गाओं की चंदा की कामुकता

मैने भी और कुछ नही कहा और गाओं की तरफ चल दिया… थोड़ी देर तक मुझे उसकी नज़रें अपनी पीठ पे ही महसूस होती रही.. अचानक मैं वापस लौट पड़ा.. मंन नही मान रहा था… दिल ने कहा अभी कुछ करना नही है.. गाओं की लड़की है भड़क सकती है.. पर उसको देखने का मंन कर रहा था… हमारे नहाने की जगह से थोड़ा पहले ही एक पेड़ (ट्री) था. मैं चुपके से उसके पीछे आया और धीरे से उसपे चढ़ गया. और खुद को पत्तो मे छिपाते हुए आगे वाली डाल पे जा के बैठ गया.. पेड़ पे चढ़ना मैं पहले से जानता था.. गाओं पहले भी आ चुक्का था और स्कूल मे भी अक्सर चढ़ जाया करता था जामुन के पेड़ पे. अब मैं यहा से उसे अच्छी तरह देख सकता था.. मुझे 10 मिनिट लगे होंगे जाने और वापस यहा पहुचने मे.. चंदा अभी वही खड़ी थी… पर इस समय वो एक धोती को खुद पे लपेट रही थी.. उसके पहने हुए सारे कपड़े नीचे पत्थर पे रखे थे..वो
अपनी कमर ढक चुकी थी पर उसके योवन उभार (बूब्स) देख के मेरा लंड फड़फादाने लगा..

फिर वो अपनी गाये भेँसो को पानी मे उतारने लगी.. और लास्ट मे खुद भी पानी मे उतर गयी.. ज़रा ही देर बाद वो एक भेंस की पीठ पे थी.. और उसे यहा वाहा रगड़ रही थी.. फिर दूसरी फिर तीसरी.. उसकी धोती गीली हो चुकी थी और उसके शरीर से बिल्कुल चिपकी हुई थी.. पूरा शरीर सॉफ दिख रहा था..तभी उसने एक गाय की
पीठ से पानी मे छलाँग लगाई तो उसकी धोती उपेर हो गयी और ज़रा सी देर को उसकी जाँघो के दर्शन हुए… “इनको तो पा के ही रहना है, मैने मन मे सोचा” वो करीब 1 घंटे तक वाहा नहाती नहलाती रही फिर वो उन सब जनवरो को बाहर निकाल के खुद भी पानी से बाहर आ गयी.. अफ..क्या लग रही थी वो इस वक़्त… आग… मैं जला जा रहा था.. इतने दिनो से संभाल के रखा मेरा कुवरापन बाँध तोड़ के बहने पे उतारू था…मैं पाजामा के उपेर से ही लंड को सहला रहा था कि शांत हो जा यार..

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पर वो मेरी कब सुनने वाला था…उधर चंदा ने अपनी धोती इधर उधर देखते हुए उतार दी.. वो पूरी नंगी खड़ी थी.. उसके चेहरे पे प्यारी सी मुस्कान थी.. उसने जैसे मेरी नकल करते हुए अपनी कमर को झटका दिया पानी सुखाने के लिए.. फिर अपने पूरे बदन पे हाथ फेरा और लास्ट मे एक हाथ को चूत पे फिराते हुए पानी सॉफ किया.. मैं समझ गया कि इसने मुझे पूरा देखा था..
फिर वो अपनी चड्डी पहनने लगी.. उसके बाद उसने लोकल ब्रा (कपड़े की बनाई हुई) पहनी और फिर ब्लाउस और पेटिकोट पहन लिया. अब उसने अपनी धोती को झाड़ा और वही सुखाने लगी.. ज़रा देर मे ही धोती सूख गयी तो वो उसे पहनने लगी.. “शो समाप्त” मैने सोचा और पेड़ से उतर के गाओं की तरफ चल दिया… जैसे तैसे वो दिन गुज़रा… शाम को मैं फिर गाओं घूमने निकला तो मेरी आखें चंदा कोही ढूँढ रही थी. फिर वो दिखी.. अपनी सहेलियो के साथ लंगड़ी खेल रही थी. और मुझे ही देख रही थी.. मैं पहुच गया..

मैं भी खेलु?? तुमको आता है लंगड़ी खेलना..?? हां! मैने कहा. पर ये तो लड़कियो का खेल है.. तो क्या हुआ..?? खेल तो खेल है कोई भी खेल सकता है.. मैं थोड़ी देर खेला फिर लड़को के साथ क्रिकेट खेलने चला गया… अब तक मेरे दिमाग़ ने कई सारी प्लॅनिंग कर ली थी.. काम कल से शुरू होना था.. और कल ही चाचा जी और चाची जी को भी मुंबई के लिए निकलना था… वो लोग अगले दिन सुबह ही निकल गये… अब मैं बिल्कुल आज़ाद था.. पड़ोस मे से खाना आना था.. वाहा सब सुबह 10-11 बजे तक खाना खा लेते थे तो मैने कह दिया था कि मेरा खाना मेरे कमरे मे रख दिया कीजिए मैं बाद मे खा लिया करूँगा.. क्यूकी मेरी आदत 3 बजे खाने की है और रात का खाना 10 बजे. जबकि वो लोग 7 बजे तक खा लेते थे… अगले दिन मैं नहाने के लिए 12:15 पर पहुचा… मैने पहले पेड़ से देख लिया…

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चंदा वही थी और उसकी गायें-भेंसें भी..! मैने इधर उधर देखा.. दूर दूर तक कोई नही था.. मैने अपने सारे कपड़े उतार के वही पत्थर से दबा दिए और पेड़ की साइड से ही नही मे सरक गया… मैने के गहरी साँस ली और पानी के अंदर ही अंदर तैरता हुआ चंदा की तरफ बढ़ चला.. पास पहुच के देखा पानी के बहाव से उसकी धोती उपेर को उठी हुई थी और उसकी मुलायम चूत बिल्कुल सॉफ दिख रही थी.. वो गर्दन भर पानी मे थी और
उसके हाथ एक गाय की बॉडी पे इधर उधर चल रहे थे उसे नहलाने के लिए… उसके बूब्स गाय की बॉडी से रगड़ खा रहे थे.. मैने अचानक ही अपना हाथ उसके बूब्स और गाय की बॉडी के बीच मे कर दिया. उसके बूब्स मेरे हाथ पर रगड़ गये.. पर उसे कुछ लगा तो उसने हाथ अपने बूब्स पे फेर के देखा.. कुछ ना पा कर वो फिर दूसरी गाय को नहलाने लगी.. उसकी धोती पूरी की पूरी उपेर हो चुकी थी और वो बूब्स के निचले हिस्से तक बिल्कुल नंगी दिख रही थी क्यूकी वही पे उसने धोती मे गाँठ लगा रखी थी…

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