दोस्तों मैं प्रांजल अपनी बाप-बेटी सेक्स कहानी का अगला पार्ट लेके हाज़िर हू. उमीद है आपने पिछला पार्ट पढ़ लिया होगा, और वो आपको पसंद भी आया होगा. जिन लोगों ने पिछला पार्ट नही पढ़ा है, पहले वो उसको ज़रूर पढ़ ले.
पिछले पार्ट में आपने पढ़ा की कैसे मैं अपने पापा की पर्मिशन लेके दोस्त की पार्टी पर गयी, और वहाँ मैने दारू पी ली. दारू पी कर मैं बहुत हॉर्नी हो गयी थी, और वापस आते हुए मैने पापा के लंड पर हाथ रख दिया.
फिर मैने जान-बूझ कर नशे में होने का ड्रामा करके पापा का लंड चूसना शुरू कर दिया. पापा मुझे रोकने की कोशिश किए, लेकिन मैने उनकी कोशिश सफल नही होने दी. फिर पापा ने उत्तेजित होके मेरे मूह में अपना स्पर्म निकाल दिया. अब आयेज-
पापा के स्पर्म से मेरा मूह भर चुका था. मैं एक रंडी जैसे पीछे हुई, और आँखें बंद रखे हुए ही उनका सारा स्पर्म पी गयी. फिर मैं बोली-
मैं: अर्रे वरुण, बहुत टेस्टी है तुम्हारा स्पर्म, मज़ा आ गया. चलो अब तुम्हारी बारी है.
मैने ये बोल तो दिया, लेकिन पापा को समझ नही आया की मैं क्या बोल रही थी. फिर मैने दोबारा कहा-
मैं: चलो ना वरुण, अब करो ना. तुम्हारी बारी है.
2-3 बार मैने ऐसे ही कहा पापा को, लेकिन उनकी साइड से कोई रेस्पॉन्स नही आया. पर मैं भी ढीढ़ हू. मैं बार-बार कहती रही. फाइनली पापा ने मुझसे पूछा-
पापा: अर्रे क्या करना है?
मैं: वहीं जो मैने किया. मैने चूसा तुम्हारा, अब तुम चूसो मेरी.
मैने आँखें बंद कर रखी थी, लेकिन उतनी खोली हुई थी, की मुझे पापा का चेहरा दिख जाए, लेकिन पापा को ना पता चले की मैं उनको देख रही थी. पापा मेरी बात सुन कर हैरान थे, और मेरी छूट वाली जगह पर बार-बार देख रहे थे. फिर जब वो आयेज नही बढ़े, तो मैने कहा-
मैं: तुम बड़े सुस्त हो यार. ये लो, मैं तुम्हारी मदद करती हू.
ये बोल कर मैने आँखें बंद किए हुए ही अपनी जीन्स का बटन खोला, और कमर उपर करके जीन्स नीचे करने लगी. देखते ही देखते मैने जीन्स और पनटी दोनो नीचे पैरों में कर दिए, पैरों से बाहर नही निकाले.
अब मेरी क्लीन-शेव्ड छूट पापा की आँखों के सामने नंगे थी. पापा बार-बार छूट की तरफ देख तो रहे थे, लेकिन कुछ कर नही रहे थे. उनका दिल तो था, लेकिन शायद उनके अंदर का बाप उनको रोक रहा होगा.
फिर मैने अपना हाथ आयेज बढ़ाया और पापा का एक हाथ पकड़ कर अपनी छूट पर रख दिया. पापा का हाथ काँप रहा था, और ये कंपन्न मैं अपनी छूट पर महसूस कर रही थी. मैने उनके हाथ की उंगलियाँ अपनी छूट के होंठो पर फिरनी शुरू कर दी.
पहले-पहले पापा अपना हाथ पीछे करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन फिर वो खुद बा खुद हाथ फिरने लगे. अब पापा शायद गरम हो चुके थे, और बाप-बेटी का रिश्ता भूलने के लिए तैयार थे. मैं मस्त होने लगी, और अब अपने हाथो से अपने बूब्स टॉप के उपर से दबाने लगी. फिर मैने कहा-
मैं: चूसो ना वरुण, ऐसे मज़ा नही आ रहा.
ये बोल तो दिया मैने, लेकिन अभी भी डाउट था की पापा ऐसा कुछ करेंगे की नही. दरअसल आज तक मैने छूट नही चटवाई थी, और अपने पापा से मैं वो मज़ा लेना चाहती थी.
तभी पापा ने गाड़ी एक साइड में रोकी. वहाँ रास्ता सुनसान था और अंधेरा था. ये देख कर मेरी उत्सुकता बढ़ गयी. फिर पापा ने अपनी सीट बेल्ट खोली, और मेरी तरफ आए. उन्होने मेरी जांघों के आस-पास हाथ डाला, और जांघों को खींच कर मुझे अपनी तरफ मोड़ा. मैने आँखें बंद किए हुए ही उनकी तरफ अपनी छूट कर दी.
फिर पापा अपने मूह को मेरी छूट के करीब लाए. पहले वो छूट को तोड़ा सूँगने लगे. शायद उसकी खुश्बू को महसूस कर रहे थे. फिर उन्होने मेरी छूट पर किस की और मेरी तरफ देखा. मैं नींद में होने का नाटक करती रही, लेकिन उनकी किस से मेरे जिस्म में खलबली मच गयी.
फिर पापा ने अपनी जीभ मूह से निकली, और धीरे-धीरे मेरी छूट पर फेरने लगे. मैं हल्की आवाज़ में आ आ की सिसकियाँ भरने लगी. धीरे-धीरे वो जीभ अंदर डालने की कोशिश करने लगे.
फिर उन्होने अपने एक हाथ से मेरी छूट का मूह खोला, और जीभ अंदर-बाहर करने लगे. मुझे बहुत मज़ा आने लगा. मैं गांद उठा-उठा कर छूट चुसाई का मज़ा लेने लगी. पापा छूट चुसाई में एक प्रो थे. वो मेरी छूट के दाने को अपनी जीभ की नोक से च्छेद रहे थे, जिससे मेरे जिस्म में झटके लग रहे थे.
फिर मैने अपना हाथ पापा के सर पर रखा, और सिसकियाँ भरते हुए बोली: आ वरुण, ज़ोर से करो वरुण. खा जाओ मेरी छूट को. बहुत मज़ा आ रहा है वरुण. आ, ऐसे ही करो आ.
पापा ये सुन कर और ज़ोर लगा कर जीभ छूट में अंदर-बाहर करने लगे. मुझे बहुत मज़ा आ रहा था. मैं बस अपने चरमसुख को पाने ही वाली थी. मैं ज़ोर-ज़ोर से आ आ कर रही थी. तभी पापा अपने हाथ उपर लेके आए, और मेरे बूब्स पर रख कर उनको दबाने लगे.
लगभग 2-3 मिनिट में मेरी छूट ने अपने पानी की पिचकारी पापा के मूह में छ्चोढ़ दी. पापा मेरी छूट का सारा पानी पी गये. मेरी साँसें तेज़ थी, और मुझे तोड़ा पसीना भी आ चुका था. मैं तका हुआ महसूस कर रही थी.
फिर पापा पीछे हो गये, और मैं अपने कपड़े ठीक करके वैसे ही आँखें बंद करके बैठी रही. आँखें बंद रखने की वजह से मुझे कब नींद आ गयी, मुझे पता ही नही चला.
मेरी नींद तब खुली, जब हम घर पहुँच गये, और पापा मुझे आवाज़ देके उठा रहे थे. मेरी आँखें खुली, और मैने कहा-
मैं: पापा पहुँच गये?
मैने पापा बोल तो दिया, लेकिन फिर मुझे याद आया की मैं तो नाटक कर रही थी पापा को वरुण समझने का. लेकिन अब नाटक ख़तम हो चुका था, और उसको दोबारा शुरू नही किया जेया सकता था.
फिर हम गाड़ी से निकले, और घर की तरफ चल पड़े.
इसके आयेज क्या हुआ, वो आपको अगले पार्ट में पता चलेगा.