मा-बेटा सेक्स स्टोरी अब आयेज-
मम्मी के साथ मेरा सिलसिला अब एक गहरी आदत बन चुका था. उनकी छूट की हर प्यास मैं बुझा रहा था, और उन्होने मुझे जिस्म के हर राज़ से वाक़िफ़ करा दिया था. हर रात, या जब भी मौका मिलता, मम्मी मेरे कमरे में आती, अपनी सारी हदें तोड़ती और फिर संतुष्ट हो कर चली जाती. पर अनिरुढ़ भाई का अब भी मम्मी की ज़िंदगी में होना मेरे लिए चुभन था.
मम्मी का कभी-कभी ये कहना की अनिरुढ़ के बाद भी उन्हे मेरी याद आती है, मेरे अंदर के जुनून को और बढ़ा रहा था. अनिरुढ़ को मम्मी की ज़िंदगी से पूरी तरह हटाना अब मेरे लिए एक चुनौती बन चुका था, एक ऐसा खेल जिसे मैं हर हाल में जीतना चाहता था.
एक शाम, अनिरुढ़ भाई ने मुझे अपने फ्लॅट पर बुलाया. हम दोनो अकेले थे, सोफे पर बैठे, टीवी पर कुछ देख रहे थे. मैने मौके का इंतेज़ार किया, जब तक हम कॅषुयल बातें कर रहे थे. जैसे ही बात में तोड़ा ठहराव आया, मैने धीरे से अपना दाव चला.
मैं (टीवी से नज़र हटाए बिना, एक-दूं कॅषुयल टोने में): अनिरुढ़ भाई, मम्मी आज-कल आपको बहुत मिस करती है. अब तो उन्हे वीकेंड का इंतेज़ार भी नही होता.
अनिरुढ़ (मेरे तरफ पलट कर, उसकी आँखों में चमक आ गयी): मिस करती है? सच में आराव? क्या कह रही थी यामिनी जी?
मैं (अपने चेहरे पर मासूमियत लाते हुए, जैसे ये एक छ्होटी सी बात हो): हा अनिरुढ़ भाई. कल ही बोल रही थी, अनिरुढ़ जी से आचे से मिल नही पति हू, काफ़ी बिज़ी हो गयी हू. और उनकी आवाज़ में अजीब सी उदासी थी. लगता है उन्हे आपकी दोस्ती की बहुत ज़रूरत है. उनका मूड ऑफ रहता है जब वो आपसे मिल नही पति.
अनिरुढ़ के चेहरे पर एक अजीब सा कॉन्फिडेन्स और खुशी फैल गयी. उसे लगा मेरी बात में सकचाई थी और ये मम्मी की तरफ से एक स्ट्रॉंग सिग्नल था. उसकी आँखों में एक नया जोश दिखा.
अनिरुढ़ (उसकी आवाज़ में नया उत्साह था): अछा? ऐसी बात है? मुझे तो लगा… (वो अपनी बात पूरी नही कर पाया, बस सोच में पद गया).
मैं (उनके कंधे पर हाथ रख कर, एक नकली हुंदर्दी दिखाते हुए): हा अनिरुढ़ भाई. आप उनके लिए कितने ख़ास हो, ये उनको भी पता है. और उन्हे आपकी बहुत फिकर रहती है.
उस दिन के बाद, जब भी मैं अनिरुढ़ भाई से अकेलापन में मिलता, तो ऐसी ही बातें करता. कभी बोलता, अनिरुढ़ भाई, मम्मी आपकी तारीफ कर रही थी, बोल रही थी आप उनके लिए कितना कुछ करते हो, कोई नही करता इतना सेल्फलेस. कभी, मम्मी ने कहा था की अनिरुढ़ जी जब आता है, तो घर में रौनक रहती है, उनका मॅन लगा रहता है. पर अब बार-बार आएँगे तो किसी को शक हो सकता है.
हर बार अनिरुढ़ भाई और ज़ोर लगते. वो मम्मी से कॉल पर बात करने की कोशिश करते, उनके लिए छ्होटे-मोटे काम करते, और उनके करीब आने की हर मुमकिन कोशिश करते. उन्हे लगता था की वो मम्मी को इंप्रेस कर रहे थे. पर असल में वो मेरे खेल का मोहरा बन रहे थे.
एक शाम, मैं पानी की बॉटल भरने किचन में गया. घर में सभी अपने-अपने कमरों में थे. किचन में मैने देखा, मम्मी पहले से ही वहीं पानी की बॉटल भर रही थी. उन्होने रेड सॅटिन की एक-दूं स्लीक और स्मूद निघट्य पहनी हुई थी. वो निघट्य उनके जिस्म पर ऐसे चिपक रही थी की उनकी हर एक लाइन, हर एक मोड़ को सॉफ्ट्ली ट्रेस कर रही थी.
शॉर्ट स्लीव्स और क्लोस्ड नेक के बावजूद भी वो आउटफिट उनके जिस्म पर एक सहम देने वाला सेन्ल्युवस फील दे रही थी. उन्होने अपने लंबे बालों का नीट्ली टाइड बुन बना रखा था, जिससे उनकी मुलायम गर्दन की रेखा सॉफ नज़र आ रही थी. उनके होंठो पर हल्की चमक थी.
उनके बड़े-बड़े बूब्स निघट्य के अंदर से ऐसे दिख रहे थे मानो वो अभी बाहर निकल पड़ेंगे, और ये सॉफ था की उन्होने नीचे ब्रा बिल्कुल नही पहना था. उनकी कमर की पतली सी रेखा और गोल गांद उस सॅटिन में बेहद घेरी सेक्सी और आकर्षक लग रही थी. उनकी पनटी की लाइन्स भी निघट्य के पतले कपड़े से सॉफ नज़र आ रही थी.
उन्होने बॉटल उठाई, और पलट कर धीरे से मेरी तरफ देखा. उनकी आँखों में एक शिकार करने वाली सेडक्टिव शाइन थी, और उन्होने एक धीमी, पागल करने वाली नॉटी स्माइल दी. उन्होने मेरी आँखों में देखा, एक पल के लिए ठहरी, जैसे मुझे कोई मौन निमंत्रण दे रही हो, और फिर धीरे-धीरे अपने कमरे की तरफ चली गयी, दरवाज़ा हल्का सा खुला छ्चोड़ दिया. उनकी हर चाल में एक अजीब सा लचक और गर्मी थी, जो हवा में घुल रही थी.
मैं बिना सोचे-समझे उनके पीछे-पीछे गया. अंदर जाते ही मैने देखा, पापा वहीं बेड पर लेते हुए अपना मोबाइल चला रहे थे. उनका पूरा ध्यान स्क्रीन पर था, मैं उनके मोबाइल की हल्की आवाज़ सुन सकता था. उन्हे हमारी मौजूदगी का शायद ही कोई एहसास था.
मैने उनकी तरफ देखा और आँखों ही आँखों में इशारा किया की मेरे बेडरूम में चले, जहाँ हम अकेले होते. मेरी आँखों में सॉफ चाहत थी. पर मम्मी ने मेरी तरफ देखा. उनकी आँखों में अब भी वो शरारत थी, और उन्होने आँखों से ही माना कर दिया. उनका ये मौन इशारा मेरे अंदर के जुनून को और बढ़ा गया.
मम्मी (पापा का मोबाइल उनके हाथो से छ्चीन कर, थोड़े नकली गुस्से में): आप ना पूरा दिन मोबाइल में घुसे रहते हो. कभी मेरी तरफ भी देख लिया करो. एक तो पूरा दिन घर का काम करो और इनसे तो बस मोबाइल ही देखना होता है.
पापा (थोड़े हैरान हो कर): क्या हुआ? क्यूँ इतना चिल्ला रही हो?
मम्मी (धीमी, थकान भारी आवाज़ में): अफ, आज-कल ये पैरों का दर्द जान ले लेता है. बहुत थकान हो रही है.
पापा (उनसे भी धीमी आवाज़ में): है? ज़्यादा है क्या?
मम्मी (तोड़ा गुस्से में, पर मेरी तरफ हल्की सी नज़र डालते हुए): हा, इसीलिए तो आपको बोल रही हू. तोड़ा तेल लगा कर दबा लो.
पापा (मेरी तरफ देख कर, उनकी बात काट-ते हुए): बेटा, मम्मी के पैर में बहुत दर्द हो रहा है. थोड़े दबा दोगे? उन्हे आराम मिल जाएगा.
मेरी आँखों में एक नॉटी शाइन आ गयी. पापा ने खुद मुझे मौका दे दिया था.
मैं (तुरंत, बिना देर किए, मासूमियत से): जी पापा.
मम्मी (नकली गुस्से में, पर मेरी तरफ एक नॉटी स्माइल देकर): पता नही कब सुधरेंगे. रहने दे बेटा, तू आराम कर. वैसे भी सोने का टाइम हो गया है और तुझे कल ऑफीस भी जाना है.
मैं (मम्मी की तरफ देखते हुए): कोई बात नही मम्मी, मैं आपके पैर दबा देता हू.
मैं मम्मी के पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गया. धीरे से उनके नरम, रेशमी पैरों को अपने हाथो में लिया. मैने हल्के-हल्के उनके तलवों और एडियों पर दबाना शुरू किया, मेरी उंगलियाँ उनकी हर नास्स को सहला रही थी. पापा अब भी बेड पर लेते हुए अपना मोबाइल चला रहे थे. उनका पूरा ध्यान स्क्रीन पर गाड़ा था, जैसे दुनिया में और कुछ एग्ज़िस्ट ही ना करता हो.
मम्मी ने अपनी आँखें बंद कर ली थी, उनके चेहरे पर एक गहरे सुकून का भाव था, जो अब धीरे-धीरे कामुकता में बदल रहा था. मैने धीरे-धीरे अपने हाथो को उपर की तरफ बढ़ाना शुरू किया. पैरों से शुरुआत की, फिर उनकी मुलायम पिंदलियों पर हाथ फेरा, उनकी मासपेशियों को हल्के से दबाते हुए.
हर स्पर्श के साथ, मम्मी का जिस्म हल्का सा कांपता, जैसे बिजली का झटका लगा हो, पर वो कुछ कहती नही थी, बस एक धीमी सी आ भारती थी, जो अब दर्द में आराम मिलने की नही, बल्कि च्छूपी हुई चाहत की आ थी.
मम्मी ने धीरे से अपने पैर बेड के नीचे लटका लिए, और तोड़ा और दूसरी तरफ सरक कर बैठ गयी. उन्होने अपने घुटने हल्का सा फैला लिए, जिससे उनकी जांघों के बीच का रास्ता मेरे लिए खुल गया. मैं उनके बिल्कुल सामने था, ज़मीन पर घुटनो के बाल बैठा हुआ, और अब उनकी लाल निघट्य उनके घुटनो तक चढ़ि हुई थी.
मेरी आँखों में चमक और बढ़ गयी. ये एक खुला निमंत्रण था. एक ऐसा मौका जिसका मैं सपना देख रहा था. पापा वहीं थे, लेकिन मम्मी ने उनसे मुझे पूरी तरह से च्छूपा लिया था. उनकी नंगी जांघें मेरे सामने थी, और रेड सॅटिन निघट्य के उपर से उनकी पनटी की लाइन्स सॉफ दिख रही थी.
मम्मी (आँखें बंद किए, एक धीमी, नशीली फुसफुसती आवाज़ में): आराव… तोड़ा उपर… उस तरफ भी दर्द है…
उनकी आवाज़ में दर्द अब बिल्कुल नही था, बल्कि एक अजीब सी चाहत और प्यास थी, जिसे सिर्फ़ मैं ही पहचान सकता था. मेरी आँखों में चमक और बढ़ गयी. मैने उनकी बात मानी और अपना हाथ उनकी जाँघ पर और उपर ले गया, बिल्कुल उनकी गरम और रस्स भारी छूट के करीब.
मेरी उंगलियाँ धीरे से उनकी पनटी के किनारे को छ्छूने लगी, जैसे अंजाने में कोई मसाज करते हुए उनकी छूट को सहला रही हो. मम्मी ने अपने होंठो को कस्स कर बंद कर लिया, पर उनके चेहरे पर परम आनंद और कामुकता सॉफ दिख रही थी, जिसे वो दर्द के भाव में च्छूपा नही पा रही थी.
उनकी साँसें अब तेज़-तेज़, गरम झोंकों में बदल गयी थी, जो सिर्फ़ मैं ही महसूस कर सकता था, क्यूंकी मैं उनके बिल्कुल करीब था.
मैने पापा की तरफ एक नज़र डाली. वो अब भी अपने मोबाइल में खोए थे. उनके कान में इयरफोन्स लगे थे, जिससे वो किसी और ही दुनिया में थे. यहीं मौका था, पर हर पल पकड़े जाने का दर्र भी था. मम्मी ने अपनी निघट्य को तोड़ा अड्जस्ट किया, जिससे उनकी जांघों के बीच का हिस्सा पापा की डाइरेक्ट व्यू से तोड़ा हाइड हो गया. उनकी निघट्य का कपड़ा अब उनकी छूट के पास हल्का सा गॅदर हो गया था, जो एक नॅचुरल कवर का काम कर रहा था.
मैं अब बिना देर किए, अपना चेहरा उनकी जांघों के बीच ले गया. मेरी नाक उनकी गरम-गरम छूट की ख़ास्स खुश्बू से भर गयी. मैने उनकी पनटी को एक तरफ सरकया, और अब उनकी गीली और फूली हुई छूट बिल्कुल मेरे सामने थी. मैं अब बिना देर किए, अपनी जीभ बाहर निकली और उनकी छूट की फाँक पर रख दी.
मम्मी के जिस्म में एक तेज़ कंपन हुआ. उन्होने अपने होंठो को ज़ोर से दबा लिया, और उनकी आँखें बड़ी-बड़ी हो गयी, पापा की तरफ एक नर्वस नज़र डालते हुए. अगर पापा मोबाइल से नज़र हटते, तो भी उन्हे कुछ सेकेंड्स लगते हमे ठीक से देखने में, और उतनी देर में मम्मी अपने पैर समेत सकती थी या मैं सीधा हो सकता था.
मैने उनकी छूट को धीरे-धीरे चाटना शुरू किया, पहले हल्की-हल्की, फिर और तेज़. मेरी जीभ उनकी छूट के दाने पर आते ही. मम्मी का जिस्म एक बार फिर तर्रा गया. उन्होने अपने घुटनो से मेरे सर को हल्का सा दबाया, जैसे मुझे और अंदर खींच रही हो.
मैं उनकी छूट को पागलपन की तरह चाट रहा था, मेरी जीभ उनके रस्स को पी रही थी. मम्मी अब अपने होंठो से सिसकारियाँ रोक रही थी, उनका जिस्म आयेज-पीछे हो रहा था. उनके हाथ धीरे से मेरे बालों में चले गये और वो मेरे सर को और ज़ोर से अपनी छूट पर दबाने लगी. उनकी साँसें अब हाँफ रही थी, और उनके चेहरे पर परम आनंद और अश्लील मुस्कान थी.
पापा वहीं थे, बस कुछ ही फुट डोर, अपने मोबाइल में. मम्मी की आँखें बार-बार उनकी तरफ जाती, उनके चेहरे पर पकड़े जाने का सॉफ दर्र दिखता, पर उस दर्र के बावजूद वो इस फॉरबिडन मस्ती का पूरा लुत्फ़ उठा रही थी.
मम्मी (एक धीमी, कामुक कराह जो लगभग सुनाई नही दी): एम्म्म… आ… आराव… और तेज़… बस… बस…
उनकी आवाज़ में एक अजीब सी तड़प थी. मैने उनकी छूट को और ज़ोर-ज़ोर से चाटना शुरू किया, मेरी जीभ उनके दाने पर ऐसे चल रही थी जैसे वो उसे खा जाएगी. मम्मी का जिस्म अब काँप रहा था, उनके पैर बिल्कुल सीधे हो गये, और उन्होने अपने होंठो को एक बार फिर ज़ोर से दबा लिया. उनके जिस्म में एक तेज़ झटका लगा, और उनकी छूट से गरम रस की धार मेरे चेहरे पर आ गिरी.
मम्मी झाड़ चुकी थी. उनका जिस्म ढीला पद गया, उन्होने एक लंबी साँस ली और उनके चेहरे पर पर्म संतुष्टि थी, साथ ही पकड़े जाने का एक हल्का सा दर्र भी अभी भी उनकी आँखों में दिख रहा था.
मम्मी के झड़ने के बाद भी, मैं कुछ देर उनकी छूट को हल्के से चाट-ता रहा, बस उनके रस्स का स्वाद लेता रहा. उन्होने धीरे से अपने घुटने वापस थोड़े बंद किए, जैसे होश में आ रही हो. मैं भी उनके पैरों के बीच से अपना चेहरा हटा कर सीधा बैठ गया. मैने उनकी पनटी को वापस ठीक किया और उनकी निघट्य को भी तोड़ा नीचे सरका दिया, ताकि सब कुछ नॉर्मल लगे.
मम्मी ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोली. उनकी आँखों में अब भी नशीला सा नशा और एक गहरा सुकून था. उन्होने एक बार फिर पापा की तरफ देखा, जो अब भी अपने मोबाइल में बिज़ी थे, बिल्कुल अंजान की उनके बगल में क्या तूफान आया था. मम्मी के चेहरे पर एक च्छूपी हुई जीत की मुस्कान थी.
उन्होने धीरे से अपना हाथ उठाया और मेरे बालों को हल्के से सहलाया, जैसे मुझे शाबाशी दे रही हो. उनकी उंगलियों का स्पर्श मेरे सिर पर एक नया एहसास दे गया.
मम्मी (धीमी, थोड़ी हफ़ूटी आवाज़ में): आ… हा… अब ठीक है बेटा. बहुत आराम मिला… शुक्रिया.
उनकी आवाज़ में अब दर्द बिल्कुल नही था, बल्कि एक गहरा एहसान और च्छूपी हुई खुशी थी. मैने उनकी आँखों में देखा. उन्होने एक सेडक्टिव विंक किया, जो सिर्फ़ मेरे लिए था.
मैं (मासूमियत से, पापा की तरफ देखते हुए): जी मम्मी, ठीक है. अब आराम कर लो. दर्द ज़्यादा हो तो फिर बुला लेना.
मेरी आवाज़ में भी एक च्छूपी हुई शैतानियत थी. मम्मी ने एक बार फिर हल्की सी नॉटी स्माइल दी.
पापा (मोबाइल से नज़र हटाए बिना): क्या हुआ? आराव, हो गया क्या?
मैं: जी पापा, हो गया. मम्मी को अब आराम है.
पापा: ठीक है बेटा. जाओ, सो जाओ अब.
मैं धीरे से उठा. मम्मी ने एक बार फिर मेरी तरफ देखा, उनकी आँखों में अब और भी गहरा निमंत्रण था, जैसे वो इस रात को और आयेज बढ़ाना चाहती थी. मैं भी उन्हे एक च्छूपी हुई स्माइल देकर पापा के कमरे से बाहर निकल गया, पर मेरा लंड अब भी टाइट खड़ा था और मम्मी की छूट का रस्स मेरे होंठो पर लगा था.
मैं सीधा अपने कमरे में आया. दरवाज़ा बंद करते ही, मम्मी के साथ बिताए पल मेरी आँखों के सामने घूम गये. उनकी निघट्य, वो गरम छूट का स्वाद, और पापा की अंजान मौजूदगी सब कुछ याद करके, मेरा लंड पूरा खड़ा हो गया. मैने बिना देर किए मूठ मारी, और उस गहरी संतुष्टि के बाद, थकान से चूर हो कर सो गया.