रसिका भाभी को कुंवर साहब ने चोदा

अब हम घर फिर से तीन लोग रह गए थे. मैं, मेरी छोटी बेटी और कुंवर साहब.

कुछ दिन हमारे दिन नॉर्मल ही गए, लेकिन उस दौरान मेरे में और कुंवर साहब में काफी बातें होने लगी थीं.

एक दिन एक रात मैं खाना लेकर उनके रूम में गयी. अचानक से न जाने क्या हुआ कि कुंवर साहब का खाना गिर गया.
कुंवर साहब बोले- सॉरी रसिका.
मैंने कहा- कोई बात नहीं, मैं सब साफ कर देती हूँ.

मैं जमीन पर गिरा हुआ खाना साफ करने लगी. कुंवर साहब बेड पे ही बैठे थे. वो मेरी हरकतों को देख रहे थे. मैं घूंघट में ही थी, सब समझ रही थी.

मैंने खाना साफ किया और कुछ ही देर में दूसरी खाने की थाली कुंवर साहब को दे दी. इसके बाद मैं अपने रूम में जाने लगी. कुंवर साहब के इस कमरे में सामने आईना लगा था. मैं देखा, मेरे ऊपर घूंघट जरूर था, लेकिन मेरा पल्लू काफी नीचे आया हुआ था. मैं समझ गयी कि कुंवर साहब ने मेरे मम्मों को खूब देखा होगा.

दूसरे दिन मेरी नींद खुली. मैंने एक नजर कुंवर साहब के रूम में डाली.
मैंने देखा कि कुंवर साहब अपना लंड हिला हिला कर मेरे नाम से मुठ मार रहे थे. वो बोल रहे थे- आह रसिका एक बार लंड लगाने दे … आह एक बार चोद देने दे. मैं भी सेक्स का भूखा हूँ और मैं जानता हूँ कि तू भी सेक्स की भूखी है, बस एक बार लंड लगा लेने दे.

मैं सोचने लगी, मेरा मन डोलने लगा. कुंवर साहब का लंड अब भी बहुत मस्त था. फिर भी मैं लाज का पहरा न तोड़ सकी.

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अब मैं जब रसोई में होती, तो कुंवर साहब अन्दर रसोई में किसी ना किसी बहाने से आ जाते. उनकी घूरती हुई नजर मेरी समझ में आ रही थी.

एक दिन मेरा जन्म दिवस था. ये कुंवर साहब को मालूम था. मैं बेटी को स्कूल से लेकर आयी. मैं अपने रूम में गयी, तो देखा, तो बेड पे एक बॉक्स रखा था, ऊपर ‘हैप्पी बर्थडे टू यू रसिका’ लिखा था.

मैंने वो डिब्बा खोला और देखा तो अन्दर ढेर सारी साड़ियां थीं. मैंने ठीक से देखा, तो सब साड़ियां नेट वाली थीं … यानि ट्रांसपेरेंट साड़ियां थीं. उनके साथ में कुछ ब्लाउज भी थे, उन ब्लॉउजों में बटन नहीं थे. उनको बांधने के सामने से डोरियां थीं. यानि डोरी वाले ब्लाउज थे. उस तरह के ब्लाउज को खोलने के लिए डोरी भर खोलनी पड़ती थी. सारे ब्लाउज काफी तंग दिख रहे थे. वो साड़ियां अगर मैं पहनूंगी, तो अन्दर का मेरा बदन उभर कर दिखेगा.

मैं समझ गयी कि कुंवर साहब क्या चाहते हैं.

शाम को कुंवर साहब आए और अपने रूम में चले गए.

मैं भी चाय लेकर उनके रूम में गयी. कुंवर साहब ने कहा- हैप्पी बर्थडे रसिका, गिफ्ट मिला क्या?
मैंने कहा- शुक्रिया कुंवर साहब. हां जी मिला.
कुंवर साहब ने कहा- फिर कब पहनोगी?
मैंने कहा- हां जी पहनूंगी बाद में!

मैं इतना कह कर अपने काम के लिए चली गयी. मैं समझ गयी कि आज रात जरूर कुछ होने वाला है.

उसी दिन मेरी एक सहेली मेरे जन्म दिन पर मुझे बधाई देने आयी थी. उसकी बेटी भी उसी के साथ आई थी. जब वो अपने घर गई, तो साथ में उसकी बेटी जिद करके मेरी बेटी को भी अपने घर ले गयी.

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अब रात हम दोनों ही अकेले रह गए थे. मैं और कुंवर साहब. रात को मैंने सब दरवाजे खिड़की बंद किए.

करीब 10 बज कर 30 मिनट हुए होंगे, मैंने साड़ी पहनी, लेसवाला ब्लाउज भी पहना. सच में काफी तंग था. मैंने खुद को आईने में देखा, तो मुझे अपने आपको देख कर शर्म आ रही थी. नेट की साड़ी और ऊपर से लेसवाला ब्लाउज, इसमें से मेरे मम्मे तो आधे से ज्यादा बाहर ही दिख रहे थे.

मैंने खाने की थाली लगाई और कुंवर साहब के कमरे की ओर गयी. मैंने घूंघट डाला हुआ था. कुंवर साहब खड़े हुए, काफी देर तक मुझे देखते रहे और आगे बढ़ कर उन्होंने अपने रूम का दरवाजा बंद कर दिया.

फिर कुंवर साहब ने मेरे हाथ से खाने की थाली ली और बाजू में रख दी. पूरे कमरे में अंधेरा था, सिर्फ टेबल लैंप चालू था. थोड़ी देर वो वैसे ही खड़े थे, मैं एकदम चुप थी, घूंघट में थी.

फिर उन्होंने अपने दोनों हाथ मेरे मम्मों की ओर बढ़ाए. अपने दोनों हाथों से मेरे मम्मे दबाने शुरू कर दिए. मैं चुप थी. कुंवर साहब मेरे आमों को जोर जोर से दबाने लगे. उन्होंने मेरा घूंघट ऊपर कर दिया और मुझे किस किया. वे फिर से मेरे मम्मे दबाने लगे.

मुझमें चुदास भरने लगी थी. कुंवर साहब ने मेरा ब्लाउज की डोरी खींच दीं और ब्लाउज को खोल दिया. मेरी साड़ी उतार दी. वे फिर से मेरे मम्मे दबाने लगे. अब साथ ही में ही कुंवर साहब मेरे मम्मों की नोकों को चूसने लगे.

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