समधी जी से चुदवाया

तभी मुझे विचार आया कि कहीं नीलम को बच्चा ठहर गया तो ? कही मलय मेरी बेटी को फुसलाकर केवल उसको भोग तो नही रहा है? मैं विचलित हो उठी।

अगले दिन जब शाम को नीलम घर लौटी तो मैंने उसके अपने कमरे में बुलाया और पूछा ,”तुम्हारा मलय से क्या चक्कर चल रहा है? १/२ महीने में तुम एमटेक हो जाओगी तब मलय तुमको चूस के भूल जायेगा।” मेरे इस तरह पूछने से नीलम सकपका गयी, वो समझ गयी की माँ को कल रात वाली बात पता चल गयी है। उसने कहा,” माँ, ऐसा नही है वो मुझे प्यार करता है और शादी करना चाहता है।”
उसकी बात सुन कर मेरे मन की कुछ शंकाए दूर हुयी और मैंने कहा,”नीलम यदि ऐसा है तो मुझे उसके माँ बाप से बात करनी पड़ेगी। क्या वो इसके लिए तैयार है?” नीलम ने सर हिला कर हाँ कहा और , मलय को मोबाइल से फोन कर के पूरी बात बता दी। उसके बाद मलय अगले दिन मेरे घर आया और मुझसे नीलम का हाथ माँगा। मैंने उससे उसके माता पिता से मिलने और बात करने के लिए कहा, तो उसने मेरे समने अपने पिता से बात की और मेरी बात करा दी।

मै इस शादी को जल्दी से तय कर देना चाहती थी इसलिए अगली छुट्टी वाले दिन मै तैयार होकर मलय के पिता से मिलने इलाहबाद चली गई। उनका नाम नरेंद्र प्रताप सिंह था, मेरी ही उमर के थे। उनकी आँखे बड़ी बड़ी थी और तेजी थी। उनका शरीर कसा हुआ था, एक मधुर मुस्कान थी उनके चेहरे पर। आकर्षक व्यक्तिव था, एक नजर में ही वो भा गये थे। उनकी पत्नी नहीं रही थी। पर वे हंसमुख स्वभाव के थे। दोनों परिवार एक ही जाति के थे। मलय के पिता बहुत ही मृदु स्वभाव के थे। उनको समझाने पर उन्होंने बात की गम्भीरता को समझा। वे दोनों की शादी के लिये राजी हो गये। शायद उसके पीछे उनका मेरे लिये झुकाव भी था। मैं ५० वर्ष की आयु में भी सुन्दर नजर आती थी, मेरे स्तन और नितम्ब बहुत आकर्षक थे। यही सब गुण मेरी पुत्री में भी थे।
कुछ ही दिनों में नीलम की शादी हो गई। वो मलय के घर चली गई। मैं नितांत अकेली रह गई। मेरा मन बहलाने के लिये बस मात्र कम्प्यूटर रह गया था और साथ था टेलीविजन का। कम्प्यूटर पर पोर्न साईट पर ब्ल्यू फ़िल्में देख लेती थी और बस उन्हें देख देख कर दिन काटती थी। मुझे ब्ल्यू फ़िल्म का बहुत सहारा था, उसे देख कर और रस निकाल कर मैं सो जाती थी। रोज का कार्यक्रम बन सा गया था। ब्ल्यू फ़िल्म देखना और फिर तड़पते हुये अंगुली या मोमबती का सहारा ले कर अपनी चूत की भूख को शान्त करती थी। गाण्ड में तेल लगा कर ठीक से मोमबती से गाण्ड को चोद लेती थी।

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एक दिन मेरे समधी नरेंद्र प्रताप सिंह का फोन आया कि वे किसी काम से आ रहे हैं। मेरे समधी पहली बार मेरे घर आ रहे थे, मैंने उनके लिये अपने घर में एक कमरा ठीक कर दिया था। वो शाम तक घर आ गये । उनके आने पर मुझे बहुत अच्छा लगा। सच पूछिये तो अनजाने में मेरे दिल में खुशी की फ़ुलझड़ियाँ छूटने लगी थी। उनके खुशनुमा मिजाज के कारण समय अच्छा निकल रहा था।

उन्हें आये हुये दो दिन हो चुके थे और मुझसे वो बहुत घुलमिल गये थे। वो हसी मजाक करते थे जो मुझे बहुत अच्छा लगता था। अनजाने में ही उन्हें देख कर मेरी सोई हुई वासना जागने लगी थी। मुझे तो लगा था कि जैसे वो अब कहीं नहीं जायेंगे। सदा ही यही रहेंगे। एक बार रात को तो हद होगयी, मैंने सपने में उनको देखा और महसूस किया की वो मेरी छातियां दबा रहे है। अगली सुबह जब मैंने उन्हें चाय दी तो मै शर्म से गड़ी जारही थी और अपने गंदे ख्यालातों पर शर्म आ रही थी।

तीसरी रात को उनको खाना खिलने के बाद मै अपने कमरे में गयी और लेटी तो मेरे दिमाग में ब्ल्यू फिल्म घूमने लगी और वासना मेरे अंदर हलचल करने लगी। बाहर बरसात होने लगी थी और पानी की आवाज मेरे मन को और पंख दे रही थी। मेरा उस बंद कमरे में दम घुटने लगा था मै बैचैन हो कर कमरे से बाहर गेलरी में आ गई। तभी बिजली चली गई। बरसात के दिनो में लाईट का जाना यहाँ आम बात है। मैं सम्भल कर चलने लगी। तभी मेरे कंधों पर दो हाथ आकर जम गये। मैं ठिठक कर मूर्तिवत खड़ी रह गई। वो हाथ नीचे आये और बगल में आकर मेरी चूचियों की ओर बढ़ गये। मेरे जिस्म में जैसे बिजलियाँ कौंध गई। उसके हाथ मेरे स्तन पर आ गये।
“क्…क्…कौन ?”

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“श्…श्… चुप …।”

वो हाथ मेरे स्तनों को एक साथ सहलाने लगे। मेरे शरीर में तरंगें छूटने लगी। मेरे भारी स्तन के उभारों को वो कभी दबाता, कभी सहलाता तो कभी चुचूक मसल देता। मैं बिना हिले डुले जाने क्यूँ आनन्द में खोने लगी। तभी उसके हाथ मेरी पीठ पर से होते हुये मेरे चूतड़ों के दोनों गोलों पर आ गये। दोनो ही नरम से चूतड़ एक साथ दब गये। मेरे मुख से आह निकल पड़ी। उसकी अंगुलियाँ उन्हें कोमलता से दबा रही थी और कभी कभी चूतड़ों को ऊपर नीचे हिला कर दबा देती थी। मन की तरंगें मचल उठी थी। मैंने धीरे से अपनी टांगें चौड़ी कर दी। उसके हाथ दरार के बीच में पेटीकोट के ऊपर से ही अन्दर की ओर सहलाने लगे। धीरे धीरे वो मेरी चूत तक पहुँच गये। मेरी चूत की दरार में उसकी अंगुलियाँ चलने लगी। मेरे अंगों में मीठी सी कसक भर गई। मेरी चूत में जोर से गुदगु्दी उठ गई।

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