एक-दूं काला, और उस पर कॉंडम चमक रहा था. पर उसका साइज़ यार, वो देख कर तो मेरी साँस ही अटक गयी.
मैने अपनी पूरी ज़िंदगी में इतना मोटा और लंबा लंड कभी नही देखा था. मेरे हज़्बेंड का लंड तो इसके सामने बच्चा लग रहा था, एक-दूं छ्होटा और ना-काफ़ी. मेरे अंदर दर्र की एक ठंडी लेहायर दौड़ गयी, पर उस दर्र के पीछे एक गहरी चाहत भी च्चिपी थी.
मैं एक-दूं सहमी हुई थी, पर मेरी नज़रें उनकी मर्दानगी से हॅट नही रही थी. मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था, एक अंजना दर्र और एक उत्सुकता दोनो एक साथ मुझमे मचल रहे थे.
मैं (हानफते हुए): ये… ये क्या? ये इतना बड़ा मैं कैसे?
मेरी आवाज़ में सक्चा दर्र था. वो और क़रीब आए. चेहरे पर वही नॉटी स्माइल थी. उन्होने मेरे गाल पर हल्का सा हाथ फेरा, और धीमे से, सहलाती आवाज़ में बोले-
डॉक्टर: दररो मत, रीता जी. इस बड़े लंड से ही तो तुम्हे असली मज़ा मिलेगा. तोड़ा दर्द होगा शुरू में मेरी जान. पर फिर तुम खुद चाहोगी की ये कभी ना निकले. तुम्हारी छूट इसके लिए ही बनी है, रीता.
उनकी बातों से दर्र धीरे-धीरे डोर हुआ. उत्सुकता और बेचैनी बढ़ गयी. मेरी नज़रें फिर से उनके विशाल लंड पर टिक गयी. अब वो डरने की बजाए, एक गहरी ख्वाहिश जगा रहा था. जिस्म उस बड़े लंड के लिए और भी बेकरार हो चला था. उसे तुरंत महसूस करना चाहता था, कुछ भी करने को तैयार था.
मैं शर्मा गयी, पर अब मेरा दर्र पूरी तरह से उत्तेजना में बदल चुका था. मुझे पता था आज मेरी इस बड़े लंड से चुदाई पक्की थी. और सच काहु तो मैं भी ये लंड मेरे अंदर महसूस करना चाहती थी. उसकी गहराई और मोटाई को अपनी छूट में समा लेना चाहती थी, चाहे जितना भी दर्द हो.
मेरे अंदर की प्यास अब इतनी बढ़ चुकी थी की मैं उस लंड को अपनी छूट की गहराइयों में उतारने के लिए कुछ भी कर सकती थी.
उन्होने मुझे नीचे बैठने का इशारा किया, और मैं उनके सामने घुटनो पर बैठ गयी. मेरी नज़रें उनके विशाल, काले लंड पर टिकी थी, जो अब मेरी नज़रों में एक शिकारी की तरह चमक रहा था.
डॉक्टर अमित (मेरी आँखों में देखते हुए): ले रीता, पकड़ इसको. तेरा पति तो ये मज़ा कभी दे ना पाया. आज से ये तेरा है. इसकी हर इंच, हर मोटाई, तेरी प्यासी छूट के नाम है.
उनके इशारे से मैने उसे पकड़ लिया, मेरी उंगलियाँ उसकी मोटाई को महसूस कर रही थी, जैसे मैं किसी गरम, पत्थर से बने देवता को चू रही हू. लाइफ में पहली बार किसी गैर मर्द से ये सब हो रहा था, और मेरे जिस्म का रोम-रोम इससे कामुकता में डूब रहा था. उनका लंड छ्छूते ही मेरे में बिजली दौड़ गयी, और अबकी बार वो बिजली सिर्फ़ झुरजुरी नही, बल्कि एक तेज़ आग थी जो मेरी नस-नस में फैल गयी. मेरी छूट अब बुरी तरह से मसली जेया रही थी.
मैं (लंड को हाथ में लिए): अफ डॉक्टर, क्या कमाल का लंड है आपका. इतना बड़ा, इतना मोटा मेरे मूह में तो मुश्किल से आ पाएगा. पर मैं इसकी हर एक बूँद रस चूस लेना चाहती हू.
डॉक्टर अमित: आ, अब देर मत कर, मेरी जान. जो प्यास तेरी छूट में मचल रही है ना, वो इसको चूसने से ही शुरू होगी. दिखा दे मुझे अपनी रणदीपना.
फिर मैने उनके लंड को मूह में लेकर चूसना शुरू कर दिया. मैं एक-दूं रंडी की तरह उनका लंड चूस रही थी, जैसे मैं बरसों से इसकी प्यासी थी, और आज मेरा जन्मों का इंतेज़ार ख़तम हो रहा था. मेरे होंठ और जीभ उनके लंड पर पूरी शिद्दत से चल रहे थे, और मैं उसकी हर नस, हर उभार को महसूस कर पा रही थी. मैं हर बूँद रस्स चूस लेना चाहती थी.
डॉक्टर अमित: आ, क्या चूस्टी है मेरी जान. तेरी ज़ुबान तो मेरी लंड पर ऐसे चल रही है जैसे ये कोई लॉलिपोप हो. सच काहु, तूने तो रंडियों को भी पीछे छ्चोढ़ दिया. इतनी प्यासी थी तू मेरे लंड के लिए, है ना? और अंदर ले, मेरी रंडी, पूरा का पूरा निगल ले इसको.
डॉक्टर अमित की आँखें बंद थी, और उनके चेहरे पर परम सुख सॉफ दिख रहा था. वो मेरे सिर को धीरे-धीरे सहला रहे थे, मुझे और गहरा खींचने का इशारा कर रहे थे. मेरे गले से गंदी-गंदी, कामुक आवाज़े निकल रही थी, और मैं पूरी तरह से उस पल में खोई हुई थी, उस बड़े, हार्ड लंड के स्वाद में.
कुछ देर बाद, डॉक्टर अमित ने मेरा सिर पकड़ा और मुझे धीरे से उपर उठाया. उन्होने अपनी आँखें खोली और मेरे होंठो पर एक गहरी, कामुक मुस्कान के साथ एक और किस दिया. मैं उनकी आँखो में हवस और प्यास सॉफ देख पा रही थी, जो मेरी ही भावनाओं का आईना थी.
उन्होने मुझे धीरे से बेंच पर लिटाया. मैं अपनी लाल सारी में लेती हुई थी, मेरे उभरे हुए बूब्स उनकी नज़रों के सामने थे. डॉक्टर अमित मेरे उपर झुक गये, और इस बार, उनका ध्यान मेरे नीचे की और गया. उन्होने मेरी सारी को धीरे से उपर खिसकाया.
मेरी साँसें तेज़ हो गयी, जब उनका हाथ मेरी रेड पनटी पर पड़ा. उन्होने एक नॉटी स्माइल दी और धीरे से मेरी पनटी को नीचे खिसकाया, उसकी इलॅस्टिसिटी को महसूस करते हुए. एक पल में, मेरी गुलाबी छूट उनके सामने आ गयी, जो अब बुरी तरह से गीली और प्यासी थी.
डॉक्टर अमित (मेरी टाँगों के बीच झुकते हुए): आज तो तुम्हारा पूरा इलाज करना पड़ेगा, रीता जी.
उनकी जीभ मेरी छूट के उपर मंडराने लगी. मैने एक गहरी आहह भारी, और मेरे शरीर में तीवरा झुरजुरी दौड़ गयी. उन्होने पूरी लगान से मेरी छूट को चाटना शुरू कर दिया. उनकी जीभ की हर हरकत से मैं और ज़्यादा उत्तेजित हो रही थी, जैसे मेरे जिस्म का हर हिस्सा उनके छ्छूने से झूम उठ रहा हो. मैने अपने होंठ चबा रही थी और अपने हाथो से बेंच को कस्स कर पकड़ लिया था.
मैं (मेरी सिसकारियाँ अब कमरे में गूँज रही थी): आ… हा… और तेज़… डॉक्टर अमित… रुकना मत.
मेरी छूट से पानी की धार बहने लगी थी, और मैं पूरी तरह से पिघलने लगी थी. मेरी सारी शरम और होश अब डॉक्टर अमित की ज़ुबान के सामने हवा हो चुके थे.
डॉक्टर अमित ने मेरी छूट को तब तक छाता जब तक मैं दो बार झाड़ नही गयी. जब मैं पूरी तरह से शांत हो गयी, तो उन्होने अपना चेहरा उपर उठाया, उनके होंठो पर मेरे काम-रस्स का स्वाद था.
डॉक्टर अमित: अभी तो बस शुरुआत है, रीता जी. असली मज़ा तो अब आएगा.
मेरी आँखें चमक उठी. मैं जानती थी की अब क्या होने वाला था. उन्होने अपने लंड पर लगा कॉंडम ठीक किया, जो अब पूरी तरह से तंन कर तैयार था, एक पत्थर की तरह. उन्होने अपनी टाँगों के बीच आ कर खुद को मेरी छूट के मुहाने पर सेट किया.
डॉक्टर अमित: तैयार है मेरी रंडी, अब इस बड़े लंड को अपनी छूट में उतारने के लिए? इसकी गर्मी झेलने के लिए? आज से तू मेरी रंडी है, और तुझे असली चुदाई के मज़े देता हू.
मैं (दूं तोड़ती आवाज़ में): हमेशा से, अब और वेट नही होता. पर… पर तोड़ा धीरे से करना… ये बहुत बड़ा है…
उन्होने मेरी बात सुनी, पर उनके चेहरे पर वही डेरिंग स्माइल थी. एक पल का भी इंतेज़ार किए बिना, उन्होने एक ज़ोर का धक्का दिया, और उनका बड़ा और मोटा लंड मेरी छूट में घुस गया!
आआआआआअहह! एक तीखी चीख मेरे गले से निकली. हा, यार, दर्द हुआ, बहुत तेज़, क्यूंकी वो सच में बहुत बड़ा था, मेरी छूट को फाड़ता हुआ लग रहा था. मेरी आँखों में पानी आ गया, मेरे जिस्म में अजीब सी सिहरन दौड़ गयी. पर वो दर्द एक अजीब से आनंद में बदल गया जब वो लंड अंदर तक चला गया, मेरी गहराइयों तक पहुँच गया.
मैने अपने पैरों को उनकी कमर के इर्द-गिर्द कस्स लिया, जैसे मैं उन्हे अपने अंदर समेत लेना चाहती थी. इस दर्द और मज़े को पूरी तरह महसूस करना चाहती थी.
डॉक्टर अमित (मेरे होंठो पर गरम किस करते हुए): दर्द हो रहा है ना, मेरी जान? तेरी छूट की दीवारें खुल रही है. अब तू असली मज़ा पाएगी, मेरी मासूम रंडी.
मैं (लंड को अपनी छूट में महसूस करते हुए): हा… बहुत… पर आप रुकना मत… मुझे इसका पूरा मज़ा लेना है… और अंदर… पूरा ले लो मुझे.
डॉक्टर अमित (मेरी कमर को कस्स के पकड़ते हुए): जानता हू मेरी रीता. बस तोड़ा सा ये दर्द झेल ले, फिर ये मज़ा ऐसा चढ़ेगा की तू ये लंड कभी बाहर निकालने नही देगी. मैं हू ना, अब तू अपनी छूट को मेरे लंड पर छ्चोढ़ दे, और इसको अपने अंदर उतार जाने दे. आज से तू सिर्फ़ मेरी रंडी है.
उनकी इस बात ने मुझे हिला दिया, और वो सच भी बोल रहे थे. उनके लिए तो मैं संस्कारी से रंडी बन रही थी. और दर्द के बीच भी एक अनोखा आराम मिलने लगा. मेरी छूट अब उस बड़े लंड को अपनाने लगी थी, और मैं उसकी हर हलचल को महसूस करने लगी थी.
उन्होने धक्कों की स्पीड थोड़ी धीमी रखी, और धीरे-धीरे अंदर-बाहर होने लगे. मेरी छूट उसकी मोटाई से पूरी तरह से भर चुकी थी, और हर इंच उनका लंड अंदर जाता, मुझे एक अलग ही एहसास होता. हर धक्के पर मेरी छूट खुल और बंद हो रही थी, उस बड़े लंड को पूरी तरह से महसूस कर रही थी.