डॉक्टर की चूत चुदाई

doctor ki chut chudai जैसा कि पिच्छली स्टोरी मे बताया था कि मेरी शादी के बाद मेरा ट्रान्स्फर दूसरी जगह हो गया था. मेरे साथ मेरी प्यारी सहेली रचना का भी ट्रान्स्फर उसी जगह हो गया था जो कि हमारे लिए बहुत ही खुशी की बात थी. सूरज ने नयी जगह पर एक नर्सरी खोल ली. जो कि उसकी महनत से अच्छा चल बैठा. मेरी पहली प्रेग्नेन्सी जो की शादी से पहले ही हो गयी थी मिसकॅरियेज हो गया था. हम दोनो बच्चों के मामले मे कोई भी जल्दी बाजी नहीं करना चाहते थे.

इसलिए हमने काफ़ी सुरक्षा के साथ ही संभोग किया. रचना की शादी वहीं पास के एक फॉरेस्ट ऑफीसर अरुण से हो गयी. रचना यू.पी. से बिलॉंग करती थी. अरुण बहुत ही हँसमुख और रंगीन मिज़ाज आदमी था. उसकी पोस्टिंग हमारे हॉस्पिटल से 80 किमी दूर एक जंगल मे थी. शुरू शुरू मे तो हर दूसरे दिन भाग आता था. कुच्छ दिनों बाद हफ्ते मे दो दिन के लिए आने लगा. हम चारों आपस मे काफ़ी खुले हुए थे. अक्सर आपस मे रंगीले जोक्स और द्विअर्थि संवाद करते रहते थे.

उसकी नज़र शुरू से ही मुझ पर थी. मगर ना तो मैने उसे कभी लिफ्ट दिया ना ही उसे ज़्यादा आगे बढ़ने का मौका मिला. होली के समय ज़रूर मौका देख कर रंग लगाने के बहाने मुझसे लिपट गया था और मेरे कुर्ते मे हाथ डाल कर मेरी चूचियो को कस कर मसल दिया था. उसकी इस हरकत पर किसी की नज़र नहीं पड़ी थी इसलिए मैने भी चुप रहना बेहतर समझा. वरना बेवजह हम सहेलियों मे दरार पड़ जाती. मैं उससे ज़रूर अब कुच्छ कतराने लगी थी. मगर वो मेरी निकट ता के लिए मौका खोजता रहता था. रचना को शादी के साल भर बाद ही मैके जाना पड़ गया क्योंकि वो प्रेग्नेंट थी.

अब अरुण कम ही आता था. आकर भी उसी दिन ही वापस लौट जाता था. अचानक एक दिन दोपहर को पहुँच गया. साथ मे एक और उसका साथी था जिसका नाम उसने मुकुल बताया. उनका कोई आदमी पेड से गिर पड़ा था. बॅकबोन. मे इंजुरी थी. रास्ता खराब था इसलिए उसे लेकर नहीं आए.

मुझे साथ ले जाने के लिए आए थे. मैने झटपट हॉस्पिटल मे इनफॉर्म किया और सूरज को बता कर अपना समान ले कर निकल गयी. निकलते निकलते दो बज गये थे. 80 की. का फासला कवर करते करते हमे ढाई घंटे लग गये. वो तीनो सूमो मे आगे की सीट पर बैठे थे. दोनो के बीच मे मे फँसी हुई थी. रास्ता बहुत उबड़ खाबड़ था. हिचकोले लग रहे थे. हम एक दूसरे से भीड़ रहे थे. मौका देख कर अरुण बीच बीच मे मेरे एक स्तन को कोहनी से दाब देता. कभी जांघों पर हाथ रख देता था. मुझे तब लगा कि मैने सामने बैठ कर ग़लती की थी.

हम शाम तक वहाँ पहुँच गये. मरीज को चेकप करने मे शाम के सिक्स ओ’क्लॉक हो गये. यहाँ शाम कुच्छ जल्दी हो जाती है. नवेंबर का महीना था मौसम बहुत रोमॅंटिक था. मगर धीरे धीरे बदल घिरने लगे थे मैं जल्दी अपना काम निपटा कर रात तक घर लौट जाना चाहती थी.

“इतनी जल्दी क्या है? आज रात यहीं रुक जाओ मेरे झोपडे मे.” अरुण ने कहा मगर मेरे टावर कर देखने पर वो चुप हो गया.

“चलो मुझे छोड़ आओ.”मैने कहा.

“चल रे मुकुल, मॅडॅम को घर छ्चोड़ आएँ.”

हम वापस सूमो मे वैसे ही बैठ गये और रिटर्न यात्रा शुरू हो गयी. मैं पीछे बैठने लगी थी की अरुण ने रोक दिया.

“कहाँ पीछे बैठ रही हो. सामने आ जाओ. बातें करते हुए रास्ता गुजर जाएगा.”

“लेकिन तुम अपनी हरकतों पर काबू रखोगे वरना मैं रचना से बोल दूँगी.” मैने उसे चेताया.

“अरे उस हिट्लर को मत बताना नहीं तो वो मेरी अच्छि ख़ासी रॅगिंग ले लेगी.”

मैं उसकी बात सुन कर हँसने लगी. और मैं उसकी चिकनी चुपड़ी बातों से फँस गयी.अचानक मूसलाधार बेरिश शुरू हो गयी. जुंगल के अंधेरे राश्तो मे ऐसी बरसात मे गाड़ी चलाना भी एक मुश्किल काम था. अचानक गाड़ी जंगल के बीच मे झटके खाकर रुक गयी. अरुण टॉर्च लेकर नीचे उतरा. गाड़ी चेक किया मगर कोई खराबी पकड़ मे नहीं आई. कुच्छ देर बाद वापस आ गया.वो पूरी तरह भीग चुक्का था. “कुच्छ नहीं हो सकता.”

उसने कहा”चलो नीचे उतर कर धक्का लगाओ.

हो सकता है कि चल जाए.”

“मगर….बरसात…”मैं बाहर देख कर कुच्छ हिचकिचाई.

“नहीं तो जब तक बरसात ना रुके तब तक इंतेज़ार करो”उसने कहा”अब

इस बरसात का भी क्या भरोसा. हो सकता है सारी रात बरसता रहे.

इसीलिए तुम्हें रात को वहीं रुकने को कहा था.”

मैं नीचे उतर गयी. बरसात की परवाह ना कर मैं और मुकुल दोनो काफ़ी देर तक धक्के मारते रहे मगर गाड़ी नहीं चली. रात के आठ बज रहे थे. मैं पूरी तरह गीली हो गयी थी. मैं पीछे की सीट पर बैठ गयी. अरुण ने अंदर की लाइट ओन की. मैने रुआंसी नज़रों से अरुण की तरफ देखा. अरुण बॅक मिरर से मेरे बदन का अवलोकन कर रहा था. चूचियो से सारी सरक गयी थी. सफेद ब्लाउस और ब्रा बरसात मे भीग कर पारदर्शी हो गयी थी. निपल सॉफ सॉफ नज़र आरहे थे. मैने जल्दी से अपनी छातियो को सारी से छिपा लिया.

उसने भी लाइट बंद कर दी. रात अंधेरे में दो गैर मर्दों का साथ दिल को डुबाने के लिए काफ़ी था. कुच्छ देर बाद बरसात बंद हो गयी मगर ठंडी हवा चलने लगी. बाहर कभी कभी जानवरों के आवाज़ सुनाई दे रही थी.अरुण और मुकुल गाड़ी से निकल गये. उन्हों ने अपने अपने वस्त्र उतार लिए और निचोड़ कर सूखने रख दिए. मैं ठंड से काँप रही थी. शरम की वजह से गीले कपड़े भी उतार नहीं पा रही थी. अरुण मेरे पास आया “देखो नीलम घुप अंधेरा है. तुम अपने गीले वस्त्र उतार दो.” अरुण ने कहा.”वरना ठंड लग जाएगी.”

“कुच्छ है पहन ने को?” मैने पूछा “मैं शरम से दोहरी हो गयी.”

“नहीं!” अरुण ने कहा “हमारे पहने कपड़े भी तो भीग चुके हैं.

पहले से थोड़ी मालूम था कि हमे रात जंगल मे गुजारनी पड़ेगी.

वैसे देखना रीच्छ बहुत सेक्सी जानवर होते हैं.सुंदर सेक्सी महिलाओं को देख कर उनपर टूट पड़ते हैं.”

“मेरी तो यहाँ जान जा रही है और तुम्हे मज़ाक सूझ रहा है. कोई कंबल होगा?”मैने पूछा. “पिक्निक पे गये थे क्या.” अरुण मज़ाक कर रहा था. “सर, एक पुरानी फटी हुई चादर है. अगर उस से काम चल जाए..” मुकुल ने कहा. “दिखा नीलम को.” अरुण ने कहा.

मुकुल ने पीछे से एक फटी पुरानी चादर निकाली और मुझे दी. गाड़ी का दरवाज़ा बंद करते ही लाइट बंड हो गयी. दो मर्दों के सामने वस्त्र उतारने के ख़याल से ही शर्म अरही थी. मगर करने को कुच्छ नहीं था ठंड के मारे दाँत बज रहे थे. ऐसा लग रहा था मैं बर्फ की सिल्लिओ से घिरी हुई हूँ. मैने झिझकते हुए अपनी सारी उतार दी. मगर उस से भी राहत नहीं मिली तो चारों ओर देखा. अंधेरा घना था कुच्छ भी दिखाई नहीं दे रहा था. मैने एक एक कर के ब्लाउस के सारे बटन खोल दिए.

चारों ओर नज़र दौड़ाई. कुच्छ भी नहीं दिख रहा था . फिर ब्लाउस को बदन से उतार दिया. उसके बाद मैने अपनी पेटिकोट भी उतार दी. मैं अब सिर्फ़ ब्रा और पॅंटी मे थी. ब्रा को भी मैने बदन से अलग कर दिया. और उस चादर से बदन को लप्पेट लिया. गाड़ी का दरवाज़ा खोल कर मैने उन्हे निचोड़ कर सुखाने का सोचा मगर दरवाज़ा खोलते ही बत्ती जल गयी. मेरे बदन पर केवल एक चिथड़े हुई चादर बेतरतीब तरीके से लिपटी हुई थी. आधा बदन साफ नज़र अरहा था. मेरा दायां वक्ष पर से चादर हटा हुआ था.

मैने देखा अरुण भोचक्का सा एकटक मेरी छाती को घूर रहा है. मैने झट चादर को ठीक किया. चादर कई जगह से फटी हुई थी इसलिए एक अंग ढकति तो दोसरा बाहर निकल आता. दोनो मेरे निवस्त्र योवन को निहार रहे थे. मैने दरवाजा बंद कर दिया. बत्ती बंद हो गयी. “अरुण प्लीज़ मेरे कपड़ों को सूखने देदो.” मैने कहा.

अरुण ने मेरे हाथों से कपड़े ले लिए. मेरे बदन पर अब केवल गीली पॅंटी थी जिसको कि मैं अलग नहीं करना चाहती थी. ठंड अब भी लग रही थी मगर क्या किया जा सकता था. कुच्छ देर बाद दोनो भी ठंड से बचने के लिए गाड़ी मे आ गये. दोनो के बदन पर भी बस एक एक पॅंटी थी. उनके निवस्त्र बदन को मैने भी गहरी नज़रों से देखा.

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“यार, मुकुल ठंड से तो रात भर मे बर्फ की तरह जम जाएँगे. केबईनेट मे रम की एक बॉटल रखी है उसको निकाल.” अरुण ने कहा. मुकुल ने केबईनेट से एक बॉटल निकाली. लाइट जला कर डॅश बोर्ड के अंदर कुच्छ ढूँढने लगा. “सर, ग्लास नहीं है.” उसने कहा. “अबे नीट ही ला.” अरुण ने बॉटल लेकर मुँह से लगाया और दो घूँट लेकर मुकुल की तरफ बढ़ाया.

मुकुल ने भी एक घूँट लिया. “नीलू तू भी दो घूँट लेले सारी सर्दी निकल जाएगी.” अरुण ने कहा. ” नहीं मैं दारू नहीं पीती” मैने मना कर दिया. मगर कुच्छ ही देर में मुझे अपने फ़ैसले पर गुस्सा आने लगा. वैसे भी दो दो आदमख़ोरों के बीच में मे इस तरह का कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी कि मेरा अपने उपर से कंट्रोल हट जाए. मगर ठंडक ने मेरी मति मार दी. मैं दोनो को पीते हुए देख रही थी. उन्होंने फिर मुझ से पूछा.

इस बार मेरी ना मे दम नहीं था. अरुण ने बॉटल मुझे पकड़ा दी. “अरे ले यार कोई पाप नहीं लगेगा. एक डॉक्टर के मुँह से इस तरह की दकियानूसी बातें सही नहीं लगती.” अरुण ने कहा. मैने काँपते हाथों से बॉटल लिया. और मुँह से लगाकर एक घूँट लिया. ऐसा लगा मानो तेज़ाब मेरे मुँह और गले को जलाता हुआ पेट में जा रहा है. मेरे को फॉरन उबकाई आ गई. मैने बड़ी मुश्किल से मुँह पर हाथ रख कर अपने आप को रोका.

“लो एक और घूँट लो.” अरुण ने कहा.

“नहीं, कितनी गंदी चीज़ है तुम लोग पीते कैसे हो.” मैने कहा.

मगर कुच्छ देर बाद मैने हाथ बढ़ा कर बॉटल ले ली और एक और घूँट लिया. इस बार उतनी बुरी नहीं लगी. “बस और नहीं.” मैने बॉटल वापस कर दिया. मेरी इन हरकतों के कारण चादर मेरी एक चूची से हट गया. मेरा सर घूम रहा था. मैं अपने आप को बहुत हल्का फूलका महसूस कर रही थी. अपने ऊपर से कंट्रोल ख़तम होने लगा. शरीर भी गरम हो चला था.

अरुण सामने का दरवाजा खोल कर बाहर निकला और पीछे की सीट पर आगेया. मैं सिमट ते हुए सरक गयी मगर वो मेरे पास सरक आया. “देखो अरुण यह सब सही नहीं है.” मैने कहा.

” मैं तो सिर्फ़ तुम्हारे काँपते हुए बदन को गर्मी देने की कोशिश कर रहा हूँ.”

“नहीं मुझे नहीं चाहिए.”मैं उनको धक्का देती रह गयी मगर उन्हों ने मुझे अपनी बाहों मे समा लिया.

उसके गरम होंठ मेरे होंठों पर चिपक गये. धीरे धीरे मैं कमजोर पड़ती जा रही थी. मैने उसे धकेलने की कोशिश की मगर वो मेरे बदन से और ज़ोर से चिपक गये. एक झटके मे मेरे बदन से चादर को अलग कर दिया. “मुकुल इसे सम्हाल.” अरुण ने चादर आगे की सीट पर फेक दी जिसे मुकुल ने सम्हाल लिया. मेरे बदन पर अब सिर्फ़ एक पॅंटी की अलावा कुच्छ भी नहीं था. मैं हाथ पैर फेक रही थी..

मुकुल को धकेलते हुए कहा”छ्चोड़ो मुझे वरना मैं शोर मचाउंगी” “मचाओ शोर. जितना चाहे चीखो यहाँ मीलो तक सिर्फ़ पेड और जानवरों के सिवा तुम्हारी चीख सुनने वाला कोई नहीं है.” मुकुल ने लाइट जलादी और हमारी रासलीला देखने लगा. अरुण के हाथ मेरे बदन पर फिर रहे थे. उसके नग्न बदन से मेरा बदन चिपका हुआ था.

मैने काफ़ी बचने की कोशिश की अपनी सहेली की दुहाई भी दी मगर दोनो पूरे राक्षश बन चुके थे. मेरा विरोध भी धीरे धीरे मंद पड़ता जा रहा था. उसने मेरे उरोज थाम लिए और निपल्स अपने मुँह मे ले कर चूसने लगा. अपने एक हाथ से अपने बदन से आखरी वस्त्र भी उतार दिया और मेरे हाथ को पकड़ कर अपने तपते लिंग पर रख दिया.

मैने हटाने की कोशिश की मगर उसके हाथ मजबूती से मेरे हाथ को लिंग पर थाम रखे थे. शराब अपना असर दिखाने लगी. मेरा बदन भी गरम होने लगा. कुच्छ देर बाद मैने अपने को ढीला छ्चोड़ दिया. उसके हाथ मेरे उरजों को मसल्ने लगे. उसके होंठ मेरे होंठों से चिपके हुए थे और जीभ मेरे मुँह के अंदर घूम रही थी. मुकुल से अब नहीं रहा गया और वो दूसरी साइड का दरवाजा खोल कर मेरे दूसरी तरफ आ गया. उसने पहले सीट के लीवर को खोल कर चौड़ा कर दिया.

पीछे की सीट ने खुल कर एक आरामदेह बिस्तर का रूप ले लिया था. जगह कम थी मगर इस काम के लिए काफ़ी था.दोनो एक साथ मेरे बदन पर टूट पड़े. मैं उनके बीच फँसी हुई थी. दोनो ने एक एक उरोज थाम लिए. उनके साथ वो बुरी तरह पेश आरहे थे. मेरे दोनो हाथों मे एक एक लिंग था. दोनो लिंगों को मैं सहला रही थी. मेरी पॅंटी पहले से ही गीली थी वरना मेरे करमास से गीली हो जाती. दोनो के हाथ मेरी पॅंटी को मेरे बदन से नोच कर अलग कर दिया. दो जोड़ी उंगलियाँ मेरी योनि मे प्रवेश कर गयी.

“आआहहूऊओह” मेरे मुँह से वासना भरी आवाज़ें निकल रही थी. अरुण ने मुझे गुड़िया की तारह उठा कर अपनी गोद मे बिठा लिया. उसने मेरे दोनो पैरों को फैला कर अपनी गोद मे बिठाया. उसने मुझे खींच कर अपने नग्न बदन से चिपका लिया. मेरे बड़े-बड़े उरोज उसके सीने मे पिसे जा रहे थे. वो मेरे होंठों को चूम रहा था. मुकुल के होंठ मेरी पीठ पर फिसल रहे थे. अपनी जीभ निकाल कर मेरी गर्दन से लेकर मेरे नितंबों तक ऐसे फिरा रहा था मानो बदन पर कोई हल्के से पंख फेर रहा हो.

बदन मे झूर झूरी सी दौड़ रही थी.मैं दोनो की हरकतों से पागल हुई जा रही थी.. रही सही झिझक भी ख़त्म हो गयी थी.मैं अपनी योनि को अरुण के लिंग पर मसल्ने लगी. अरुण ने अभी तक अंडरवेर पहन रखी थी जो कि अब मेरी योनि के रस से भीग गयी थी. ऐसी हालत मे मुझे कोई देखता तो एक वेश्या ही समझता. मेरी डिग्निटी, मेरा रेप्युटेशन,मेरी सिक्षा सब इस आदिम भूख के सामने छ्होटी पड़ गयी थी.

मेरी आँखो मे मेरे प्यार, मेरा हमदम, मेरे पति के चेहरे पर इन दोनो के चेहरे नज़र आ रहे थे. शराब ने मुझे अपने वश मे ले लिया था. सब कुच्छ घूमता हुआ लग रहा था. महसूस हो रहा था कि जो हो रहा है वो अच्च्छा नहीं है मगर मैं किसिको मना करने की स्तिथि मे नहीं थी. दोनो के हाथ मेरी छातियों को ज़ोर-ज़ोर से मसल्ने लगे. अरुण ने मेरे होंठों को चूस चूस कर सूजा दिया था. फिर उन्हें छ्चोड़ कर मेरे निपल्स पर टूट पड़ा.

अपने दोनो हाथों से मेरे एक-एक उरोज को निचोड़ रहा था और निपल्स को मुँह मे डाल कर चूस रहा था. ऐसा लग रहा था मानो बरसों के भूखे के सामने कोई दूध की बॉटल आ गयी हो. दाँतों के निशान पूरे उरोज पर नज़र आ रहे थे. मुकुल उस वक़्त मेरी गर्दन पर और मेरी नितंबों पर दाँत गढ़ा रहा था. मैं मस्त हुई जा रही थी. फिर मुकुल ने अपना अंडरवेर उतार कर मेरे सिर को पकड़ा और मेरे पास बैठ कर अपने लिंग पर झुकने लगा. मैं उसका इरादा समझ कर कुच्छ देर तक मुँह को इधर उधर घुमाती रही.

मगर उसके आगे मेरी एक ना चली. वो मेरे खूबसूरत होंठों पर अपना काला लिंग फेरने लगा. लिंग के आगे के टोपे की मोटाई देख कर मैं काँप गयी. लिंग से चिपचिपा प्रदार्थ निकल कर मेरे होंठों पर लग रहा था. अरुण ने मुझे गोद से उठा कर पूरा नंगा हो गया.मुझे कोहनी और घुटनों के बल पर चौपाया बनाकर मेरी योनि को छेड़ने लगा. योनि की फाँकें अलग कर अपनी उंगलियाँ अंदर बाहर करने लगा.

मैं पूरी तरह अब निवस्त्र थी. मुकुल मेरे सिर को अपने लिंग पर दबा रहा था. मुझे मुँह नहीं खोलता देख कर मेरे निपल्स को बुरी तरह मसल दिया. मैने जैसे ही चीखने के लिए मुँह खोला उसका मोटा लिंग जीभ को रास्ते हटाते हुए गले तक जाकर फँस गया. मेरा दम घुट रहा था. मैने सिर को बाहर खींचने के लिए ज़ोर लगाया तो उसने अपने हाथ को कुच्छ ढीला कर दिया. लिंग आधा ही बाहर निकला होगा उसने दोबारा मेरे सिर को दाब दिया.

और इस तरह वो मेरे मुँह को योनि की तरह चोद रहा था. उधर अरुण मेरी योनि मे अपनी जीभ अंदर बाहर कर रहा था. मैं कामोत्तेजना से चीखना चाहती थी मगर गले मे मुकुल का लिंग फँसा होने के कारण मेरे मुँह से सिर्फ़ “उूउउन्न्ञनणणनह” जैसी आवाज़ें निकल रही थी.

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मैं उसी अवस्था मे झार गयी. काफ़ी देर तक चूसने चाटने के बाद अरुण उठा. उसके मुँह, नाक पर मेरा कामरस लगा हुआ था. उसने अपने लिंग को मेरी योनि के द्वार पर सटा दिया. फिर बहुत धीरे धीरे उसे अंदर धकेलने लगा. खंबे के जैसे अपने मोटे ताजे लिंग को पूरी तरह मेरी योनि मे समा दिया. योनि पहले से ही गीली हो रही थी इसलिए कोई ज़्यादा दिक्कत नहीं हुई. मुकुल मेरा मुख मैथुन कर रहा था.

दोनो लिंग दोनो तरफ से अंदर बाहर हो रहे थे और मैं जीप मे झूला झूल रही थी. मेरे दोनो उरोज़ पके हुए अनार की तरह झूल रहे थे. दोनो ने मसल कर काट कर दोनो उरोजों का रंग भी अनारों की तरह लाल कर दिया था. कुच्छ देर बाद मुझे लगने लगा कि अब मुकुल डिसचार्ज होने वाला है. यह देख कर मैने लिंग को अपने मुँह से निकाल ने का सोचा. मगर मुकुल ने शायद मेरे मन की बात पढ़ ली. उसने मेरे सिर को प्युरे ताक़त से अपने लिंग पर दबा दिया. मूसल जैसा लिंग गले के अंदर तक घुस गया.

वो अब झटके मारने लगा. फिर ढेर सारा गरम गरम वीर्य उसके लिंग से निकल कर मेरे गले से होता हुआ मेरे पेट मे समाने लगा. मेरी आँखें दर्द से उबली पड़ी थी. दम घुट रहा था. काफ़ी सारा वीर्य पिलाने के बाद लिंग को मेरे मुँह से निकाला. उसका लिंग अब भी झटके खा रहा था. और बूँद बूँद वीर्य अब भी टपक रहा था. मेरे होंठों से उसके लिंग तक वीर्य एक रेशम की डोर की तरह चिपका हुआ था. मैं ज़ोर ज़ोर से साँसें ले रही थी.

अरुण पीछे से ज़ोर ज़ोर से धक्के दे रहा था. और मैं हर धक्के के साथ मुकुल के ढीले पड़े लिंग से भिड़ रही थी. मैं सिर को उत्तेजना से झटकने लगी “अयीयैयियी माआ ऊऊहह हुम्म्म्प्प” जैसी उत्तेजित आवाज़ें निकालने लगी. मेरी योनि ने ढेर सारा रस छ्चोड़ दिया. मगर उसकी रफ़्तार में कोई कमी नहीं आई थी. मेरी बाहें मुझे और थामे ना रख सकी. और मैने अपना सिर मुकुल की गोद मे रख दिया. काफ़ी देर तक धक्के मारने के बाद उसके लिंग ने अपनी धार से मेरी योनि को लबालब भर दिया.

हम तीनो गहरी गहरी साँसें ले रहे थे. खेल तो अभी शुरू ही हुआ था. दोनो ने कुच्छ देर सुस्ताने के बाद अपनी जगह बदल ली. अरुण ने मेरे मुख मे डाल दिया तो मुकुल मेरी योनि पे चोट करने लगा. दोनो ने करीब आधे घंटे तक मेरी इसी तरह से जगह बदल कर चुदाई की. मैं तो दोनो का स्टॅमिना देख कर हैरान थी. दोनो ने दोबारा मेरे बदन पर वीर्य की वर्षा की.

मैं उनके सीने से चिपकी साँसे ले रही थी. “अब तो छ्चोड़ दो. अब तो तुम दोनो ने अपने मन की मुराद पूरी कर ली. मुझे अब आराम करने दो.” मैने कहा. मगर दोनो मे से कोई भी मेरी मिन्नतें सुनने के मूड में नहीं लगा. कुच्छ देर तक मेरे बदन से खेलने के बाद दोनो के लिंग मे फिर दम आने लगा. अरुण सीट पर अब लेट गया और मुझे उपर आने का इशारा किया. मैं कुच्छ कहती उस से पहले मुकुल ने मुझे उठाकर उसके लिंग पर बैठा दिया. मैने अपने योनि द्वार को अरुण के खड़े लिंग पर टीकाया. अरुण ने अपने लिंग को दरवाजे पर लगाया.

मैं धीरे धीरे उसके लिंग पर बैठ गयी. पूरा लिंग अंदर लेने के बाद मैं उसके लिंग पर उठने बैठने लगी. तभी दोनो के बीच आँखों ही आँखों मे कोई इशारा हुआ. अरुण ने मुझे खींच कर अपने नग्न बदन से चिपका लिया. अरुण मेरे नितंबों को फैला कर मेरे पिच्छले द्वार पर उंगली से सहलाने लगा. फिर उंगली को कुच्छ अंदर तक घुसा दिया. मैं चिहुनक उठी. मैं उसका इरादा समझ कर सिर को इनकार मे हिलाने लगी तो अरुण ने मेरे होंठ अपने होंठों मे दबा लिए. मुकुल ने अपनी उंगली निकाल कर मेरे योनि से बहते हुए रस को अपने लिंग और मेरी योनि पर लगा दिया. मैं इन दोनो बलिष्ठ आदमियों के बीच बिल्कुल आशय महसूस कर रही थी.

दोनो मेरे बदन को जैसी मर्ज़ी वैसे मसल रहे थे. मुकुल ने अपना लिंग मेरे गुदा द्वार पर सटा दिया. “नहीं प्लीज़ वहाँ नहीं” मैने लगभग रोते हुए कहा “मैं तुम दोनो को सारी रात मेरे बदन से खेलने दूँगी मगर मुझे इस तरह मत करो मई मार जाउन्गि” मगर मुकुल अपने काम मे जुटा रहा. मैं हाथ पैर मार रही थी मगर अरुण ने अपने बलिष्ठ बाहों और पैरों से मुझे बिल्कुल बेबस कर दिया था. मुकुलने मेरे नितंबों को फैला कर एक जोरदार धक्का मारा. “उवूअवियैयीयियी माआ मर गेययी” मेरी चीख पूरे जंगल में गूँज गयी. मगर दोनो हंस रहे थे.

“थोड़ा सबार करो सब ठीक हो जाएगा. सारा दर्द ख़त्म हो जाएगा.” मुकुल ने मुझे समझाने की कोशिश की. मेरी आँखों से पानी बह निकला. मैदर्द से रोने लगी. दोनो मुझे चुपकरने की कोशिश करने लगे. कुच्छ देर बाद मैं जब शांत हुई तो मुकुल ने धीरे धीरे पूरे लिंग को अंदर कर दिया. मैने और सूरज ने शादी के बाद से ही खूब खेल खेला था मगर उसकी नियत कभी मेरे गुदा पर खराब नहीं हुई.

मगर इन दोनो ने तो मुझे कहीं का नहीं छ्चोड़ा. पूरा लिंग अंदर कर के मुकुल मेरे उपर लेट गया. मैं दोनो के बीच सॅंडविच की तरह लेटी हुई थी. एक तगड़ा लिंग आगे से और एक लिंग पीछे से मेरे बदन मे ठुका हुआ था. दोनो लिंग अंदर कुच्छ ही दूरी पर हुलचूल मचा रहे थे. दोनो ने अपने अपने बदन को हरकत दे दी. मैं दोनो के बीच पीस रही थी. मैं भी मज़े लेने लगी. एक साथ दोनो डिसचार्ज होगये.

मेरे भी फिर से उनके साथ ही डिसचार्ज हो गया. मेरा पूरा बदन गीला गीला हो रहा था. तीनो च्छेदों से वीर्य टपक रहा था. तीनों के “आआआअहूऊऊहह” से जंगल गूँज रहा था. इस ठंड मे भी हम पसीने से भीग रहे थे. मुकुल ने पीछे से एक डिब्बे से कुच्छ सॅंडविच निकाले जो शायद अपने लिए रखे थे.

हम तीनों ने उसी हालत मे आपस मे मिल बाँट कर खाया. फिर से संभोग चालू हुआ तो घंटों चलता रहा दोनो ने मुझे रात भर बुरी तरह झिझोर दिया. कभी आगे से कभी पीछे से कभी मुँह मे हर जगह जी भर कर मालिश की. मेरे पूरे बदन पर वीर्य का मानो लेप चढ़ा हुआ था. संभोग करते करते हम निढाल हो कर वहीं पड़ गये. कभी किसी की आँख खुलती तो मुझे कुच्छ देर तक झींझोरने लगता.

पता ही नहीं चला कब भोर हो गयी. अचानक मेरी आँख खुली तो देखा बाहर लालिमा फैल रही है. मैं दोनो की गोद में बिल्कुल नग्न लेटी थी. मुझे अपनी हालत पर शर्म आने लगी. मैने मिरर पर नज़र डाली तो अपनी हालत देख कर रो पड़ी. होंठ सूज रहे थे चेहरे पर वीर्य सूख कर सफेद पपड़ी बना रहा था. मैं एक झटके से उठी और बाहर निकल कर अपने कपड़े पहने. मुझे अपने आप से घिंन आरहि थी. सड़क के पास ही थोड़ा पानी जमा हुआ था. जिस से अपना चेहरा धो कर अपने आप को व्यवस्थित किया.

दोनो उठ चुके थे. अरुण मेरे बदन से लिपट कर मेरे होंठो को चूम लिया. मैने उसे धकेल कर अपने से अलग किया. “मुझे अपने घर वापस छ्चोड़ दो.” मैने गुस्से से कहा. अरुण सामने की सीट पर बैठ कर जीप को स्टार्ट किया. जीप एक ही झटके मे स्टार्ट हो गयी. मैं समझ गयी कि यह सब दोनो की मिली भगत थी. मुझे चोदने के लिए ही सूनसान रास्ते मे गाड़ी खराब कर दिए थे. घंटे भर बाद हम घर पहुँचे. रास्त मे भी दोनो मेरी चुचियों पर हाथ फेरते रहे. मगर मैने दोनो को गुस्से से अपने बदन से अलग रखा.

हम जब तक घर पहुँचे सूरज अपने काम पर निकल चुक्का था जो कि मेरे लिए बहुत ही अच्च्छा रहा वरना उसको मेरी हालत देख कर साफ पता चल जाता कि रात भर मैने क्या क्या गुल खिलाएँ हैं. उस घटना के बाद अरुण ने कई बार मुझे अपने नीच लिटाने की कोशिश की मगर हर बार मैं अपने आप को बचाती रही और किसी को पता भी नहीं चलने दिया…

भाई लोगो कैसी लगी ये मस्त कहानी आप सब को ज़रूर बताना आपका दोस्त राज शर्मा

समाप्त.

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