अनाड़ी लंड चूत का नशा

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा अपनी एक और कहानी लेकर हाजिर हूँ दोस्तो ये कहानी उस समय की है जब मैं 20-21 साल का था शहर मे कमरा लेकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था.
और जिनके बारे मे बताने जा रहा हूँ वह एक शादीशुदा मेरी पड़ोसन है और उनका नाम ललिता है. उनकी एज 25 थी और शादी होके 4 साल हुए थे. और उनके 2 बच्चे थे. हज़्बेंड उनका काफ़ी टाइम बाहर रहता था और जब भी आता था तो पीके आता था. घर पे भी उनका इन-लॉस होने के कारण उनको सब परेशान करते थे क्यू कि वह ग़रीब फॅमिली मे से थी और उनका हज़्बेंड घर मे कुछ कमा के देता नही था. तो घरवाले सोचते थे कि वो सब कुछ इनके पास ही देता है और ये अपनी माँ को भेज देती है. यह सब देख के अच्छा नही लगता था. वो उसके घर मे बिल्कुल अकेली पड़ती थी. और उनके बच्चे भी दिनभर मेरे यहाँ पर ही खेलते थे तो वो भी मोस्ट ऑफ टाइम वो मेरे घर मे ही टाइम पास करती थी.

मैं घर पर अकेला ही रहता था. बातचीत के कारण वो मुझे मन ही मन मे चाहने लगी थी और मैं भी. ललिता मुझको बहुत चाहती थी, क्योंकि एक मैं ही तो था जिससे कि ललिता बातचीत कर सकती थी. खास कर जब कोई उनके घर पे नही होता और उनका हज़्बेंड बाहर जाता.

ललिता बहुत प्यार से मेरा ख्याल रखती थे और कभी एह अहसास नही होने देती कि मैं घर पर अकेला हूँ. वो मुझे प्यार से राज कहकर पुकरती थी और मैं हमेशा उनके पास पास रहना पसंद करता था. वो बहुत ही सुंदर थी, एकदम गोरी चिट्टी लंबे लंबे काले बाल करीब 5′3″ और फिगर 38-28-40 था. मैं उनकी स्माइल और चुची पर फिदा था और हमेशा उनकी एक झलक पाने के लिए बेताब रहता था. जब-भी काम करते वक़्त उनका आँचल उनकी छाती पर से फिसल कर नीचे गिरता था या वो नीचे झुकती, मैं उनकी चूंची की एक झलक पाने की कोशिश करता था. ललिता को इस-बात का पता था और वो जानबूझ कर मुझे अपनी चूंची का जलबा दिखा देती थी.

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ये बात तब हुआ जब उसके हज़्बेंड काम के सिलसिले मे शादी के बाद बाहर गये और उनके घरवाले भी पहले से ही उनके गाओं गये थे और करीब एक महीने बाद लौटने वाले थे. ललिता पर ही घर सम्हालने की ज़िम्मेदारी थी. मेरा उस समय टाइम खराब चल रहा था और साथ ही मे ललिता को भी अकेलापन महसूस हो रहा था.

ललिता उस्दिन बहुत ही खुश थी. जब हम लोग घर पे थे तो उन्होने मुझे अपने कमरे मे बुलाया और कहा कि उन्हे अकेले सोने की आदत नही है और बच्चे भी अकले है तो जब तक वो वापस नही आते, मैं उनके घर मे सोया करूँ. मैं तो खुशी से झूम उठा था

ललिता ने खाना पकाया और हम दोनो ने साथ साथ खाना खाया. आज वो मुझपर कुछ ज़्यादा ही मेहरबान थी और बार बार किसी ना किसी बहाने से अपनी चूंची का जलवा दिखा रही थी. खाने के बाद ललिता ने मुझे फल खाने को दिए. फल देते वक़्त उन्होने मेरा हाथ मसल दिया और बड़ी ही मादक अदा से मुस्कुरा दिया. मैं शरमा गया क्यूंकी ये मुस्कान कुछ अलग किस्म की थी और उसमे शरारत झलक रही थी. खाने के बाद मैं तो पेपर पढ़ने बैठ गया और वो अपने कपड़े चेंज करने लगी. गर्मी के दिन थे और गर्मी कुछ ज़यादा ही थी. मैं अपनी शर्ट उतार कर केवल बनियान और पॅंट पहन कर पढ़ने बैठ गया. मेरे सामने की टेबल के उपर दीवार पर एक शीशा टंगा था और ललिता को मैं उस शीशे मे देख रहा था. वो मेरी तरफ देख रही थी और अपने कपड़े उतार रही थे. वो सोच भी नही सकती थे कि मैं उनको शीशे के अंदर से देख रहा था. उन्होने अपना ब्लाउज खोल कर उतार दिया. है क्या मदमस्त चूंची थी. मैं पहली बार लेस वाली ब्रा मे बँधी उनकी चुचियों को देख रहा था. उनकी चूंचियाँ काफ़ी बड़ी थी. और वो ब्रा मे समा नही रही थी. आधी चूंची ब्रा के उपर से झलक रही थी. .
कपड़े उतार कर वो बिस्तेर पर चित लेट गयी और अपने सीने मे एक झीनी से चुन्नी ढक लिया. एक पल के लिए तो मेरा मन किया कि मैं उनके पास जा कर उनकी चूंची को देखु, फिर सोचा ये ठीक नही होगा और मैं पढ़ने लग गया. तुरंत ही वो सो गयी और कुछ ही देर मे उनका दुपट्टा उनकी छाती से सरक गया और साँसों के साथ उठती बैठती उनकी मस्त रसीली चूंची साफ साफ दिख रही थी.

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रात के बारह बाज चुके थे. मैने पढ़ाई बंद की और बत्ती बुझाने ही वाला था कि ललिता की सुरीली आवाज़ मेरे कानो मे पड़ी, “राज यहाँ आओ ना “ मैं उनकी तरफ बढ़ा, अब उन्होने अपनी चूंची को फिरसे दुपट्टे से ढँक लिया था. मैने पूछा, “क्या है ललिता?’ उन्होने कहा, “राज ज़रा मेरे पास ही लेट जाओ ना, थोड़ी देर बात करेंगे फिर तुम अपने बिस्तेर पर जा कर सो जाना.”

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