बातरूम में भाई-बहन के संगम की शुरुआत की कहानी

बचपन से ही मुझे कुछ अनुभव ऐसे हुए जिससे मैं अपनी सेक्स लाइफ को समझना सीख गया था. इनमे से पहला एक्सपीरियेन्स उस वक़्त हुआ, जब मेरी उमर सिर्फ़ 18 साल की थी.

मैं अपने परिवार के साथ खुशाल ज़िंदगी बिता रहा था. पापा की इनकम अची थी, और मम्मी भी कुछ सिलाई बुनाई का काम करके तोड़ा कमा लेती थी. मेरी बड़ी बेहन स्वेता कॉलेज में पढ़ती थी, और छ्होटी संज्ञा हाइ स्कूल में दसवी कक्षा में पढ़ रही थी. मैं हमेशा अपने मम्मी-पापा के कमरे में सोता था, और कभी अकेला नही सोया था.

एक दिन की बात है, की मैं स्कूल से घर आया. तब मुझे बुखार (फीवर) हो गया. पापा ने मुझे अपनी कार में ले जेया कर डॉक्टर से दवाई भी ले दी. लेकिन उसी दिन किसी रिश्तेदार के यहा शादी का इन्विटेशन था, जिसमे मम्मी-पापा और संज्ञा को शहर से डोर जाना पड़ा.

मेरी तबीयत सही नही थी. इसलिए मुझे मेरी बड़ी बेहन स्वेता के पास छ्चोढ़ कर मम्मी-पापा और संज्ञा निकल गये. अब घर में मैं और मेरी बड़ी बेहन स्वेता अकेले थे. पूरा दिन दीदी ने मेरी देखभाल की.

दूसरे दिन सुबा को जब मैं बातरूम में नहाने गया, तो बातरूम का दरवाज़ा तोड़ा सा खुला था, और मेरी दीदी पहले से नहाने के लिए गयी हुई थी. मैने बातरूम के दरवाज़े से देखा तो दीदी कपड़े उतार रही थी.

ओह! अभी उसने अपना नाइट गाउन उतरा ही था, की उसकी ब्रा से झाँक रहे उसके सुंदर बूब्स पर मेरी नज़र पड़ी. पता नही क्यूँ, लेकिन मेरे लंड पर गुदगुदी सी होने लगी. दीदी ने अपनी ब्रा निकाल कर खूँटि पर टाँग दी. अब उसके टाइट नुकीले बूब्स देख कर मेरे शरीर के रोंगटे खड़े हो गये.

फ़ौरन ही उसने अपनी पनटी भी उतार दी. अब दीदी के सुंदर सुडौल कूल्हे भी सॉफ नज़र आ रहे थे. और मेरे लंड ने टाइट होना शुरू कर दिया था. दीदी ने शवर ओं किया, और अपने खूबसूरत जिस्म को ढोने लगी. उसका हाथ उसके जिस्म पर फिरने लगा, और मेरे शरीर में रोमांच की लहरे दौड़ने लगी.

उसी समय दीदी मेरी तरफ घूम गयी. अब दीदी के बूब्स और भी ज़्यादा सुंदर लग रहे थे. तभी मेरी नज़र दीदी के दोनो पैरों के बीच दीदी की सुंदर कोमल छूट पर पड़ी, और मेरा लंड पंत के अंदर ही उछालने लगा.

ओह! मैं दीदी की चूत से नज़र ही नही हटा पा रहा था. ऐसा लग रहा था, जैसे दीदी ने अपनी दोनो जांघों के बीच फूलों की दो पंखुड़ीयान लगा रखी हो. मैं दीदी को देख रहा था, और दीदी ने अपनी छूट को धोना शुरू किया.

दीदी अपनी उंगली को छूट के बीच ले गयी, जैसे फूलों की दो पंखुड़ियों को बीच से धो रही हो. मेरा लंड अब दीदी की छूट का दीवाना हो गया था. अब वो दीदी की छूट के अंदर समा जाना चाहता था.

पर मैने हिम्मत नही की, और डोर हॅट गया. फिर मैने दीदी को आवाज़ देते हुए कहा-

मैं: दीदी, क्या तुम बातरूम में हो?

दीदी: हा भैया, बस दो मिनिट में आई.

दीदी की सुरीली आवाज़ बातरूम से आई. फिर कुछ ही मिंटो में दीदी बातरूम से बाहर आ गयी. अब मैं इस सोच में था की दीदी के साथ बातरूम में वापस कैसे जौ. दीदी अपना गाउन बदल कर सारी पहन चुकी थी. मैने कुछ सोच कर दीदी से कहा-

मैं: दीदी मुझे नहाने में परेशानी होती है.

दीदी ने पूछा: क्या परेशानी होती है?

मैने कहा: मेरा एक हाथ दर्द कर रहा है. इसलिए मैं पीठ पर साबुन नही माल सकता.

दीदी: तो क्या हुआ, तुम्हे मैं नहला देती हू. मम्मी नही नहला सकती थी, तब भी मैं ही नहलाती थी.

दीदी ने ये प्रेम भाव से कहा था, क्यूंकी दीदी मुझे अभी भी बच्चा ही समझ रही थी. कुछ ही देर बाद दीदी ने मुझे बातरूम में जाने को कहा, और मेरे पीछे खुद भी आ गयी.

दीदी: चलो जल्दी से कपड़े उतरो, मुझे अभी नाश्ता भी बनाना है.

मैने जल्दी से कपड़े निकाल दिए. इस वक्त तक मेरा लंड भी शांत हो चुका था. कुछ ही देर में दीदी ने मेरे शरीर पर पानी डाल कर साबुन मलना शुरू कर दिया, और दीदी के कोमल हाथो के स्पर्श से मेरा लंड फिरसे उछालने लगा.

तभी दीदी की नज़र अचानक ही मेरे मोटे ताज़े लंड पर गयी, और उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ गयी. उसने अपने कोमल हाथ से मेरे लंड को पकड़ा, और बोली

दीदी: काफ़ी जवान हो गये हो तुम भैया.

मैने सिर्फ़ मुस्कुरा के उसको देखा. दीदी को मेरे लंड को सहलाने में मज़ा आने लगा. वो मेरे लंड को कुछ देर सहलाती रही.

दीदी ने पूछा: तुम्हे अछा लग रहा है?

मैं: हा दीदी, बहुत अछा.

तभी दीदी ने मेरे लंड को चूम लिया, और मेरे लंड को चूसने और चाटने लगी. मेरी खुशी का ठिकाना नही रहा. मेरी दीदी अब मेरे लंड की प्यासी हो गयी थी, और मेरे लंड की प्यास भी बुझाना चाहती थी.

कुछ ही देर के बाद दीदी खड़ी हो गयी, और अपनी सारी उपर करके उसने अपनी पनटी निकाल दी. और अब दीदी की कोमल सुंदर छूट फिर एक बार मेरे सामने थी.

अब दीदी अपनी सारी उपर उठा कर खड़ी थी, और मैं उसके सामने नंगा बैठा हुआ था. दीदी ने मेरे सर पर हाथ रख कर मेरा मूह अपनी छूट से लगा दिया. मुझे जिस घड़ी का इंतेज़ार था, वो आ गयी.

अब दीदी की फूलों की पंखुड़ी जैसी प्यारी सी छूट मेरे मूह से लगी हुई थी, और मैं मेरी बेहन की प्यारी सी छूट को चूसने लगा और चाटने लगा. दीदी बार-बार अपनी आँखें बंद कर लेती, और अपनी छूट को चूज़ जाने का मज़ा ले रही थी.

तभी मैं ज़ोर-ज़ोर से दीदी की छूट को चूसने लगा, और दीदी ने अचानक मुझे अपनी छूट से डोर हटाने की कोशिश की. लेकिन मैने अपने दोनो हाथ दीदी के कूल्हो पर रख कर दीदी की छूट को मेरे मूह में दबा लिया.

दीदी अब खुद को कंट्रोल नही कर पाई, और अचानक ही दीदी की छूट से पानी की एक तेज़ धार मेरे मूह में छूटी. मेरा मूह दीदी की छूट के पानी से भर गया. साथ ही मेरा चेहरा भी दीदी की छूट से निकले पानी से धूल गया.

फिर दीदी हेस्ट हुए बोली: मैने डोर हटाने की कोशिश की थी. मैने भी हेस्ट हुए कहा: कोई बात नही दीदी. मुझे तो बहुत ही अछा लगा.

लेकिन दूसरे ही पल दीदी मुझे खड़ा करके खुद मेरे सामने बैठ गयी, और मेरे लंड को फिरसे चूसने लगी. इस बार दीदी ने मेरे लंड को ज़ोर-ज़ोर से चूसना शुरू कर दिया. मानो वो मेरे लंड से कोई रस्स खींच रही हो, और कुछ देर के बाद मुझे एक अनोखा आनंद महसूस होने लगा.

तभी मेरे लंड से मेरे वीर्या की एक तेज़ धार मेरी बेहन के मूह में छूटी, और मेरी बेहन का मूह मेरे लंड से निकले वीर्या से भर गया. लेकिन मेरी बेहन मेरे लंड से निकले रस्स को लगातार पीने लगी.

मेरा लंड मेरी बेहन के मूह में एक के बाद एक काई धार छ्चोढता रहा, और मेरी प्यारी बेहन अपने प्यारे भाई के लंड का रस्स लगातार पीटी रही. आख़िर जब मेरे लंड से वीर्या निकलना बंद हुआ, तब मेरी बेहन ने मेरा लंड अपने मूह से बाहर निकाला और बोली-

दीदी: भैया तुम अब बहुत मज़ेदार हो गये हो. रात को और भी मज़े करेंगे. लेकिन अभी तुम नहा धो कर नाश्ता करने आ जाओ. मैं तुम्हारा इंतेज़ार कर रही हू.

कहते हुए उसने अपनी पनटी पहन ली.

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