सेक्स स्टोरी अब आयेज-
संग्राम जी के झड़ने के बाद, हम दोनो बिल्कुल निढाल एक-दूसरे के उपर ही पड़े रहे. मेरी छूट अभी भी उनके गरम वीरया से भारी हुई थी, और उनका लंड भी मेरे अंदर ही था, ढीला पद चुका था. हम दोनो की साँसें तेज़ थी, और जिस्म पसीने से लथपथ.
संग्राम जी का वज़न मेरे उपर था, पर अब उसमें एक अजीब सा सुकून था. मेरी छूट की गहराइयों में उनका गरम रस्स फैला हुआ था, हर नास्स को भिगोते हुए एक अलग ही एहसास दे रहा था. मेरे जिस्म की हर कोशिका अब शांत थी, जैसे एक लंबी प्यास बुझ गयी हो. वो तीखा दर्द जो शुरू में था, वो अब एक मादक थकान में बदल गया था, एक ऐसा सुकून जो मैने पहले कभी नही जाना था.
कुछ देर बाद, संग्राम जी ने धीरे से अपनी कमर उठाई और अपना लंड मेरी छूट से बाहर निकाल लिया. मेरी छूट अब हल्की सी खाली महसूस हुई, पर उसकी जलन अब भी थी. वो मेरे बगल में लेट गये, और हम दोनो एक-दूसरे को देखने लगे. उनकी आँखों में अब भी नशा था, पर एक अलग तरह का, एक जीत का नशा.
संग्राम जी (उनकी आवाज़ गहरी और ताकि हुई थी): तेरी छूट ने तो मेरी जान निकाल दी. ऐसा मज़ा, ऐसी चुदाई मैने कभी नही की.
मैं (मुस्कुराते हुए, साँसें ठीक करते हुए): तो, अब समझे संग्राम जी, असली मज़ा कहाँ मिलता है?
उन्होने मेरी तरफ देखा और उनके होंठो पर एक नॉटी स्माइल आई. उन्होने धीरे से मेरे गाल को सहलाया.
संग्राम जी (उनकी उंगलियाँ मेरी गांद की दरार के करीब जाती हुए मेरी गांद को सहलाती हुए): अब तो एक बार तेरी गांद भी मारनी है. तेरी गांद भी बहुत टाइट होगी.
उनकी बात सुन कर मेरा जिस्म एक पल को काश गया. उनका लंड जितना बड़ा था, उतना मेरी गांद में लेना मेरे लिए मुश्किल था. मैने उनकी आँखों में देखा.
मैं (धीरे से): आज नही संग्राम जी. आपका लंड इतना बड़ा है. मेरी गांद अभी इतना बड़ा नही ले पाएगी. कभी किसी और दिन.
उन्होने मेरी बात सुनी, और एक पल के लिए सोचा. फिर उन्होने सिर हिला दिया.
संग्राम जी: ठीक है. आज के लिए तेरी छूट ही काफ़ी है. पर अगले बार तेरी गांद नही छ्चोधुंगा.
मेरी बात मान कर, संग्राम जी ने मुझे अपनी तरफ खींच लिया और मेरे होंठो पर एक गहरा किस किया. मैने भी उनका पूरा साथ दिया. जब हुमारा किस ख़तम हुआ, तो मैने उनकी तरफ देखा. उनका लंड अब फिर से धीरे-धीरे खड़ा हो रहा था.
संग्राम जी ने मुझे अपनी बाहों में कस्स लिया. मैं उनके उपर लेती हुई थी, मेरी टाँगें उनकी कमर पर थी. उनका लंड अब फिर से पूरी तरह से तंन चुका था, और वो अपनी कमर को धीरे-धीरे हिलने लगे. मेरी छूट अब उनके लंड के लिए पूरी तरह से तैयार थी, और हम दोनो एक बार फिर चुदाई में डूब गये. इस बार, चुदाई थोड़ी हल्की थी, पर उसमें सुकून और गहराई ज़्यादा थी.
हम दोनो बस एक-दूसरे में खोए हुए थे, बिना किसी बात के, सिर्फ़ अपने जिस्म की ज़ुबान में.
थोड़ी देर बाद, हम दोनो की साँसें फिर से तेज़ होने लगी. संग्राम जी ने एक बार फिर अपना वीरया मेरी छूट में छ्चोढ़ दिया, और मैं भी उसी पल झाड़ गयी. हम दोनो पूरी तरह से तक चुके थे, और जिस्म एक-दूसरे में घुसा हुआ था.
संग्राम जी का वज़न मेरे उपर था, और उनके चेहरे पर अब हवस नही, बल्कि गहरा सुकून और थकान थी.
मैने धीरे से उनके ढीले पड़े लंड को अपने हाथ में लिया और उस पर एक नज़र डाली. उसका सूपड़ा अभी भी मेरे वीरया और मेरे रस्स से गीला था. मैने अपनी ज़ुबान से उसके सूपदे को चाटना शुरू किया, उसके गरम रस्स को अपनी ज़ुबान पर महसूस करती हुई. फिर धीरे से उसे अपने मूह में भर लिया. उनका लंड गरम और रसीला था, जिसमें अभी भी कुछ बूँदें बाकी थी.
मैं उसे हल्के-हल्के चूसने लगी, जैसे कोई थके हुए प्यासे को पानी मिलता है. मेरी ज़ुबान उसके पुर लंड पर घूम रही थी, उसकी रग़ाद से उन्हें भी नशा हो रहा था. संग्राम जी ने मेरी कमर को पकड़ लिया, और उनके मूह से एक गहरी आ निकली, उनका जिस्म थिरक उठा. मैं उनके लंड को पूरी लगान से चूस रही थी, कभी सूपदे को चाट-ती, तो कभी लंड को मूह की गहराई तक लेती, उसके हर इंच को अपनी ज़ुबान से सहला रही थी.
कुछ ही पलों में, उनका लंड फिर से हल्का सा तनने लगा. उन्होने मेरा सिर पकड़ कर अपने लंड पर और ज़ोर से दबाया. उनका बचा हुआ वीरया मेरे मूह में उछालने लगा, और मैने उसे पूरा पी लिया. उसका स्वाद मेरी ज़ुबान पर ठहर गया, एक अलग ही मिठास और खराश का मिश्रण, जो मेरे अंदर तक उतार गया.
संग्राम जी (मेरी तरफ देखते हुए, ताकि हुई आवाज़ में, पर आँखों में एक अजीब सी चमक थी): आज पहली बार किसी औरत ने मुझे निचोढ़ कर रख दिया.
मैं (उनके चेहरे पर अपना मूह लाते हुए, उनकी आँखों में गहराई से देखते हुए, धीमी पर रसीली आवाज़ में): ये तो बस शुरुआत है संग्राम जी. अभी तो आपको मेरी चाहत में और निचोढ़ना है. अब आप सिर्फ़ मेरे है.
संग्राम जी ने एक पल के लिए मेरी आँखों में देखा. उनकी आँखों में वो चमक अब गहरे आकर्षण में बदल चुकी थी, एक अजीब सी हैरानी और अंबूझी चाहत थी. जैसे उन्होने कुछ ऐसा सुन लिया हो जो उन्होने कभी सोचा नही था, और अब वो उस बात से बाँध चुके थे. उनके होंठो पर एक हल्की मुस्कान फैल गयी, जिसके पीछे एक नयी बेचैनी च्चिपी थी. मैने धीरे से उनके होंठो पर अपने होंठ रख दिए. वो भी धीरे से मेरी तरफ झुके, और हम एक गहरी, मादक किस में खो गये.
हम दोनो की साँसें एक-दूसरे में घुल रही थी. मैने अपने हाथो को उनकी पीठ पर कस्स लिया, और उनसे पूरी तरह लिपट गयी. उनका जिस्म अभी भी गरम था, और मेरे जिस्म से चिपका हुआ था. सारी थकान, सारी हवस, अब एक गहरे सुकून में बदल चुकी थी. उस पल, दुनिया में सिर्फ़ हम दो लोग थे, हमारी साँसें, हमारी धड़कने, और हमारे जिस्म जो एक-दूसरे में समा चुके थे.
हम ऐसे ही एक-दूसरे से लिपटे हुए, बेड पर पड़े रहे. धीरे-धीरे, आँखों में नींद भरने लगी, और हम बिना किसी और बात के, एक-दूसरे की बाहों में गहरी नींद में सो गये.
कुछ देर बाद, संग्राम जी की नींद खुली. उन्होने धीरे से मेरे माथे को चूमा, फिर अपने कपड़े पहने और कमरे से बाहर निकल गये. मैं भी चुदाई की थकान से चूर थी, पर मेरे अंदर एक अजीब सी हल्की फुल्की सी खुशी थी. मेरे जिस्म का हर हिस्सा अब भी उस अनुभव की गर्मी को समेटे हुए था.
जैसे-तैसे खुद को संभाल कर बातरूम तक पहुँची. ठंडे पानी की धार मेरे जिस्म पर पड़ी तो एक नयी जान सी आ गयी. मैने अपने आप को सॉफ किया, उस वीरया की हर बूँद को धोया जो मेरी छूट के बाहर रह गयी थी. आईने में खुद को देखते हुए, मेरे चेहरे पर एक अलग ही चमक थी. फ्रेश हो कर मैने अपनी सारी पहनी.
मेरी सारी, जो मैने सुबह पहनी थी, अब फिर से मेरे जिस्म पर थी, पर इस बार उसका एहसास कुछ अलग था. चेहरे पर हल्की लाली थी, और आँखों में एक अजीब सी चमक. सारी का नरम कपड़ा अब मेरे जिस्म पर पहले से अलग महसूस हो रहा था, जैसे वो हर उभार को और भी ज़्यादा आकर्षक बना रहा हो.
एक गहरा सुकून लिए मैं कमरे से बाहर आ गयी. जब मैं कमरे से बाहर निकली, दोपहर की रोशनी अब धीरे-धीरे शाम की तरफ ढाल रही थी. कमरा अब भी गरम सा लग रहा था, जैसे अभी भी उसमें हवस की गर्मी ठहरी हो.
जैसे ही मैं ड्रॉयिंग रूम में पहुँची, ज्योति वहीं बैठी हुई थी. उसने मेरी तरफ देखा और उसके चेहरे पर एक नॉटी स्माइल आ गयी. उसकी आँखों में वहीं शरारत थी, जो सुबह से अब तक बढ़ चुकी थी. वो उठी और मेरे पास आ कर खड़ी हो गयी.
ज्योति (मेरी तरफ घूरते हुए, धीमी पर शरारती आवाज़ में, उसकी आँखों में शैतानी चमक थी): क्या बात है, संगीता. चेहरे पर तो अलग ही नूवर च्छा गया है. लगता है संग्राम भैया ने आज तेरी सारी प्यास बुझा दी. तुझे देख कर लग रहा है जैसे तू अभी-अभी अमृत पी कर आई हो.
मैं (शरमाते हुए, नज़रें नीचे करते हुए, मेरी गालों पर अब भी लाली थी): ज्योति, चुप कर. तू भी ना. सब कुछ पता है तुझे.
ज्योति (मेरे करीब आते हुए, मेरी कमर पर हल्का हाथ रखते हुए, उसकी उंगलियाँ हल्की-हल्की मेरी कमर पर चल रही थी): ऐसे शर्मा मत, मेरी जान. मुझे सब पता है. कैसा लगा असली मर्द का स्वाद? वो बड़ा, तगड़ा लंड. निचोढ़ दिया ना तुझे पूरी तरह से? तेरी छूट का क्या हाल किया उन्होने, बता ना.
उसके शब्दों से मेरे जिस्म में एक तेज़ झुरजुरी दौड़ गयी, वो सब कुछ जानती थी. मेरी हँसी निकल गयी, पर शरम से मैं अपनी नज़रें उठा नही पा रही थी.
मैं (धीमे से, पर मेरी आवाज़ में अब खुशी और एक नया गर्व था): मेरी तो बोलती बंद है. तू खुद सोच, क्या हाल हुआ होगा मेरा. अब मैं समझी असली चुदाई क्या होती है.
ज्योति ने मेरी कमर पर हल्का सा दबाव डाला. उसके चेहरे पर अब और भी गहरी शरारत थी, जैसे उसके पास और भी राज़ हो.
ज्योति (मेरी आँखों में देखते हुए, आवाज़ में हल्की फुसफुसाहट, उसकी आँखों में चमक और बढ़ गयी): मेरी जान, संग्राम भैया जब बाहर निकले ना, तो उनके चेहरे पर ऐसी चमक थी जैसे उन्होने चाँद तोड़ लिया हो. वो तो बोल रहे थे, “तेरी दोस्त की जवानी ने मुझे पूरा निचोढ़ कर रख दिया.” कह रहे थे, आज तक उन्हें किसी औरत ने इतना खुश नही किया.
उनका तो मॅन ही नही कर रहा था जाने का. मेरी कसम, मैं उनको इतना खुश, इतना संतुष्ट कभी नही देखा. सच बता, ऐसा क्या जादू कर दिया तूने उन पर की वो तेरे दीवाने हो गये है?
उसकी बातों से मैं शरम से डूब गयी, पर अंदर ही अंदर एक गर्व भी महसूस हो रहा था. संग्राम जी ने इतनी तारीफ की थी मेरी, ये सोच कर मेरे होंठो पर एक हल्की सी मुस्कान आ गयी. मैने बस अपना सिर धीमे से हिला दिया, उनकी बातों पर कुछ कह नही पा रही थी.
ज्योति (मेरी कमर को सहलाते हुए): चल अब, तेरे घर जाने का टाइम हो रहा है. बस मिस हो जाएगी.
हम दोनो बाहर निकले. दोपहर अब ढाल चुकी थी, और शाम की ठंडी हवा चल रही थी. मेरे दिल में एक अजीब सी खुशी थी, एक नया अनुभव था जो मैने पहले कभी महसूस नही किया था. मेरे कदम अब हल्की सी थकान के बाद भी ज़्यादा मज़बूती से पद रहे थे, जैसे इस अनुभव ने मुझे और ताक़त दे दी हो.
ज्योति ने तुरंत एक ऑटो बुलाई. मैने उसे अलविदा कहा और ऑटो में बैठ गयी. ऑटो से मैं बस स्टॅंड तक पहुँची. वहाँ से अपनी गाओं जाने वाली बस पकड़ कर मैं अपने घर पहुँच गयी.
उस दिन से संग्राम जी के साथ मेरा रिश्ता एक नये मोड़ पर आ गया था. उनके लंड का स्वाद और मेरी छूट में उनके वीरया की गर्मी, ये सब कुछ मेरे ज़हन में बस चुका था. जब भी मैं अपनी बड़ी बेहन के घर जाती, संग्राम जी से मिले बिना वापस आना मेरे लिए नामुमकिन सा हो गया था. हर बार उनकी बाहों में जेया कर, उनके लंड से छुड़ा कर, मैं खुद को और भी ज़िंदा महसूस करती थी.
ज्योति की मदद से मैं शहर जेया कर भी संग्राम जी से मिल पाती थी. हमारा ये सिलसिला सालों तक चलता रहा. मैं उनकी सबसे ख़ास बन चुकी थी, एक ऐसी औरत जिसे उन्होने पूरी तरह से निचोढ़ लिया था, और जिसने उन्हे भी पहली बार असली मर्द होने का एहसास कराया था. मेरी छूट और उनका लंड, अब एक-दूसरे के लिए ही बने थे, हमेशा एक-दूसरे की प्यास बुझाने के लिए तैयार. हर मुलाक़ात के बाद, मैं और भी ज़्यादा उनकी दीवानी होती जाती, और वो मेरे, जैसे हम एक-दूसरे के लिए ही बने थे.