बड़े भाई ने चड्डी उतारी-1

नाज़ खेलते हुए अपना चाचा के कमरे में पहुँची. वो जॉइंट फॅमिली में अपने अम्मी अब्बा और बड़े भाई के साथ रहती थी. उसके दो चाचा थे बड़े चाचा के दिन बेटे थे और छोटे चाचा कुंवारे थे. वो घर में सब से छोटी थी. चाचा के कमरे वो बेड पर बैठ गयी छोटे चाचा बातरूम में नहा रहे थे.

नहा कर बाहर निकले उन्होने ने टॉवलिया लपेटा था नाज़ को देखा और कुछ पल रुक गये फिर दरवाज़े की तरफ बड़े बाहर देखा और दरवाज़ा बूँद कर दिया. और आकर नाज़ को सामने से अपनी बाहों में कस लिया.

वो बेड पर ही बैठी थी. चाचा उसे चूमने लगे पहले गाल फिर गर्दन फिर अचानक हूथ. नाज़ को कुछ समझ नहीं आया ऐसा चाचा ने पहली बार किया था नाज़ को कुछ अलग अहसास हुआ उसे अछा लग रहा था.

नाज़ नाज़… अम्मी की आवाज़ आई..

चाचा ने घबराकर उसे छोड़ दिया कहा जाओ अम्मी बुला रही है.

नाज़ दौड़कर बाहर आगाई और अम्मी के पास गयी.

कुछ दिन तक कुछ नही हुआ पर नाज़. फिर से चाचा के पास जाना चाहती थी पर चाचा ने उसे नही बुलाया. क्यूंकी सयद उनको मौका नही मिला.

साजिद नाज़ के बड़े चाचा का बेटा था 22 साल का वो नाज़ को बहोट प्यार करता था.

एक दिन शाम के वक़्त नाज़ ने देखा वो छत पर जा रहा है. उसने लूँगी और बन्नीयाँ पहनी थी नाज़ को साजिद को देख कर कुछ होने लगा. वो भी छत पर पीछे पीछे चली गयी. पर जैसे ही उसने ने छत की आख़िरी सीडीयों पर कदम रखा. उसने देखा साजिद उनके घर की नौकरी मीना के पीछे छत के कोने में जेया रहे थे.

नाज़ वही रुक गयी और देखने लगी. चाचा ने मीना को जाकड़ लिया और चूमने लगे जैसे चाचा चूम रहे थे फिर उन्होने मीना को जकड़ा और उसे ज़मीन पर लिटा दिया और उसपर चाड गये और रगड़ने लगे. फिर एक हाथ से उसकी सलवार का नडा खोलने लगे.

नही भाई जान कोई आ जाएगा फिर कभी यहाँ नही मीना ने साजिद रोख दिया. साजिद ऐसे ही मीना के उपर रगड़ने लगे. फिर शांत होगआय उठकर अपनी लूँगी सीधी की और मूड गये नाज़ दौड़कर नीचे आय.ई उसने जो देखा वो अजीब था उसका दिल मचलने लगा. रात को खाना खा कर अपने अपने रूम में टीवी देख रहे थे.

अम्मी में चाचू के पास जा रही हू.

ठीक है.. अम्मी ने कहा.

नाज़ दौड़कर चाचा के रूम में गयी वो बेड पे लेते थे नाज़ उनके गोध में बैठ गयी. बैठते ही लूँगी के अंदर से उसे कुछ मोटे से चीज़ का एहसास हुआ.

नाज़ तुम क्या कर रही हो यहाँ… चाचा ने पूछा.

नाज़ ने कुछ नही कहा. चाचा उठकर बैठ गये और दरवाज़े की तरफ देखा कोई नही था तो फट से उसे चूमने लगे. फिर उसे गोद में उठाकर बातरूम में ले गये उसे खड़ा किया और कस कर अपनी बाहों जकड़ा और कमर उसके बदन पर रगड़ने लगे.

नाज़ को अछा लग रहा उसने सोचा साजिद भाई जान भी यही कर रहे थे. दरवाज़ा खुला था इसलिए चाचा घबराए हुए थे. वो तेज़ तेज़ रगड़ने लगे लूँगी जे अंदर जो मोटी चीज़ थी वो अब गरम भी लग रही थी.

आअहह आआ एयाया चाचा ने दो टीन बार ज़ोर से ज़हात्तक्ा मारा फिर जल्दी से बातरूम से बाहर आए और कहाँ अब तुम जाओ.

रात को मुझे नींद नही अराही थी आरिफ़ मेरा बड़ा भाई अलग कमरे मे सोता था. नाज़ अम्मी अब्बू के साथ बगल में छोटे बेड पर सोती थी. उसे साजिद भाईजान और चाचा के हरकते याद अराही थी वो आँख बूँद कर लेती थी.

उसने अब्बू के पलंग के नीचे उतरने की आवाज़ सुनी वो आँखें बंद किए लेती रही. अब्बू ने दीं लाइट ऑफ कर दी. नाज़ ने सोचा की दिन लाइट क्यू बंद करदी, कमरे में अब पूरा अंधेरा था.

अंधेरे में उसे सिर्फ़ अब्बू का आया नज़र आ रहा था. उसने देखा अब्बू पलंग पर गये ऐसे लगा जैसे वो हाथ यहाँ वहाँ घुमा रहे है आ..

अब्बू उँचाई पर अब उल्टे लेते लग रहे थे उनका आया नज़र आ रहा थे बेड की चरमरने की आवाज़ हल्की से आई फिर रुख़ गयी.

थोड़ी देर बाद फिर से लगा जैसे बेड हिल रहा है. पहले धीरे धीरे फिर ज़ोर ज़ोर से और ऐसे लग रहा था जैसे कोई चीज़ आपस में टकरा रही हो. अब्बू की धीमी धीमी आवाज़ आने लगी अयाया अया.. फिर और ज़ोर बेड हिलने लगा नाज़ की साँसें रुक गयी फिर एक लास्ट बार बेड ज़ोर से दीवार से टकराया फिर सब खामोश हो गया.

साजिद भाई बेज़ार जा रहे थे उन्होने नाज़ को भी बिके पर बैठा दिया जैसे ही बिके घर से दूर हुई नाज़ ने साजिद भाई को कूस के पकड़ लिया.

दर रही हो क्या… साजिद ने हंसते हुए कहा वो सब बातून से बेख़बर थे.

हन… नाज़ ने कहाँ.

ओक ओक कोई बात नही कस के पाकड़ो साजिद भाई ने कहाँ.

डीहरे डीहरे बिके चलने के बहाने नाज़ ने अपने हाथ नीचे सरकार वो अब साजिद के पेट पर थे. जब वो बेज़ार से दूर आए तो बिके खड्डे की वजह से ज़ोर से हीले नाज़ ने अपने दोनो हाथ साजिद भाई के पेट से भी नीचे कर दिए.

अब वो उनकी कमर से नीचे उनकी सलवार तक पहुँच गयी थी. धीरे धीरे वही कोई मोटी सी चीज़ जो चाचा की थी वही मोटी सी चीज़ नाज़ की उंगलियों को लग रही थी. साजिद भाई खामोश थे.

जब भी बिके जंप करती कोई मोटी सी चीज़ नाज़ के हाथों में आती फिर छूट जाती. रास्ते पर कोई नही था एका दुक्का गदितन नज़र आती और कुछ लोग चलते नज़र आते जैसे ही जब कोई नज़र नही आया.

साजिद भाई ने नाज़ का हाथ पकड़ कर अपनी सलवार पर रख दिया और बिके चलते रहे. नाज़ बे हाथ नही हठाया वैसे ही रखा.

फिर अचानक उस मोटी से चीज़ को जाकड़ लिया. साजिद भाई तोड़ा हड़बदाए पर बिके चलते रहे. नाज़ उस मोटी चीज़ को दबाती रही. कुछ देर बाद बिके चलते चलते साजिद हल्के से कापें और नाज़ का हाथ गीला हो गया कोई चिप चिप्पी सी चीज़ उसके हाथ लगी.

साजिद ने बिके मोदी और घर की तरफ बड़े.

अर्रे कुछ लाया नही? चाची ने पूछा.

नही एक अर्जेंट काम याद आ गया.. कह कर साजिद भाई अपने हमारे में चले गये.

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