मेरा नाम आराव है, 25 साल का हू. ये सेक्स कहानी तब से शुरू होती है जब मैं 21 साल ग्रॅजुयेशन कंप्लीट किया था, और टाउन में जॉब करता था.
हम एक बड़ी जॉइंट फॅमिली में रहते है, लगभग 16 लोग एक साथ. पर ऑनेस्ट्ली, मैं ज़्यादा फॅमिली ड्रामा में इंटेरेस्ट नही लेता था. घर में क्या चल रहा है, उसकी मुझे ज़्यादा परवाह नही होती.
मैं अपनी मस्ती में मस्त रहता था, अपने दोस्तों के साथ टाइम बीतता था, और अपनी लाइफ अपने तरीके से जीने में बिलीव करता हू. फॅमिली में क्या हो रहा है, कभी-कभी तो मुझे पता ही नही चलता था.
ऑफीस के बाद मैं अक्सर अपने दोस्त रोहन की शॉप पर तोड़ा टाइम बिताने चला जाता था. रोहन की शॉप मोहल्ले के बीच में है, जहाँ लोग आते-जाते रहते है, और थोड़ी मस्ती भी हो जाती थी.
एक दिन जब मैं वहाँ गया, तो मैने एक आदमी देखा जो पहले कभी नही मिला था. वो आदमी तोड़ा मेच्यूर लगता था, लगभग 39 साल का, कॉन्फिडेंट और शांत टाइप. उसका नाम था अनिरूद्ध.
अनिरूद्ध रोज़ रोहन की शॉप पर आता था, कुछ काम की बातें करता. कभी-कभी छाई पे बातें करता. रोहन उसका अछा दोस्त था, इसलिए वो आराम से वहाँ आता रहता था.
पहली बार जब अनिरूद्ध से मिला, तो लगा की वो अलग लेवेल का बंदा है, मेच्यूर, समझदार. धीरे-धीरे मैं और अनिरूद्ध बातें करने लगे. कभी ऑफीस की प्रॉब्लम्स डिसकस करते, कभी लाइफ के गोल्स. उसका अप्रोच लाइफ को देखने का काफ़ी डिफरेंट था, जो मुझे पसंद आया. बस, इसी तरह से हमारी दोस्ती बढ़ती गयी, एक ऐसा रिश्ता जहाँ मुझे सपोर्ट, समझ और सही राह मिलती थी.
अनिरूद्ध किसी दूसरे स्टेट से आया था, और उसकी अपनी रीजनल लॅंग्वेज थी. पहले तोड़ा ऑक्वर्ड लगा, पर उसका नेचर इतना ग्राउंडेड था की लॅंग्वेज का बॅरियर कभी फील ही नही हुआ. वो शादी-शुदा था. उसकी बीवी और एक छ्होटा सा बेटा उसके गाओं में रहते थे. यहाँ तो वो बस जॉब के सिलसिले में आया था, और एक छ्होटी सी फ्लॅट में अकेला रहता था, रेंट पे.
सबसे सर्प्राइज़िंग बात ये थी की वो खाना खुद बनता था. और सिर्फ़ बनता ही नही, एक-दूं एक्सपर्ट लेवेल का कुकिंग करता था. सिंपल चीज़ें भी उसके हाथों से ख़ास बन जाती थी.
एक बार अनिरुढ़ भाई ने कॅष्यूयली बोला: आज राजमा चावल बना रहा हू, आएगा क्या?
मैं: राजमा चावल? अनिरुढ़ भाई, आप बना रहे है?
अनिरुढ़: बस देख लेना, घर जैसा स्वाद है.
मैं गया, और सच में खाना खाते वक़्त थोड़ी देर के लिए सब कुछ भूल गया. वो एक अजीब सा कंफर्ट था, बिना एक्सपेक्टेशन्स के, बिना फॉरमॅलिटी के. तब से कभी-कभी मैं उनके यहाँ चला जाता हू डिन्नर पे. बातें होती है, कभी सीरीयस, कभी फुल टाइम मस्ती.
एक अजीब सा भाई जैसा बॉन्ड बन गया था हम दोनो के बीच. कितना अजीब होता है ना, कुछ लोग बस रॅंडम्ली लाइफ में आते है और बिना प्लान के अपने लगने लगते है.
जब मैं अनिरुढ़ भाई के हाथ का खाना खाता था ना, तो अंदर से कुछ हिलता था. लेकिन अनिरुढ़ भाई को देख के लगा, भाई, एक बंदा जो अकेला रहता है, जॉब करता है, और फिर भी इतना टेस्टी खाना बना लेता है, कुछ तो बात है.
एक दिन मैं कॅष्यूयली बोला: यार अनिरुढ़ भाई, आप सिखाएँगे मुझे भी कुछ सिंपल डिश बनाना? ऐसे जो मैं भी बना पौ बिना किचन में तबाही किए?
अनिरूद्ध: चल, आज एक-दूं बिगिनर-लेवेल डिश सिखाता हू, आलू-कापसिकूं मसाला वित तड़का डाल.
मैं फुल फोकस मोड में आ गया. पहली बार लाइफ में प्याज़ काट रहा था, आँखों में पानी, लेकिन मॅन में एग्ज़ाइट्मेंट. अनिरूद्ध ने सब पेशंट्ली सिखाया. वो पूरा प्रोसेस इतना इंट्रेस्टिंग लगा की मैने डिसाइड किया, बस, इस वीकेंड घर पर सब को यही खिलता हू.
सनडे को मैं किचन में घुस गया, पूरा फोकस करके. मैने वो आलू-कापसिकूं मसाला और तड़का डाल बनाया, जैसा अनिरुढ़ भाई ने सिखाया था. जब डिन्नर का टाइम हुआ, और घर के सब लोगों ने वो डिश टेस्ट की, तो एक पल की साइलेन्स च्छा गयी.
मेरे टाइया जी बोले: अर्रे, आराव. ये तो रेस्टोरेंट स्टाइल बना है.
मेरी चाची ने कहा: सच में, किसने सिखाया तुझे?
फिर मम्मी बोली: आराव, इसका स्वाद तो कमाल का है. मुझे यकीन नही हो रहा तूने इतना अछा बना लिया. कहाँ से सीखा ये सब?
मैं: एक नया दोस्त है मेरा, अनिरुढ़ भाई. उन्होने ही सिखाया है. उनकी वजह से ही बन पाया.
पापा: वाह बेटे, टेस्ट तो कमाल का है.
सब लोग मेरी तारीफ कर रहे थे. मेरे पेरेंट्स को मुझ पर प्राउड फील हुआ. उस दिन के बाद, कुकिंग मेरे लिए सिर्फ़ स्किल नही, एक एक्सपीरियेन्स बन गया.
अनिरुढ़ भाई मुझे कुछ ना कुछ सीखते रहते और मैं घर पर बनाने लगा. अब मैं उनके फ्लॅट पर अकेला नही जाता था. कभी रोहन भी साथ होता तो कभी मैं अनिरुढ़ भाई को अपने साथ रोहन की शॉप पर ले आता. हम तीनो साथ में मस्ती करते, बातें शेर करते.
अनिरुढ़ भाई की कुकिंग स्किल्स ने उनको मेरी फॅमिली में भी पॉपुलर कर दिया था. मेरी मम्मी अक्सर उनकी तारीफ करती रहती थी, ख़ास कर उनके खाने की.
एक दिन मैने सोचा, अनिरुढ़ भाई को अपने घर पर इन्वाइट करता हू. उनकी और मेरी फॅमिली की अची पहचान हो जाएगी.
मैने उन्हे बोला: अनिरुढ़ भाई, एक दिन हमारे घर डिन्नर पर आओ ना.
अनिरुढ़ भाई तोड़ा सर्प्राइज़ हुए, फिर स्माइल करते हुए बोले: तुम लोग तो इस ज़माने में जॉइंट फॅमिली में रहते हो, ये तो बहुत बड़ी बात है. मैं तो कब से तुम्हारी फॅमिली से मिलना चाहता था. ज़रूर अवँगा.
मैने घर पर सब को बताया की मेरा दोस्त रात को खाने के लिए आने वाला है. मैं आपको ये भी बता डू, ये पहली बार था की मेरा कोई दोस्त मेरे घर आने वाला था. मेरे बहुत से दोस्त थे, लेकिन मैं अपनी दोस्ती सिर्फ़ घर के बाहर तक ही सीमित रखता था.
मैं अनिरुढ़ भाई के फ्लॅट पर गया और उनको बोला: चलो घर.
मैने उन्हे हमेशा त-शर्ट और शॉर्ट्स में ही देखा था. पर आज वो फॉर्मल शर्ट और पंत पहन कर तैयार थे, जैसे कहीं घूमने जाना हो.
मैं: इतना फॉरमॅलिटी क्यूँ?
अनिरुढ़: पहली बार आ रहा हू. तेरे घर वालों से मिलने तो सही से आना पड़ता है.
मैं अनिरुढ़ भाई को घर लेकर जेया रहा था, लेकिन उस दिन से पहले मैं किसी दोस्त को अपने घर नही लाया था. इसलिए तोड़ा नर्वस फील कर रहा था. मुझे नही पता था घर वालों का क्या रिक्षन होगा.
लेकिन अनिरुढ़ भाई तो सारे घर वालों से ऐसे घुल-मिल गये जैसे वो हमारे फॅमिली मेंबर ही हों. बच्चो से लेकर सब लॅडीस और सारे मर्द उनसे आराम से कनेक्ट हो गये.
अनिरुढ़ भाई ने मेरे घर वालों के सामने मेरी बहुत तारीफ की. इससे मुझे बहुत अछा फील हुआ. लेकिन मुझे नही पता था की यहाँ से सब कुछ बदलने वाला था. शायद, कहानी की असली शुरुआत अभी हुई थी.
यहाँ तक तो सब सही था. डिन्नर के बाद, मम्मी उनके लिए आचार की बरतनी देने आई.
मम्मी: आपने आराव को बहुत अछा खाना बनाना सिखाया है. आप ये आचार लेकर जाइए. हमारे यहाँ इसको घर पर बनाते है. शायद आपको अछा लगे.
मैने नोटीस किया, अनिरुढ़ भाई मम्मी की तरफ ऐसे देख रहे थे जैसे उन्हे कुछ होने लगा था. अनिरुढ़ भाई ने थॅंक योउ कहा और फिर उसके बाद वो सब से बातें कर रहे थे, पर उनकी नज़र बार बार मम्मी की तरफ जाने लगी. वो खुद को रोकने की कोशिश कर रहे थे, पर रोक नही पाए. मम्मी भी समझ रही थी की वो देख रहे थे, और वो शर्मा रही थी.
मेरी मम्मी का नाम यामिनी है. वो 43 साल की है, पर उनको देख कर ऐसा लगता नही. अभी भी वो 30स की लगती है. घर में वो सब का ध्यान रखती है. इतनी बड़ी जॉइंट फॅमिली को वो बहुत स्मूद्ली मॅनेज करती है. उनका फिगर हमेशा से ही वेल-मेंटेंड रहा है. उनकी सारी में कुवर्व्स और भी खूबसूरत लगती है. आँखों में एक अलग ही चमक है और उनकी मुस्कान बहुत वॉर्म है. उनकी फिगर 34सी-30-38 थी, जो मुझे बाद में अनिरुढ़ भाई की वजह से पता चला.
अब तक मैं उन्हे सिर्फ़ अपनी मम्मी के रूप में देखता था. पर अनिरुढ़ भाई की नज़रों से जब उन्हे देखा, तो लगा की उनके अंदर एक च्छूपी हुई अदा भी थी. उनकी चाल, उनके बोलने का तरीका, सब में एक अजीब सी नज़ाकत थी, जिसे मैने पहले कभी नोटीस नही किया था. वो ऐसी है की उनकी प्रेज़ेन्स से घर में एक अलग ही रौनक आ जाती है.
एक दिन घर पर पूजा रखी थी. मैने अनिरुढ़ भाई को इन्वाइट किया था. पूजा का दिन था, और मम्मी ने एक गहरे लाल रंग की सिल्क सारी पहनी थी. उसमे उनका भरा हुआ जिस्म और भी कसीला लग रहा था. सारी के पल्लू से झँकते उनके उभरे हुए बूब्स और गोल चुतताड, अनिरुढ़ भाई की नज़रों को अपनी तरफ खींच रहे थे.
माथे पर बिंदी, गले में एक पतला मंगलसूत्रा, और हल्के सिंदूर के साथ वो एक-दूं संस्कारी, फिर भी बेहद सेक्सी दिख रही थी. उनकी हर चल में एक अजीब सी नज़ाकत थी.
अनिरुढ़ भाई जब आए, और उनकी नज़र मम्मी पर पड़ी, तो वो जैसे वहीं ठहर से गये. उनकी आँखें मम्मी के हर अंग पर घूमने लगी. उनका चेहरा, उनकी कमर, उनके हिप्स पर उनकी नज़र जैसे चिपक सी गयी थी. वो जैसे मम्मी की खूबसूरती और उनके जिस्म की बनावट में खो गये थे, पूरी तरह फ्लॅट हो चुके थे. उनकी आँखों में सॉफ हवस दिख रही थी.
पूजा ख़तम होने के बाद, मम्मी ने सब के लिए प्रसाद लगाना शुरू किया. जब वो अनिरुढ़ भाई के पास आई, तो एक बहाना बनाते हुए बोले-
मम्मी: अनिरुढ़ जी, आप ठीक से बैठे है ना? हमारा घर तोड़ा शोर-शराबा वाला है, आपको अनकंफर्टबल तो नही लग रहा?
अनिरुढ़ भाई ने हल्की मुस्कान के साथ कहा: नही-नही यामिनी जी. यहाँ तो बहुत अछा लग रहा है. आप लोगों का प्यार देख कर दिल खुश हो गया.
मम्मी ने प्रसाद देते हुए कहा: आपको कुछ और चाहिए हो तो झिझाकिएगा मत. वैसे, आप अकेले रहते है, खाना ठीक से खाते है ना?
मम्मी की इस बात पर अनिरुढ़ भाई के चेहरे पर एक हल्की सी लाली आ गयी. उन्होने मम्मी की आँखों में देखा और एक अजीब सी चमक उनकी आँखों में भी दिखी. वो जैसे समझ गये थे की मम्मी भी उनको नोटीस कर रही थी, उनकी केर कर रही थी, और शायद उनमे इंटेरेस्ट भी ले रही थी. उनकी नज़रें मम्मी के जिस्म को गंदी तरह घूर रही थी. मम्मी भी ये सब फील कर रही थी, और हल्के से शर्मा रही थी. उनके गालों पर एक हल्की लाली थी.
एक दिन मैं अनिरुढ़ भाई के फ्लॅट पर गया. हम दोनो शाम को साथ में बैठे छाई पी रहे थे. वैसे तो हमारी बातें नॉर्मली ऑफीस या लाइफ गोल्स पर होती थी, पर आज कुछ अलग ही था. अनिरुढ़ भाई की नज़रें थोड़ी रेस्टलेस लग रही थी.
मैं: और बताओ अनिरुढ़ भाई, सब ठीक है? ऑफीस में कैसा चल रहा है?
अनिरुढ़: सब बढ़िया, आराव. तू बता, घर पर सब कैसे है?
मैं: सब बढ़िया है.
अनिरुढ़: उस दिन पूजा थी तो घर में माहौल कितना अछा था ना? कुछ लोग तो घर में जैसे रौनक ले आते है.
मैं: हा, सब ठीक है. घर में तो सब बिज़ी रहते है, जैसे हमेशा.
अनिरुढ़: हा, पर वो दिन सब कितने खुश लग रहे थे. एस्पेशली तेरे घर में, इतनी बड़ी फॅमिली को देख कर अछा लगा.
मैं: सब ठीक ही है अनिरुढ़ भाई. अपनी अपनी रुटीन में बिज़ी रहते है.
अनिरुढ़: ह्म. और पापा कैसे है? वो भी बिज़्नेस में बिज़ी रहते है ना?
मैं: हा, पापा तो ऑफीस और बिज़्नेस में बिज़ी ही रहते है. सुबह जाते है, देर रात तक आते है.
अनिरुढ़: समझ गया. वैसे आराव, तुम तो अपनी मम्मी पर गये हो. इसलिए इतने हॅंडसम हो. तुम्हारी शकल मम्मी से बहुत मॅच करती है.
अनिरुढ़ भाई ने थोड़ी देर चुप रहने के बाद फिर बात बदली.
अनिरुढ़: पर सच काहु तो तेरी मम्मी बहुत खूबसूरत है. उनको देख कर कोई कह नही सकता उनकी उमर क्या है. उनकी वो फिगर, उनकी चल, सब कुछ कमाल है. उनका जिस्म तो जैसे अभी भी पूरी जवानी में हो.
मैने थोड़ी देर चुप रहा. मुझे समझ ही नही आया की मैं इस पर क्या रिक्ट करू.
अनिरुढ़: अच्छा, और घर में टाइया जी लोग कैसे है? वो भी तो काफ़ी एनर्जेटिक लगते है.
मैने टाइया जी और दूसरे रिश्तेदारों के बारे में कुछ बातें बताई. हम थोड़ी देर घर के माहौल पर बात करते रहे. पर अनिरुढ़ भाई की नज़र कहीं और ही थी. उसकी आँखें बहकी हुई थी, जैसे वो कुछ और ही सोच रहा हो. थोड़ी देर बाद उसने फिर से मम्मी की तरफ बात घुमाई.
अनिरुढ़: और यामिनी जी, वो हेल्त का ध्यान कैसे रखती है? इतनी बड़ी फॅमिली में सब को संभालना और खुद को इतना फिट रखना, ये तो कमाल है. उनकी बॉडी तो जैसे बिल्कुल मेनटेन रहती है, एक-दूं शेप्ली. इस उमर में ऐसी फिगर बहुत कम लोगों की होती है.
मुझे अनिरुढ़ भाई की बातों में एक अजीब सी बेचैनी दिख रही थी. उसकी हर बात में मम्मी का ज़िकार था, भले ही वो उसे कितना भी च्छुपाने की कोशिश करे. उसकी प्यासी नज़रें मुझे मम्मी के जिस्म की हर आडया याद दिला रही थी, जो उस दिन पूजा में उसने देखी थी.
ये बातें उसकी मेरे दिमाग़ में चल रही थी. ऐसा लगा जैसे कोई मेरे अंदर एक नया दरवाज़ा खोल रहा हो, जहाँ से मैं मम्मी को एक अलग ही नज़र से देखने लगा था. ये सब कुछ अजीब था, पर मैं इससे रोक नही पा रहा था.
अनिरुढ़ भाई की आँखों में जो हवस थी, वो अब मुझे भी डिस्टर्ब करने लगी थी. कहीं ना कहीं उसकी बातों ने मेरे अंदर भी मम्मी के लिए एक अलग किस्म का एहसास जगा दिया था, जिसे मैं अभी तक समझ नही पा रहा था. उस रात मैं अनिरुढ़ भाई के फ्लॅट से वापस आया तो मेरा दिमाग़ बस मम्मी और उसकी बातों में ही उलझा हुआ था. उसके आयेज क्या हुआ मैं आपको अगले पार्ट में बतौँगा.