मैं आ गयी हो फिर से आपके लुंड और चूत की आग शांत करने. चलिए आगे बढ़ते है मेरी इस काल्पनिक बाप बेटी की सेक्स स्टोरी में.
पिछले पार्ट में आपने पढ़ा की मेरी माँ की तबियत खराब थी तो मैं १ महीने की लीव लेके उनके यहाँ जा रही थी उनकी देख-बहाल करने. मैं कुछ दिन पहले ही जा रही थी उन्हें बिन बताये, ताकि उन्हें सरप्राइज दे सकू. अब आगे-
मैं अपने घर के बाहर खड़ी थी. मैंने डोरबेल बजाई टिंग-टोंग. २-३ मिनट तक किसी ने दूर नहीं खोला तो मैंने फिर से दुर्बल बजायी. पर कोई डोर खोल ही नहीं रहा था. फिर मुझे लगा शायद पापा किसी काम से गए हो और मम्मी दवा लेके सो रही हो. तो मैंने सोचा पापा को कॉल करती हु. जैसे ही मैंने फ़ोन निकाला कॉल करने, दूर खुला और पापा सामने खड़े थे. पापै शॉक हो गए मुझे देख के और खुश भी, और पुछा की-
पापा: अरे बेटा तुम तो सैटरडे को आने वाली थी. पर आज ही कैसे आ गयी?
में: यहीं सब बताऊ क्या?
पापा: ा न अंदर.
मैं दूर से अन्दर आई और पापा को हुग किया. पापा बहुत खुश लग रहे थे मुझे देख के. फिर मैं जब लिविंग रूम में आयी तो कविता बुआ जी रूम से बाहर आयी. मैंने उन्हें देखा और उनके पास जाके उनके पांव छुए और पुछा-
में: अरे बुआ जी आप कब आये?
बुआ जी: मैं तो कल से यहीं हूँ. तुम तो सैटरडे आने वाली थी न, आज अचानक कैसे आ गयी?
में: बस आ गयी मम्मी पापा को सरप्राइज देने.
पापा: सच में सरप्राइज दे दिया तूने तो.
बुआ जी: अच्छा हुआ तू आ गयी. गायत्री (माँ) तुझे कब से याद कर रही थी.
में: कैसी है माँ अब? तबियत में कुछ सुधार आया की नहीं?
पापा: वो दवा टाइम पे लेटी कहाँ है जो सुधार आएगा. कल से दीदी है तो टाइम पे दवा दे रही है.
में: अब मैं आ गयी हूँ न. अब मम्मी को ठीक करके ही जाउंगी.
बुआ जी: तुझे देख के वो आधी ठीक तो ऐसे ही हो जाएगी.
में: मैं ज़रा उनसे मिल के आती हु.
और मैं मम्मी के रूम में चली गयी. मम्मी मुझे देखते ही उठ के बैठने लगी. मैंने बोला-
में: मम्मी आप आराम से लेटी रहे. अब मैं यहीं हूँ कुछ दिन.
मम्मी: अरे बेटा, तुझे देखने को आँखें तरस गयी थी. अपनी माँ की याद नहीं आती क्या?
में: कैसी बात कर रही हो मम्मी? आपको तो रोज़ याद करती हूँ, रोज़ पापा से आपके बारे में पूछती हू. अब आपको तो पता है ाराव का स्कूल होता है तो मैं घर से निकल ही नहीं पाती.
मम्मी: ाराव है कहाँ? बाहर है क्या?
में: मम्मी में अकेली ही आई हु. उसके एक्साम्स चल रहे है. और मम्मी जी ने बोला कि उसका ध्यान वो रख लेंगी और मुझे आपका ध्यान रखने भेज दिया यहाँ.
मम्मी: अरे बेटा समधन जी को फालतू में तकलीफ होगी मेरी वजह से.
में: मम्मी इसमें क्या तकलीफ है? वैसे भी मैं तो पूरे दिन ऑफिस में रहती हूँ. वही तो सम्भालती है ाराव को.
मम्मी: तेरा ऑफिस भी तो होगा.
में: मैं १ महीने की छुट्टियां लेके आयी हु. अब आप जब तक पूरी ठीक नहीं हो जाती, तब तक मैं यहीं हूँ.
मम्मी: अब तू आ गयी है न, अब मैं ठीक हो जाऊंगी.
में: आपने खाना खाया? आपको दवा भी लेनी होगी न?
मम्मी: अरे बेटा खाना तो कब का खा लिया और दवा भी लेली. दीदी (बुआ जी) है न, वो टाइम पे दे देती है सब.
में: चलो ठीक है, आप आराम करो अब. मैं हु बाहर.
मम्मी: ठीक है बेटा, तू भी खाना खा ले.
में: हां मम्मी, आप रेस्ट करो.
फिर मैं उनके रूम से बाहर आयी. बाहर पापा और बुआ जी दोनों पास बैठ के कुछ बात कर रहे थे. पर मुझे देखा तो चुप हो गए. मैंने पुछा तो उन्होंने बात टाल दी. मुझे अजीब लगा पर मैंने इग्नोर कर दिया. फिर मैं भी वहीँ बैठ गयी उनके पास और बातें करने लगे. मैंने पुछा-
में: मैं कितनी देर से बाहर खड़ी थी. २ बार डोरबेल बजाई. दूर खोलने में इतना टाइम क्यों लगा?
पापा: मैं वाशरूम में था बेटा, इसलिए.
में: तो बुआ जी आप ने दूर क्यों नहीं खोला?
बुआ जी: बेटा मैं रूम में थी. मुझे लगा अशोक खोल देगा दूर. पर जब दूसरी बार डोरबेल बजी, तब मैं रूम से बाहर आयी. पर तब तक अशोक ने डोर खोल दिया.
मुझे उनके जवाब कुछ सही नहीं लगे. मुझे ऐसा लगा जैसे दोनों कोई बहाना बना रहे हो. पर मुझे लगा शायद मैं ज़्यादा सोच रही थी, इसलिए बात जाने दी.
पापा: वो सब छोड़, आरव कैसा है? उसे क्यों नहीं लायी और रजनी जी कैसी है है और दीपक?
में: सब ठीक है वहां, आपको बताया था न ाराव के एक्साम्स चल रहे है. इसलिए उसे नहीं लायी.
पापा: पर उसके एक्साम्स के बाद सैटरडे को आने वाली थी न? आज अचानक कैसे आ गयी?
में: अरे वो क्या हुआ मैंने मम्मी जी को बोला की मैं सटूडे आप लोगों के पास आऊंगी. तो वो बोली की, सैटरडे क्यों कल ही चली जा न. आरव का ख़याल वो रख लेंगी और आरव को साथ लेके जाओगी तो मम्मी की देख-भाल कैसे करोगी. बस इसीलिए मैं आज ही आ गयी और आपको नहीं बताया. क्यूंकि आप लोगों को सरप्राइज देना चाहती थी.
बुआ जी: सरप्राइज तो अछा दिया बेटा तूने. तू फ्रेश हो जा, तब तक मैं खाने का देख लेती हु.
में: बुआ जी आप क्यों तकलीफ लेते हो? मैं आ गयी हूँ न, मैं फ्रेश होक आती हु. फिर मैं बना दूँगी खाना.
बुआ जी: बेटा तू सफर से थक के आई है, और वैसे भी सब्ज़ी तो बन गयी है. सिर्फ रोटी बनानी है. तू फ्रेश होजा, तब तक मैं सब्ज़ी गरम करके रोटी बना लेती ह. फिर सब साथ में खाना खाएंगे.
में: ठीक है बुआ जी, पर कल से खाना मैं ही बनाऊंगी.
बुआ जी: हां बेटा तू ही बनना. वैसे भी अब तू आ गयी है, तो मैं कल चली जाऊंगी वापस.
में: क्या बुआ जी, मैं आयी और आप जाने की बात कर रही हो?
बुआ जी: तू जा, अभी फ्रेश होजा पहले.
में: हां ठीक है.
मैं अपने रूम में जेक फ्रेश होने लगती ह. फिर कपडे चेंज करके बाहर आती हु. पापा नहीं थे बाहर, मुझे लगा मम्मी के पास होंगे. पर तभी पापा किचन से बाहर आते है.
में: आप किचन में क्या कर रहे थे?
पापा: कुछ नहीं, दीदी को कुछ हेल्प तो नहीं चाहिए यही पूछने गया था.
में: मैं हूँ न, मैं कर देती हू हेल्प उनकी.
पापा: अब तो हो गया सब रेडी.
में: अच्छा ठीक है.
मुझे पापा का बेहेवियर कुछ अलग लगा. मुझे लगा जैसे वो मुझसे कुछ छुपा रहे हो. मैंने सोचा कहीं मम्मी की तबियत को लेकर कोई सीरियस बात तो नहीं, जो ये लोग मुझसे छुपा रहे थे. मुझे थोड़ी टेंशन होने लगी अब. तब तक बुआ जी बाहर आ गयी किचन से, खाना रेडी था.
मैंने और बुआ जी ने मिल के खाना डाइनिंग टेबल पे लगा दिया और तीनों साथ में खाना खाने बैठे. पर खाना खाते हुए भी वो मुझसे छुपा के आपस में इशारे से बात कर रहे थे जो मैंने देख लिया. अब मुझसे रहा नहीं गया और मैंने सीधे पूछ लिया-
में: आप लोग इतने परेशान क्यों लग रहे हो? कुछ प्रॉब्लम है क्या?
पापा: नहीं तो बीटा, हम क्यों परेशान रहने लगे?
में: मैं जब से आयी हू देख रही हूँ, आप लोग मुझसे कुछ छुपा रहे हो. मम्मी की तबियत से रिलेटेड कोई बात है क्या? प्लीज आप मुझे बताइए.
पापा: अरे नहीं बेटा, कोई सीरियस बात नहीं है. मम्मी भी ठीक है अब. हम कुछ नहीं छुपा रहे है तुझसे. तुझे कुछ ग़लतफहमी हो रही है.
बुआ जी: हां बेटा, तेरी मम्मी को कोई सीरियस प्रॉब्लम नहीं है. उनको बस देख-भाल की ज़रुरत है. वो बिलकुल ठीक हो जाएगी.
में: पक्का कोई सीरियस बात नहीं है न?
पापा: कोई सीरियस बात नहीं है. अब अच्छे से खाना खा ले और फ़ालतू का टेंशन मत ले.
फिर हम सब ने खाना खाया. उसके बाद थोड़ी देर बातें की ऐसे ही नोर्मल्ली. फिर हम तीनो मम्मी को देखने उनके रूम में गए. मम्मी जाग रही थी, तो हम सब वहीँ बैठ के बातें करने लगे. फिर थोड़ी देर बाद मम्मी पे दवा का असर होने लगा और नींद आ गयी. हम तीनों बाहर आ गए और सोफे पे बैठ गए.
बुआ जी टीवी पे सीरियल देखने लगी और मैं पापा से बात कर रही थी. सफर की थकान की वजह से मुझे नींद आने लगी, तो मैंने उन्हें बोला-
में: मैं जा रही हूँ सोने, थकान लग रही है.
बुआ जी: हां जा तू सजा, मैं भी ये सीरियल देख के आती हु (बुआ जी मेरे ही रूम में मेरे साथ ही सोने वाली थी).
पापा: गुड नाईट बीटा.
में: गुड नाईट पापै.
फिर मैं उठ के अपने रूम में जाने लगी. जाते-जाते पीछे मुड़ के देखा तो पापा फिर से बुआ जी के पास आ गए थे, और उनका खुसुर-पुसुर स्टार्ट हो गया था. मैंने सोचा शायद मैं ही ज़्यादा सोच रही हूँ. मैं जाके बेड पे पसर गयी. मैंने मोबाइल में टाइम देखा १०:४५ हो गए थे.
मैं इतनी जल्दी सोती नहीं हो, पर आज थोड़ी थकान लग रही थी सफर की वजह से शायद. फिर मैं अपने हस्बैंड दीपक के बारे में सोचने लगी कि अभी वो मेरे पास यहाँ होते तो हम चुदाई कर रहे होते. वो मेरी चूत चाट रहे होते. मैं उनका लुंड चुस्ती और फिर वो मेरी जाम के चुदाई करते. यहीं सब सोचते-सोचते मुझे कब नींद आ गयी मुझे पता ही नहीं चला.
फिर अचानक मेरी आँख खुली. मैंने मोबाइल में टाइम देखा तो १:१० हुए थे. मैंने देखा बुआ जी अभी तक रूम में नहीं आयी थी. सोचा ये अभी तक बाहर टीवी देख रही थी क्या. तो मैं उठ के बाहर आई, पर वहां कोई नहीं था. मैंने वाशरूम में देखा, तो वहां भी कोई नहीं था. फिर मैंने धीरे से मम्मी पापा के रूम का डोर खोला तो मम्मी सो रही थी, पर पापा नहीं थे वहां.
मैं सोचने लगी पापा और बुआ जी इतनी रात को कहाँ गए? पूरे घर में कहीं नहीं थे तो इतनी रात को गए कहाँ और क्यों? फिर मुझे ध्यान आया की कहीं टेरेस पे तो नहीं है. फिर मैं टेरेस पे गयी तो वो वहां भी नहीं दिखे. जब मैं वापस आ रही थी तो मुझे कुछ गिरने की आवाज़ आयी. मैंने यहाँ-वहां दिखा तो कुछ नहीं दिखा.
हमारे टेरेस के कोने में एक स्टोर रूम है. मैंने ध्यान से सुना तो स्टोर रूम से ही कुछ आवाज़ आ रही थी.
इस पार्ट में इतना ही. अगले पार्ट में पता चलेगा स्टोर रूम में क्या था. पापा और बुआ जी का क्या चल रहा था. जल्दी ही आएगा अगला पार्ट. तो तब तक आप सब मुझे मेल करके अपना प्यार दीजिए. मैं आपकी अपनी मनीषा. मुझे आपके फीडबैक का इंतज़ार रहेगा. माय ईमेल: मनीषजैं३९९१@जीमेल.कॉम
अगला भाग पढ़े:- पापा की ख़ुशी के लिए उनसे चुड़ गयी-३