पति के दोस्त की दुल्हन बनकर सुहागरात

दोस्तो, मैं तृप्ति एक बार फिर से आपके सामने उपस्थित हुई हूं. पहले आप सब पाठकों को मेरा धन्यवाद. इसलिए क्योंकि मेरी पिछली कहानी
पति के दोस्त ने मातृत्व का सुख दिया
को आप सबने बहुत ही प्रेम दिया.

नए पाठक जो कि अभी ये कहानी पढ़ रहे हैं, उससे मेरा निवेदन है कि वे मेरी पहली उक्त को कहानी को पढ़ लें, ताकि उनको इस कहानी का शुरुआत से ही आनन्द मिल सके.

जैसा कि पिछली कहानी में आपने पढ़ा कि मैंने मयूर को पटा लिया था. मयूर मेरे पति के बहुत ही अच्छा दोस्त था. मैंने उसके साथ सेक्स संबंध बना लिए थे. जिसके फलस्वरूप मैं उसके बच्चे की मां बन गई थी. इस बच्चे की चाहत के चलते हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार भी करने लगे थे. हम दोनों ही आपसी सहमति से ये रिश्ता बरकरार रखना भी चाहते थे, इसलिए हम लोग जब भी टाइम मिलता, साथ में वक्त गुजार लेते हैं.

अब आगे की कहानी पर आते हैं:

पहले मैं एक बार फिर से कम शब्दों में अपना परिचय दे देती हूं. मैं तृप्ति पटेल, उम्र वही है, जो आप अभी मन में सोच रहे हो. फिगर 32-28-34 की है. मैं दिखने में भी बहुत खूबसूरत हूं. ऐसी कि पहली नजर में ही आप अपना दिल और सब कुछ … मुझ पर न्यौछावर कर दो.

मैंने सोचा कि क्यों ना मयूर से शादी करके उसे भी यहां बुला लूं और सब कुछ मेरे पति (प्रतीक) को बता दूं. लेकिन मन में एक ऊहापोह थी कि क्या प्रतीक मेरी भावनाओं को समझेगा? अगर उसने कहीं मुझे घर से बाहर निकाल दिया या बच्चा गिराने को कहा तो क्या होगा.

मुझे ये सब सोच कर बहुत डर लग रहा था. फिर मैंने सोचा कि जब प्रतीक का मूड एकदम खुशनुमा होगा, तब उनको बताऊंगी. तब भी मुझे डर बहुत लग रहा है.

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ये सब बताने से पहले मैंने इस बाबत मयूर से बात करना ठीक समझा. मैं इस बारे में बताने के लिए उसको कॉल किया और कहा- मुझे तुम्हारी जरूरत है और बहुत याद भी आ रही है जान.
उसने भी मस्ती में कहा- आपका ये दीवाना थोड़ी देर में आपकी खिदमत में हाजिर हो जाएगा जानेमन.

थोड़ी देर बाद वो आया और उसने डोरबेल बजाई. मैंने जाकर दरवाजा खोला और उसे देख कर मुस्कुरा पड़ी.
अगले ही पल उसने मुझे गोद में उठा लिया और बोला- हमारे होते आप चलने की तकलीफ़ क्यों उठा रही हो जानेमन.

मैंने भी उसे प्यारी सी स्माइल देकर चूम लिया. वो मुझे उठाए हुए ही बहुत ही प्यार से मेरी चुम्मी का आनन्द लेने लगा. साथ ही वो मुझे चूमते हुए मेरे रूम में ले गया. कमरे में ले जाकर मयूर ने मुझे बेड पर लेटा दिया और मेरे साथ लिपट कर बैठ गया.

उसने कहा- हां अब बताओ जान कि आपने मुझे क्यों याद किया था?
मैंने मयूर को सब कुछ बताया कि मैं तुमसे शादी करना चाहती हूं और हम दोनों अपने होने वाले बच्चे के बारे में प्रतीक को बता देते हैं.

वैसे भी मयूर ने अब एक किराए का मकान ले लिया था. मकान क्योंकि परिवार के बिना घर नहीं होता, वो सिर्फ एक इमारत या सिर्फ बना हुआ मकान होता है. जब तक उसमें गृहस्वामिनी न हो तब तक उस मकान को मकान कहना अनुचित होता है.

मयूर से मेरा मिलना अब बहुत ही कम मिलना हो पाता था, परंतु हम दोनों के बीच मैसेज वगैरह तो पूरे दिन चालू ही रहते थे. वो भी अब अच्छे खासे पैसे कमाने लगा था. उसकी एक बात बहुत ही अच्छी थी कि वो और मेरे पति आपस में बहुत ही अच्छे दोस्त थे, तो मयूर कभी भी हमारे घर आ जा सकता था. उसके आने से मेरे पति भी उसे कुछ नहीं कहते थे.

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मैं कभी कभी बाजार भी उसके साथ ही चली जाती या घर का कोई काम होता, तो भी उसे बुला लेती थी.

वैसे भी मयूर ने अभी तक शादी नहीं की थी और वो करना भी नहीं चाहता था क्योंकि मयूर किसी लड़की को लाईक करता था और उस लड़की ने दूसरे किसी लड़के से शादी कर ली थी. इससे मयूर उदास हो गया था और उसी के प्यार में पूरी जिंदगी कुंवारा बैठने वाला था. बाद में जब मैं उसकी जिंदगी में आयी और मयूर को भी उसकी माशूका की तरह टाइम देने लगी. तो वो भी उस लड़की के गम से बाहर आ गया.

लेकिन उसने मुझसे कहा था कि मैं आपके अलावा किसी और से प्यार नहीं करूंगा और शादी भी नहीं करूंगा.

बाद में हमने फैसला किया कि हम दोनों शादी कर लेंगे, लेकिन पहले प्रतीक को सब कुछ बता देते हैं.

मैंने भी मन ही मन सोच रखा था कि किसी न किसी तरह मैं मयूर को वापिस घर ले आऊंगी और उसकी अधूरी दुनिया पूरी कर दूंगी.

आज वो मेरे पास आकर मेरे मम्मों का मजा लेने लगा. फिर मैंने उसे रोकते हुए शराराती अंदाज में कहा- अब जो भी होगा, वो शादी के बाद होगा मयूर जी.
मयूर ने मेरे दूध दबाते हुए कहा- अन्दर बाहर का खेल रहने भी दो, तो कम से कम इनसे तो खेलने दो ना.

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