ही, मेरा नाम रीता है. मेरी उमर 42 साल है. लोग अक्सर बोलते है की मैं अपनी उमर से काफ़ी कम लगती हू, जैसे अभी 30 ही क्रॉस किए हो. मेरा फिगर 34सी-30-36 है, जिसे मैं ज़्यादातर सारी में ही पहनती हू. और जब मैं सारी पहनती हू, तो मेरा कसावदार जिस्म और उभरे हुए बूब्स देख कर हर कोई आहें भरता है.
मेरी कमर और गांद सारी में और भी लुभावनी लगती है. पर घर पर, रात को, मुझे सिर्फ़ मॅक्सी में रहना पसंद है, बिना ब्रा के. बस, वो आराम ही मेरा सब कुछ है.
मेरे एक बेटा और एक बेटी है. बेटी 19 साल की और बेटा 16 साल का है. मेरी ज़िंदगी एक सीधी-सॅडी किताब जैसी थी, जिसके ज़्यादातर पन्ने मैने खुद ही बंद रखे थे. शादी से पहले, कॉलेज के टाइम पर मैने बहुत लोगों से चुदाई करवाई थी, तब मैं एक-दूं बेफ़िक्र थी. पर फिर मेरी शादी हुई, और मेरी सेक्स लाइफ एक-दूं ख़तम हो गयी. रोज़ एक ही लंड से चूड़ने की आदत पद गयी थी, और वो जोश कहीं खो गया था.
पर फिर एक दिन, मेरी ज़िंदगी में वो आए और मेरी बंद किताब के पन्ने, धीरे-धीरे खुलने लगे. पिछले साल की बात है. मेरी कमर में ऐसा दर्द उठा की मेरी रात की नींद तक उडद गयी. डॉक्टर दिखाए, इलाज करवाया, पर फराक नही पड़ा. दर्द बढ़ता गया, और मेरी बेचैनी भी. तब किसी ने बताया की मेरे किसी रिश्तेदार के दोस्त का भांजा स्पाइन स्पेशलिस्ट है. बस, वहीं जाने का फ़ैसला किया, शायद यहीं मेरी तकलीफ़ का अंत हो.
मैने उनका नाम सिर्फ़ सुना था, डॉक्टर अमित शर्मा. कभी देखा नही था, ना उनके बारे में इतना कुछ जानती थी. मेरे लिए वो बस एक नये डॉक्टर थे, जिससे मैं अपनी कमर का दर्द ठीक करवाना चाहती थी. पहली बार जब उनसे मिलने गयी, मेरे साथ मेरा बेटा, हज़्बेंड और बेटी थे. क्लिनिक में अंदर जाते ही एक अजीब सी हलचल महसूस हुई, जैसे ये सिर्फ़ एक नॉर्मल डॉक्टर विज़िट नही थी.
डॉक्टर अमित लगभग 36-37 साल के होंगे. दिखने में वो सावले रंग के और हल्के मोटे थे. पर उनकी आँखों में कुछ था, एक अजीब सी चमक, जो उसी पल मेरी नज़र में आ गयी. जैसे उनकी आँखें कुछ कहना चाहती हो, कुछ ढूँढ रही हो.
पहले तो उन्होने मेरे हज़्बेंड से ढेरों बातें की, बचपन की यादें ताज़ा की, फॅमिली कनेक्षन्स की. मैं बस सुन रही थी, पर मेरे अंदर एक अजीब सी बेकरारी थी. वो बोल तो मेरे हज़्बेंड से रहे थे, पर उनकी नज़र बार-बार मुझ पर आ कर रुक जाती थी. फिर उन्होने मेरा चेकप किया.
जब उनका हाथ मेरी कमर को छ्छूता, एक हल्की सी सिसकारी मेरे गले तक आई. मेरा शरीर जैसे सिहार गया था, एक अजीब सा एहसास हुआ. उनका अंदाज़ बाकी डॉक्टर्स से अलग था, बहुत मज़किया. लग रहा था जैसे वो मेरी प्राब्लम को लाइट्ली ले रहे थे, पर शायद वो मुझे रिलॅक्स करना चाहते थे. पर उनकी बातों में भी एक शरारत थी, जो मेरे अंदर कुछ जगा रही थी.
लेकिन वो मज़किया बातें भी मेरे दिमाग़ में एक अलग ही तस्वीर बना रही थी. उनकी आँखों में वो चमक, वो कुछ ऐसी थी जो मुझे उनकी तरफ तेज़ी से खींच रही थी. एक अजीब सा जादू था उनकी निगाहों में. उस पल कोई सीधी सेक्षुयल फीलिंग तो नही थी, पर उनसे बात करना मुझे बहुत अछा लगा. जैसे वो मेरे लिए कोई नया दरवाज़ा खोल रहे हो.
मैने सॉफ महसूस किया, उन्होने भी मुझे गौर से देखा, जैसे वो मेरे अंदर कुछ तलाश रहे हो. कोई च्चिपी हुई बात जो शायद मुझे खुद भी नही पता थी. वो एक ऐसी शुरुआत थी जहाँ मुझे बिल्कुल नही पता था, ये कहाँ ले जाएगी, पर दिल में एक अनोखी हलचल ज़रूर थी.
उस दिन के बाद मेरा ट्रीटमेंट उनसे शुरू हुआ. अगली बार से मेरा बेटा मेरे साथ आता था, पर वो मेरे मोबाइल में इतना बिज़ी रहता था की अक्सर वो बाहर ही वेट करता था. तो मैं अकेली ही अंदर जाती थी. और हर बार, अंदर जाते ही मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो जाती थी.
ऐसे ही 7-8 बार हम मिले. कभी बेटा साथ होता, कभी बेटी, पर मेरा दिल हमेशा उनसे मिलने को एग्ज़ाइटेड रहता था. और ये एग्ज़ाइट्मेंट सिर्फ़ इलाज के लिए नही थी, कुछ और ही था. मैं अब अची-अची सरीस पहन कर जाती थी, मेकप करती थी, खुद को और खूबसूरत बनाने की कोशिश करती थी. क्या मैं उनको इंप्रेस करना चाहती थी? शायद. या शायद मैं खुद को उनके लिए तैयार कर रही थी, बिना जाने, किसके लिए.
एक बार मेरा बेटा साथ आया था, पर वो फिर से मेरे मोबाइल में ग़मे खेलने में बिज़ी था. उस दिन मैने ब्लॅक शिफ्फॉन सारी पहनी थी, जो मेरे बूब्स और गांद के कुवर्व्स को हाइलाइट कर रही थी. मैं उस दिन काफ़ी मस्त लग रही थी, और ये मैने सिर्फ़ महसूस नही किया, हॉस्पिटल में भी बहुत लोगों ने, ख़ास कर मर्दों ने, मुझे घूर घूर कर देखा.
यहाँ तक की स्टाफ की एक लड़की ने भी कहा, आपकी सारी बहुत प्रेटी है और आप बहुत आचे लग रहे हो. मेरी खुशी का ठिकाना नही था, एक अजीब सा कॉन्फिडेन्स मुझमे भर गया था.
जब मैं अंदर उनके कॅबिन में गयी, उन्होने मुझे देखा और एक हल्की सी स्माइल दी. मैं उस स्माइल से ही हल्की शर्मा गयी, और मेरे अंदर एक अजीब सी बेचैनी शुरू हो गयी. मुझे पता था, आज कुछ ज़रूर होगा, कुछ अलग. मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो चुकी थी. और जैसा की मैने सोचा था, उस दिन उनके साथ कोई स्टाफ नही था. हम दोनो अकेले ही थे रूम में.
उन्होने मेरे साथ बहुत मज़ाक किया मेरी प्राब्लम सुन कर. मुझे अछा भी लगा, पर उनकी आँखों में वो शरारत अब और भी गहरी हो चुकी थी, जैसे वो मेरे अंदर कुछ पढ़ रहे हो. फिर उन्होने मुझे चेकप के लिए बेंच पर सोने को कहा. मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा.
मैं बेंच पर लेट गयी. वो मेरे करीब आए, और मैं शरम के मारे आँखें नही उठा पा रही थी. जब उनका हाथ मेरी कमर को छूटा, एक करेंट सा दौड़ गया मेरे शरीर में. उनका टच इतना नरम और मदहोश करने वाला था की मेरे गले से एक हल्की सी आ निकल गयी.
मैं उस टच में पूरी तरह खो चुकी थी, और कुछ ही पलों में मुझे रीयलाइज़ हुआ की मेरी छूट ने पानी छ्चोढ़ दिया है. वो पूरी तरह से गीली हो चुकी थी. डॉक्टर अमित ने भी वो महसूस कर लिया था की मैं कितनी गरम हो गयी थी. उनके चेहरे पर एक छ्होटी सी मुस्कान आई, जैसे उन्हे सब पता चल गया हो.
उसके बाद, उन्होने बड़े प्रोफेशनल तरीके से मेडिसिन लिखी, जैसे कुछ हुआ ही ना हो. मैं शरम के मारे नज़रें भी नही मिला पा रही थी उनसे, बस जल्दी से वहाँ से निकलना चाहती थी. जब मैं उठ कर जाने लगी और दरवाज़े तक पहुँची, तब मैने पीछे मूड कर देखा. और वहीं हुआ जो मैने सोचा था, वो मेरी गांद को घूर रहे थे, और अपना लंड मसल रहे थे पंत के उपर से.
उनकी आँखों में वही हवस थी, जो अब मेरी आँखों में भी थी. मैने भी उन्हे एक नॉटी स्माइल दी और शरम से लाल होती हुई कॅबिन से बाहर निकल गयी. मेरे अंदर एक अजीब सी गर्मी और बेकरारी अब भी बाकी थी.
इसके आयेज की कहानी अगले पार्ट में. फीडबॅक देने के लिए मूडछंगेरबोय@गमाल.कॉम पर मैल करे.