कोच को पटा कर चूत चुदवायी

दोस्तो, बहुत बहुत आभार आप सभी का… आपने अपने मेल के जरिये मेरी हौसला अफजाई की।
मुझे बहुत से नटखट प्रशंसकों के काफी मेल प्राप्त हुए, जिनका खत मन को गुदगुदा जाता है. तो बहुत सारे गंभीर प्रशंसकों के मेल भी मिले जिनके सुझाव पर अगले बार से अमल करुँगा।
मेरे एक सुधी पाठक का प्रश्न यह था कि ‘मैं साली को कैसे पटाऊँ?’
जिसका जवाब मैंने दिया कि धैर्य रखें, कोई भी लड़की अपने दोस्त में पिता की अक्स खोजती है, उसके सानिध्य में अपने आप को महफूज सोचेगी. तब लड़के को बहुत ऐंगिल से परखती है तब वह कोई कदम आगे बढ़ाती है क्योंकि वह भी आगे पीछे समाज परिवार को देखती है फिर अपना भविष्य सोच कर तब आपको समर्पण करेगी।

ऐसे ही प्रशंसकों में से यह कहानी है सुश्री मीनाक्षी कंठ की जिसे सभी प्यार से मीनू बुलाते हैं। उन्होंने अपनी कहानी मेरे मेल पर शेयर की थी जो मुझे बहुत प्यारी लगी तो उनकी पूर्वानुमति के बाद उनकी कहानी उसी तरह से पेश कर रहा हूँ.
आशा है आप भी मीनू जी के आपबीती को सराहेंगे।

प्रिय दिनेश जी,
मैं आपकी पहली आपबीती कहानी
क्सक्सक्स फिल्म दिखा कर साली को मनाया चुदायी के लिये
से फालो कर रही हूँ।

पता नहीं क्यों मन कर रहा है कि अपनी कहानी पहले आपसे शेयर करुँ, फिर आपको अगर उचित लगे तो आप मेरी कहानी अन्तर्वासना के माध्यम से पूरे जग से शेयर कर सकते हैं।
आपकी साली बन कर सोचती हूँ तो लगता है कि वह भी कहीं न कहीं आपसे चुदना चाह रही थी भले ही वह कितनी भी गुस्सैल क्यूँ न हो। उसने आपको परखा, जब अपने आप को सुरक्षित महसूस किया उसने तो आपके फेंके जाल में फँसने को तैयार हुयी।
ऐसा नहीं है कि आपने कोई शेर का शिकार कर लिया. यह उसकी दैहिक मजबूरी रही होगी जिसके कारण वो समर्पित हुयी।
दूसरे भाग में तो उसने मस्ती की सिर्फ मस्ती और कुछ नहीं।

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आपकी साली तो जानती थी कि आप उसके बहन के पति हो और वो अगर चुदवा रही है तो मात्र शारीरिक इच्छा की पूर्ति हेतु, एक शादीशुदा मर्द से सम्बन्ध बनाने का परिणाम शादी कभी नहीं है। हाँ, थोड़ी गलती आपकी भी है कि आपने बडे़ होकर भी सही मार्गदर्शन न करके उसे सेक्स करने के लिये उकसाया।

पर अपने बारे में क्या बताऊँ, प्यार में चोट खायी हुयी बंदी हूँ। नादानी बस इतनी कि एक शादीशुदा आदमी से प्यार कर बैठी और अपना सबकुछ समर्पित कर दिया। अगर जानती होती कि वह शादीशुदा है तो घास भी न डालती।

मेरी कहानी उस समय की है जब मैं कॉलेज में बी. ए. पार्ट थ्री की छात्रा थी। मेरी सेलेकशन सीनियर खो-खो टीम में हुयी थी। मेरे साथ 15 अन्य लड़कियों का भी सेलेक्शन हुआ और मैं प्रथम नौ की सदस्या थी।
बड़े इंडस्ट्रियल शहर (क्षमा करेंगे शहर का नाम नहीं बताऊँगी) में रहने का अपना सुख होता है। प्ले ग्राउंड, कोच की सुविधा, उपस्कर आदि कंपनी द्वारा ही किया जाता है, आप बस अपना खेल प्रदर्शित कीजिये।

उस समय मैं 21 वर्ष की थी। हम लोगों का कोच, अन्य खेल के कोच उन्हें राय साहब के नाम से पुकारते थे, पूरा नाम क्या है वो मैं आज तक नहीं जान पायी या यूँ कहे कि बताना नहीं चाह रही!
सुडौल बदन, गोरा चिट्टा रंग, 5 फीट 7 इंच के जवान थे। किसी किसी मर्दों के स्कीन टेक्सचर से उसके उम्र का अंदाज नहीं लगता उसी तरह उनके बॉडी को देख कर उसके उम्र का अनुमान लगाना कठिन था। हम लड़कियाँ उसे 34-35 का मान कर चल रही थी।

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हम सभी काफी मेहनत कर खेलती थी पर चढ़ती जवानी हम लोगों पर कभी कभी हावी होने लगती। कोच राय साहब तो पहले अपने काम से ही काम रखते थे पर बाद में एक दो मुँहफट सदस्या के कारण वे भी उन लम्हों का आनन्द लेने लगे थे और प्रतिउत्तर में जवाब देने लगे थे। हल्की फुल्की वेज, नॉन वेज जोक्स कभी गुदगुदाती तो कभी चूत को गीली कर देती।

नॉन वेज जोक्स पर हम लड़कियों की तरफ से कोई एतराज न होने पर वे थोड़ा आगे का कदम लेने लगे। अब वे किसी न किसी बहाने हम सबों को छूने का बहाना ढूँढने लगे थे। वे मेरी तरफ कुछ ज्यादा आकर्षित हो रहे थे। कभी पोस्चर ठीक करने के बहाने से मेरे पीछे से पकड़ कर बताते तो उनका लंड मेरे गांड के गहरायी में महसूस होती थी.

कोच की दृष्टि से पकड़ने में या जानबूझ कर पकड़ने का फर्क हम लड़कियाँ भली भाँति समझती हैं। हम लोगों की ट्रेनिंग सूर्योदय से पहले अंधेरे में ही शुरु होती थी तो वे बेफिक्र होकर पकड़ते थे, कभी कभी तो उनके लंड का उभार भी हमें अपनी गांड पर महसूस होता था, तो धीरे से चूचियाँ भी दाबते या कभी आँख भी मार देते।
हम लोग हँस कर टाल देती थी। कच्ची उम्र हम सबों को भी यह अच्छा लग रहा था कि कोई तो है जो हम लोगों पर लाईन मार रहा है। वरना खिलाड़ी को देख लड़के दूर से ही बाय बाय करने लगते हैं। लड़कों को तो छुई मुई टाइप की लड़कियाँ पसंद होती हैं न?

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