मेरी माँ और हमारे मकान मालिक

प्यारे साथियो आपके लिए एक अंतरजातीय सेक्स कहानी लाया हूँ . भाइयो मेरा मकसद सिर्फ़ मनोरंजन करना और करवाना है किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नही आशा करता हूँ आप इस कहानी को सिर्फ़ मनोरंजन की दृष्ट से ही देखेंगे . ये सच्ची घटना है,मेरी माँ और हमारे मकान मालिक, राज के बीच हुए सेक्स की. मेरा नाम अनवर है. मैं पहले अपने माँ, और बाप के साथ कोलकाता में रहता था. मेरा बाप एक राजनैतिक पार्टी का कार्यकर्ता था, और माँ स्टेट बॅंक ऑफ इंडिया में काम करती थी. मेरी माँ एक बेहद खूबसूरत बंगाली औरत थी, उसका कद लगभग 5’5” था, फिगर 37द-31-38 थी. उसके लंबे बाल थे जो उसकी कमर तक पहुँचते थे, वो गोरे गदराए बदन, सुडोल बाहों और वक्ष की मालकिन थी. सेक्स में मेरी रूचि तब हुई जब मैं 11 साल का था. स्कूल में दोस्त लोग सेक्स की बातें करते और मस्तराम जैसी किताबें पढ़ते.

कुछ दोस्त अपने माँ-बाप के सेक्स की बातें करते, मैं भी अपने माँ-बाप के सेक्स देखने की कोशिश करता, पर मेरे माँ-बाप के बीच सेक्स बहुत ही कम होता था. कभी कभी महीने में एक दो बार वो लोग सेक्स करते, उसमें भी उनका सेक्स कभी 5-7 मिनिट से ज़्यादा नही चलता था. मेरा एक दोस्त था विनय, वो अक्सर अपने बाप धरम और उसकी सेक्रेटरी नजीबा के सेक्स के किस्से सुनाता. मेरी भी बहुत इच्छा होती अपनी माँ को सेक्स करते देखने की. पर मेरे बाप को सेक्स में कोई रूचि नहीं थी, बात तब की हैं जब में 12 साल का था, माँ की उम्र तब 39 साल थी. पार्टी के चक्कर में मेरे बाप का एक लोकल नेता से झगड़ा हो गया. वो नेता वेस्ट बंगाल कमिटी का मेंबर था, और उसकी पहुँच बहुत उपर तक थी. बदला लेने के लिए उसने माँ का ट्रान्स्फर मुर्शीदाबाद के डोंकल इलाक़े में करा दिया. अब माँ के पास और कोई चारा नहीं था, वैसे भी घर उसी की सेलरी से चलता था, इसलिए वो नौकरी भी नहीं छोड़ सकती थी. बाप ने कोशिश की ट्रान्स्फर रुकवाने की, पर कुछ ना हुआ. फिर उन्होने फ़ैसला किया मैं और मेरी माँ डोंकल चले जाएँगे, क्यूंकी यही एक रास्ता बचा था. डोंकल बांग्लादेश की सीमा से बस 5 किमी दूर था, ये पूरा मोमडन इलाक़ा था, यहाँ की 95% जनसंख्या हिंदू थी, 5% हिंदू थे, जो की सब दलित थे यहाँ माहौल बहुत कन्सर्वेटिव था. कोलकाता में तो माँ स्लीव्ले ब्लाउस वाली ट्रॅन्स्परेंट साड़ियाँ पहनती थी.

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यहाँ वो साड़ियाँ नही पहन सकती थी, ऐसे माहौल में साड़ी पहनती तो पूरा बाज़ार पागल हो जाता. इसलिए माँ अब सलवार कमीज़ पहनने लगी, पर उसके टाइट सलवार कमीज़ में भी उसके गदराए बदन को देख के लोग उसको घूरते थे. यहाँ घर ढूँढने में भी दिक्कत थी, माँ के बॅंक मॅनेजर ने बॅंक के पास ही अज़ीम गंज इलाक़े में एक घर ढूँढ दिया. घर का मालिक एक पहलवान था, उसकी डोंकल में बहुत बड़ी मिठाई की दुकान थी, सभी होटेलों में उसी की दुकान से मिठाई जाता था. उसकी दुकान भी घर के पास ही थी. उसका नाम राज था, वो एकदम जैसा दिखता था, उसका कद 6 फुट, बदन हटटा-कॅटा, चौड़ी छाती, थोड़ा काला रंग था. उसने मूछें नहीं रखी थीं, पर वो लंबी दाढ़ी का मालिक था. वो हमेशा पठानी कुर्ता पाजामा या कुर्ता लुंगी पहनता था. कभी कभी सर पे टोपी भी पहन लेता था. मिठाई की दुकान चलाने के साथ साथ वो पहलवानी भी करता था, और अखाड़े में कुश्ती करता था, इसलिए वो सांड जैसा दिखता था. उसका घर काफ़ी बड़ा था, नीचे वो खुद रहता था, उपर का फ्लोर हमें किराए पर दे दिया. उसने शादी नहीं की थी, उसकी उम्र लगभग 42 साल की थी. वो लोकल मुनिसिपल काउन्सिल का काउन्सिलर भी था,

इसलिए थोड़ी गुंडागर्दी भी करता था, मैने कई बार उसे फोन पे गाली गलोच करते सुना था, पर माँ और मेरे साथ बहुत प्यार से बात करता था. मुझे खिलोने या चॉक्लेट देता, माँ को हसाने की कोशिश करता. इसका एक कारण था, मैने देखा वो माँ को बहुत अजीब नज़र से घूरता था, माँ के बदन और उसकी मटकती गाँड को निहारता. वो उसको उसी नज़र से देखता जिस नज़र से एक ठरकी आदमी एक खूबसूरत औरत को देखता है. शायद माँ को भी ये बात पता थी, इसलिए वो उससे ज़्यादा बात नहीं करती थी, हालाँकि वो कभी कभी अपनी बातों से माँ को हंसा देता था. उसे शायरी भी आती थी, इसलिए वो उसको गालिब के शेर सुनाता. धीरे-धीरे मैने देखा माँ की झिझक कम होने लगी थी, वो भी अब उसे खुल के बात करती. बातों बातों में कभी कभी राज माँ के बदन को छू देता. अब तो वो कभी कभी हमारे साथ ही रात का खाना ख़ाता.

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एक महीने के बाद सब नॉर्मल सा लगने लगा था. जो डर था की हम एक इलाक़े में जा रहे हैं वो कम हो गया था. माँ अब राज के साथ घुल मिल गयी थी, मुझे भी वो अच्छा लगने लगा था. तकरीबन एक महीने बाद की बात है, रविवार का दिन था. मैं उपर अपने कमरे में बैठ के होमवर्क कर रहा था. मैने देखा माँ मेरे कमरे के बाहर खड़ी छुप के नीचे आँगन की तरफ देख रही थी. काफ़ी देर तक नीचे देखने के बाद वो अंदर आ गयी. मैं बाहर गया और आँगन की तरफ़ देखा, वहाँ डंब-बेल और कुछ फिज़िकल एक्सर्साइज़ का सामान पड़ा था. मैं समझ नहीं पाया माँ क्या देख रही थी. जैसे ही मैं अंदर आने लगा, नीचे राज आँगन में आया. वो केवल एक छोटे से लंगोट में था, उसका पूरा बदन पसीने से भीगा हुआ था. क्या बदन था उसका, एकदम डब्ल्यूडब्ल्यू एफ के पहलवानों जैसा, पर उसके बाल बहुत थे. पूरा बदन और पीठ बालों से भरी हुई थी. मुझे समझने में देर ना लगी, माँ राज को कसरत करते हुए देख रही थी. ऐसे मर्दाना बदन को देख के कोई भी औरत गर्म हो जाए. मैने सोचा माँ राज के पसीने से भरे मर्दाना जिस्म को देख रही थी. एक महीने से वो अपने पति से दूर थी. वैसे भी उसका पति सेक्स में कम ही रूचि रखता था,

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