समधी जी से चुदवाया

“अब ये तो झेलना ही पड़ेगा … अपनी गाण्ड को मेरे लण्ड लायक बना ही लो … अब तो आये दिन ये चुदेगी … देखना ये भी चुद चुद कर गेट वे ऑफ़ इण्डिया बन जायेगी”

“धत्त, जाने क्या क्या बोलते रहते हो ?”

लण्ड की मार पड़ते ही मेरी गाण्ड का दर्द तेज हो गया। पर वो रुके नहीं। उनकी मशीन चलती रही … मैं चुदती रही। ऐसी चुदाई रोशनी मे, मैंने भी खूब अपनी टांगे चीर कर बेशर्मी से दिल की सारी हसरते पूरी की। अब मुझे महसूस हो रहा था कि मैं भी इक्कीसवीं सदी की महिला हू, आज की लड़कियो से किसी भी प्रकार कम नहीं हूँ। रात भार जी भर कर चुदाया मैने। सुबह तक हम दोनो कमजोरी महसूस करने लगे थे। हम दोनो दिन के बारह बजे सो कर उठे थे। अब तो ये हाल था कि समधी जी सप्ताह में एक बार मुझसे मिलने जरूर आते थे। उन्हे मेरी फ़ेमिली प्लानिंग के ऑप्रेशन का पता था सो वो मुझे खुल कर चोदते थे … प्रेग्नेंसी ला सवाल ही नहीं था। बस मेरी गाड़ी तो चल पड़ी थी। मैं विधवा होने पर भी बहुत सुखी थी और अब अकेली ही रहना पसन्द करने लगी थी। मेरे जीवन में फिर से बहार आगयी।

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