होली का नया रंग बहना के संग

अब तक आपने पढ़ा कि कैसे मोहन और प्रमोद ने अपनी वासना की उड़ान भरी और उसमें उनकी पत्नियों और माँ-बाप की क्या भूमिका रही। अब उनकी वासना के लिए आगे कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था लेकिन जैसे नदी अपना रास्ता खुद बना लेती है वैसे ही जिंदगी भी।

देखते हैं उनकी अगली पीढ़ी क्या गुल खिलाती है।
अब आगे…

प्रमोद और मोहन वासना के जिन पंखों पर उड़े थे वो तो ज़िम्मेदारी के बोझ तले कमज़ोर पड़ गए थे। रूपा दस साल की हुई तब मोहन की माँ भी गुज़र गईं और मोहन अपने दो बच्चों के साथ बिलकुल अकेला रह गया। तब तक पंकज के भी स्कूल की पढ़ाई पूरी हो गई थी। कुछ ही महीनों में वो कॉलेज की पढ़ाई के लिए शहर चला गया। उसका मेडिकल कॉलेज में सेलेक्शन तो हो गया था लेकिन हॉस्टल मिलने में कुछ समय लग गया तो कुछ महीने वो प्रमोद के घर ही रहा।

एक तरफ पंकज की सोनाली के साथ बचपन वाली दोस्ती अब रोमांस में बदल रही थी तो दूसरी ओर मोहन के सर पर रूपा की पूरी ज़िम्मेदारी आ गई थी। खाना बनाने से लेकर घर की साफ़-सफाई तक सारा काम मोहन खुद करता था। रूपा थोड़ी बहुत मदद कर दिया करती थी लेकिन मोहन उसे पढ़ाई में ध्यान लगाने के लिए ज्यादा जोर देता था।

इधर रूपा हाई-स्कूल में पहुंची और उधर पंकज ने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी कर ली थी। जब उसकी इंटर्नशिप चल रही थी तो वो अक्सर सोनाली से मिलने उसके शहर चला जाया करता था। अब उसके पास थोड़ा समय भी था और पैसे भी। ऐसे ही मिलते मिलाते दोनों चुदाई भी करने लगे। पंकज किसी अच्छे से होटल में रूम बुक कर लेता और सोनाली कॉलेज बंक करके आ जाती और फिर पूरा दिन मस्त चुदाई का खेल चलता।

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इंटर्नशिप पूरी होते ही पंकज ने अपने पिता मोहन और सोनाली के मम्मी-पापा दोनों को कह दिया कि उसे सोनाली से शादी करनी है।

वो दोनों तो पहले से ही पक्के दोस्त थे उन्हें क्या समस्या होनी थी। सोनाली की माँ थोड़ी नाखुश थी क्योंकि उसके हिसाब से मोहन ठरकी था और उसे लगता था कि कहीं वो सोनाली पर पूरी नज़र ना डाले और क्या पता पंकज भी अपने बाप पर गया हो और सोनाली को अपने दोस्तों से चुदवता फिरे।
लेकिन जब मियाँ, बीवी और बीवी का बाप भी राज़ी तो क्या करेंगी माँजी।
दोनों की शादी धूम-धाम से हुई और फिर सोनाली पंकज के साथ दूसरे शहर में चली गई जहाँ पंकज ने अपना क्लिनिक खोला था।

इधर जब रूपा ने जवानी की दहलीज़ पर कदम रखा तो मोहन का मन भी डोलने लगा था। मोहन का मन इसलिए डोला था कि एक तो मोहन को काफी समय हो गया था स्त्री संसर्ग के बिना और उस पर रूपा बिलकुल अपनी माँ जैसी दिखती थी; लेकिन मोहन नहीं चाहता था कि रूपा की पढ़ाई में कोई रुकावट आये इसलिए उसने रूपा को उसके भाई के साथ रहने के लिए शहर ये बहाना बना कर भेज दिया कि वहां पढ़ाई अच्छी हो जाएगी और साथ में कॉलेज की तैयारी भी कर लेगी।

रूपा ने भी इस बात को गंभीरता से लिया और पढ़ाई में अपना दिल लगाया। स्कूल की पढ़ाई के साथ साथ अच्छे कॉलेज में एडमिशन के लिए एंट्रेंस एग्जाम की भी तैयारी की। उधर एक बेडरूम में पंकज और सोनाली की चुदाई चलती थी और दूसरे बेडरूम में रूपा की पढ़ाई। दिन में भी कभी उसका ध्यान उसके भैया-भाभी की चुहुलबाज़ी पर नहीं जाता था।

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आखिर उसकी मेहनत रंग लाई और शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में उसका सेलेक्शन हो गया। पहले सेमिस्टर के रिजल्ट्स भी अच्छे आये तब जा कर रूपा को थोड़ा सुकून मिला और उसने पढ़ाई के अलावा भी दूसरी बातों की तरफ ध्यान देना शुरू किया। ज़ाहिर है सेक्स उन बातों में से एक था। अब उसका ध्यान अपने भैया कि उन सब हरकतों पर जाने लगा था जो वो हर कभी नज़रें बचा कर सोनाली भाभी के साथ साथ करते थे। कभी किचन में भाभी के उरोजों को मसलते हुए दिख जाते तो कभी बाथरूम से नहा कर आती हुई भाभी के टॉवेल के नीचे हाथ डाल कर उनकी चूत के साथ छेड़खानी करते हुए।

इन सब बातों को सोच सोच कर रूपा रोज़ रात को अपनी चूत सहलाते हुए सो जाती। सब कुछ ऐसे ही चलता रहता अगर होली के एक दिन पहले सोनाली की नज़र, रंग खरीदते समय एक भांग की दूकान पर ना पड़ी होती। उसने सोचा क्यों ना थोड़ी मस्ती की जाए तो वो थोड़ी ताज़ी घुटी हुई भांग खरीद कर ले आई। अगले दिन सुबह वो भांग नाश्ते में मिला दी गई।

रूपा ने नाश्ता किया और चुपके से जा कर अपने सोते हुए भैया के चेहरे पर रंग से कलाकारी करके आ गई। सोनाली अभी किचन में ही थी कि पंकज उठ कर बाथरूम गया तो देखा किसी ने उसे पहले ही कार्टून बना दिया है। उसने भी जोश में आ कर किचन में काम कर रही सोनाली को पीछे से पकड़ कर रंग दिया। उसका चेहरा ही नहीं बल्कि कुर्ती में हाथ डाल कर उसके स्तनों पर भी अपने हाथों के छापे लगा दिए।

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