मुन्नू की बहन नीलू की चुदाई कहानी

मेरा यह मानना है कि दारु और चूत कभी भी झूटी नहीं होती – जब भी मौका मिले, इनसे मजे लेने चाहिए। चूत खूब चोदिये मगर गांड मारना न भूलें। और जब गांड मारें तो अपना रायता उसी के अन्दर छोड़ दें ताकि उस लौंडियाँ की गांड में एक गर्म एहसास रह जाए। यह मेरी शैली है – अब कोई माने या न माने।

अब सुनिए मेरी कहानी :

मैं शिमला का रहने वाला हूँ। मेरे घर के पास एक परिवार है जिसमें चार बच्चे हैं – दो बेटे और दो बेटियाँ। छोटा बेटा जिसका नाम मुन्नू है, मेरा बहुत अच्छा दोस्त है – और छोटी बेटी जिसका नाम नीलू है – उसके तो क्या कहने। मुझसे सिर्फ दो साल छोटी है।

मैं मुन्नू के घर बहुत जाता था। मुन्नू से मिलने और फिर नीलू को छूने। मुन्नू और मैं एक ही क्लास में पढ़ते थे। हम दोनों पढ़ाई भी साथ करते थे और लौंडिया-बाज़ी भी साथ ही करते थे। उसको शायद लगता था कि मैं उसकी बहन के चक्कर में उसके घर आता-जाता हूँ। एक दो बार उसने मुझे नीलू को हसरत भरी नज़रों से देखते हुए पकड़ा भी था। एक दिन उसने मुझसे कहा भी था कि मैं अपनी औकात में रहूँ। हर भाई अपनी बहन को शायद इसी तरह सुरक्षित रखना चाहता है।

अब मुन्नू के चाहने से भला क्या होगा। नीलू को मेरा उसे छूना शायद अच्छा लगता था तभी वो मेरे करीब आकर बैठती थी।

उस वक़्त मैं बीस साल का था और नीलू अट्ठारह साल की थी। नीलू एक पंजाबी परिवार से थी। काफी गोरी-चिट्टी और हर जगह से उसका बदन फूट फूट के उभार मार रहा था। बहुत ही चिकनी थी वो। उसकी बाहों पर या टांगों पर बिल्कुल भी बाल नहीं थे। हाँ – बहुत पास से उनमे रोम ज़रूर दीखते थे। मेरी बस एक ही तमन्ना थी कि गुलाब जामुन का शीरा उसके नंगे जिस्म पर डालूँ और ऊपर से नीचे तक उसे चाटूं। यह सोचकर ही मेरा खड़ा होने लगता था और मैं मुठ मारता था। मैं एक मौके की ताक में था कि कब हम अकेले मिलें।

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पंजाबियों की दाद देनी पड़ेगी- क्या खाकर ये लोग इतनी सुन्दर और मस्त लौंडियाँ पैदा करते हैं। साला देखते ही लंड खड़ा होने लग जाता है। खैर, रब ने एक दिन मेरी सुन ली।

नीलू मेरे घर आई थी। उसने मेरी माँ से थोड़ी देर बातचीत की और जाने लगी। मैं उसको दरवाजे तक छोड़ने आया और उसको जोर से अपने गले लगा लिया। यह पहली बार था कि मैं उससे लिपट रहा था।

थोड़ी सी कसमसाहट के बाद उसने भी मुझे जोर से भींचना शुरू किया, फिर बोली – दो बजे घर आना ! कोई नहीं रहेगा। सिर्फ हम-तुम !

और एक हल्का सा चुम्बन मेरे गाल पर जड़कर चली गई।

उस दिन मैंने बारह बजे ही खाना खा लिया और फिर अपने कमरे में चला गया। बार-बार मैं अपने लंड को सहलाता रहा और कहता रहा- सैर करने जाएगा?

आपको मैं बताना भूल गया कि मेरा लंड नौ इंच लम्बा है और थोड़ा मोटा भी है। भगवान् ने मुझे काला रंग दिया है लेकिन चेहरा और बदन काफी अच्छा दिया है। थैंक-यू गॉड !

दो बजने को थे। मैं घर से बाहर निकला। उस समय हमारी कालोनी में सन्नाटा छाया हुआ था। सब खा-पी कर सो रहे थे। खैर-अपन को क्या।

मैं नीलू के घर पहुंचा। दरवाजा बंद था। ज़रा सा धक्का दिया और दरवाजा खुल गया।

मैंने धीरे से कहा- नीलू ?

नीलू बोली- दरवाजा बंद करके अन्दर आ जाओ।

मैंने झट से दरवाजा बंद किया और अन्दर के कमरे में चला गया।

वहाँ नीलू एक आदमकद आईने के सामने खड़ी थी। मैं उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया। उसे पीछे से भींचकर मैंने कहा- कब तक मुझे यूं ही बेचैन करोगी रानी? अब तो रहा नहीं जाता।

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और मैं धीरे धीरे उसके गोल गोल चूतड़ पर पीछे से हल्के-हल्के धक्के लगाने लगा।

इसके जवाब में नीलू भी अपने आपको मेरी ओर झटके देने लगी। उसको मेरे लंड की सख्ती का अंदाजा हो गया। मैंने उसका चेहरा अपनी ओर किया और उसके गर्म गर्म गालों को चूमने लगा। धीरे-धीरे मैं होंठों पर पहुंचा। और फिर उसके होटों पर अपने अधर रखकर मैं जिंदगी का मज़ा लूटने लगा।

उधर नीलू भी मुझे चूसती रही।

मैंने धीरे से अपना बायाँ हाथ उसकी कुर्ती के अन्दर डाला। उसके पेट पर हाथ सहलाते हुए मैं धीरे से उसके मम्मों तक ले गया। एक हल्की सी हूंक निकली लेकिन फिर वो सामान्य हो गई। मेरा हाथ उसके दोनों मम्मों की गोलाईयाँ नाप रहा था।

इतने में मानो मेरे दायें हाथ ने कहा- मैं क्या करूँ?

तो मैंने अपने दूसरे हाथ से उसकी जाँघों का मुआयना किया। क्या सुडौल जांघें थी। धीरे-धीरे मेरा हाथ उसकी चूत पर पहुँचा। शायद उसे भी यही चाहिए था। मैं उसकी चूत पर अपना हाथ फेरता रहा – कभी सहलाता और कभी उसे नोचता था। पायजामे के ऊपर से ही मैं उसकी चूत को रगड़ता रहा। उसके मुँह से सिर्फ ऊह-आह की ही आवाज आ रही थी।

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