केले का भोज Part – 2

मैंने योनि के छेद पर उंगली फिराई। थोड़ा-सा गूदा घिसकर उसमें जमा हो गया था। ‘तुम्हें भी केले का स्वाद लग गया है !’ मैंने उससे हँसी की।

मैंने उस जमे गूदे को उंगली से योनि के अंदर ठेल दिया। थोड़ी सी जो उंगली पर लगी थी उसको उठाकर मुँह में चख भी लिया। एक क्षण को हिचक हुई, लेकिन सोचा नहा-धोकर साफ तो हूँ। वही परिचित मीठा, थोड़ा कसैला स्वाद, लेकिन उसके साथ मिली एक और गंध- योनि के अंदर की मुसाई गंध।

मैंने केले को उठाकर देखा, छिलके के अंदर मुँह घिस गया था। मैंने छिलका अलग कर फिर से गूदे में नाखून से खोद दिया। देखकर मन में…

मैंने योनि के छेद पर उंगली फिराई। थोड़ा-सा गूदा घिसकर उसमें जमा हो गया था। ‘तुम्हें भी केले का स्वाद लग गया है !’ मैंने उससे हँसी की।

मैंने उस जमे गूदे को उंगली से योनि के अन्दर ठेल दिया। थोड़ी सी जो उंगली पर लगी थी उसको उठाकर मुँह में चख भी लिया। एक क्षण को हिचक हुई, लेकिन सोचा नहा-धोकर साफ तो हूँ। वही परिचित मीठा, थोड़ा कसैला स्वाद, लेकिन उसके साथ मिली एक और गंध- योनि के अन्दर की मुसाई गंध।

मैंने केले को उठाकर देखा, छिलके के अन्दर मुँह घिस गया था। मैंने छिलका अलग कर फिर से गूदे में नाखून से खोद दिया। देखकर मन में एक मौज-सी आई और मैंने योनि में उंगली घुसाकर कई बार कसकर रगड़ दिया।

उस घर्षण ने मुझे थरथरा दिया और बदन में बिजली की लहरें दौड़ गईं। हूबहू मोटे लिंग-से दिखते उस केले के मुँह को मैंने पुचकार कर चूम लिया।

और उसी क्षण लगा, मन से सारी चिंता निकल गई है, कोई डर या संकोच नहीं।

मैंने बेफिक्र होकर केले को योनि के मुँह पर लगा दिया और उसे रगड़ने लगी। दूसरे हाथ की तर्जनी अपने आप भगांकुर पर घूमने लगी। आनन्द की लहरों में नौका बहने लगी, साँसें तेज होने लगीं। मैंने खुद अपने यौवन कपोतों को तेज तेज उठते बैठते देख मैंने उन्हें एक बार मसल दिया।

मेरा छिद्र एक बड़े घूमते भँवर की तरह केले को अदंर लेने की कोशिश कर रहा था। मैंने केले को थपथपाया, ‘अब और इंतजार की जरूरत नहीं। जाओ ऐश करो।’

मैंने उसे अन्दर दबा दिया। उसका मुँह द्वार को फैलाकर अन्दर उतरने लगा। डर लगा, लेकिन दबाव बनाए रही। उतरते हुए केले के साथ हल्का सा दर्द होने लगा था लेकिन यह दर्द उस मजे में मिलकर उसे और स्वादिष्ट बना रहा था। दर्द ज्यादा लगता तो केले को थोड़ा ऊपर लाती और फिर उसे वापस अन्दर ठेल देती।

धीरे धीरे मुझमें विश्वास आने लगा- कर लूँगी।

जब केला कुछ आश्वस्त होने लायक अन्दर घुस गया तब मैं रुकी, केले का छिलका योनि के ऊपर पत्ते की तरह फैला हुआ था। मेरी देह पसीने-पसीने हो रही थी।

अब और अन्दर नहीं लूँगी, मैंने सोचा। लेकिन पहली बार का रोमांच और योनि का प्रथम फैलाव उतने कम प्रवेश से मानना नहीं चाह रहे थे।

थोड़ा-सा और अन्दर जा सकता है !

अगर ज्यादा अन्दर चला गया तो?

मैं उतने ही पर संतोष करके केले को पिस्टन की तरह चलाने लगी।

आधे अधूरे कौर से मुँह नही भरता, उल्टे चिढ़ होती है। मैंने सोचा, थोड़ा सा और… !

सुरक्षित रखते हुए मैंने गहराई बढ़ाई और फिर उतने ही तक से अन्दर बाहर करने लगी। ऊपर बायाँ हाथ लगातार भग-मर्दन कर रहा था। शरीर में दौड़ते करंट की तीव्रता और बढ़ गई। पहले कभी इस तरह से किया नहीं था। केवल उंगली अन्दर डाली थी, उसमें वो संतोष नहीं हुआ था।

अब समझ में आ रहा था औरत के शरीर की खूबी क्या होती है, नेहा क्यों इसके पीछे पागल रहती है। जब केले से इतना अच्छा लग रहा था तो वास्तविक सम्भोग कितना अच्छा लगता होगा !?!

मेरे चेहरे पर खुशी थी। पहली बार यह चिकना-चिकना घर्षण एक नया ही एहसास था, उंगली की रगड़ से अलग, बेकार ही मैं इससे डर रही थी।

मुझे केले के भाग्य से ईर्ष्या होने लगी थी, केला निश्चिंत अन्दर-बाहर हो रहा था। अब उसे योनि से बिछड़ने का डर नहीं था। मैं उसके आवागमन का मजा ले रही थी। केले के बाहर निकलते समय योनि भिंचकर अन्दर खींचने की कोशिश करती। मैं योनि को ढीला कर उसे पुन: अन्दर ठेलती। इन दो विरोधी कोशिशों के बीच केला आराम से आनन्द के झोंके लगा रहा था। मैं धीरे-धीरे सावधानी से उसे थोड़ा थोड़ा और अन्दर उतार रही थी। आनन्द की लहरें ऊँची होती जा रही थीं, भगांकुर पर उंगलियों की हरकत बढ़ रही थी, सनसनाहट बढ़ रही थी और अब किसी अंजाम तक पहुँचने की इच्छा सर उठाने लगी थी।

बहुत अच्छा लग रहा था। जी करता था केले को चूम लूँ। एक बार उसे निकालकर चूम भी लिया और पुन: छेद पर लगा दिया। अन्दर जाते ही शांति मिली। योनि जोर जोर से भिंच रही थी। मैंने अपने कमर की उचक भी महसूस की।

धीरे धीरे करके मैंने आधे से भी अधिक अन्दर उतार दिया। डर लग रहा था, कहीं टूट न जाए। हालाँकि केले में पर्याप्त सख्ती थी। मैं उसे ठीक से पकड़े थी। योनि भिंच-भिंचकर उसे और अन्दर खींचना चाह रही थी। केला भी जैसे पूरा अन्दर जाने के लिए जोर लगा रहा था। मैं भरसक नियंत्रण रखते ही अन्दर बाहर करने की गति बढ़ा रही थी। योनि की कसी चिकनी दीवारों पर आगे पीछे सरकता केला बड़ा ही सुखद अनुभव दे रहा था।

कितना अच्छा लग रहा था !! एक अलग दुनिया में खो रही थी मैं ! एक लय में मेरा हाथ और सांसें और धड़कनें चल रही थीं, तीनों धीरे धीरे तेज हो रहे थे। मैं धरती से मानो ऊपर उठ रही थी। वातावरण में मेरी आह आह की फुसफुसाहटों का संगीत गूंज रहा था। कोई मीठी सी धुन दिमाग में बज रही थी…..

“आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन, मेरा मन

शरारत करने को ललचाए रे मेरा मन, मेरा मन ….

धीरे धीरे दाहिने हाथ ने स्वत: ही अन्दर-बाहर करने की गति सम्हाल ली। मैं नियंत्रण छोड़कर उसके उसके बहाव में बहने लगी। मैंने बाएँ हाथ से अपने स्तनों को मसलना शुरू कर दिया। उसकी नोकों पर नाइटी के ऊपर से ही उंगलियाँ गड़ाने, उन्हें चुटकी में पकड़कर दबाने की कोशिश करने लगी। योनि में कम्पन सा महसूस होने लगा। गति निरंतर बढ़ रही थी – अन्दर-बाहर, अन्दर-बाहर… सनसनी की ऊँची होती तरंगें …. ‘चट’ ‘चट’ की उत्तेजक आवाज… सुखद घर्षण.. भगनासा पर चोट से उत्पन्न बिजली की लहरें… चरम बिन्दु का क्षितिज कहीं पास दिख रहा था। मैंने उस तक पहुँचने के लिए और जोर लगा दिया …..

कोई लहर आ रही है… कोई मुझे बाँहों में कस ले, मुझे चूर दे…………… ओह……

कि तभी ‘खट : खट : खट’…..

मेरी साँस रुक गई। योनि एकदम से भिंची, झटके से हाथ खींच लिया….

खट खट खट…..

हाथ में केवल डंठल और छिलका था।

मैंने योनि के छेद पर उंगली फिराई। थोड़ा-सा गूदा घिसकर उसमें जमा हो गया था। ‘तुम्हें भी केले का स्वाद लग गया है !’ मैंने उससे हँसी की।

मैंने उस जमे गूदे को उंगली से योनि के अन्दर ठेल दिया। थोड़ी सी जो उंगली पर लगी थी उसको उठाकर मुँह में चख भी लिया। एक क्षण को हिचक हुई, लेकिन सोचा नहा-धोकर साफ तो हूँ। वही परिचित मीठा, थोड़ा कसैला स्वाद, लेकिन उसके साथ मिली एक और गंध- योनि के अन्दर की मुसाई गंध।

मैंने केले को उठाकर देखा, छिलके के अन्दर मुँह घिस गया था। मैंने छिलका अलग कर फिर से गूदे में नाखून से खोद दिया। देखकर मन में एक मौज-सी आई और मैंने योनि में उंगली घुसाकर कई बार कसकर रगड़ दिया।

उस घर्षण ने मुझे थरथरा दिया और बदन में बिजली की लहरें दौड़ गईं। हूबहू मोटे लिंग-से दिखते उस केले के मुँह को मैंने पुचकार कर चूम लिया।

और उसी क्षण लगा, मन से सारी चिंता निकल गई है, कोई डर या संकोच नहीं।

मैंने बेफिक्र होकर केले को योनि के मुँह पर लगा दिया और उसे रगड़ने लगी। दूसरे हाथ की तर्जनी अपने आप भगांकुर पर घूमने लगी। आनन्द की लहरों में नौका बहने लगी, साँसें तेज होने लगीं। मैंने खुद अपने यौवन कपोतों को तेज तेज उठते बैठते देख मैंने उन्हें एक बार मसल दिया।

मेरा छिद्र एक बड़े घूमते भँवर की तरह केले को अदंर लेने की कोशिश कर रहा था। मैंने केले को थपथपाया, ‘अब और इंतजार की जरूरत नहीं। जाओ ऐश करो।’

मैंने उसे अन्दर दबा दिया। उसका मुँह द्वार को फैलाकर अन्दर उतरने लगा। डर लगा, लेकिन दबाव बनाए रही। उतरते हुए केले के साथ हल्का सा दर्द होने लगा था लेकिन यह दर्द उस मजे में मिलकर उसे और स्वादिष्ट बना रहा था। दर्द ज्यादा लगता तो केले को थोड़ा ऊपर लाती और फिर उसे वापस अन्दर ठेल देती।

धीरे धीरे मुझमें विश्वास आने लगा- कर लूँगी।

जब केला कुछ आश्वस्त होने लायक अन्दर घुस गया तब मैं रुकी, केले का छिलका योनि के ऊपर पत्ते की तरह फैला हुआ था। मेरी देह पसीने-पसीने हो रही थी।

अब और अन्दर नहीं लूँगी, मैंने सोचा। लेकिन पहली बार का रोमांच और योनि का प्रथम फैलाव उतने कम प्रवेश से मानना नहीं चाह रहे थे।

थोड़ा-सा और अन्दर जा सकता है !

अगर ज्यादा अन्दर चला गया तो?

मैं उतने ही पर संतोष करके केले को पिस्टन की तरह चलाने लगी।

आधे अधूरे कौर से मुँह नही भरता, उल्टे चिढ़ होती है। मैंने सोचा, थोड़ा सा और… !

सुरक्षित रखते हुए मैंने गहराई बढ़ाई और फिर उतने ही तक से अन्दर बाहर करने लगी। ऊपर बायाँ हाथ लगातार भग-मर्दन कर रहा था। शरीर में दौड़ते करंट की तीव्रता और बढ़ गई। पहले कभी इस तरह से किया नहीं था। केवल उंगली अन्दर डाली थी, उसमें वो संतोष नहीं हुआ था।

अब समझ में आ रहा था औरत के शरीर की खूबी क्या होती है, नेहा क्यों इसके पीछे पागल रहती है। जब केले से इतना अच्छा लग रहा था तो वास्तविक सम्भोग कितना अच्छा लगता होगा !?!

मेरे चेहरे पर खुशी थी। पहली बार यह चिकना-चिकना घर्षण एक नया ही एहसास था, उंगली की रगड़ से अलग, बेकार ही मैं इससे डर रही थी।

मुझे केले के भाग्य से ईर्ष्या होने लगी थी, केला निश्चिंत अन्दर-बाहर हो रहा था। अब उसे योनि से बिछड़ने का डर नहीं था। मैं उसके आवागमन का मजा ले रही थी। केले के बाहर निकलते समय योनि भिंचकर अन्दर खींचने की कोशिश करती। मैं योनि को ढीला कर उसे पुन: अन्दर ठेलती। इन दो विरोधी कोशिशों के बीच केला आराम से आनन्द के झोंके लगा रहा था। मैं धीरे-धीरे सावधानी से उसे थोड़ा थोड़ा और अन्दर उतार रही थी। आनन्द की लहरें ऊँची होती जा रही थीं, भगांकुर पर उंगलियों की हरकत बढ़ रही थी, सनसनाहट बढ़ रही थी और अब किसी अंजाम तक पहुँचने की इच्छा सर उठाने लगी थी।

बहुत अच्छा लग रहा था। जी करता था केले को चूम लूँ। एक बार उसे निकालकर चूम भी लिया और पुन: छेद पर लगा दिया। अन्दर जाते ही शांति मिली। योनि जोर जोर से भिंच रही थी। मैंने अपने कमर की उचक भी महसूस की।

धीरे धीरे करके मैंने आधे से भी अधिक अन्दर उतार दिया। डर लग रहा था, कहीं टूट न जाए। हालाँकि केले में पर्याप्त सख्ती थी। मैं उसे ठीक से पकड़े थी। योनि भिंच-भिंचकर उसे और अन्दर खींचना चाह रही थी। केला भी जैसे पूरा अन्दर जाने के लिए जोर लगा रहा था। मैं भरसक नियंत्रण रखते ही अन्दर बाहर करने की गति बढ़ा रही थी। योनि की कसी चिकनी दीवारों पर आगे पीछे सरकता केला बड़ा ही सुखद अनुभव दे रहा था।

कितना अच्छा लग रहा था !! एक अलग दुनिया में खो रही थी मैं ! एक लय में मेरा हाथ और सांसें और धड़कनें चल रही थीं, तीनों धीरे धीरे तेज हो रहे थे। मैं धरती से मानो ऊपर उठ रही थी। वातावरण में मेरी आह आह की फुसफुसाहटों का संगीत गूंज रहा था। कोई मीठी सी धुन दिमाग में बज रही थी…..

“आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन, मेरा मन

शरारत करने को ललचाए रे मेरा मन, मेरा मन ….

धीरे धीरे दाहिने हाथ ने स्वत: ही अन्दर-बाहर करने की गति सम्हाल ली। मैं नियंत्रण छोड़कर उसके उसके बहाव में बहने लगी। मैंने बाएँ हाथ से अपने स्तनों को मसलना शुरू कर दिया। उसकी नोकों पर नाइटी के ऊपर से ही उंगलियाँ गड़ाने, उन्हें चुटकी में पकड़कर दबाने की कोशिश करने लगी। योनि में कम्पन सा महसूस होने लगा। गति निरंतर बढ़ रही थी – अन्दर-बाहर, अन्दर-बाहर… सनसनी की ऊँची होती तरंगें …. ‘चट’ ‘चट’ की उत्तेजक आवाज… सुखद घर्षण.. भगनासा पर चोट से उत्पन्न बिजली की लहरें… चरम बिन्दु का क्षितिज कहीं पास दिख रहा था। मैंने उस तक पहुँचने के लिए और जोर लगा दिया …..

कोई लहर आ रही है… कोई मुझे बाँहों में कस ले, मुझे चूर दे…………… ओह……

कि तभी ‘खट : खट : खट’…..

मेरी साँस रुक गई। योनि एकदम से भिंची, झटके से हाथ खींच लिया….

खट खट खट…..

हाथ में केवल डंठल और छिलका था।

क्षितिज कहीं पास दिख रहा था। मैंने उस तक पहुँचने के लिए और जोर लगा दिया…..

कोई लहर आ रही है… कोई मुझे बाँहों में कस ले, मुझे चूर दे……. ओह……

कि तभी ‘खट : खट : खट’…..

मेरी साँस रुक गई। योनि एकदम से भिंची, झटके से हाथ खींच लिया….

खट खट खट…..

हाथ में केवल डंठल और छिलका था। मैं बदहवास हो गई। अब क्या करूँ?

“निशा, दरवाजा खोलो !”…. खट खट खट…

मैंने तुरंत नाइटी खींची और उठ खड़ी हुई। केला अन्दर महसूस हो रहा था। चलकर दरवाजे के पास पहुँची और चिटकनी खोल दी।

नेहा मेरे उड़े चेहरे को देखकर चौंक पड़ी- क्या बात है?

मैं ठक ! मुँह में बोल नहीं थे।

“क्या हुआ, बोलो ना?”

क्या बोलती? केला अन्दर गड़ रहा था। मैंने सिर झुका लिया। आँखें डबडबा आईं।

नेहा घबराई, कुछ गड़बड़ है, कमरे में खोजने लगी। केले का छिलका बिस्तर पर पड़ा था। नाश्ते की दोनों प्लेटें एक साथ स्टडी टेबल पर रखी थीं।

“क्या बात है? कुछ बोलती क्यों नहीं?”

मेरा घबराया चेहरा देखकर संयमित हुई,”आओ, पहले बैठो, घबराओ नहीं।”

मेरा कंधा पकड़कर लाई और बिस्तर पर बिठा दिया। मैं किंचित जांघें फैलाए चल रही थी और फैलाए ही बैठी।

“अब बोलो, क्या बात है?”

मैंने भगवान से अत्यंत आर्त प्रार्थना की- प्रभो ….. बचा लो।

अचानक उसके दिमाग में कुछ कौंधा। उसने मेरी चाल और बैठने के तरीके में कुछ फर्क महसूस किया था। केले का छिलका उठाकर बोली, “क्या मामला है?”

मैं एकदम शर्म से गड़ गई, सिर एकदम झुका लिया, आँसू की बूंदें नाइटी पर टपक पड़ी।

“अन्दर रह गया है?”

मैंने हथेलियों में चेहरा छिपा लिया। बदन को संभालने की ताकत नहीं रही। बिस्तर पर गिर पड़ी।

नेहा ठठाकर हँस पड़ी।

“मिस निशा, आपसे तो ऐसी उम्मीद नहीं थी। आप तो बड़ी सुशील, मर्यादित और सो कॉल्ड क्या क्या हैं?” उसकी हँसी बढ़ने लगी।

मुझे गुस्सा आ गया- बेदर्द लड़की ! मैं इतनी बड़ी मुश्किल में हूँ और तुम हँस रही हो?

“हँसूं न तो क्या करूँ? मुझसे तो बड़ी बड़ी बातें कहती हो, खुद ऐसा कैसे कर लिया?”

मैंने शर्म और गुस्से से मुँह फेर लिया।

अब क्या करूँ? बेहद डर लग रहा था। देखना चाहती थी कितना अन्दर फँसा हुआ है, निकल सकता है कि नहीं। कहीं डॉक्टर बुलाना पड़ गया तो? सोचकर ही रोंगटे खड़े हो गए। कैसी किरकिरी होगी !

मैंने आँख पोछी और हिम्मत करके कमरे से बाहर निकली। कोशिश करके सामान्य चाल से चली, गलियारे में कोई देखे तो शक न करे। बाथरूम में आकर दरवाजा बंद किया और नाइटी उठाकर बैठकर नीचे देखा। दिख नहीं रहा था। काश, आइना लेकर आती। हाथ से महसूस किया। केले का सिरा हाथ से टकरा रहा था। बेहद चिकना। नाखून गड़ाकर खींचना चाहा तो गूदा खुदकर बाहर चला आया।

और खोदा।

उसके बाद उंगली से टकराने लगा और नाखून गड़ाने पर भीतर धँसने लगा।

मैंने उछल कर देखा, शायद झटके से गिर जाए। डर भी लग रहा था कि कहीं कोई पकड़ न ले।

कई बार कूदी। बैठे बैठे और खड़े होकर भी। कोई फायदा नहीं। कूदने से कुछ होने की उम्मीद करना आकाश कुसुम था।

फँस गई। कैसे निकलेगा? कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी रही। फिर निकलना पड़ा। चलना और कठिन लग रहा था। यही केला कुछ क्षणों पहले अन्दर कितना सुखद लग रहा था !

कमरे के अन्दर आते ही नेहा ने सवाल किया,”निकला?”

मैंने सिर हिलाया। हमारे बीच चुप्पी छाई रही। परिस्थिति भयावह थी।

“मैं देखूँ?”

हे भगवान, यह अवस्था ! मेरी दुर्दशा की शुरुआत हो चुकी थी। मैं बिस्तर पर बैठ गई।

नेहा ने मुझे पीछे तकिए पर झुकाया और मेरे पाँवों के पास बैठ गई। मेरी नाइटी उठाकर मेरे घुटनों को मोड़ी और उन्हें धीरे धीरे फैला दी। बालों की चमचमाती काली फसल………. पहली बार उस पर बाहर की नजर पड़ रही थी। नेहा ने होंठों को फैलाकर अन्दर देखा।

हे भगवान कोई रास्ता निकल आए !

उसने उंगलियों से होंठों के अन्दर, अगल बगल टटोला, महसूस किया। बाएँ दाएँ, ऊपर नीचे। नाखून से खींचने की असफल कोशिश की, भगांकुर को सहलाया। ये क्यों? मन में सवाल उठा, क्या यह अभी भी तनी अवस्था में है? नेहा ने गुदा में भी उंगली कोंची, दो गाँठ अन्दर भी घुसा दी। घुसाकर दाएं बाएँ घुमाया भी।

मैं कुनमुनाई। यह क्या कर रही है?

पलकों की झिरी से उसे देखा, उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी। कहीं वह मुझसे खेल तो नहीं रही है?

“ओ गॉड, यह तो भीतर घुस गया है।” उसके स्वर में वास्तविक चिंता थी, “क्या करोगी?”

“डॉक्टर को बुलाओगी? वार्डन को बोलना पड़ेगा। हॉस्टल सुपरिंटेंडेंट जानेगी, फिर सारी टीचर्स, … ना ना…. बात सब जगह फैल जाएगी।”

“ना ना ना…. ” मैंने उसी की बात प्रतिध्वनित की।

कुछ देर हम सोचते रहे। समय नहीं है, जल्दी करना पड़ेगा, इन्फेक्शंन का खतरा है।

…………. मैं क्या कहूँ।

“एक बात कहूँ, इफ यू डोंट माइंड?”

“………….” मैं कुछ सोच नहीं पा रही।

“सुरेश को बुलाऊँ? एमबीबीएस कर रहा है। कोई राह निकाल सकता है। सबके जानने से तो बेहतर है एक आदमी जानेगा।”

बाप रे ! एक लड़का। वह भी सीधे मेरी टांगों के बीच ! ना ना….

“निशा, और कोई रास्ता नहीं है। थिंक इट। यही एक संभावना है।”

कैसे हाँ बोलूँ। अब तक किसी ने मेरे शरीर को देखा भी नहीं था। यह तो उससे भी आगे……. मैं चुप रही।

“जल्दी बोलो निशा। यू आर इन डैंजर। अन्दर बॉडी हीट से सड़ने लगेगा। फिर तो निकालने के बाद भी डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा। लोगों को पता चल जाएगा।”

इतना असहाय जिंदगी में मैंने कभी नहीं महसूस किया था,”ओके ….”

“तुम चिंता न करो। ही इज ए वेरी गुड फ्रेड ऑव मी (वह मेरा बहुत ही अच्छा दोस्त है।)” उसने आँख मारी, “हर तरह की मदद करता है।”

गजब है यह लड़की। इस अवस्था में भी मुझसे मजाक कर रही है।

उसने सुरेश को फोन लगाया, “सुरेश, क्या कर रहे हो….. नाश्ता कर लिया?… नहीं?… तुम्हारे लिए यहाँ बहुत अच्छा नाश्ता है। खाना चाहोगे? सोच लो… इटस ए लाइफटाइम चांस… नाश्ते से अधिक उसकी प्लेट मजेदार … नहीं बताऊँगी…. अब मजाक छोड़ती हूँ। तुम तुरंत आ जाओ। माइ रूममेट इज इन अ बिग प्राब्लम। मुझे लगता है तुम कुछ मदद कर सकते हो… नहीं नहीं.. फोन पर नहीं कह सकती। इट्स अर्जेंट… बस तुरंत आ जाओ।”

मुझे गुस्सा आ रहा था। “ये नाश्ता-वाश्ता क्या बक रही थी?”

“गलत बोल रही थी?”

उसे कुछ ध्यान आया, उसने दुबारा फोन लगाया, “सुरेश , प्लीज अपना शेविंग सेट ले लेना। मुझे लगता है उसकी जरूरत पड़ेगी।”

शेविंग सेट! क्या बोल रही है?….. अचानक मेरे दिमाग में एकदम से साफ हो गया … क्या वहाँ के बाल मूंडेगी? हाय राम!!!

कुछ ही देर में दरवाजे पर दस्तक हुई।

“हाय निशा ! ” सुरेश ने भीतर आकर मुझे विश किया और समय में मैं बस एक ठंडी ‘हाय’ कर देती थी, इस वक्त मुस्कुराना पड़ा।

“क्या प्राब्लम है?”

नेहा ने मेरी ओर देखा, मैं कुछ नहीं बोली।

“इसने केला खाया है।”

“तो?”

“वो इसके गले में अटक गया है।”

उसके चेहरे पर उलझन के भाव उभरे,”ऐसा कैसे हो सकता है?”

“मुँह खोलो !”

नेहा हँसी रोकती हुई बोली, “उस मुँह में नहीं….. बुद्धू…. दूसरे में… उसमें।” उसने उंगली से नीचे की ओर इशारा किया।

सुरेश के चेहरे पर हैरानी, फिर हँसी ! फिर गंभीरता…..

हे भगवान, धरती फट जाए, मैं समा जाऊँ।

“यह देखो”, नेहा ने उसे छिलका दिखाया, “टूटकर अन्दर रह गया है।”

“यह तो सीरियस है।” सुरेश सोचता हुआ बोला।

“बहुत कोशिश की, नहीं निकल रहा। तुम कुछ उपाय कर सकते हो?”

सुरेश विचारमग्न था। बोला, “देखना पड़ेगा।”

मैंने स्वाचालित-सा पैरों को आपस में दबा लिया।

“निशा….”

मैं कुछ नहीं सुन पा रही थी, कुछ नहीं समझ पा रही थी। कानों में यंत्रवत आवाज आ रही थी, “निशा… बी ब्रेव…! यह सिर्फ हम तीनों के बीच रहेगा…..!”

मेरी आँखों के आगे अंधेरा छाया हुआ है। मुझे पीछे ठेलकर तकिए पर लिटा रही है। मेरी नाइटी ऊपर खिंच रही है…. मेरे पैर, घुटने, जांघें… पेड़ू…. कमर….प्रकट हो रहे हैं। मेरी आत्मा पर से भी खाल खींचकर कोई मुझे नंगा कर रहा है। पैरों को घुटनों से मोड़ा जा रहा है……. दोनों घुटनों को फैलाया जा रहा है। मेरा बेबस, असहाय, असफल विरोध…. मर्म के अन्दर तक छेद करती पराई नजरें … स्त्री की अंतरंगता के चिथड़े चिथड़े करती….

मैं कुछ नहीं सुन पा रही थी, कुछ नहीं समझ पा रही थी। कानों में यंत्रवत आवाज आ रही थी, “निशा… बी ब्रेव…! यह सिर्फ हम तीनों के बीच रहेगा…..!”

मेरी आँखों के आगे अंधेरा छाया हुआ है। मुझे पीछे ठेलकर तकिए पर लिटा रही है। मेरी नाइटी ऊपर खिंच रही है…. मेरे पैर, घुटने, जांघें… पेड़ू…. कमर….प्रकट हो रहे हैं। मेरी आत्मा पर से भी खाल खींचकर कोई मुझे नंगा कर रहा है। पैरों को घुटनों से मोड़ा जा रहा है……. दोनों घुटनों को फैलाया जा रहा है। मेरा बेबस, असहाय, असफल विरोध…. मर्म के अन्दर तक छेद करती पराई नजरें … स्त्री के बेहद अंतरंगता के चिथड़े चिथड़े करती….

जांघों पर, पेड़ू पर घूमते हाथ …. बीच के बालों को सरकाते हुए… होंठों को अलग करने का खिंचाव…।

“साफ से देख नहीं पा रहा, जरा उठाओ।”

मेरे सिर के नीचे से एक तकिया खींचा है। मेरे नितंबों के नीचे हाथ डालकर उठाकर तकिया लगाया जा रहा है…. मेरे पैरों को उठाकर घुटनों को छाती तक लाकर फैला दिया गया है… सब कुछ उनके सामने खुल गया है। गुदा पर ठंडी हवा का स्पर्श महसूस हो रहा है…

ॐ भूर्भुव: ………………………… धीमहि ….. पता नहीं क्यों गायत्री मंत्र का स्मरण हो रहा है। माता रक्षा करो…

केले की ऊपरी सतह दिख रही है। योनि के छेद को फैलाए हुए। काले बालों के के फ्रेम में लाल गुलाबी फाँक … बीच में गोल सफेदी… उसमें नाखून के गड्ढे…

कुछ देर की जांच-परख के बाद मेरा पैर बिस्तर पर रख दिया जाता है। मैं नाइटी खींचकर ढकना चाहती हूँ, पर….

“एक कोशिश कर सकती है।”

“क्या?”

“मास्टरबेट (हस्तेमैथुन) करके देखे। हो सकता है ऑर्गेज्म(स्खलन) के झटके और रिलीज(रस छूटने) की चिकनाई से बाहर निकल जाए।”

नेहा सोचती है।

“निशा!”

मैं कुछ नहीं बोलती। उन लोगों के सामने हस्तमैथुन करना ! स्खलित भी होना!!! ओ माँ !

“निशा”, इस बार नेहा का स्वर कठोर है,”बोलो…..”

क्या बोलूँ मैं। मेरी जुबान नहीं खुलती।

“खुद करोगी या मुझे करना पड़ेगा?”

वह मेरा हाथ खींचकर वहाँ पर लगा देती है,”करो।”

मेरा हाथ पड़ा रहता है।

“डू इट यार !”

मैं कोई हरकत नहीं करती, मर जाना बेहतर है।

“लेट अस डू इट फॉर हर (चलो हम इसका करते हैं)।”

मैं हल्के से बाँह उठाकर पलकों को झिरी से देखती हूँ। सुरेश सकुचाता हुआ खड़ा है। बस मेरे उस स्थल को देख रहा है।

नेहा की हँसी,”सुंदर है ना?”

शर्म की एक लहर आग-सी जलाती मेरे ऊपर से नीचे निकल जाती है, बेशर्म लड़की…!

“क्या सोच रहे हो?”

सुरेश दुविधा में है, इजाजत के बगैर किसी लड़की का जननांग छूना ! भलामानुस है।

तनाव के क्षण में नेहा का हँसी-मजाक का कीड़ा जाग जाता है,”जिस चीज की झलक भर पाने के लिए ऋषि-मुनि तरसते हैं, वह तुम्हें यूँ ही मिल रही है, क्या किस्मत है तुम्हारी !”

मैं पलकें भींच लेती हूँ। साँस रोके इंतजार कर रही हूँ ! टांगें खोले।

“कम ऑन, लेट्स डू इट…”

बिस्तर पर मेरे दोनों तरफ वजन पड़ता है, एक कोमल और एक कठोर हाथ मेरे उभार पर आ बैठते हैं, बालों पर उंगलियाँ फेरने से गुदगुदी लग रही है, कोमल उंगलियाँ मेरे होंठों को खोलती हैं अन्दर का जायजा लेती हैं, भगनासा का कोमल पिंड तनाव में आ जाता है, छू जाने से ही बगावत करता है, कभी कोमल, कभी कठोर उंगलियाँ उसे पीड़ित करती हैं, उसके सिर को कुचलती, मसलती हैं, गुस्से में वह चिनगारियाँ सी छोड़ता है। मेरी जांघें थरथराती हैं, हिलना-डुलना चाहती हैं, पर दोनों तरफ से एक एक हाथ उन्हें पकड़े है, न तो परिस्थिति, न ही शरीर मेरे वश में है।

“यस … ऐसे ही…” नेहा मेरा हाथ थपथपाती है तब मुझे पता चलता है कि वह मेरे स्तनों पर घूम रहा था। शर्म से भरकर हाथ खींच लेती हूँ।

नेहा हँसती है,”अब यह भी हमीं करें? ओके…”

दो असमान हथेलियाँ मेरे स्तनों पर घूमने लगती हैं। नाइटी के ऊपर से। मेरी छातियाँ परेशान दाएं-बाएँ, ऊपर-नीचे लचककर हमले से बचना चाह रही हैं पर उनकी कुछ नहीं चलती। जल्दी भी उन पर से बचाव का, कुछ नहीं-सा, झीना परदा भी खींच लिया जाता है, घोंसला उजाड़कर निकाल लिए गए दो सहमे कबूतर … डरे हुए ! उनका गला दबाया जाता है, उन्हें दबा दबाकर उनके मांस को मुलायम बनाया जा रहा है- मजे लेकर खाए जाने के लिए शायद।

उनकी चोंचें एक साथ इतनी जोर खींची जाती है कि दर्द करती हैं, कभी दोनों को एक साथ इतनी जोर से मसला जाता है कि कराह निकल जाती है। मैं अपनी ही तेज तेज साँसों की आवाज सुन रही हूँ। नीचे टांगों के केन्द्र में लगातार घर्षण, लगातार प्रहार, कोमल उंगलियों की नाखून की चुभन… कठोर उंगलियों की ताकतवर रगड़ ! कोमल कली कुचलकर लुंज-पुंज हो गई है।

सारे मोर्चों पर एक साथ हमला… सब कुछ एक साथ… ! ओह… ओह… साँस तो लेने दो…

“हाँ… लगता है अब गर्म हो गई है।” एक उंगली मेरी गुदा की टोह ले रही है।

मैं अकबका कर उन्हें अपने पर से हटाना चाहती हूँ, दोनों मेरे हाथ पकड़ लेते हैं, उसके साथ ही मेरे दोनों चूचुकों पर दो होंठ कस जाते हैं, एक साथ उन्हें चूसते हैं !

मेरे कबूतर बेचारे !जैसे बिल्ली मुँह में उनका सिर दबाए कुचल रही हो। दोनों चोंचें उठाकर उनके मुख में घुसे जा रहे हैं।

हरकतें तेज हो जाती हैं।

“यह बहुत अकड़ती थी। आज भगवान ने खुद ही इसे मुझे गिफ्ट कर दिया।” नेहा की आवाज…. मीठी… जहर बुझी….

“तुम इसके साथ?”

“मैं कब से इसका सपना देख रही थी।”

“क्या कहती हो?”

“बहुत सुन्दर है ना यह !” कहती हुई वह मेरे स्तनों को मसलती है, उन्हें चूसती है। मैं अपने हाँफते साँसों की आवाज खुद सुन रही हूँ। कोई बड़ी लहर मरोड़ती सी आ रही है….

“निशा, जोर लगाओ, अन्दर से ठेलो।” सुरेश की आवाज में पहली बार मेरा नाम… नेहा की आवाज के साथ मिली। गुदा के मुँह पर उंगली अन्दर घुसने के लिए जोर लगाती है।

यह उंगली किसकी है?

मैं कसमसा रही हूँ, दोनों ने मेरे हाथ-पैर जकड़ रखे हैं,”जोर से …. ठेलो।”

मैं जोर लगाती हूँ। कोई चीज मेरे अन्दर से रह रहकर गोली की तरह छूट रही है……. रस से चिकनी उंगली सट से गुदा के अन्दर दाखिल हो जाती है। मथानी की तरह दाएँ-बाएँ घूमती है।

आआआआह………. आआआआह………. आआआआह……….

“यस यस, डू इट…….!” नेहा की प्रेरित करती आवाज, सुरेश भी कह रहा है। दोनों की हरकतें तेज हो जाती हैं, गुदा के अन्दर उंगली की भी। भगनासा पर आनन्द उठाती मसलन दर्द की हद तक बढ़ जाती है।

ओ ओ ओ ओ ओ ह…………… खुद को शर्म में भिगोती एक बड़ी लहर, रोशनी के अनार की फुलझड़ी ……….. आह..

एक चौंधभरे अंधेरे में चेतना गुम हो जाती है।

“यह तो नहीं हुआ? वैसे ही अन्दर है !”… मेरी चेतना लौट रही है, “अब क्या करोगी?”

कुछ देर की चुप्पी ! निराशा और भयावहता से मैं रो रही हूँ।

“रोओ मत !” सुरेश मुझे सहला रहा है, इतनी क्रिया के बाद वह भी थोड़ा-थोड़ा मुझ पर अधिकार समझने लगा है, वह मेरे आँसू पोंछता है,”इतनी जल्दी निराश मत होओ।” उसकी सहानुभूति बुरी नहीं लगती।

ओ ओ ओ ओ ओ ह…………… खुद को शर्म में भिगोती एक बड़ी लहर, रोशनी के अनार की फुलझड़ी ……….. आह..

एक चौंधभरे अंधेरे में चेतना गुम हो जाती है।

“यह तो नहीं हुआ? वैसे ही अन्दर है !”… मेरी चेतना लौट रही है, “अब क्या करोगी?”

कुछ देर की चुप्पी ! निराशा और भयावहता से मैं रो रही हूँ।

“रोओ मत !” सुरेश मुझे सहला रहा है, इतनी क्रिया के बाद वह भी थोड़ा-थोड़ा मुझ पर अधिकार समझने लगा है, वह मेरे आँसू पोंछता है,”इतनी जल्दी निराश मत होओ।” उसकी सहानुभूति बुरी नहीं लगती।

कुछ देर सोचकर वह एक आइडिया निकालता है। उसे लगता है उससे सफलता मिल जाएगी।

“तुम मजाक तो नहीं कर रहे, आर यू सीरियस?” नेहा संदेह करती है।

“देखो, वेजीना और एनस के छिद्र अगल-बगल हैं, दोनों के बीच पतली-सी दीवार है। जब मैंने इसकी गुदा में उंगली घुसाई तो वह केले के दवाब से बहुत कसी लग रही थी।”

अब मुझे पता चला कि वह उंगली सुरेश की थी। मैं उसे नेहा की शरारत समझ रही थी।

“तुम बुद्धिमान हो।” नेहा हँसती है, “मैंने तुम्हें बुलाकर गलती नहीं की।”

तो यह बहाने से मेरी ‘वो’ मारना चाह रहा है। गंदा लड़का। मुझे एक ब्लू फिल्म में देखा गुदा मैथुन का दृश्य याद हो आया। वह मुझे बड़ा गंदा लेकिन रोमांचक भी लगा था- गुदा के छेद में तनाव। कहीं सुरेश ने मेरी यह कमजोरी तो नहीं पकड़ ली? ओ गॉड।

“एक और बात है !” सुरेश नेहा की तारीफ से खुश होकर बोल रहा था,”शी इज सेंसिटिव देयर। जब मैंने उसमें उंगली की तो यह जल्दी ही झड़ गई।”

उफ !! मेरे बारे में इस तरह से बात कर रहे हैं जैसे कसाई मुर्गे के बारे में बात कर रहा हो।

“तो तुम्हें लगता है शी विल इंजॉय इट।”

“उसी से पूछ लो।”

नेहा खिलखिला पड़ी,”निशा, बोलो, तुम्हें मजा आएगा?”

वह मेरी हँसी उड़ाने का मौका छोड़ने वाली नहीं थी। पर वही मेरी सबसे बड़ी मददगार भी थी।

चुप्पी के आवरण में मैं अपनी शर्म बचा रही थी। लेकिन केला मुझे विवश किए था। मुझे सहायता की जरूरत थी। मेरा हस्तमैथुन करके उन दोनों की हिम्मत बढ़ गई थी। आश्चर्य था मैंने उसे अपने साथ होने दिया। अब तो मेरी गाण्ड मारने की ही बात हो रही थी।

मुझे तुरंत ग्लानि हुई ! छी: ! मैंने कितने गंदे शब्द सोचे। मैं कितनी जल्दी कितनी बेशर्म हो गई थी !

“निशा, मजाक की बात नहीं। बी सीरियस।” नेहा ने अचानक मूड बदल कर मुझे चेतावनी दी। उसका हाथ मेरे योनि पर आया और एक उंगली गुदा के छेद पर आकर ठहर गई।

“तुम इसके लिए तैयार हो ना?”

मेरी चुप्पी से परेशान होकर उसने कहा,”चुप रहने से काम नहीं चलेगा, यह छोटी बात नहीं है। तुम्हें बताना होगा तैयार हो कि नहीं। अगर तुम्हें आपत्ति्जनक लगता है तो फिर हम छोड़ देते हैं ! बोलो?”

मेरी चुप्पी यथावत् थी।

नेहा ने सुरेश से पूछा- बोलो क्या करें? यह तो बोलती ही नहीं।

“क्या कहेगी बेचारी ! बुरी तरह फँसी हुई है। शी इज टू मच इम्बैरेस्ड !” कुछ रुककर वह फिर बोला,”लेकिन अब जो करना है उसमें पड़े रहने से काम नहीं चलेगा। उठकर सहयोग करना होगा।”

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