दोस्त की बेटी पर दिल आ गया

दोस्तो आज अपने एक मित्र की कहानी आपको सुनाने जा रहा हूँ। मित्रो ये हक़ीकत नही है सिर्फ़ एक काल्पनिक कहानी है मेरा एक परम मित्र जो बचपन का मित्र था, उसकी बेटी के साथ मेरा एक तजुरबा मैं आपके सामने रखने जा रहा हूँ।

बात तब की है जब मेरा तबादला जयपुर से गुड़गांवा हो गया। मैंने अपने किसी वाकिफ की मदद से एक पीजी में कमरा ले लिया। घर का खाना और आराम मिल गया। जिनके घर में मैं रहता था, उनके साथ भी अच्छा दोस्तना हो गया। नारायण साहब के एक बेटी थी रिंकी, करीब 19-20 साल की, अच्छी सुंदर, पतली दुबली, मगर ज़रूरत का सामान पूरा था उसके पास।

श्रीमती नारायण भी बहुत अच्छी थी, मेरा खयाल रखती थी, टाइम से खाना, चाय सब देती। मेरी अच्छी मित्र भी बन गई थी। अक्सर घर परिवार की बातें कर लेती थी मेरे साथ।
अब मैं ठहरा अकेला आदमी। अब जिसे बीवी से दूर रहना पड़े उसके लिए तो हर औरत, सिर्फ एक सुराख लगती है जिसमें वो अपना लंड डाल सके। सो मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं थी कि श्रीमती नारायण मुझसे चुदती या उनकी बेटी, मेरे लिए दोनों सिर्फ एक चूत थी, सिर्फ अपनी वासना को शांत करने का साधन।

यूं दुनिया के सामने मैं दोनों माँ बेटी को बहुत सम्मान देता, बहुत प्यार से भाभीजी, बेटा बेटा कह कर पुकारता, मगर अंदर मन ही मन मैं उन दोनों की ढलती और चढ़ती जवानी को भोगने के लिए मर रहा था।
जब काम दिमाग में बहुत ज़्यादा चढ़ जाता तो बहुत बार मैंने उन दोनों के नाम की मुठ भी मारी थी। जब घर वापिस जाता तो बीवी को भी उन दोनों के रूप में ही चोदता।

एक दिन वैसे ही बैठे बैठे दिमाग में एक आइडिया आया।
मैं केमिस्ट की दुकान पे गया और वहाँ से एक जोड़ी सर्जिकल दस्ताने ले आया। घर आकर मैंने एक चौड़े मुँह वाली प्लास्टिक की बोतल ली जिसमें हम फ्रिज में पानी भर के रखते हैं।
मैंने एक दस्ताना पानी भरी बोतल में डाला और उसका कलाई वाला हिस्सा बाहर को मोड़ कर उस पर रबर चढ़ा दी। अब दस्ताना बोतल के अंदर नहीं गिर सकता था।

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मैंने अपना लंड थोड़ा सा हिलाया, थोड़ा सा खड़ा हुआ तो थूक लगा कर लंड को चिकना किया और बोतल में डाला। अब चिकना होने के वजह से लंड बोतल में घुस गया और सर्जिकल दस्ताने की वजह से बहुत ही चिकनी चूत जैसे फीलिंग आई।
मैंने बोतल को चोदना शुरू किया, लंड टाइट हो गया और बोतल में पूरा अंदर तक डाल कर मैंने बोतल को दो तकियों के नीचे दबा दिया और बिल्कुल किसी औरत को चोदने की तरह से चोदा।
‘अरे वाह…’ मैंने कहा- यह तो रेडीमेड चूत बन गई।

उसके बाद मैंने उस बोतल को स्खलित होने तक चोदा। जब वीर्य छूट गया तो बोतल से लंड निकाला, बाथरूम में जा कर लंड, दस्ताना और बोतल तीनों अच्छी तरह से धोकर अगली बार इस्तेमाल के लिए रख दिये।
अब जब भी दिल करता मैं ऐसे ही सेक्स करता, इसमें फायदा यह कि मुठ मारने से ज़्यादा मज़ा, चुदाई की पूरी फीलिंग और किसी तरह का कोई डर भय नहीं।

अब जब मेरा पानी निकलता हो गया तो उन दोनों माँ बेटी के आगे मैं और ज्याआ शराफत से पेश आने लगा।

समय के साथ मैं जैसे उनके घर का मेम्बर ही बन गया। नारायण भाई साहब के साथ अक्सर पेग शेग भी चलता था।
धीरे धीरे वो अपने घर की हर बात मुझे बताने लगे।
मैंने श्रीमती नारायण से भी दोस्ती बढ़ा ली।
अब हालात ये हो गए कि अगर नारायण साहब ज़्यादा टाइम लगाते तो भी मुझे पता होता और अगर नारायण साहब जल्दी आउट हो जाते तो भी मुझे पता होता।
मियां बीवी दोनों एक दूसरे के रिपोर्ट मुझे दे जाते।

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मगर एक खास बात जो थी, वो यह कि इतना सब कुछ के बावजूद श्रीमती नारायण ने कभी मुझे लिफ्ट नहीं दी, मतलब बेशक वो मुझसे अपने बेडरूम की बातें शेयर कर लेती, मगर कभी मुझे इस बात का फायदा उठाने का मौका नहीं दिया और मैं उनको अपने सेक्स पार्टनर के रूप में हासिल नहीं कर पाया।
दोस्त थी, मगर शरीफ औरत थी, मैंने भी कभी उन्हें बेवजह छूने की हिमाकत नहीं की।
हाँ, उनकी बेटी को मैं कई बार बाहों में भर लेता, प्यार से उसकी पीठ सहला देता, मगर वो सब एक बाप जैसा प्यार था, हाँ मन ही मन मैं उसकी पीठ पर हाथ फेरता हुआ उसके ब्रा के स्ट्रैप को छूकर मधुरांचित हो लेता।

ऐसे ही एक दिन दोनों मियां बीवी कहीं गए हुये थे किसी शादी में और रात को देर से आने वाले थे।
रिंकी मुझे खाना दे गई।
खाना खा कर मैं छत पे टहलने चला गया।
एक बार दिल में खयाल आया कि रिंकी घर में अकेली है कुछ हिम्मत करके देखूँ। अगर किसी तरह से बात बन जाए यह मान जाए तो उनके दोनों के आने से पहले पहले मैं रिंकी को चोद लूँ।
मगर यह भी बात थी कि रिंकी अपने बाप की उम्र के आदमी के साथ क्यों सेट होगी, उसे तो अपनी ही उम्र का कोई लड़का पसंद आएगा।

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