सेक्स कहानी अब आयेज-
मम्मी की वो रानी पिंक सारी और स्लीव्ले ब्लाउस में उनका हर कर्व सॉफ नज़र आ रहा था. शादी सिटी से बाहर एक बड़े फार्महाउस या प्लॉट पर हो रही थी. खुले माहौल में मम्मी जैसे ही लोगों के बीच आई, बारात में मौजूद काई आँखें उनकी तरफ घूम गयी. लड़की वाले पक्ष के कुछ आदमी और यंग लड़के भी मम्मी को घूर रहे थे. उनकी नज़रों में सॉफ हवस दिख रही थी. कुछ तो ऐसे थे जो अपनी नज़रें हटा ही नही पा रहे थे, जैसे मम्मी कोई खिलौना हो उनके लिए.
मैं समझ गया था की ये अनिरुढ़ भाई की नज़र से देखने का तरीका था, जिसने मम्मी को बदल दिया था. पहले मम्मी ने कभी खुद को इतना खुल कर नही दिखाया था. उनका फिगर हमेशा सिंपल सरीस में च्चिपा रहता था. पर आज वो बिल्कुल अलग थी. अनिरुढ़ भाई ने जैसे उनके अंदर की च्छूपी हुई आग को जगा दिया था. उनका हर अंदाज़ सहमी हुई चमक से भरा था, जो अब खुद को दिखाने लगा था.
जब हम बारात में पहुँचे तो चाचा अपने दोस्तों के पास चले गये. मम्मी, छ्होटी सिस्टर और दादी के साथ बारातियों के बीच जेया कर बैठ गयी. अभी दूल्हे की बारात निकालने की तैयारियाँ चल रही थी, लोग इकट्ठे हो रहे थे.
जब भी मेरी नज़र अनिरुढ़ भाई पर पड़ती, वो मम्मी को ही देख रहा होता. उसकी आँखों में प्यास और एक च्छूपी हुई मुस्कान होती. मम्मी भी बार-बार उसकी तरफ देखती और हर बार शर्मा जाती. उनके चेहरे पर अब शरम के साथ एक अजीब सी उत्तेजना भी दिख रही थी.
मैं समझ गया था की दोनो के बीच एक अजीब सा कनेक्षन बन गया था, जो अब सिर्फ़ नज़रों से आयेज बढ़ने वाला था. ये सब हम खाना खा रहे थे, वहाँ भी चल रहा था. मम्मी ने एक बार उनको नॉटी स्माइल देकर कहा भी- आचे से खाना खाना.
खाना खाने के बाद जब बारात निकालने लगी, तो हम सब सड़क पर झूम रहे थे. ढोल और बंद-बाजे की आवाज़ में सब नाच रहे थे. दोस्तों ने अनिरुढ़ भाई को भी खींच लिया. मुझे तो उस दिन पहली बार पता चला की वो डॅन्स कितना अछा कर लेते थे. उनके मूव्स में एक अजीब सा जुनून था.
मम्मी भी उनको देख कर मुस्कुरा रही थी. उनकी आँखें अनिरुढ़ भाई से हॅट नही रही थी. थोड़ी देर बाद मैने नोटीस किया मम्मी अकेली खड़ी थी. छ्होटी सिस्टर और दादी उनके साथ नही थी.
मैं: मम्मी, छ्होटी और दादी कहाँ है?
मम्मी: वो लोग तो वहाँ के हॉल में सोने चले गये. दादी तक गयी थी और छ्होटी को नींद आ रही थी.
मुझे और मम्मी को बातें करते देख अनिरुढ़ भाई भी हमारे पास आ गये. उनको तो बस बहाना चाहिए था मम्मी से बातें करने का.
अनिरुढ़ भाई: क्या हाल चल है यामिनी जी? आज आपने डॅन्स नही किया, तक गयी लगता है?
मम्मी (तोड़ा शर्मा कर): नही अनिरुढ़ जी, मैं कहाँ आपके जितना अछा डॅन्स कर पति हू. आप तो बहुत अछा डॅन्स करते है. मैं देख रही थी. और हा, इतनी गर्मी है यहाँ, एक ठंडा सोडा मिल जाए तो मज़ा आ जाए. क्या बोलते हो आराव?
मैं: हा मम्मी, आइडिया तो अछा है. मेरा भी गला सूख रहा है.
मम्मी: पर इतनी रात को कहाँ मिलेगा सोडा? और इतनी डोर जाना पड़ेगा?
अनिरुढ़ भाई: डोर क्या, बाहर निकलते ही कोई ना कोई दुकान तो मिल ही जाएगी. बहुत गर्मी है, चलते है.
मैं: ठीक है, मैं चाचा से कार की चाबी लेकर आता हू.
मैं जल्दी से चाचा के पास गया और कार की चाबी ले आया. अनिरुढ़ भाई और मम्मी की आँखों में एक च्छूपी हुई उत्तेजना थी. अब हम तीनो, मम्मी, अनिरुढ़ भाई और मैं, अकेले, एक नयी राह पर निकल गये. रात का सन्नाटा और कार की ठंडी हवा में, उन दोनो में अनकहा रिश्ता बन रहा था.
शादी का प्लॉट सिटी से बहुत अंदर था. एक छ्होटे से गाओं के पास एक धुंधली सी रोशनी दिखी. वहाँ सोडा मिल जाएगा, सोच कर मैने कार रोक दी. पर कार स्पीड में थी, तो दुकान काफ़ी पीछे छ्छूट गयी.
मैं कार से उतरा और दुकान की तरफ गया. अनिरुढ़ भाई और मम्मी कार में ही थे. दुकान पर सोडा नही मिला. जब मैं वापस कार की तरफ बढ़ा, देखा कार पूरी तरह अंधेरे में थी. जैसे ही मैं नज़दीक गया, मुझे मम्मी और अनिरुढ़ भाई की धीमी आवाज़े सुनाई दी. वो बातें कर रहे थे. उनकी आवाज़े सुन कर मैं वहीं रुक गया, उनकी बातें सुनने के लिए. मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गयी थी.
मैं वहीं अंधेरे में च्छूप कर मम्मी और अनिरुढ़ भाई की बातें सुनने लगा. उनकी आवाज़े धीमी थी, पर हर शब्द सॉफ सुनाई दे रहा था.
मम्मी: आपने मेरे बर्तडे पर बहुत अची सारी पसंद की थी. मुझे वो बहुत पसंद आई. थॅंक योउ सो मच.
अनिरुढ़ भाई: यामिनी जी, मेरी पसंद हमेशा बहुत अची रही है. और सारी नही, आप खूबसूरत हो इसलिए सारी ज़्यादा खूबसूरत लग रही थी. आपके जिस्म पर तो कुछ भी खूबसूरत लगेगा.
मम्मी (एक शरारती, सिड्यूसिंग खनक उसकी आवाज़ में थी): लेकिन आप ना बड़े च्छूपे रुस्तम निकले. मुझे आराव ने बताया वो ब्लाउस आपने टेलर से बात करके रेडी करवाया था. जितना मेरा टेलर इंची टेप से नही नाप लेता, उतना तो आपने आँखों से ही ले लिया.
अनिरुढ़ भाई (उसकी आवाज़ में गहरा, बोल्ड लालच था): सोच लो, यामिनी जी, हमने बिना च्छुए इतना अछा नाप लिया, तो च्छू लिया तो क्या कुछ कर सकते है? आपके हर एक अंग का नाप तो मेरी आँखों में बस गया है.
मम्मी (उसकी हँसी में एक नशा था): आप जीतने शकल से भोले दिखते हो, उतने हो नही. सच काहु तो, मुझे लगा ही नही था की आप इतने बेबाक होंगे.
अनिरुढ़ भाई (मम्मी की आवाज़ में डूबते हुए): यामिनी जी, आज ना आप बहुत कमाल लग रही हो. आपको इस सारी में देख कर तो मेरा खुद पर काबू नही रह रहा.
मम्मी: आपकी नज़र में मैं खूबसूरत हू इसलिए आपको लग रही हू. बाकी इतने सालों में किसी ने ऐसा सोचा नही था. मैने खुद ने नही सोचा था की मुझ में इतनी खूबसूरती है. (एक लज़्जत और च्छूपी हुई ख्वाहिश उसकी आवाज़ में थी).
मैं ये सब सुन कर शॉक्ड हो गया. मेरी संस्कारी मम्मी किसी गैर मर्द से इतना खुल कर और ऐसी बातें कैसे कर रही थी? उनकी आवाज़ो में जो गर्मी और खिचाव था, वो मेरे दिमाग़ को सुन्न कर रहा था. इतने में पास से कोई गाओं का आदमी गुज़र रहा था. मम्मी को लगा मैं आ रहा था.
मम्मी (अपनी आवाज़ नॉर्मल करते हुए): लगता है आराव आ रहा है.
फिर दोनो एक-दूं नॉर्मल हो गये, जैसे कुछ हुआ ही ना हो. मैं जब कार में बैठा तो मम्मी ने पूछा: सोडा मिला?
मैं: नही मम्मी, वहाँ नही मिला. हमे लगता है सिटी में जाना पड़ेगा.
उसके बाद हम कार लेकर सिटी की तरफ गये. पुर रास्ते दोनो ने बहुत नॉर्मल बिहेव किया, जैसे कुछ अनोखा हुआ ही ना हो. पर जब भी मैं तोड़ा डोर होता या मेरा ध्यान हॅट जाता, उनकी फूस-फूस शुरू हो जाती थी. उनकी नज़रें मिल जाती और एक च्छूपी हुई मुस्कान उनके चेहरे पर आ जाती. हमने सिटी से सोडा लिया और फिर वापस शादी में आ गये.
हम वहाँ पहुँचे तो काफ़ी रात हो चुकी थी. शादी का मैं प्रोग्राम शुरू हो गया था, और बहुत सारे बाराती और रिश्तेदार भी शादी छ्चोढ़ कर निकल गये थे. माहौल अब तोड़ा शांत हो चुका था.
जैसे ही हम कार से बाहर निकले, एक तेज़, ठंडी हवा का झोंका आया और हम तीनो को सुरशुरी सी हो गयी. मैने अपना ब्लेज़र निकाला और पहन लिया. अनिरुढ़ भाई तो सूट में थे, उन्हे ज़्यादा फराक नही पड़ा, पर मम्मी वो तो बस पतली जोर्जेट सारी में थी. सॉफ दिख रहा था की उन्हे ठंड लग रही थी, उनकी बाहों पर हल्की सी गूसेबूमप्स दिख रही थी.
अनिरुढ़ भाई को मम्मी को इस हाल में देख कर उनकी फिकर होने लगी. उनकी नज़रें मम्मी के शिवर करते जिस्म पर थी. मैने नोटीस किया, पार्किंग में बहुत कम कार बची थी, और मैने कार ऐसी जगह पार्क की थी की किसी की आसानी से नज़र ना पहुँचे. मेरे दिमाग़ में एक प्लान आया. मैने सोचा, यही सही मौका था दोनो को पहचानने का की इनके अंदर असल में क्या चल रहा था.
मैं: मम्मी, आप और अनिरुढ़ भाई कार में बैठो. बाहर ठंड है. मैं अंदर देख कर आता हू रसम कहाँ तक पहुँची है, और चाचा को भी पूच लेता हू उनको कब निकलना है.
मम्मी और अनिरुढ़ भाई ने एक-दूसरे की आँखों में देखा. उनकी नज़रों में एक छुपी हुई राहत और खुशी थी, जैसे उन्हे यही तो चाहिए था – अकेले वक़्त. उनकी आँखों में एक शरारती चमक आ गयी, जो मैं सॉफ पढ़ सकता था.
मैं उनके सामने तो नॉर्मल चलते हुए गया, पर जैसे ही मुड़ा, मैं भाग कर शादी के मंडप की तरफ लपका. मैने देखा, शादी में अभी बहुत सारी रस्में बाकी थी.
चाचा और जिस लड़के की शादी थी, उसके पापा, दोनो आचे दोस्त थे. तो चाचा को उन्होने शादी ख़तम होने तक रोक कर रखा था. मैं हॉल में गया, वहाँ दादी, छ्होटी और बहुत सारे गेस्ट्स चैन की नींद सो रहे थे. मैं समझ गया की इन लोगों के पास तो अभी बहुत टाइम था.
फिर मैं फटाफट भाग कर पार्किंग के पास गया और चुपके से कार की तरफ देखा. मैने देखा, अनिरुढ़ भाई आयेज की सीट पर थे और मम्मी पीछे की सीट पर. मुझे देख कर दोनो की बातें तुरंत रुक गयी. मैं बहुत कॅषुयल तरीके से कार के पास गया.
मैने देखा मम्मी ने अपने आप को अनिरुढ़ भाई के कोट से कवर किया हुआ था. उनकी आँखों में हल्की घबराहट थी. दोनो मुझसे नज़रें चुरा रहे थे, पर मैने वो सब ऐसे जाने दिया जैसे मैने वो चीज़ नोटीस ही नही की हो.
मैं: शादी की रस्में तो अभी बहुत सारी बाकी है. दादी और छ्होटी तो आचे से सो रहे है. चाचा ने बताया की उन्हे अब बिदाई के बाद ही घर जाना है.
दोनो के चेहरे देख कर ऐसा लग रहा था की उनको तो बस यही चाहिए था की ये रात ख़तम ही ना हो. उनकी आँखों में एक छुपी हुई खुशी थी.
मैने फिर इधर-उधर की बात करके कहा: मेरे दोस्त मुझे बुला रहे है, मैं जेया रहा हू.
फिर मैं वहाँ से निकल गया और चुपके से वापस आ कर कार को डोर से देखने लगा. मैं इतना डोर था की सॉफ-सॉफ तो नही देख सकता था की अंदर क्या चल रहा था. पर इतना ज़रूर पता था की जो भी वहाँ हो रहा था, वो साधारण नही था. अंधेरे में कार के अंदर की हरकतें एक अजीब सा राज़ बना रही थी, और मेरी कल्पनाओ ने उस राज़ को और भी गहरा कर दिया. मेरी पूरी बॉडी में एक तेज़ झुरजुरी दौड़ गयी. मेरे होश उडद चुके थे, और एक पल के लिए तो लगा जैसे मेरा दिमाग़ काम करना बंद हो गया था.
जिस मम्मी को मैं बचपन से संस्कारी और सीधी-सॅडी देखता आया था, वो अनिरुढ़ भाई के साथ कार की पिछली सीट पर ये सोच कर ही मेरे अंदर तूफान उठ गया. मेरे कान गरम हो गये थे, और दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था की लग रहा था अभी सीने से बाहर आ जाएगा. एक तरफ गुस्सा था, तो दूसरी तरफ एक अजीब सी उत्तेजना भी थी जो मुझे अंदर ही अंदर खा रही थी. मैं वही जाम सा गया, बस उस कार की तरफ देखता रहा.
ये रात अनिरुढ़ भाई और मम्मी को तो शायद बहुत छ्होटी लग रही होगी, क्यूंकी वो दोनो एक-दूसरे में खोए हुए थे. पर मेरे लिए ये रात बहुत लंबी होती जेया रही थी. मैं बस यही सोच-सोच कर पागल हो रहा था की मम्मी और अनिरुढ़ भाई कार के अंदर क्या बातें कर रहे होंगे? उनके बीच असल में क्या चल रहा होगा? ये सोच-सोच कर मेरा दिमाग़ फटा जेया रहा था.
इस सब में मुझे पता ही नही चला की समय क्या हुआ था, और मैं कहाँ बैठा था. मेरा पूरा ध्यान उस कार पर और उसके अंदर चल रही अंजान कहानी पर था. मेरी आँखों के सामने मम्मी की भारी हुई फिगर घूम रही थी. अनिरुढ़ भाई की नज़रें तो हमेशा से उनके उभरे हुए बूब्स और गोल चूतदों पर छिपकती थी. उसका हर बार मम्मी को देखना, उनकी हर आडया पर उसकी हवस भारी नज़र टिकना , उनका वो चेहरा मेरी आँखों के सामने आ रहा था. मैं ये इमॅजिन करके अंदर ही अंदर उन पर गुस्सा निकाल रहा था. और आज मम्मी ने उसको मौका दे दिया था.
कहीं वो दोनो एक-दूसरे को मसल तो नही रहे होंगे? मेरे दिमाग़ में बहुत से सवाल घूम रहे थे. जैसे अनिरुढ़ भाई मम्मी के कोमल होंठो को चूस रहा होगा? क्या वो उनके भरे हुए बूब्स को अपने हाथो में मसल रहा होगा? उनके ब्लाउस के अंदर हाथ डाल कर, वो उनके गरम-गरम मॅमन को दबोच रहा होगा? और मम्मी भी उसके लंड को अपनी पकड़ में ले कर सहला रही होगी.
ये सब सोच कर मेरे जिस्म में आग सी लग गयी. मेरे अंदर इस वक़्त बहुत कुछ चल रहा था. एक तरफ सोच रहा था की उनको रोक डू, ये सब ग़लत था. जिस मम्मी को मैं हमेशा संस्कारी और मर्यादा में देखता आया था, उसको ऐसे एक गैर मर्द के साथ देख कर मेरा खु खौलता.
पर दूसरी तरफ, मेरे दिमाग़ में मम्मी के चेहरे पर वो पहली बार दिखी खुशी घूम रही थी. एक अजीब सी चमक थी उनकी आँखों में जब वो अनिरुढ़ भाई से बातें कर रही थी. शायद इस नयी राह पर चल कर मम्मी खुश थी. और बस यही एक रीज़न था जिसकी वजह से मैं कुछ कर नही पा रहा था, उन्हे रोक नही पा रहा था.
मैं बस वही खड़ा, अंदर ही अंदर इस जुंग को लड़ रहा था. कुछ समय बाद मुझे पार्किंग में कुछ लोगों की आवाज़ सुनाई दी. उनकी बातें धीरे-धीरे नज़दीक आ रही थी. मेरे दिमाग़ में एक-दूं से ख़याल आया – अगर किसी ने मम्मी को अनिरुढ़ भाई के साथ इस हाल में देख लिया तो हमारी बहुत बदनामी होगी. पूरा खानदान और रिश्तेदार क्या सोचेंगे?
मैं जल्दी से भाग कर कार के पास गया और जैसे ही अंदर देखा, मेरी साँस अटक गयी. मम्मी और अनिरुढ़ भाई अभी भी एक-दूसरे में खोए हुए थे, होंठ चूम रहे थे. अनिरुढ़ भाई का हाथ मम्मी के ब्लाउस के अंदर था, और मम्मी उसके उपर झुकी हुई थी.
मेरी उलझन बढ़ गयी. अब मैं उन्न दोनो को कैसे अलर्ट करता? अगर मैं सीधा देख लेता और उन्हे पता चलता की मैने उन्हे इस हाल में देख लिया था, तो शायद दोनो मुझसे कभी अपनी आँखें नही मिला पाते.
मम्मी को अपने आप पर बहुत गिल्ट होता, और शायद वो आयेज से कभी अपनी खुशी ढूँढने की कोशिश नही करती. मैं नही चाहता था की उनके चेहरे पर वो नयी चमक चली जाए.
अनिरुढ़ भाई तो बाहर के थे, एक-दोस्त कम होता तो मुझे शायद उतना फराक नही पड़ता. पर मम्मी को जिस तरह उन्होने एक नया आईना दिखाया था, उनके अंदर की च्छूपी हुई औरत को जगाया था, मेरे लिए वो भी इंपॉर्टेंट थे. उनकी वजह से मम्मी के चेहरे पर जो खुशी दिखी थी, वो मैने पहले कभी नही देखी थी. एक तरफ मेरी परिवारिक इज़्ज़त थी, और दूसरी तरफ मम्मी की नयी मिली खुशी. मैं इसी कशमकश में था.
वो लोग इतने करीब आ रहे थे की मुझे ना चाहते हुए भी कार का डोर नॉक करना पड़ा. मेरी आवाज़ से दोनो एक-दूं से चौंक कर अलग हो गये. जैसे ही उनकी नज़र मुझ पर पड़ी, उनके चेहरे पर सॉफ दर्र च्छा गया और आँखों में घबराहट थी, जैसे पकड़े गये हों. वो जल्दी-जल्दी अपनी पोज़िशन ठीक करने लगे.
मैं (तोड़ा ज़ोर से): लगता है बिदाई हो रही है. सब मेहमान बाहर निकल रहे है.
मम्मी और अनिरुढ़ भाई एक-दूसरे से नज़र भी नही मिला पा रहे थे, दोनो में ज़बरदस्त दर्र था. उनके चेहरे पर पसीने की बूँदें थी, जिसे मैं उनकी तरफ हल्का सा देख कर भी समझ गया. पर मैने माहौल को हल्का बनाने के लिए उनकी तरफ नही देखा. मैने उन लोगों की तरफ देखा जो पार्किंग में आ रहे थे, और उनसे कुछ इधर-उधर की बातें करने लगा.
उनको कुछ सेकेंड्स मिल गये अपने आप को संभालने के लिए. जब वो कार से उतरे, तो मम्मी जल्दी से अपनी सारी सही कर रही थी और अनिरुढ़ भाई अपना सूट ठीक कर रहे थे. उनके चेहरों पर वो दर्र अभी भी था की मैने सब देख लिया है, पर मैं बिल्कुल अंजान बना रहा.
मैं: चलो, हम बिदाई की रसम देख कर आते है.
मैं उन दोनो के सामने इतना कॅषुयल रहा की थोड़े ही समय बाद उन्होने राहत की साँस ली, पर उनके चेहरे पर अब भी एक च्छूपी हुई घबराहट थी. मेरा इस सिचुयेशन में नॉर्मल रहना मुश्किल था, फिर भी मैं अपने आप को संभाल कर दोनो से मस्ती-मज़ाक वाला माहौल बनता रहा.
जब बिदाई हो गयी और लोग निकालने लगे, मम्मी अंकल के साथ कार में चली गयी और अनिरुढ़ भाई बस में गुमसूँ बैठे रहे, उनकी आँखों में अब भी वही अनकही बातें थी.
अब इसके आयेज क्या हुआ आपको नेक्स्ट पार्ट में बतौँगा. स्टोरी अची लगी हो तो