मेरा नाम रोहन शर्मा है, और मैं देल्ही में रहता हू. वहीं रहता हू, और वहीं से कॉलेज भी करता हू. मैं अभी कॉलेज में ब.टेक थर्ड एअर में हू. मेरी आगे 20 यियर्ज़ है.
मेरे घर में मेरे पापा ब्रिज मोहन शर्मा जो की हमारी सोसाइटी के बाहर एक फार्मेसी शॉप चलते है. उनकी आगे 45 साल है. सर में थोड़ी सी बालों की कमी है, पर जब भी कॅप लगा के निकलते तो लोगों को वो मेरे बड़े भाई के जैसे प्रतीत होते है.
फिर आती है मेरी मम्मी मधु शर्मा, जो की पेशे से एक होम्मेकर है. उनकी आगे 40 साल है. दिखने में वो बहुत सुंदर है. कोई ये बता ही ना पाए की वो 40 साल की 2 बच्चो की मा है. ऐसा लगता था की वो 30 साल की है. उनका सारा दिन घर के काम-काज में निकल जाता है, और जो समय बचता है, वो अपनी सोसाइटी के फ्रेंड्स के साथ व्यतीत करती है.
फिर आती है मेरी बड़ी बेहन प्रिया शर्मा जो अभी म.कॉम कर रही है और दिखने में मम्मी जैसी सुंदर है. वैसे तो वो मेरे से एक साल बड़ी है, पर हम दोनो ही मज़ाक मस्ती करते रहते है.
लास्ट में आते है बुनती अंकल. होने को ये हमारे पड़ोसी है, पर पापा के परम मित्रा है. इनकी आगे 50 साल और पापा की फार्मेसी शॉप से बगल में इनकी किराने की शॉप है. इनकी वाइफ सुमन मेरी मम्मी की बेस्ट फ्रेंड है, और एक बेटी रिया जिसकी बाजू वाली सोसाइटी में शादी हो चुकी है.
तो ये मेरी फॅमिली है, जहाँ रोज़ कुछ ना कुछ तो चलता ही रहता है. पर एक साल पहले कुछ ऐसा हुआ जिससे हमारी पूरी ज़िंदगी ही बदल गयी.
अभी मैं ब.टेक 3 एअर में एंटर किया हू. लेकिन ये स्टोरी एक साल पहले स्टार्ट होती है, जब मैं 19 साल का था, और कॉलेज में 2न्ड एअर में था. प्रिया भी ब.कॉम थर्ड एअर में हो गयी थी.
मम्मी उस वक़्त 1 महीने के लिए नानी के घर गयी थी. एक सनडे जब पापा ने नोटीस किया की बातरूम का दरवाज़ा अटक सा रहा था. तो उन्होने सोचा की आज रेस्ट के दिन इसको ठीक किया जाए. मेरे पापा की ख़ास बात थी की उनको प्राब्लम सॉल्व करने का शौंक था. पर हर बार प्राब्लम बढ़ा के आ जाते थे.
इस बार भी यही हुआ. दरवाज़ा ठीक करने के चक्कर में दरवाज़े की कुण्डी ही बाहर निकल गयी थी, और हमारे घर में एक ही बातरूम था. जब हम रूम से बाहर आए, तो देखा.
प्रिया: पापा यार ये क्या किया?
पापा: बेटे वो दरवाज़ा अटक रहा था, तो ठीक कर रहा था.
मैं: पापा लेकिन ये कुण्डी आपके हाथ में आ गयी.
पापा: अर्रे चिंता ही कोई बात नही है. इसको मैं अभी ठीक कर दूँगा.
प्रिया और मैं (गुस्से में): अर्रे नही.
प्रिया (सार्कॅज़म में): इस बार कुण्डी हाथ में आई है. क्या पता अगली बार दरवाज़ा ही ना आ जाए.
सब हासणे लगे.
पापा: तो अब क्या करे?
मैं: ऐसा करते है कल मिश्रा अंकल को बुला के ठीक कर करवा देंगे.
प्रिया: आज क्यूँ नही?
मैं: आज वो कहीं घूमने गये है.
प्रिया (उत्सुकता से): तुझे बड़ा पता है.
मैं (चिढ़ते हुए): बस करो अब.
मिश्रा अंकल का हमारी सोसाइटी में दरवाज़े, टेबल, अलमारी मॅन्यूफॅक्चरिंग आंड रेपेरिंग का बिज़्नेस है. उनकी वाइफ डॉक्टर है, और उनके एक बेटी है सोनिया, और वो मेरी गर्लफ्रेंड है. सोनिया और मेरे बारे में किसी को भी नही पता था.
फिर हमने डिसाइड किया की कल दरवाज़ा ठीक करवाएँगे. तब तक जो भी बातरूम उसे कर रहा होगा, वो अपनी ड्रेस बाहर लटका दे. इससे बाहर वालों को आइडिया आ जाए की बातरूम ऑक्युपाइड है करके.
अगली सुबा मैं उठने में तोड़ा लाते हो गया, और मुझे कॉलेज जाना था. रूम से बाहर निकला तो पता चला की पापा जेया चुके थे, और दीदी भी दिखाई नही दे रही थी. फिर मैं नहाने की चला गया.
जल्दी-बाज़ी में मैं सनडे का हादसा भूल गया था. जैसे ही मैने तोड़ा दरवाज़ा खोला, देखा दीदी नहा रही थी. उनकी पीठ मेरी तरफ थी, तो उन्होने मुझे देखा नही था. मेरा दिल ज़ोरो से धड़क रहा था. दीदी मेरे सामने नंगी शवर ले रही थी. मैने दीदी को कभी ऐसे नही देखा था. मैने दरवाज़ा तोड़ा बंद किया और कोने से देकने लगा. मेरी नज़र बातरूम से हॅट ही नही रही थी.
वो भीगा नंगा बदन, खुले हुए बाल, पतली कमर, और वो मखमली गांद. फिर एक मिनिट बाद जब वो पलटी, तो मैने उनके बूब्स और छूट के दर्शन भी किए. उनके बड़े-बड़े बूब्स लगभग 34द के थे, और छूट क्लीन शेव्ड थी. उनको हाइजीन का शौक था.
मेरा हाथ कब मेरे शॉर्ट्स के अंदर गया, मुझे खुद पता नही चला. मैने अपना लंड हाथ में लिया, और हिलना स्टार्ट कर दिया था. जैसी ही मेरा होने वाला था, मैने देखा दीदी टवल लपेट के बाहर को आने लगी थी. मैने पंत उपर की और चुप-छाप अपने रूम में चला गया.
5 मिनिट्स बाद मैं रूम से बाहर निकाला तो दीदी ब्रेकफास्ट बना रही थी. मैं बातरूम गया, और नहाने लगा. मैने देखा दीदी की अंडरवेर वहीं पड़ी हुई थी. मुहे 5 मिनिट्स पहले का सीन याद आ गया, और मैं लंड हिलना स्टार्ट किया.
मैने वो अंडरवेर स्मेल किया तो मैं कुछ ज़्यादा एग्ज़ाइटेड हो गया, और 1 मिनिट में झाड़ गया. नहा के बाहर आया तो दीदी नाश्ता लगा रही थी.
प्रिया: जल्दी से नाश्ता कर ले, वरना कॉलेज के लिए लाते हो जाएँगे.
मैं: पापा?
प्रिया: पापा को कुछ काम था, वो आज पहले ही चले गयी थे.
मैं: ठीक है.
मैं दीदी से आँखें नही मिला पा रहा था. अब एक गिल्ट सा आ रहा था मॅन में. फिर हमने खाना खाया और कॉलेज जाने लगे. दीदी का कॉलेज रास्ते में पड़ता था. वहाँ हम दोनो मेरी बिके पर जाते थे. आज मेरा ध्यान कहीं और ही था. ट्रॅफिक ज़्यादा होने के कारण जब भी मैं ब्रेक मारता, तो दीदी के बूब्स मेरी पीठ टच करते.
मुझे अछा लगता, बुत गिल्ट भी फील होता. फिर मैं दीदी को उसके कॉलेज लीव करके अपने कॉलेज पहुँचा. मुझे वहाँ सोनिया मिली. वो भी मेरी ही ब्रांच में थी.
अभी कहानी स्टार्ट हुई है. आयेज बहुत कुछ बाकी है.