मेरी दीदी लैला

नमस्ते दोस्तो, मैं रजत हूँ, मेरी उमर 18 साल है, पँजाब का रहने वाला हूँ। मेरे परिवार में हम कुल पाँच लोग हैं- पापा, मम्मी मेरी बड़ी बहन लैला, मैं और मेरी छोटी बहन रिमझिम !

लैला दीदी मुझसे सात साल बड़ी हैं और रिमझिम मुझसे 2 साल छोटी है। मम्मी, पापा दोनो केंद्र सरकार के महकमों में नौकरी करते हैं और अपनी नौकरी के सिलसिले में अकसर उनको दिल्ली या दूसरे शहरों में आना जाना पड़ता है। कभी-कभी तो दोनो एक ही समय शहर से बाहर होते हैं।

दोस्तो, यहाँ मैं कुछ बातें स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। पहली भले ही यह गाथा मेरी बहनों के बारे में है परन्तु यह पारिवारिक यौन गाथा नहीं है। दूसरे यह कोई कहानी नहीं है बल्कि आपको मैं वो बताने जा रहा हूँ जो मैंने बहुत बार अपनी आँखों देखा है।

बात तब की है जब लैला दीदी 18 साल की नवयौवना हो चुकी थी। बला की खूबसूरत तो लैला दीदी थी ही, ऊपर से कुदरत ने दीदी को यौवन के कटाव और उठान भी भरपूर दिये थे, मतलब दीदी की छाती और कूल्हे अपनी हमजोलियों के मुकाबले ज्यादा ही बड़े थे। लैला दीदी उन दिनों दो ही जगह मिलती थी, या तो शीशे के सामने या घर के मेन गेट पर।

बहुत से आवारा किस्म के लड़के हमारे घर के चक्कर लगाने लगे थे, उनमें से कुछ लड़के दीदी को कमेंट भी देते थे जोकि दीदी को अच्छा लगता था।

धीरे-धीरे मम्मी को यह बात पता चल गई और वो दीदी को बात बात पर डाँटने लगी। मम्मी ने दीदी के घर से बाहर अकेले जाने पर भी पाबंदी लगा दी।

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दीदी जब भी घर से बाहर जाती तो मम्मी मुझे दीदी के साथ भेजने लगी। थोड़े दिन तो सब ठीक चलता रहा। धीरे-धीरे दीदी को हर जगह मुझे साथ ले जाना चुभने लगा। खासकर जहाँ लड़के दीदी का पीछा करते वहाँ दीदी मुझे डाँटने लगती।

ऐसे ही एक दिन दीदी मम्मी से अपनी एक सहेली के घर जाने का बोल कर मुझे साथ लेकर घर से निकली। घर से थोड़ा आगे जाकर दीदी ने मुझसे कहा- अगर तू मेरी बातें मम्मी को नहीं बताएगा तो तुझे रोज एक बढ़िया वाला चॉकलेट लेकर दिया करुँगी और आज से ही महीने में दो बार बड़ा गिफ़्ट जो भी तू माँगेगा लेकर दिया करुँगी।

मैं खुश होते हुये बोला- ठीक है दीदी ! आज से जैसा तुम कहोगी, वैसा ही करुँगा, पर यह चॉकलेट और गिफ़्ट वाली बात भूलना मत।

फ़िर दीदी ने मुझसे कहा- हम डौली (दीदी की सहेली) के घर मालगोदाम (पुराने बंद पड़े फ़सल रखने के सरकारी गोदाम का क्षेत्र जो अब रास्ते के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है) वाले रास्ते से जायेंगे पर वहाँ पे कुछ आवारा लड़के बैठे होते हैं तो तू एक काम कर, तू यहीं पर पंद्रह मिनट रुकने के बाद आना ताकि अगर वो लड़के मेरे को तंग कर रहे हों तो मैं उनसे लड़ झगड़ के उनको भगा दूँ नहीं तो वो तुझे भी तंग करेंगे।

मैंने कहा- ठीक है दीदी !

और दीदी मुझे वहाँ छोड़ कर मालगोदाम में चली गई।

उन दिनों मेरे पास घड़ी तो थी नहीं जो मैं 15 मिनट इन्तज़ार करता रहता। शायद मैंने 4-5 मिनट इन्तज़ार की और मैं भी मालगोदाम में चला गया। थोड़ा आगे जा के मैंने देखा कि चार लड़कों ने लैला दीदी को पकड़ा हुआ था और दीदी को लेकर वो सभी एक गोदाम में जा रहे थे। पहले तो मैं दीदी को उनसे छुड़ाने के लिये जाने लगा था, फ़िर मुझे दीदी की बात याद आई कि जब तक मैं उनको भगा ना दूँ, तुम मत आना, नहीं तो वो तुमको मारेंगे।

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तो मैंने सोचा कि मैं छिप कर देखता हूँ, जब दीदी उनको भगा देगी तो मैं दीदी के पास चला जाऊँगा, और मैं छिप कर उनको देखने लगा।

मैंने देखा सभी लड़कों के लण्ड उनकी पैंट से बाहर थे, वो लड़के लैला दीदी की छाती को और उनके चूतड़ों को दबा रहे थे और दीदी उनके लंड दबा रही थी। थोड़ी देर बाद वो लड़के वहाँ से चले गये। उनके जाने के बाद मैं भाग कर दीदी के पास गया।

दीदी बोली- भाग गये साले।

मैंने पूछा- दीदी, उन्होंने तुम्हारे दुद्दू और चूतड़ क्यों पकड़े हुये थे?

तो दीदी बोली- पकड़े थोड़े थे, वो तो मिलकर मुझे मार रहे थे।

तो मैंने पूछा- और तुमने उनकी नुन्नियाँ क्युँ पकड़ रखी थी?

तो दीदी बोली- पकड़ नहीं रखी थी बुद्धू ! मैं भी उनकी नुन्नी पे मार रही थी क्यूंकि लड़कों की नुन्नी पे मारो तो बहुत दर्द होता है।

फ़िर दीदी ने कहा- तुम मम्मी को यह लड़ाई वाली बात मत बताना, तुमने कसम खाई है कि चॉकलेट और गिफ़्ट के बदले मेरी बातें तुम मम्मी को नहीं बताओगे।

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