बेटे ने देखी मा की चुदाई

हेलो दोस्तों, मेरा नाम सूरज है. मैं अभी 26 साल का हू. ये कहानी मेरी मा और मेरे दोस्त से जुड़ी एक सच्ची कहानी है. मैं विलेज बॅकग्राउंड से हू. मेरा गाओं एक छ्होटा सा गाओं है जहाँ मेरा पूरा बचपन गुज़रा. मेरे पिता जी, राजेश आगे 55, खेती-बाड़ी करते थे, और मेरी मा मीयर्रा आगे 46 एक होम्मेकर थी. मा पिता जी की खेती के काम में भी मदद करती थी.

हाइयर एजुकेशन के लिए मैं पुणे आया था. 12त क्लास से ही मैं घर से बाहर रहने लगा. ग्रॅजुयेशन के बाद मेरी नौकरी भी पुणे में लग गयी. तब मैं लगभग 21 साल का था. मैं अपने ऑफीस के सीनियर कॉलीग्स के साथ फ्लॅट में रहता था. ये फ्लॅट हम चार लड़कों ने मिल कर शेरिंग में लिया था.

हम सब लगभग 2 साल तक साथ रहे और एक-दूसरे के काफ़ी क्लोज़ आ गये. उनमे से रिज़वान मेरा सबसे अछा दोस्त बन गया था. उसकी एक बहुत ही खूबसूरत गर्लफ्रेंड भी थी. रिज़वान एक रिच फॅमिली से था और उसकी सॅलरी भी काफ़ी अची थी. मेरा फॅमिली बॅकग्राउंड इतना स्ट्रॉंग नही था, और मेरी सॅलरी भी उतनी ज़्यादा नही थी, लेकिन फिर भी सब कुछ ठीक चल रहा था.

कुछ समय से मेरे पिता जी की तबीयत ठीक नही चल रही थी. गाओं के पास के डॉक्टर से वो इलाज करवा रहे थे. एक दिन मुझे मा का फोन आया.

वो बोली: डॉक्टर ने कहा है की पिता जी को बड़े हॉस्पिटल में ले जाना ज़रूरी है. क्यूंकी तबीयत ज़्यादा खराब हो चुकी है.

मैं तुरंत मा और पिता जी को पुणे बुला लाया और उन्हे हॉस्पिटल में अड्मिट किया. उनके बहुत सारे टेस्ट्स हुए और हमे पता चला की पिता जी की दोनो किड्नीस फैल हो चुकी थी. उनकी कंडीशन बहुत सीरीयस थी. डॉक्टर ने कहा की रिकवरी में बहुत टाइम लगेगा, और खर्चा भी काफ़ी होगा.

घर का खर्चा और ट्रीटमेंट चलाने के लिए हमे गाओं की थोड़ी ज़मीन डोर के अंकल को बेचनी पड़ी. ट्रीटमेंट शुरू हो गया.

दिन के टाइम मा हॉस्पिटल में पिता जी के साथ रहती थी और मैं ऑफीस जाता, और रात को मैं हॉस्पिटल में रुकता था. मा को आराम मिले इसलिए रात को मैं उन्हे रिज़वान के साथ फ्लॅट पर भेज देता था. रिज़वान बहुत सपोरटिव था, वो मुझे ऑफीस में भी सपोर्ट करता था और उस टाइम उसके फ्लॅट का सब मेरा खर्च भी खुद पे कर दिया.
शुरुवत में मा फ्लॅट पर जाने में हिचकिचाती थी, पर धीरे-धीरे वो कंफर्टबल हो गयी. ऐसे ही करते-करते एक महीना गुज़र गया.

एक दिन सुबह-सुबह डॉक्टर ने मुझे बुलाया और कहा, “तुम्हारे दाद की तबीयत बहुत सीरीयस है… और उनके बचने के कोई चान्सस नही है.”

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गयी. मैं घबरा गया. मैने तुरंत मा को कॉल किया, पर उन्होने फोन नही उठाया. फिर मैने रिज़वान को कॉल किया, उसे सब बताया और हॉस्पिटल जल्दी आने को कहा.

रिज़वान और मा हॉस्पिटल पहुँचते तब तक मेरे पिता जी इस दुनिया में नही रहे थे. वो पल मेरी ज़िंदगी का सबसे दर्दनाक पल था. मैं टूट सा गया था.

उसी दिन हम पिता जी का शव गाओं ले गये. वहाँ पूरी अंतिम विधि और रस्मे हुई. लगभग 15 दिन गाओं में ही निकल गये. रिश्तेदारों ने मुझे समझाया, “मा यहाँ अकेली क्या करेगी? उसे पुणे ले जाओ.”

मुझे भी बात ठीक लगी. मा भी ये सुन कर तैयार हो गयी.
हम पुणे वापस आ गये. मैने 2–3 दिन में ही एक छ्होटा सा 1 भक फ्लॅट ढूँढ लिया.

रिज़वान ने बहुत इन्सिस्ट किया:
“यही मेरे साथ रहो. हम बाकी लड़कों से बोल देंगे शिफ्ट करने, तू मा को यहीं ले आ.”

पर मैं उसे तकलीफ़ नही देना चाहता था. मैं चाहता था की मेरी मा का अपना एक स्पेस हो. इसलिए मैने नया फ्लॅट ले लिया और शिफ्ट कर गया.

धीरे-धीरे मेरी रेग्युलर लाइफ फिर से नॉर्मल होने लगी. मैं ऑफीस जाता, मा घर का काम संभालती. मा भी धीरे-धीरे ठीक होने लगी थी.

लेकिन शायद वो अकेला महसूस करती थी. इसलिए वो मुझे बार-बार फोन करती, “बेटा ऑफीस पहुँच गये क्या?” “खाना खा लिया?” “कब निकलोगे?” “बिके आराम से चलना.”

और मुझे भी धीरे-धीरे हर बात उन्हे अपडेट करने की आदत सी पद गयी थी. जैसे मा और मैं एक-दूसरे की ज़िंदगी का हर मोमेंट शेर करते थे.

रिज़वान हमारे शिफ्ट होने के बाद भी हुंसे मिलने आता रहता था. चाहे मैं ऑफीस में बिज़ी हू या मा घर पर अकेली हो, रिज़वान हमेशा एक फॅमिली मेंबर की तरह ही बिहेव करता था.

वीकेंड आते ही मा अक्सर कह देती: “रिज़वान, इस हफ्ते घर आ जाना. हम साथ में खाना खाएँगे.”

रिज़वान भी बिना झिझक आ जाता. कभी मा उसके लिए उसका फॅवुरेट चिकन-करी बनती, कभी खीर. घर का माहौल फिर से तोड़ा हल्का, नॉर्मल सा लगने लगता था.

रिज़वान मा से बड़े प्यार और इज़्ज़त से बात करता था, और मा को भी वो अपने बेटे जैसा ही लगने लगा था. रिज़वान का प्रमोशन हो चुका था और उसका ट्रान्स्फर हमारे दूसरे ऑफीस ब्रांच में हुआ था. वीक में दो दिन उसे वर्क-फ्रॉम-होमे भी मिलता था, जब की मुझे रोज़ ऑफीस जाना पड़ता था. तो हमारा ऑफीस में मिलना नही होता था.

एक दिन ऑफीस में मेरा पेट अचानक बहुत खराब हो गया. मैं वीक फील कर रहा था, इसलिए मैने सोचा घर जेया कर रेस्ट कर लेता हू. जल्दी में निकालने के चक्कर में मैं मा को कॉल करना भूल गया. मुझे पता था की आफ्टरनून में मा अक्सर सोती है, इसलिए मैं ने डोरबेल नही बजाई. मेरे पास सेकेंड के थी, तो मैने धीरे से डोर अनलॉक किया… बिना किसी आवाज़ के.

अंदर जाते ही मैं पीछे मूड कर दरवाज़ा लॉक कर रहा था और शूस निकाल ही रहा था की अचानक मुझे लिविंग रूम की तरफ से कुछ आवाज़ आई. आवाज़ बिल्कुल अनएक्सपेक्टेड थी, जैसे कोई पाईं में हो, सिसकियाँ ले रहा हो.

मैं कन्फ्यूज़्ड हो कर धीरे से लिविंग रूम की तरफ बढ़ा. और जो मैने देखा, उससे मैं एक पल के लिए बिल्कुल स्टंड रह गया.

लिविंग रूम में सोफे पे रिज़वान नंगा बैठा था और मेरी सीधी-सॅडी मा नंगी उसके लंड पे बात के उछाल रही थी. मुझे मा की बॅक साइड से व्यू था, मुझे क्लियर रिज़वान का बड़ा जानवर जैसा लंड मा के छूट में अंदर-बाहर जाते दिख रहा था, और मा एक-दूं पोर्नस्तर की तरह कमर से अपनी गांद हिला-हिला के उसका लंड अंदर-बाहर ले रही थी.

5 सेकेंड के लिए मैं सुन्न हो गया की शायद मैं सपने में तो नही था, और मेरे मूह से चीख निकल गयी. मेरी आवाज़ सुन के वो दोनो एक-दूं अलर्ट हो गये और मा भी हड़बड़ा गयी और चिल्ला उठी. एक-दूं से रिज़वान ने उसकी कमर पकड़ के अपने लंड से उतरा. मैं आयेज बढ़ता उससे पहले वो नंगी रूम के तरफ भागी. उनके कपड़े लिविंग रूम में सोफे के आस-पास बिखरे पड़े थे.

दोस्तों आज की कहानी यहीं तक. आयेज की कहानी अगले पार्ट में.

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