मेरी सौतेली बहन की कामुकता

मेरी सौतेली बहन मेरे साथ ही रह कर पढ़ रही थी. एक बार मैं जल्दी अपने फ़्लैट पर आ गया. उस दिन मैंने देखा कि मेरी बहन सीढ़ियों में अपने लवर के साथ …

दोस्तो, अन्तर्वासना पर यह मेरी पहली कहानी है आप पढ़ेंगे तो खुद ही जान जायेंगे कि इसमें सच का पुट कितना है.
उम्मीद है जितना मुझे यह कहानी लिखने में मज़ा आया आपको पढ़ने में भी आएगा. अपनी राय, सलाह, नीचे कमेन्ट में और मेल में लिखना ना भूलें.

मेरा नाम ‘मनन’ है और उम्र लगभग सत्ताईस साल. यह करीबन दो साल पुरानी बात है, उन दिनों में दिल्ली में रहता था. वैसे हम लोग पंजाब से हैं और चंडीगढ़ में सेटल्ड हैं. पापा पंजाब सरकार में एक बड़ी पोस्ट पर हैं और मम्मी पंजाब यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं.

मेरी एक छोटी बहन भी है, ‘आशिमा’ जो मेरे से 6 साल छोटी है. दरअसल जब मैं आठवीं में था तो मेरी मम्मी गुज़र गयीं थे, तब मेरी बुआ और दादी ने पापा की दूसरी शादी करवा दी थी. आशिमा मेरी दूसरी मम्मी की ही बेटी है.
नयी मम्मी बहुत ही अच्छी हैं, उन्होंने हम सबको बहुत प्यार दिया और घर-बार सब सम्भाल लिया. आशिमा ने भी मुझे हमेशा अपना सगा भाई समझा और मैंने भी उसे अपनी ‘बेबी सिस्टर’ से कम नहीं समझा.

हाई स्कूल के बाद मैं इंजीनियरिंग के लिए पिलानी चला गया था, सिर्फ छुट्टियों में ही घर आ पाता था. केम्पस प्लेसमेंट में ही जॉब मिल गयी थी, और मैं नौकरी करने पुणे चला गया. दो साल पुणे में ही रहा.
वहीं मेरी एक गर्लफ्रेंड भी बन गयी थी. वह हरियाणा के हिसार शहर की थी और यहाँ पर नौकरी के लिए आई थी.

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जनाब, क्या गज़ब की ठरकी थी, जब तक … मैं वहां रहा, उसने मेरी जवानी की प्यास को जी भर के बुझाया. हफ्ते में दो बार तो मैं उसको ज़रूर चोदता ही था.

अच्छा वक़्त भी एक दिन ख़त्म हो जाता है. मुझे अपनी तब वाली जॉब से कहीं बेहतर पैकेज वाली एक जॉब गुडगाँव में मिली और मुझे वहां शिफ्ट होना पड़ा.

पापा ने एक छोटा सा डीडीए फ्लैट गुरूग्राम के पास ही दिल्ली में ले रखा था. यह सोच कर कि शायद बच्चों को आगे पढ़ाई या नौकरी के लिए कभी जरूरत पड़े, नहीं तो एक अच्छा निवेश तो था ही.
मैंने नयी नौकरी ज्वाइन करी और उसी फ्लेट में शिफ्ट हो गया. साथ में ही अपनी बोरियत कम करने के लिए अपनी ही कंपनी का एक सहकर्मी ‘आफताब’ को अपना फ्लैटमेट भी बना लिया.
आफताब और मेरी काफी पक्की दोस्ती हो गयी थी. वह ना सिर्फ अच्छे खाने बनाने और खिलाने का शौकीन था बल्कि रोज़ मुझे खींच कर जिम भी ले जाता था.
सारा दिन ऑफिस में गुज़र जाता, शाम में हम दोनों आपस में बतियाते रहते या फिर लैपटॉप पर अंग्रेजी फिल्में या संगीत सुनते रहते.

सब ठीक था, मगर जवानी का रस निकालने का कोई जुगाड़ नहीं थी. कोई गर्लफ्रेंड तो अब तक बनी नहीं थी और पोर्न देख कर मुठ मारना कुछ मजेदार नहीं था. ना तो मुझे अपनी मर्ज़ी का पोर्न मिलता था, ना ही मुठ मार के आसानी से मेरा माल निकलता था.

हाल यह था कि सारा दिन टट्टे भारी रहते और जब भी खाली होता, मन में चूत का ही ख्याल आता. यहाँ तक कि जो भी लड़की मुझे दिखती उसमें मुझे सिर्फ चूत ही नज़र आती थी. आफताब का भी यही हाल था, और आप शायद मानेंगे कि कुंवारे लड़के की यही हालत रहती है.

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कभी वीर्य का प्रेशर बहुत ज्यादा हो जाता तो मुठ काम कर जाती थी, मगर यह तो खाली पेट को खील से भरने जैसा था, मुठ मारने में ना तो चूत की वह गर्माहट और फिसलाहट मिलती थी, ना ही इसमें लड़की के कोमल बदन को अपने नीचे मसलने आनंद. और जो स्वर्गिक सुख गर्म चूत के आखिर तक घुस कर पिचकारी छोड़ने का है, वह मुठ में कहाँ.

बहरहाल किसी तरह हमने भी लगभग एक साल निकाल दिया.

इस दौरान आशिमा ने हाईस्कूल बहुत अच्छे नंबरों से क्लियर किया और अपनी ग्रेजुएशन के लिए उसने दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में एडमिशन लेने की सोची. जब यह पक्का हो गया कि आशिमा यहीं आएगी ही तो मुझे मजबूरन आफताब को कहीं और रहने का इंतज़ाम करने को बोलना पड़ा. उसने मेरी मजबूरी एकदम समझी और जल्दी से शिफ्ट हो गया.

आशिमा को सेटल करने के लिए मम्मी एक महीने की छुट्टी लेकर दिल्ली आयीं. वह आशिमा के साथ उसके कॉलेज तक भी गयीं और देखा कि मेट्रो से उसे आने-जाने में ज्यादा तकलीफ तो नहीं है!

उन्होंने घर में पार्टटाइम मेड वगैरह भी बदल दी, अब सारा काम उसे सिखा दिया, अब सब कुछ अच्छे से हो जाता था. पहली बार घर, घर जैसा, लगने लगा था.
एक महीने बाद, जब मम्मी को पूरी तसली हो गयी, तो वह वापस चंडीगढ़ चली गयीं.

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