समधी जी से चुदवाया

” तो समधन जी आओ एक तन हो जाये … ये कपड़े की दीवार हटा दें… पर कण्डोम तो लगा लूँ?”

“समधी जी, आपको मेरी कसम ! अपनी आंखें बन्द कर लो, और आप चिन्ता ना करें, मैंने ऑपेरशन करा रखा है।”

“वाह जी तो अब शरम किस बात की, यहां बस आप और हम ही है ना, बस अपनी चूत के द्वार खोल दो जी !”

“क्या कहा … चूत का … आह और कहो … ऐसे प्यारे शब्द मैंने पहली बार सुने हैं !”

“सच, तो ले लो जी मेरा सोलिड लण्ड अपनी भोसड़ी में…” मैं उसकी अनोखी भाषा से खुश हो गई।

“आह, धीरे से, यह तो बहुत मोटा है … और धीरे से !”

सच में नरेंद्र प्रताप जी का लण्ड तो बहुत ही मोटा था। चूत में घुसाने के लिये उसे जोर लगाना पड़ रहा था। चूत में घुसते ही मेरे मुख से चीख सी निकल गई।

“जरा धीरे … चूत नाजुक है … कहीं फ़ट ना जाये।” मेरे मुख से विनती के दो शब्द निकल पड़े। फिर भी उसका सुपारा फ़क से अन्दर घुस पड़ा।
“समधन जी, आपकी भोसड़ी तो बिल्कुल नई नवेली चूत की तरह हो गई है … इतने सालों से सूखी थी क्या … एक भी लण्ड नहीं लिया?”
“धत्त, आपको मैं क्या चालू लगती हूँ ?”
“हां , सच कहता हूँ, आपकी आंखों में मैंने चुदाई की कशिश देखी है … उनमें सेक्स अपील है … मुझे लगा तुम तो चुदक्कड़ हो, एक बार कोशिश करने क्या हर्ज़ है?”
“सच बताऊँ, आपको देख कर मेरे दिल में चुदवाने की इच्छा जाग गई थी, एक सच्चे मर्द की यही खासयित होती है कि उसमें बला का सेक्स आकर्षण होता है।”

अचानक उसने जोर लगा कर मेरी चूत में अपना लण्ड पूरा घुसेड़ दिया। मेरे मुख से एक अस्फ़ुट सी चीख निकल गई जिसमें वासना का पुट अधिक था। उनका भारी लण्ड मेरी चूत में अन्दर बाहर उतराने लगा था। आह रे … इतना मोटा लण्ड … बहुत ही फ़ंसता आ जा रहा था। लगता था इतने सालों बाद मेरी चूत सूख चुकी थी और चूत का छेद सिकुड़ कर छोटा सा हो गया था। चूत को तराई की बहुत आवश्यकता थी, सो आज उसे मिल रही थी। कुछ ही देर बाद उसकी चूत का रस उसकी चुदाई में सहायता कर रहा था। चुदाई ने अब तेजी पकड़ ली थी। मेरा दिल भी खूब उछल-उछल कर चुदवाने को कर रहा था।

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मुझे समधी जी का लण्ड बहुत मस्त लगा, मोटा, लम्बा … मन को सुकून देने वाला … जैसे मेरा भाग्य खिल उठा था। मैं इस चुदाई से बहुत खुश हो रही थी। बहुत अन्दर तक चूत को रगड़ा मार रहा था। आह क्या मोटा और फ़ूला हुआ लाल सुपारा था।

“समधी जी, आपके इस मस्त लण्ड को आपने किस किस को दिया है?”

“बस मेरी प्यारी समधन को … पूरा लण्ड दिया है … और बदले में कसी हुई भोसड़ी पाई है।”

“अरे ऐसा मत बोलो ना … मेर पानी जल्दी निकल जायेगा।”

“मेरी प्यारी राण्ड, मैं तो चाहता हूँ कि तू आज रण्डी की तरह चुदा … मन करता है तेरी चूत फ़ाड़ दूँ।”

“आह, मेरे राजा … ऐसा प्यारा प्यारा मत बोलो ना, देखो मेरा रस छूटने को है।”

अचानक उसकी तेजी बढ़ गई। मेरी नसें खिंचने लगी। बहुत दिनों बाद लग रहा कि चूत का माल वास्तव में बाहर आने को है। सालों बाद मैं तबियत से झड़ने को अब तैयार थी। मेरी आँखें नशे बंद होने लगी… और तभी समधी जी ने अपने होंठों से मेरे होंठ भींच दिये। मेरी चूचियाँ जोर से दबा कर मसल डाली। सारा भार मुझ पर डाल दिया और एक हल्की सी चीख के साथ अपना वीर्य चूत में छोड़ने लगे। तभी मेरा पानी भी छूट गया। मैंने भी समधी जी को अपनी बाहों में कस लिया। दोनों ही चूत और लण्ड का जोर लगा लगा कर अपना अपना माल निकालने में लगे हुये थे। कुछ देर तक हम दोनों हू अराम से लेते रहे और यहा वहां की बाते करते रहे। पर वो जल्दी ही फिर से उत्तेजित हो गये। मेरा दिल भी कहा भरा था, चुदाने को लालायित था। वो बोल ही पड़े।

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“समधन जी, अब बारी है दो नम्बर की… जरा टेस्ट को बदले”

“वो क्या होता है जी…” मैं हैरान सी रह गई

“आपकी प्यारी सी गोल गाण्ड को तैयार कर लो … अब उसकी बारी है…”

“अरे नहीं जी … सामने ये है ना … इसी को चोद लो ना…” मेरी इच्छा तो बहुत थी पर शर्म के मारे और क्या कहती।

“अरे समधन जी, लण्ड तो आपकी चूतड़ो को सलाम करता है ना… मस्त गाण्ड है … मारनी तो पड़ेगी ही”

भला उनकी जिद के आगे किस की चल सकती थी। फिर मेरी गण्ड भी चुदाने के लिये मचल रही थी। उन्होने मेरी गाण्ड में खूब तेल लगाया और मुझे उल्टी करके मेरी गाण्ड में लण्ड फ़ंसा दिया। मोटे लण्ड की मार थी, सो चीख निकलनी ही थी।

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