समधी जी से चुदवाया

तभी उसने अपना हाथ वापस खींच लिया।

मैं उसकी किसी और हरकत का इन्तज़ार करने लगी। पर जब कुछ नहीं हुआ तो मैंने पीछे पलट कर देखा। वहां कोई भी नहीं था।

अरे … वो कौन था ? कहां गया ? कोई था भी या नहीं !!!

कहीं मेरा भ्रम तो नहीं था। नहीं नहीं भ्रम नहीं था।

मेरे पेटीकोट में चूत के मसले जाने पर मेरे काम रस से गीलापन था। मैं तुरन्त समधी के कक्ष की ओर बढ़ी। तभी बिजली आ गई। मैंने कमरे में झांक कर देखा। सुरेश जी तो चड्डी पहने उल्टे होकर शायद सो रहे थे।

अगले दिन भी मुझे रात में किसी के चलने आवाज आई। चाल से मैं समझ गई थी कि ये नरेंद्र प्रताप ही थे। वे मेरे बिस्तर के पास आकर खड़े हो गये। खिड़की से आती रोशनी में मेरा उघड़ा बदन साफ़ नजर आ रहा था। मेरा पेटिकोट जांघों से ऊपर उठा हुआ था, ब्लाऊज के दो बटन खुले हुए थे। यह सब इसलिये था कि उनके आने से पहले मैं अपनी चूचियों से खेल रही थी, अपनी चूत मसल रही थी।

आहट सुनते ही मैं जड़ जैसी हो गई थी। मेरे हाथ पांव सुन्न से होने लगे थे। वो धीरे से झुके और मेरे अधखुले स्तन पर हाथ रख कर सहलाया। मेरे दिल की धड़कन तेज हो उठी। बाकी के ब्लाऊज के बटन भी उन्होने खोल दिये। मेरे चुचूक कड़े हो गये थे। उन्होंने उन्हें भी धीरे से मसल दिया। मैं निश्चल सी पड़ी रही। उनका हाथ मेरे उठे हुए पेटीकोट पर आ गया और उसे उन्होंने और ऊपर कर दिया। मैं शरम से लहरा सी गई। पर निश्चल सी पड़ी रही। अंधेरे में वो मेरी चूत को देखने लगे। फिर उनका कोमल स्पर्श मेरी चूत पर होने लगा। मेरी चूत का गीलापन बाहर रिसने लगा। उसकी अंगुलियाँ मेरी चूत को गुदगुदाती रही। उसकी अंगुली अब मेरी चूत में धीरे से अन्दर प्रवेश कर गई।

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मैंने अपनी आँखें बन्द कर ली। एक दो बार अंगुली अन्दर बाहर हुई फिर उन्होंने अंगुली बाहर निकाल ली। कुछ देर तक तो मैं इन्तज़ार करती रही, पर फिर कोई स्पर्श नहीं हुआ। मैंने धीरे से अपनी आँखें खोली … वहाँ कोई न था !!!

मैंने आँखें फ़ाड़ फ़ाड़ कर यहाँ-वहाँ देखा। सच में कोई ना था।

आह … क्या सपना देखा था। नहीं … नहीं … ये पेटीकोट तो अभी तक चूत के ऊपर तक उठा हुआ है … मेरे स्तन पूरे बाहर आ गये थे … मतलब वो यहां आये थे ?

अगले दिन नरेंद्र प्रताप जी के चेहरे से ऐसा नहीं लग रहा था कि उनके द्वारा रात को कुछ किया गया था। वे हंसी मजाक करते रहे और काम से चले गये। लेकिन रात को फिर वही हुआ। वो चुप से आये और मेरे अंगों के साथ खेलने लगे। मैं वासना से भर गई थी। उनका यह खेल मेरे दिल को भाने लगा था। पर आज उन्होंने भांप लिया था कि मैं जाग रही हू और जानबूझ कर निश्चल सी पड़ी हुई हूँ। आज मैं अपने आप को प्रयत्न करके भी नहीं छुपा पा रही थी। मेरी वासना मेरी बन्धन से मुक्त होती जा रही थी। शायद मेरे तेज दिल की धड़कन और मेरी उखड़ती सांसों से उन्हें पता चल गया था।उन्होंने मेरा ब्लाऊज पूरा खोल दिया और अपना मुख नीचे करके मेरा एक चुचूक अपने मुख में ले लिया। मेरे स्तन कड़े हो गये… चूचक भी तन गये थे। मेरी चूत में भी गीलापन आ गया था। तभी उनका एक हाथ मेरी जंघाओं पर से होता हुआ चूत की तरफ़ बढ़ चला। जैसे ही उसका हाथ मेरी चूत पर पड़ा, मेरा दिल धक से रह गया।

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नरेंद्र प्रताप जी ने जब देखा कि मैंने कोई विरोध नहीं किया है तो धीरे से मेरे साथ बगल में लेट गये। अपना पजामा उन्होंने ढीला करके नीचे खींच दिया। उनका कड़कड़ाता हुआ लण्ड बाहर निकल पड़ा। अब वो मेरे ऊपर चढ़ने लगे और मुझ पर जैसे काबू पाने की कोशिश करने लगे। मैंने भी नरेंद्र प्रताप जी की इसमें सहायता की और वो मेरे ऊपर ठीक से पसर गये और लण्ड को मेरी चूत पर टिका दिया। मेरे दोनों हाथों को अपने दोनों हाथों से दबा दिया और अपना खड़ा लण्ड चूत की धार पर दबाने लगे। प्यार की प्यासी चूत तो पहले ही लण्ड से गले मिलने को आतुर थी, सो उसने अपना मुख फ़ाड़ दिया और प्यार से भीतर समेट लिया।

“समधी जी … प्लीज किसी को कहना नहीं … राम कसम ! मैं मर जाऊंगी !” मैं पसीने से भीग चुकी थी।

“समधन जी, बरसों से तुम भी प्यासी, बरसों से मैं भी प्यासा … पानी बरस जाने दो !” हम दोनों ने शरीर पर खुशबू लगा रखी थी। उसी खुशबू में लिपटे हुये हम एक होने की कोशिश करने लगे।

“आपको मेरी कसम जी … दिल बहुत घबराता था … मेरे जिन्दगी में फिर से बहार ला दो !”

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