नौकर ने की पहली चुदाई

दोस्तों मेरा नाम अशहिमा है. मैं 24 साल की हू, और राँची में रहती हू. मेरी हाइट 5’5″ है. फिगर मेरा 34-30-36 है. रंग मेरा ठीक-ठीक गोरा है.

कल मेरी शादी है. रात के 11 बजे है, और मुझे नींद नही आ रही. कल मेरी ज़िंदगी बदलने वाली है. एक आदमी, जिसको मैं कुछ दीनो से ही जानती हू, कल मैं हमेशा के लिए उसकी हो जौंगी. मेरे जिस्म पर उसका हक हो जाएगा. वो जब चाहे मेरे कपड़े उतरवा देगा, और मुझे छोड़ेगा.

लेकिन मेरे दिमाग़ में एक बात बार-बार आ रही है, की क्या मुझे भी वो मज़ा मिलेगा, जो एक लड़की अपने पति से डिज़र्व करती है? या मुझे भी बहुत सी लड़कियों की तरह असंतुष्ट ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ेगी?

अब आप सोच रहे होंगे, की शादी तो मेरी कल है. तो मुझे कैसे पता की सेक्स की संतुष्टि कैसी होती है. हा ये सच है की कल मेरी शादी है. लेकिन छूट मैं पिछले 5 सालों से छुड़वा रही हू. और जो मुझे छोड़ता है, वो मुझे पुर मज़े देता है. उसका लंड मुझे जन्नत तक पहुँचा देता है. और पिछले 5 सालों से मैने इतनी बार जन्नत देखी है, की पति के साथ क्या होगा, ये सोच कर मुझे घबराहट हो रही है.

जिस आदमी से मैं छुड़वा रही हू, वो है हमारा नौकर गगन. आज मैं आपको गगन के साथ हुई मेरी पहली चुदाई की कहानी बताने वाली हू. तो चलिए शुरू करती हू.

जब मैं 16 साल की थी, तब पापा की पोस्टिंग दूसरे शहर में हो गयी. पीछे रह गये मैं, मम्मी, और मेरा छ्होटा भाई. मेरा भाई मेरे से 8 साल छ्होटा है. पूरी फॅमिली को दूसरे शहर शिफ्ट करना आसान नही था, इसलिए पापा अकेले ही चले गये, और किराए के कमरे में रहने लगे.

फिर मम्मी की तबीयत खराब रहने लगी, जिसकी वजह से पापा को बार-बार काम छ्चोढ़ कर आना पड़ा. मम्मी को किसी तरह की तक़लीफ़ ना हो, इसके लिए पापा ने एक नौकर रख लिया. उसका नाम गगन था. वो 30 साल का आदमी था, और पुंजब से था.

गगन अंकल खाना पकना, सफाई करना, कपड़े धोना, ये सब काम कर लेते थे, और बहुत अची तरह से करते थे. उनके रहते मम्मी को कोई काम नही करना पड़ता था.

फ्री टाइम में वो मेरे और मेरे भाई के साथ खेलते भी थे. वो हमे बहुत हसते थे. दिखने में दुबले-पतले थे, लेकिन उनकी बातें मुझे बहुत अची लगती थी. वो हस्सा-हस्सा कर पेट दुखा देते थे.

ऐसे ही टाइम बीट गया. अब मैं 19 साल की हो चुकी थी, और कॉलेज की दहलीज़ लाँघ चुकी थी. गगन अंकल जिनको मैं शुरू से पसंद करती थी, अब मुझे उनसे प्यार होने लगा था. अब इसे जवानी का जोश कहलो, या अल्लहड़-पं.

मैं उनसे बात करने के तरीके ढूँढती रहती थी. मेरी एक सहेली ने कहा था की लड़कों को पाटने के लिए उनको अपनी बॉडी दिखानी पड़ती है. मैं वो भी करने लगी थी. मैं झुक-झुक कर उनको अपने बूब्स दिखती थी.

गगन अंकल अकेले थे. उनका कोई परिवार नही था. मैं सोचती थी की अगर मेरी और उनकी शादी हो जाए, तो वो हमारे साथ ही रह सकते है, और मुझे भी शादी करके कहीं जाना नही पड़ेगा. लेकिन प्राब्लम ये थी की उनकी तरफ से कोई रेस्पॉन्स नही था. लेकिन फिर एक दिन मैने उनको अपने दिल की बात बता दी.

उस दिन पापा घर आए हुए थे, और मम्मी और पापा को किसी फंक्षन पर जाना था. फंक्षन रात का था, और बारिश का मौसम बना हुआ था. अंधेरा होते ही मम्मी-पापा निकल गये, और अब मैं, मेरा भाई, और गगन अंकल ही थे घर पे.

भाई टाइम पे ही सो जाता था, तो मैने मौके का फ़ायदा उठाने का सोचा. बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी. मैं जान-बूझ कर बाहर बारिश में नहाने चली गयी. मैने एक पतली सी त-शर्ट और साथ में पाजामा पहना हुआ था.

बारिश में भीगने से मेरे कपड़े गीले हो गये, और मेरी बॉडी की पूरी शेप नज़र आने लगी. गगन अंकल भी मुझे खिड़की से देख रहे थे. वो मुझे अंदर आने को बोल रहे थे, और बोल रहे थे की मुझे सर्दी लग जाएगी अगर मैं अंदर ना गयी तो. लेकिन मैं कहाँ सुनने वाली थी.

फिर हार कर उनको खुद बाहर आना पड़ा और वो मुझे हाथ पकड़ कर अंदर लेके गये. मैने उनको भी बारिश में खींच लिया. वो ज़ोर लगा रहे थे, तो मैने उनको अपनी बाहों में पकड़ लिया, और उनसे चिपक गयी.

जैसे ही मैं उनसे चिपकी, वो रुक गये. शायद उनको मेरे जिस्म के एहसास ने अनकंफर्टबल कर दिया. अब हमारी आँखें मिली हुई थी. उनकी आँखों में एक सवाल था, की मैं क्या कर रही थी. लेकिन मुझे तो मौका दिख रहा था.

मैने अपने होंठ आयेज बढ़ाए, और उनके होंठो के साथ चिपका दिए. पहली बार मेरे होंठो ने किसी मर्द के होंठो को च्छुआ था. वो भी वो मर्द, जिसको मैं अपना दिल दे बैठी थी. ये एक अलग ही एहसास था, जिससे मेरे बदन में करेंट सा दौड़ने लगा था.

मैने फ़िल्मो में किस्सिंग देखी थी, तो उसी तरह से मैं उनके होंठो को चूसने लगी. मुझे मज़ा आने लगा. लेकिन गगन अंकल की तरफ से कोई रेस्पॉन्स नही आ रहा था. वो बिल्कुल चुप-छाप खड़े थे.

कुछ सेकेंड्स मैं उनके होंठो को चूस्टी रही. तभी उन्होने मुझे पीछे धक्का दिया, और अंदर जाने लगे. मैं भी उनको आवाज़ देते हुए उनके पीछे-पीछे जाने लगी.

मैं: गगन अंकल, रुकिये. क्या हुआ?

लेकिन वो चलते जेया रहे थे. फिर मैने अपनी स्पीड बधाई, और उनका हाथ पकड़ कर उनको खींचा. तब तक हम घर की लॉबी में आ चुके थे. मेरे खींचने की वजह से वो रुक गये, और मेरी तरफ मूड कर बोले-

अंकल: अशहिमा ये क्या कर रही थी तुम? ये ग़लत है बच्चे!

मैं: प्यार करना ग़लत है?

अंकल: क्या, प्यार? कैसा प्यार? कों सा प्यार? मैं इस घर में नौकर हू. तुम मेरे मलिक की बेटी हो. तुम मुझसे प्यार नही कर सकती, और ना ही मैं तुमसे.

मैं: क्यूँ, मैं आपको अची नही लगती? या मैं इस लायक नही हू की आप मुझे प्यार करो?

अंकल: अर्रे इसमे अछा लगने वाली कोई बात नही है.

मैं: तो फिर क्या बात है?

उन्होने क्या जवाब दिया, और इसके आयेज क्या हुआ, वो आपको अगले पार्ट में पता चलेगा. यहाँ तक की कहानी की फीडबॅक आप औतोरकराज़्यफोर@गमाल.कॉम पर दे सकते है.

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