सेक्स कहानी सिलसला चुदाई का

“आआअहह” वो चिल्लाई “भर दो मुझे …. पूरी को भर दो”

लंड उसकी चूत में अंदर तक घुसा कर मैं उसके उपेर झुका और उसके होंठ को चूमा पर उसने मेरे बाल पकड़ते हुए मेरे सर को नीचे अपनी चूचियो की तरफ धकेल दिया,

“सक देम” किसी शेरनी की तरफ वो चिल्लाई “चूसो इन्हें, काटो, मस्लो. सक दा लाइफ आउट ऑफ देम”

मैने उसका निपल अपने मुँह में लेकर चूसना शुरू कर दिया. मेरे बालों को पकड़े वो जैसे अपनी पूरी चूची मेरे मुँह में घुसाने की कोशिश कर रही थी.

“आआअहह” वो चिल्लाई और नीचे से अपनी गांद हिलाते हुए लंड अंदर बाहर करने की कोशिश करने लगी “चोदो मुझे जान … जी भरके चोदो …. आज आनिवर्सयरी पर बोलो क्या चाहिए तुम्हें?”

मैं जानता था के अब वो क्या कहने वाली थी.

“बोलो क्या करना चाहते हो? मैं सब करूँगी आज की रात. तुम मेरी गांद मारना चाहते हो ना? आइ विल गिव यू माइ गांद. टेल मी व्हाट एल्स डू यू वॉंट लवर?”

मैं दिल ही दिल में मुस्कुरा उठा. वो हमेशा यही कहती थी पर ऐसा करने की नौबत आई नही थी.

“फक मीईईई” मैने हल्के से लंड बाहर खींचा तो वो फिर चिल्लाई
तभी बाहर लगी घड़ी में 1 बजा.

“लेट्स काउंट दा शॉट्स” वो फ़ौरन बोली “लेट्स सी इफ़ यू आर केपबल ऑफ 10,000 शॉट्स इन माइ चूत. बोलो है दम?”

मैने उसकी तरफ देखा और उसकी दोनो चूचियो को पकड़ कर नीचे से धक्के लगाने लगा. वो मेरे हर धक्के को गिन रही थी.

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उस पूरी रात मैं उसको जानवरो की तरह चोद्ता रहा और वो ही हमेशा की तरह बिस्तर पर लगातार मेरा मुक़ाबला करती रही. थक कर हम दोनो बिसर पर लुढ़क गये और वो मेरी बाहों में आराम से लेट गयी.

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“कुच्छ सुनाऊं? ” धीरे से वो मेरे कानो में बोली. मतलब मैं समझता था. उसकी तरफ देख कर मुस्कुराया और उसके होंठ चूम लिए.

“सूनाओ” मैने कहा और वो एक ग़ज़ल सुनाने लगी.

यूँ ना मिल हमसे, खफा हो जैसे,
साथ चल, मौज-ए-सबा हो जैसे.

लोग यूँ देख कर हंस देते हैं,
तूने मुझे भुला दिया हो जैसे,

इश्क़ को शर्क की हद तक ना बढ़ा,
यूँ ना मिल हमसे, खुदा हो जैसे.

मौत आई भी तो इस नाज़ के साथ,
मुझे कोई एहसान किया हो जैसे.

हिचकियाँ रात भर आती रही,
तुमने मुझे याद किया हो जैसे.

ज़िंदगी गुज़र रही है इस तरह,
बिना जुर्म कोई सज़ा हो जैसे.

बाहर घड़ी 5 बजा रही थी.

“यू वाना सी दा सन राइज़?” मैने उससे पुछा तो किसी छ्होटी बच्ची की तरह उसने फ़ौरन हां में सर हिला दिया.

“कम” कह कर मैं बिस्तर से उठा और वो भी मेरे पिछे पिछे ही उठ गयी.

तैयार होकर हम दोनो घर से निकले और थोड़ी देर चल कर एक पहाड़ की आखरी छ्होर पर पहुँचे. मेरा घर जहाँ बना हुआ था वहाँ दूर दूर तक कोई और घर नही था. बस सुनसान सड़क के किनारे एक पहाड़ के उपेर बना छ्होटा सा कॉटेज.

उसका हाथ पकड़े मैं पहाड़ की किनारे पर आकर खड़ा हो गया. हम दोनो के आगे अब एक गहरी खाई थी पर उसकी तरफ ना ध्यान उसका था, ना मेरा. सामने आसमान पर चाँद अब भी पूरा था और हल्की हल्की सूरज की लाली भी फेलनी शुरू हो गयी थी. ये एक ऐसा नज़ारा था जब आसमान पर रात का चाँद और सुबह का सूरज, दोनो एक साथ देखे जा सकते थे.

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वो मुस्कुराते हुए पूरी दुनिया से बेख़बर सामने आसमान की और देख रही थी. मैं 2 कदम पिछे को हुआ और अपनी जेब पर हाथ रखा. ऱेवोल्वेर अब भी मौजूद थी.

मैं जेब में हाथ डाला और रेवोल्वेर बाहर निकाली.

“वक़्त हो चुका है” आसमान में उगते सूरज की तरफ देखते हुए मैने सोचा.

“सॉरी जान” एक नज़र उसपर डालते हुए मैं ज़ोर से बोला.

वो मेरी तरफ पलटी.

मेरी अंगुली ने रेवोल्वेर का लीवर खींचा.

हवा में गोली की आवाज़ गूँजी.

ऱेवोल्वेर से निकली गोली उसके माथे पर लगी और उसका खूबसूरत चेहरा बिगड़ गया.

पीछे को झटका खाते हुए वो लड़खड़ाई और खाई में जा गिरी.

कुच्छ देर तक वहीं खड़ा मैं लंबी साँस लेकर अपने आपको शांत करता रहा. जब धड़कन काबू में आ गयी तो मैने आगे बढ़कर खाई में झाँका.

नीचे पत्थर तो नज़र आ रहे थे पर उसकी लाश का कहीं नाम-ओ-निशान नही था. वो तो जैसे गिरते हुए कहीं हवा में ही गायब हो गयी थी.
मैने अपने हाथ की तरफ देखा. ऱेवोल्वेर भी मेरे हाथ से गायब हो चुकी थी.

“मौत आई भी तो इस नाज़ के साथ,
मुझपे कोई एहसान किया हो जैसे”

मुझे उसके कहे बोल याद आए और मैं पलट कर वापिस कॉटेज की तरफ चल पड़ा जहाँ पहुँच कर मुझे हर चीज़ फिर वैसे ही करनी थी जैसे की वो 10 साल पहले उस रात थी जब मैने उसका खून किया था.

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