मम्मी को प्यार दिलाने की कोशिश

सेक्स कहानी अब आयेज-

शादी से लौटने के बाद घर में एक अजीब सा सन्नाटा छ्छा गया. मम्मी के चेहरे पर वो शादी वाली चमक अब नही थी, और वो चुप-चुप रहने लगी थी. उनका जिस्म जो उस दिन बेहद कासिला और उभरा हुआ दिख रहा था. अब फिर से सॅडी सी पोशाक में च्चिप गया था. और सच काहु तो, मम्मी का वो बोल्ड लुक और अनिरुढ़ भाई की हवस भारी नज़रें, मुझे अंदर ही अंदर बहुत अची लगती थी. अब जब मम्मी फिर से सिंपल हो गयी थी, मुझे उनका जिस्म देखने को नही मिलता था.

इधर अनिरुढ़ भाई का हाल भी कुछ अलग नही था. जिस अनिरुढ़ भाई को मैं हमेशा मस्ती में देखता था. वो अब एक-दूं चुप-चुप रहता था. ऑफीस से आने के बाद वो सीधा अपने फ्लॅट पर ही घुस जाते, ना रोहन की दुकान पर आते, ना मुझसे कोई बात करते. उनकी आँखों में वो प्यास तो थी, पर उसके साथ अब दर्र और पछतावा सॉफ दिखता था.

उन दोनो को इस हाल में देख कर मेरे अंदर एक अजीब सा ख़याल आया. मैं अपनी मम्मी को उस नयी चमक के साथ फिर से खुश देखना चाहता था. मुझे पता था की वो अनिरुढ़ भाई के साथ ही खुश रह सकती थी. इस सोच ने मेरे अंदर के कॉन्फ्लिक्ट को और बढ़ा दिया.

फॅमिली की इज़्ज़त एक तरफ, और दूसरी तरफ मम्मी की खुशी और मेरी अपनी बदलती हुई इच्छायें. मैं बस यही सोच रहा था की कैसे इन दोनो के बीच की दूरी कम करू. मैं उनके अगले कदम का इंतेज़ार कर रहा था, और शायद उनके लिए कोई रास्ता बनाने का भी.

अनिरुढ़ भाई जब भी मम्मी को हवस भारी नज़रों से देखते थे और मम्मी उनके सामने शरमाती थी, तो मुझे वो पल कहीं ना कहीं आचे लगते थे. मम्मी में जो बदलाव आए थे, वो भी मुझे पसंद थे. घर में वो फिर से अपनी सिंपल सरीस में अपना जिस्म च्चिपाने लगी थी, और ये मुझे बिल्कुल भी अछा नही लगता था. अब ना उनके उभरे हुए बूब्स दिखते थे, ना ही सारी में लिपटी उनकी सेक्सी गांद.

एक दिन मैने सोचा अनिरुढ़ भाई से खुल कर बात करता हू, तो मैं उनसे मिलने उनके फ्लॅट पर गया. उनके चेहरे पर अब वो खुशी नही थी जो पहले मेरे आने से होती थी. वो अब भी उस दिन के हादसे से गिल्ट फील कर रहे थे. मैं उनसे बात कर रहा था, पर वो मुझे सीधा, स्ट्रेट जवाब देते थे, ना कोई मस्ती मज़ाक. उन्होने मुझसे मम्मी के बारे में भी नही पूछा, जो पहले उनकी बातों का एक अहम हिस्सा होता था.

मैं (धीरे से कहा): अनिरुढ़ भाई, लगता है मुझसे कोई ग़लती हो गयी है. आपको मेरा यहाँ आना अछा नही लगता तो अब यहाँ नही आयुंगा (मैं उठ कर जाने लगा.).

अनिरुढ़ (रोकते हुए, धीमी आवाज़ में): ग़लती तेरी नही, मुझसे हो गयी है. उस दिन शादी में मैं बहक गया था. मुझे तेरी मम्मी के साथ…

मैं (उनको बीच में रोकते हुए, गुस्से में): मैने आपसे कुछ कहा क्या? मैं नॉर्मल रहता हू तो आप दोनो क्यूँ नही रह सकते?

मेरी ये बात सुन कर अनिरुढ़ एक-दूं शॉक्ड हो गये, उनकी आँखों में हैरानी थी, चेहरे पर पसीने की बूँदें, जैसे गली हुई मच्चली ठहर गये थे.

मैं (आँखों में देखते हुए): तब कुछ लोग कार की तरफ आ रहे थे, तो मम्मी की बदनामी ना हो इसलिए मुझे आप दोनो को डिस्टर्ब करना पड़ा.

अनिरुढ़ (आँखें और भी फैल गयी): तो तुम सब कुछ जानते थे उस दिन क्या हो रहा था?

मैं: उस दिन का नही, आप पहली बार मेरे घर पर डिन्नर पर आए और उस दिन से आपके और मम्मी के बीच जो कुछ चल रहा था, सब मुझे पता था. (अनिरुढ़ भाई ने नज़रें झुका ली).

मैं: जब उस दिन मम्मी के बर्तडे के लिए आपने सारी पसंद की और बहुत डीटेल में टेलर को उनके ब्लाउस का साइज़ बताया. तभी मैं समझ गया था की आप मम्मी को किस नज़र से देख रहे है.

अनिरुढ़ (धीमी आवाज़ में): मुझे माफ़ करना यार, मैने बहुत बड़ी ग़लती की.

मैं: ग़लती तो आप अब कर रहे हो. मेरी मम्मी में उम्मीद जगा कर उनको अकेला छ्चोढ़ दिया. वो पहले जैसी थी वैसी खुश थी, पर अब कितनी दुखी रहती है, वो मुझे पता है.

मैं: रात को घर पर डिन्नर पर आना और अपनी ग़लती सुधार लेना. मैं मम्मी के चेहरे पर वो खुशी फिर से देखना चाहता हू. वो चमक जो सिर्फ़ आपकी नज़रों से आती है.

अनिरुढ़ (हैरानी से): तुझे हमारे इस रिश्ते से प्राब्लम नही है?

मैं (उसकी आँखों में देखते हुए): मुझे आप पर भरोसा है, आप मम्मी के लिए सही हो. और आप मेरी घर की इज़्ज़त का ख़याल रखोगे, ये रिश्ता बहुत सीक्रेट रख पाओगे.

अनिरुढ़ (राहत के साथ): आराव, मैं नही जानता क्या काहु. तुम इतना समझदार निकलोगे, मैने सोचा नही था. मैं सच में तुम्हारी मम्मी को खुश देखना चाहता हू. और इज़्ज़त का ख़याल, वो मेरी ज़िम्मेदारी है. ये बात हम दोनो के बीच ही रहेगी, कोई तीसरा नही जानेगा, इसकी कसम है.

उस रात अनिरुढ़ भाई की आँखों में वो पुरानी चमक वापस आ गयी थी, जो मम्मी को देख कर आती थी. उनके चेहरे पर अब गिल्टी की जगह मम्मी को छोड़ने की उम्मीद थी, और हवस भी, जैसे उन्हे अपनी प्यास बुझाने का मौका मिल गया हो. वो उस पल में मम्मी के नंगे जिस्म को अपनी आँखों के सामने देख रहे होंगे, और उनके अंदर एक जुंगली आग भड़क उठी होगी.

मैं वहाँ से उनके फ्लॅट से निकला तो मेरा मॅन हल्का था, पर साथ ही एक नये राज़ का बोझ भी था जो मेरे अंदर भी कुछ नये एहसास जगा रहा था. अब मैं सिर्फ़ उनका दोस्त नही, उनका साथी भी बन गया था जो अब उनकी मम्मी की चुदाई करने में मदद कर रहा था. मेरे दिमाग़ में मम्मी का वो कासिला जिस्म और उभरे हुए बूब्स घूम रहे थे, जैसे मैं खुद उनके करीब जाना चाहता हू.

घर पहुँच कर मैं मम्मी को अनिरुढ़ भाई के आने की खबर देने का इंतेज़ार करने लगा. मेरी नज़रों में मम्मी की खुशी अब सबसे उपर थी, और उसके लिए मैं कुछ भी करने को तैयार था. भले ही इसमे मेरे अपने अंदर उनका नंगा जिस्म देखने की चाहत हो.

मैने घर आ कर सब को बोला, “आज रात अनिरुढ़ भाई खाना खाने आने वाले है.” घर के सब लोगों ने कहा, “अछा किया.”

मैने मम्मी की तरफ देखा तो उनके चेहरे पर एक दर्र था. वो मुझे बड़ी हैरानी से देख रही थी. उनकी आँखों में सवाल और शरम सॉफ दिख रही थी, जैसे वो सोच रही हो की मैने उनको अनिरुढ़ भाई से चुम्मा-छाती करते पकड़ लिया था, फिर भी उनको घर पर क्यूँ बुलाया?

रात को अनिरुढ़ भाई घर पर आए, पर मम्मी उनके सामने ही नही आई. अनिरुढ़ भाई मेरी तरफ देख रहे थे और मैं उनकी तरफ. उनकी नज़रों में भी बेचैनी थी, वो मम्मी को ढूँढ रहे थे.

मुझे लग रहा था मम्मी को अभी भी अपनी ग़लती पर गिल्ट हो रहा था, और शायद मैने उस दिन देख लिया था दोनो को, तो वो मेरे से दर्र कर अपनी इच्छाओं को मार रही थी. उनके अंदर की वो सुलगती हुई आग बुझ रही थी, और ये मुझे बिल्कुल भी गवारा नही था.

उस दिन के बाद अनिरुढ़ भाई मुझसे डेली मम्मी के बारे में पूछते की वो कैसी थी, क्या कुछ बदलाव आया या नही. वो अब खुश तो रहती थी ना? उनकी मम्मी के लिए चिंता और उनको छोड़ने की तड़प हर दिन बढ़ती जेया रही थी, और ये चीज़ मेरी नज़र से च्छूपी नही थी.

एक दिन मम्मी अपने कमरे में अकेली बैठी थी. उनके चेहरे पर गहरी उदासी दिख रही थी. उनका जिस्म जो हमेशा भरा हुआ लगता था, अब जैसे ढीला पद गया था, और आँखों की चमक गायब थी. मैने सोचा, यही सही मौका था मम्मी से खुल कर बात करने का, उनके अंदर की सुलगती आग को फिर से जगाने का.

मैं उनके पास गया और कहा: मम्मी, मुझे आपसे कुछ बात करनी है.

मम्मी के चेहरे पर एक दर्र और झीजक सॉफ दिखाई दे रही थी. उन्होने अपनी नज़रें झुका ली, जैसे कुछ च्चिपा रही हो.

मैं (उनके पास बैठ कर): मम्मी, प्लीज़ एक बार मेरे से बात तो करो.

मैं (उनका हाथ पकड़ कर): मम्मी, आप अब क्यूँ इतना उदास रहती है? आप पहले कितनी खुश रहा करती थी.

मैने उनकी सारी को छ्छूते हुए कहा: और आप ने ये अपना क्या हाल बना दिया है?

मम्मी रोने ही वाली थी की मैने उनका सर अपने कंधे पर दबा दिया और कहा: प्लीज़ रोना नही, नही तो मैं आपसे कभी बात नही करूँगा.

मम्मी (रोते हुए): सॉरी बेटा, उस दिन मेरे से…

मैने उनके होंठो पर उंगली रख कर आयेज बोलने नही दिया. उनके होंठ गरम और नरम थे, जिसे छ्छूते ही मेरे अंदर एक अजीब सी झुरजुरी दौड़ गयी.

मैं (उनका चेहरा उठा कर आँखों में देखते हुए): मम्मी, आपकी कोई ग़लती नही थी. मैं समझता हू आपने इस जॉइंट फॅमिली को संभालने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी सॅक्रिफाइस कर दी. आपको पूरा हक़ है अपनी च्छूपी हुई ख्वाहिशों को पूरा करने का.

मम्मी मेरी तरफ हैरानी से देख रही थी. उनकी आँखों में अब भी दर्र था, पर उसके साथ एक चमक भी उभर रही थी. जैसे उन्हे यकीन नही हो रहा था की मैं ये सब कह रहा था.

मैं: मम्मी, मुझे बस आप खुश रहो, यही देखना है. मैं आपको ऐसी हालत में नही देख सकता.

मम्मी: पर बेटा, ग़लती तो मैने की है. मैने आज तक तेरे पापा के अलावा किसी और के बारे में सोचा नही था. पर उस दिन मुझे क्या हुआ, मैं बहक गयी.

मैं (धीरे से): उस दिन कुछ लोग पार्किंग में थे, और वो हमारी कार की तरफ आ रहे थे. तो मुझे आप दोनो को अलर्ट करना पड़ा. मैं आप दोनो को डिस्टर्ब करना नही चाहता था. मैं चाहता था की आप दोनो को वो पूरा टाइम मिले.

मम्मी (मुझसे डोर हटने की कोशिश करते हुए, आँखों में बड़ा सवाल): तो तू सब कुछ जानता था?

मम्मी मुझे थप्पड़ मार दिया और बोली: तुझे शरम नही आई, अपने दोस्त के साथ मिल कर ऐसा गंदा काम करते हुए?

मैं (गुस्से से उनकी तरफ देखा): हा, मैं चाहता था की आप अनिरुढ़ भाई को पसंद करती है. पर दर्र से अपनी इच्छा नही पूरी करेंगी. तो मैने आप दोनो को अकेले में तोड़ा टाइम बिताने का मौका दिया. मेरा कोई ऐसा इरादा नही था, ना ही मेरा कोई उनके साथ प्लान था. जब वो पहली बार खाने पर आए. तब से मैं आप दोनो को देख रहा हू. मैने आपके चेहरे पर वो खुशी पहली बार देखी, तो मैं चुप-छाप जो हो रहा था वो बिना बोले होने दिया.

मैं (उनके पास बैठा हुआ उठ गया): आपका अछा सोचने चला था. लेकिन आप ने मुझे मेरी नज़रों में गिरा दिया.

मैने फिर अनिरुढ़ भाई को कॉल किया और उनसे मिलने की बात कही. वो भी उस समय टेन्षन में आ गये. मैने उनसे ये सारी बातें कही जो मेरे और मम्मी के बीच हुई थी. उस दिन मम्मी का गुस्सा, उनका थप्पड़, और मेरी उनसे बातें, सब कुछ मैने अनिरुढ़ भाई को बता दिया.

अनिरुढ़ (चिंतित आवाज़ में): आराव, मेरी वजह से तेरी और यामिनी जी के रीलेशन में तनाव आ गया.

मैं: आप दोनो की कोई ग़लती नही थी. मुझे बीच में नही आना चाहिए था.

अनिरुढ़: आराव, तेरी कोई ग़लती नही है. तुम अपनी मम्मी को खुश देखना चाहते हो और मैं भी यामिनी जी से प्यार करता हू. वो भी मेरे से प्यार करती है, इसलिए तो उस दिन हम दोनो में इतनी नज़दीकियाँ आ गयी.

मैं: अब क्या करना है?

अनिरुढ़: मुझे लगता है यामिनी जी को तोड़ा समय अकेले छ्चोढ़ दो. उनको अब आयेज ये रिश्ता रखना है या नही ये उनकी मर्ज़ी है. पर प्लीज़ उनको ज़्यादा गिल्ट फील हो ऐसा काम नही करना. और हो सके तो मुझे अब अपने घर पर भी नही बुलाना. और तुम भी यहाँ नही आना.

अनिरुढ़ भाई की ये बात सुन कर मैं अंदर से टूट गया. जिस हवस को मैने जगाने की कोशिश की थी, वो फिर से मेरी आँखों के सामने बुझ रही थी. मम्मी का चेहरा, उनकी वो नयी चमक, सब कुछ मेरे दिमाग़ में घूम रहा था. क्या मैं ग़लत था? क्या उनकी खुशी की जगह, मैने उन्हे और दुख दे दिया था?

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