बड़े लंड वाले से चुदाई की सेट्टिंग

मेरा नाम संगीता है. मेरी अभी आगे 57 एअर है. लेकिन आज भी मेरा फिगर ऐसा है की किसी भी जवान लड़के में वासना जगा दे. ये बात तब की है, जब मैं 36 की हो गयी थी. मैं तब अपने भनजे कमाल और मेरी बड़ी बेहन के दामाद परेश जी से चुड चुकी थी. मेरा फिगर अब 34-28-38 है और हाइट 5’4” है.

मैं हमेशा सारी ही पहनती हू. गाँव में हम सब हार्ड वर्क करते थे, तो मेरा फिगर बहुत ही फिट है. 36 की आगे थी मेरी, 3 बच्चे थे मेरे, लेकिन मुझे देख कर कोई बोल नही सकता था की मेरी इतनी आगे होगी. मुझे देख कर कितने मेरी चुदाई की सपने देखते थे. और अब मुझे कोई हवस भारी निगाहों से देखता तो मुझे अछा लगता था. क्यूंकी अब मुझे उसकी आदत हो गयी थी और उसमे मज़ा भी आने लगा था.

कुछ दीनो बाद, मेरे ससुराल में रहते हुए, मुझे पता चला की मेरे एक रिश्तेदार को हॉस्पिटल में अड्मिट किया गया है. मैं उनकी खबर निकालने और उनसे मिलने के लिए उस हॉस्पिटल पहुँची.

मैने एक हल्की गुलाबी रंग की सारी पहनी थी, जो मेरे बदन पर काफ़ी अची लग रही थी और मेरे कुवर्व्स को हल्के से दिखा रही थी. हॉस्पिटल में अंदर जाते ही, वहाँ का माहौल तोड़ा गंभीर था. लोगों की भीड़ थी और हर तरफ दवाइयों की खुश्बू आ रही थी.

मैं अपने रिश्तेदार से मिल कर और उनकी तबीयत पूच कर जब बाहर आई, तब मेरी नज़र कॉरिडर में सामने से आती हुई एक जानी-पहचानी शकल पर पड़ी. वो और कोई नही ज्योति थी! उसने भी मुझे देखा और एक पल के लिए हम दोनो हैरान रह गये. उसके चेहरे पर भी उत्सुकता थी, जैसे वो सोच रही हो की मैं यहाँ कैसे.

ज्योति ने आज एक सिंपल सी कॉटन की प्रिंटेड कुरती और सलवार पहनी थी, पर उसमें भी उसका भरा हुआ फिगर सॉफ दिख रहा था. उसके बाल बँधे हुए थे और वो थोड़ी जल्दी में लग रही थी.

ज्योति (हैरानी से, मेरी तरफ आते हुए): संगीता! तुम यहाँ? क्या हुआ? सब ठीक तो है?

मैं (खुश होते हुए, उसके पास जाते हुए): ज्योति! तुम? मैं तो अपने एक रिश्तेदार को देखने आई थी, वो अड्मिट है यहाँ. तुम यहाँ क्या कर रही हो?

ज्योति (एक हल्की मुस्कान के साथ): मैं भी अपने एक रिश्तेदार को तिफ्फ़िं देने आई थी, वो इसी हॉस्पिटल में अड्मिट है.

हम दोनो कॉरिडर के किनारे आ कर खड़े हो गये, ताकि लोगों को आने-जाने में दिक्कत ना हो.

ज्योति (मेरी तरफ घूरते हुए): वैसे संगीता, तुम तो यहाँ भी कमाल लग रही हो. ये गुलाबी सारी तुम पर बहुत जाच रही है. क्या बात है, तुम्हारी खूबसूरती दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है.

मैं (शरमाते हुए, पर दिल ही दिल में खुश हो कर): चुप कर, ज्योति. तुम भी ना. तुम तो खुद बहुत अची लग रही हो. वैसे, सब ठीक तो है?

ज्योति: मेरी तो ठीक है. सुनो, मेरे हज़्बेंड को आज उनके ऑफीस से काम से देल्ही जाना है 2 दिन के लिए. उनके जाने का टाइम हो गया है. तुम मेरे साथ घर चलो. वहाँ आराम से बातें करेंगे.

मैं भी तैयार हो गयी. हॉस्पिटल से निकल कर मैं ज्योति के साथ उसके घर की तरफ चल दी. उसका घर ठीक-ताक था, शहर के बीच में. हम दोनो बातें करते हुए उसके घर पहुँचे. जैसे ही हम अंदर घुसे, ज्योति ने मुझे उसके पति से मिलवाया.

ज्योति: संगीता, ये हैं मेरे हज़्बेंड, राकेश.

मैने नज़र उठा कर देखा तो राकेश सामने खड़े थे. वो काफ़ी हॅंडसम थे, एक-दूं फिट और यंग दिख रहे थे, अपनी 40स में भी. उन्होने मुझे देखा तो उनकी नज़रें मुझ पर ही ठहर गयी.

उनकी आँखों में एक चमक थी और वो मुझे कुछ पल तक बस देखते ही रह गये. मैने महसूस किया की उनकी आँखें मेरी गुलाबी सारी में मेरे उभरे हुए बूब्स और भारी हुई गांद पर ही टिकी हुई थी. मैं तोड़ा शर्मा गयी, पर अंदर ही अंदर एक अजीब सा करेंट दौड़ गया.

ज्योति भी ये सब समझ गयी. उसने एक हल्की मुस्कान दी और हँसी दबाते हुए बोली-

ज्योति: राकेश, ये संगीता है, मेरी सहेली, जो गाओं में रहती है. और संगीता, ये है मेरे पति, राकेश.

राकेश ने एक हल्की मुस्कान दी और अपना हाथ मिलने के लिए आयेज बढ़ाया. मैने भी उनसे हाथ मिलाया. उनका हाथ गरम था. उन्होने मेरा हाथ पकड़ा तो हल्का सा दबाव डाला, जैसे कुछ कहना चाहते हो.

राकेश: नमस्ते संगीता जी, आज मिल कर खुशी हुई.

मैं बस धीमे से मुस्कुराइ. उनकी नज़रें अब भी मुझसे हॅट नही रही थी, और ये बात मुझे पूरी तरह से महसूस हो रही थी.

उसके बाद ज्योति सब के लिए छाई बनाने किचन में चली गयी. राकेश और मैं ड्रॉयिंग रूम में बैठे थे. ज्योति किचन से ही राकेश के बारे में बता रही थी, उनकी जॉब के बारे में. और राकेश को मेरे बारे में भी कुछ बातें बता रही थी.

ज्योति: राकेश तो सुबह से ही ऑफीस के काम में लगा हुआ है. आज इसको देल्ही जाना है दो दिन के लिए.

मैने नोटीस किया की राकेश मेरे में बहुत इंट्रेस्टेड थे. वो बार-बार मेरी तरफ देख रहे थे और जब ज्योति की नज़र उन पर पड़ती थी, तो वो अपनी नज़रें हटा लेते थे. उनके चेहरे पर एक अजीब सा भाव था, जैसे कुछ कहना चाहते हो, पर कह नही पा रहे हो.

छाई आ गयी और हम सब छाई पीने लगे. अब राकेश मेरे बिल्कुल सामने बैठे थे और उनकी हल्की मुस्कान और आँखों की चमक सॉफ बता रही थी की वो मेरी खूबसूरती और जिस्म से कितने प्रभावित हो चुके थे. छाई ख़तम होने के बाद, राकेश ने अपनी घड़ी देखी. उनके चेहरे पर हल्की बेचैनी थी.

राकेश: ज्योति, अब मुझे निकलना होगा. एरपोर्ट के लिए लाते हो जौंगा.

ज्योति: हा-हा. ध्यान से जाना. मैने सब पॅक कर दिया है.

राकेश उठे और एक आखरी बार मेरी तरफ देखा, उनकी आँखों में अब भी वही चमक थी. उन्होने एक हल्की सी मुस्कान दी, और मुझे लगा जैसे उन्होने आँखों ही आँखों में कुछ कहने की कोशिश की. मैं भी बस मुस्कुराइ.

राकेश ने हम दोनो से अलविदा कहा और घर से निकल गये. राकेश के जाते ही, दरवाज़ा बंद होते ही, ज्योति ने मेरी तरफ देखा. उसके चेहरे पर अब एक अलग ही मुस्कान थी, एक शरारती चमक उसकी आँखों में थी. वो धीरे से उठी और मेरे पास आ कर बैठ गयी, बिल्कुल करीब.

ज्योति: संगीता, तेरा जलवा है यार! तेरी खूबसूरती से राकेश भी घायल हो गये. मैने देखा उन्हें, कैसे वो तुझे घूर रहे थे. बिल्कुल पागल हो गये थे.

वो मेरे करीब झुकी, उसकी साँसें मेरे गाल पर पद रही थी. मेरी धड़कने तेज़ हो गयी. हम दोनो के बीच की वो पुरानी बातें और राज़ एक बार फिर हवा में घुलने लगे थे.

मैं (शरमाते हुए, नज़रें नीचे करते हुए): ज्योति, क्या कह रही हो तुम? ऐसा कुछ नही है.

ज्योति (मेरी कमर पर हल्का हाथ रखते हुए, उसकी उंगलियाँ मेरी सारी के उपर से मेरी टेली को सहला रही थी): चल झूठी! मुझे सब पता है. तू तो खुद भी उन्हें देख कर अंदर से मचल रही थी, है ना? तेरी आँखों में मैने देख लिया था. और वैसे भी, अब तो तू और भी खुल गयी है.

उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और उसे हल्का सा सहलाने लगी. उसकी आँखों में एक गहरा मतलब था, जैसे वो मेरे दिल की बात जानती हो.

ज्योति (आवाज़ में हल्की खुणनास और उत्तेजना लाते हुए): अब बता, क्या अब भी तू सिर्फ़ छ्होटे-मोटे लंड से खुश है, या बड़े और तगड़े लंड का स्वाद चखना चाहती है? याद है ना, मैने तुझे सरपंच जी, संग्राम भैया के बारे में बताया था?

मेरी साँसें अटकने लगी. संग्राम भैया का नाम सुनते ही, मेरे पुर जिस्म में एक लेहायर दौड़ गयी. जिस बड़े लंड की बातें ज्योति ने की थी, वो अब मेरे दिमाग़ में घूमने लगा था. मेरी छूट अभी से गीली होने लगी थी, और मैं अपनी जांघों के बीच हल्की गर्मी महसूस कर रही थी.

ज्योति (मेरी आँखों में देखते हुए, जैसे मेरे हाव-भाव पढ़ रही हो): वो संग्राम भैया, वो तो असली मर्द है संगीता. उनका लंड जब तेरी छूट में जाएगा ना, तो तू सब कुछ भूल जाएगी. वो अभी भी बहुत फिट है, और बहुत ज़ोर से छोड़ते है. मैने तो उनसे काई बार चुडवाया है. उनकी ताक़त और स्टॅमिना का कोई जवाब नही. उसने मेरे कान के पास आ कर धीरे से फुसफुसाई.

ज्योति: वैसे भी, संगीता, अभी दोपहर को वो आने वेल है. अगर तू कहे तो आज उनसे तेरी मुलाक़ात करवाती हू. क्या बोलती है? मज़ा आ जाएगा तुझे, पक्का.

मेरे पुर बदन में करेंट दौड़ गया. मैं शरम से लाल हो गयी, पर मेरी छूट की मचलन अब बढ़ती जेया रही थी. मेरी ज़ुबान लड़खड़ा गयी, कुछ बोल नही पा रही थी. पर मेरी आँखों में वो बेकरारी और इक्चा सॉफ दिख रही थी.

ज्योति (मेरी हालत समझ गयी, उसने मेरे चेहरे पर अपनी उंगलियों से हल्का सा स्पर्श किया): दर्र मत संगीता. किसी को पता नही चलेगा. हम दोनो है ना. ये हुमारा राज़ रहेगा. तू बिल्कुल बेफिकर रह. मैं हू तेरे साथ. मैं जानती हू तू अब चूड़ने को तैयार है. तेरी आँखें सब कुछ कह रही हैं.

ज्योति की बातें सुन कर और उसके भरोसे के बाद भी, मेरे दिल में एक बेचैनी थी. मेरी छूट तो गरम हो चुकी थी, पर दिमाग़ में गाओं वापस जाने की फिकर घूम रही थी.

मैं: ज्योति, ये सब तो ठीक है, पर मुझे घर जाना होगा. शाम तक गाओं जाने के लिए फिर बस नही मिलेगी.

ज्योति ने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखों में अब भी वही शरारत और समझौता था. उसने मेरा हाथ पकड़ा और हल्का सा दबाया.

ज्योति: तुम उसकी चिंता मत करना, मेरी जान. मैं शाम होने से पहले तुझे घर भेज दूँगी. अब बोल?

उसके इस भरोसे ने मेरी साँसों को तोड़ा हल्का किया, पर दिल की धड़कन अब भी तेज़ थी. मैं शर्मा रही थी, मेरी नज़रें नीचे झुकी हुई थी. मेरी ज़ुबान से एक शब्द नही निकला, पर मेरी लाली और बेचैनी ज्योति को सब कुछ बता चुकी थी. वो समझ गयी थी की मैं अब तैयार हूँ.

ज्योति (मुस्कुराते हुए, एक गहरी साँस लेते हुए): चल, पहले खाना खा लेते है. अब दोपहर में वो आ जाएँगे.

हम दोनो किचन में गये और खाना खाया. पर मेरा ध्यान खाने में नही था. मेरे दिमाग़ में बस ज्योति के मूह से सुनी हुई संग्राम भैया की बातें घूम रही थी – उनका बड़ा लंड, उनकी ताक़त, और उनका छोड़ने का अंदाज़. मेरी छूट बार-बार सिकुड रही थी और पानी छ्चोढ़ रही थी. हर नीवाले के साथ वोई उत्तेजना बढ़ती जा रही थी.

ज्योति मेरी हालत समझ रही थी. उसने एक बार फिर मेरी तरफ देखा और एक लंबी साँस ली, जैसे मुझे और हिम्मत दे रही हो.

ज्योति (मेरी आँखों में देखते हुए, एक सेडक्टिव मुस्कान के साथ): मेरी जान, आज तुझे एक असली मर्द से चूड़ने का मौका मिलेगा. ऐसा मौका बार-बार नही मिलता.

उसके इन शब्दों ने मेरे अंदर की आग को और तेज़ कर दिया. मैं पूरी तरह से मचल चुकी थी. हम दोनो अभी खाना खा कर बस बैठे ही थे. मेरे दिमाग़ में संग्राम जी की बातें घूम रही थी, और मेरी छूट की मचलन बढ़ती जेया रही थी. इसी बेचैनी के माहौल में, अचानक घर की डोरबेल बाजी.

ज्योति ने मेरी तरफ देखा, उसके चेहरे पर एक नॉटी स्माइल थी, जैसे वो मेरे दर्र और उत्तेजना को समझ रही हो. वो मुस्कुराती हुई उठी और दरवाज़ा खोलने चली गयी. मेरी धड़कनें अब बुरी तरह से बढ़ चुकी थी. मेरी साँसें तेज़ हो गयी, और एक अजीब सा इंतेज़ार मेरे पुर बदन में फैल गया.

जैसे ही ज्योति ने दरवाज़ा खोला, सामने एक लंबा-चौड़ा मर्द खड़ा था. उन्हें देखते ही मेरी साँसें अटक सी गयी. उनका चेहरा गोरा-चितता था, और उनकी घनी, बड़ी मूच्चें उनके मर्दाना रूप को और भी भयंकर बना रही थी. उन्होने सफेद धोती और कुर्ता पहना हुआ था, और उनके एक हाथ में एक मोटी चाड़ी (लकड़ी की दांडी) थी. उनका पूरा मर्दाना अंदाज़, उनकी बनावट, और उनकी आँखों में एक अजीब सी तेज़ी थी.

वो अंदर आए, और उनकी पहली नज़र मुझ पर पड़ी. उनकी आँखों में एक पल के लिए वही चमक आई जो मैने विशाल और राकेश की आँखों में देखी थी, पर उनकी चमक और भी गहराई लिए हुए थी, एक अनुभवी मर्द की चमक.

उन्होने मुझे उपर से नीचे तक घूरा, और मेरे जिस्म में एक तेज़ सी झुरजुरी दौड़ गयी. मैं शरम से पानी-पानी हो गयी, पर मेरी नज़रें उनसे हॅट नही रही थी. ये थे संग्राम जी.

संग्राम जी के अंदर आते ही, उनकी मर्दाना मौजूदगी से कमरे का माहौल ही बदल गया था. मेरी धड़कने अब भी तेज़ थी, और उनकी तीखी नज़रों से बचना मुश्किल हो रहा था.

ज्योति ने एक हल्की मुस्कान दी और मेरी तरफ देख कर बोली: मैने बताया था ना, ये है संग्राम भैया.

फिर वो संग्राम जी की तरफ पलटी और उनका परिचय करवाया: संग्राम जी, ये मेरी दोस्त संगीता है. आपके गाओं में इसकी बड़ी बेहन रहती है.

संग्राम जी ने अपनी गहरी नज़रों से मेरे जिस्म, ख़ास कर मेरे उभरे हुए बूब्स, भारी हुई गांद और पतली कमर को घूरते हुए, मुझसे पूछा: तुम्हारी बेहन का नाम क्या है?

मैं उनकी नज़रों का एहसास करते हुए तोड़ा शर्मा गयी, पर हिम्मत करके उन्हें बताया: रशिकलाल मेरे बहनोई है. मैं कभी-कभी उनके घर पर रुकती हू.

मेरी बात सुन कर संग्राम जी की आँखें चमक गयी. उन्होने एक गहरी साँस ली और बोले: अछा, रशिकलाल! मैं उनको आचे से जानता हू. बहुत भले आदमी हैं. उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खुणनास थी, जैसे वो मेरे रिश्तेदार का नाम सुन कर और भी खुश हो गये हो.

संग्राम जी ने फिर ज्योति की तरफ इशारा किया. ज्योति तुरंत उनके पास बैठ गयी और उनके लिए पानी लेकर आई. उन्होने पानी पिया, और फिर ज्योति उनके कान में झुक कर कुछ फुसफुसा कर बात करने लगी. मैं डोर से उन्हें देख रही थी, और मेरे अंदर की बेचैनी बढ़ती जेया रही थी.

जैसे ही ज्योति ने बात ख़तम की, वो उठी और मेरे पास आई. उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे कमरे के अंदर की तरफ लेकर जाने लगी. मैं चलते हुए मूड कर पीछे देखा, तो संग्राम जी अब भी मेरी तरफ ही घूर रहे थे. उनकी नज़रें मेरे जिस्म पर टिकी हुई थी.

मेरी शरम और उत्तेजना अब अपने चरम पर थी. जैसे ही मैं उनके सामने से गुज़री, मेरी गांद मेरे चलने के साथ हिल रही थी, और उसका जादू उन पर चल गया. मैने देखा, उन्होने अपने होंठ चबा दिए, उनकी आँखों में अब सॉफ वासना दिख रही थी. मैं पूरी तरह से लाल हो चुकी थी.

उसके बाद संग्राम जी की आँखें और चमक गयी, जैसे उन्हें ज्योति ने कुछ ऐसा बता दिया हो जो वो सुनना चाहते थे, और अब उनका निशाना मैं थी.

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