तगड़े लंड वाले आदमी ने चूत चुदाई की

सेक्स स्टोरी अब आयेज-

मेरे जिस्म में एक तेज़ दर्द की लेहायर दौड़ी और मैने चीख निकालने की कोशिश की. पर आवाज़ गले में ही घुट गयी. मेरी छूट अब पूरी तरह से भारी हुई थी. उसमें उनका पूरा लंड समा चुका था.

उनका पूरा मोटा लंड मेरी छूट में समाया हुआ था, और मैं दर्द से बहाल बेड पर पड़ी थी. एक पल को तो लगा जैसे मेरा जिस्म दो टुकड़ों में बाँट गया हो. मेरी आँखों से आँसू बहते जेया रहे थे. संग्राम जी मेरे उपर झुके हुए थे. उनका चेहरा मेरे चेहरे के पास था, और उनकी साँसें भी तेज़ थी. उन्होने मेरी आँखों में देखा, उनकी नज़रों में अब हवस के साथ-साथ एक गहरा सब्र भी था.

संग्राम जी ने धीरे से अपनी कमर को हिलना शुरू किया. पहला धक्का बहुत हल्के से लगा, जिससे दर्द तोड़ा कम हुआ. फिर दूसरा, तीसरा. हर धक्के के साथ, उनका लंड मेरी छूट की गहराइयों में तोड़ा और अड्जस्ट हो रहा था.

धीरे-धीरे वो तीखा दर्द एक अजीब सी भरावट में बदलने लगा. मेरी छूट अब उसके बड़े आकार को अपनाने लगी थी. मेरी साँसें अब नॉर्मल होने लगी थी, और मैं अपने आप को इस अनोखे एहसास के हवाले करने लगी.

संग्राम जी ने धीरे-धीरे अपनी गति बधाई. वो लंबे, गहरे धक्के लगा रहे थे, उनका लंड मेरी छूट की दीवारों से टकराता हुआ अंदर-बाहर हो रहा था. मेरे मूह से अब दर्द की जगह हल्की सिसकारियाँ निकालने लगी थी.

मैं (दबे होंठो से कराहते हुए, पर आवाज़ में सिर्फ़ दर्द था): आह, संग्राम जी. और मत दब्ाओ. फटे जेया रही है. क्या कर रहे हो. आह. रोक दो.

मेरी बात सुन कर उनकी आँखों में एक चमक आई. उन्होने अपने हाथो से मेरी गांद को कस्स कर पकड़ लिया, और मेरी कमर को उठा कर मुझे उनके धक्को की गहराई में धकेल दिया. उनके धक्के अब तेज़ और ज़ोर से पद रहे थे. हर धक्के से मेरी छूट की अंदर की दीवारों पर ज़ोर पड़ता, लगता जैसे वो फॅट जाएँगी.

दर्द से मेरा जिस्म अकड़ रहा था, और मैं अपने हाथो से बेड की चादर को कस्स कर पकड़ रही थी. पर उस दर्द के बीच भी, उनके लंड की गर्मी और उसकी भरावट, मुझे एक अलग ही दुनिया का एहसास करा रही थी. ये दर्द इतना तीखा था की इसमें ही एक बेचैन कर देने वाला अनुभव च्छूपा था.

मैं (सिसकारियों के बीच, आँखें बंद किए): अफ, मेरी जान निकल रही है. कितना बड़ा है. आह. मुझे तोड़ रहे हो संग्राम जी. इस दर्द से मॅर जौंगी. मेरी छूट चियर रही है.

संग्राम जी ने एक पल के लिए धक्के रोके. उन्होने मुझे अपनी बाहों में कस्स लिया, उनका लंड अब भी मेरी छूट में पूरा समाया हुआ था. फिर उन्होने करवट ली और मुझे भी अपनी तरफ खींच लिया. अब हम दोनो एक-दूसरे से लिपटे हुए थे, उनका लंड मेरी छूट में तिरछा हो कर और भी ज़ोर से धँस गया. इस नयी पोज़िशन में लंड का दबाव एक नये हिस्से पर पद रहा था, और मेरी चीख निकालने लगी. ये दर्द पहले से भी ज़्यादा चुभन वाला था, हर धक्के पर लगता जैसे कुछ टूट रहा हो.

मैं (दर्द से तड़प्ते हुए): आह, ये क्या किया. बहुत दर्द है संग्राम जी. प्लीज़. और मत सताओ. अब नही सहन होता. रहम करो.

उनका जिस्म मेरे जिस्म से चिपका हुआ था, उनकी गरम साँसें मेरी गर्दन पर पद रही थी. वो मेरी बात सुन कर मुस्कुरा रहे थे, और अपनी कमर को एक अलग ही गति से हिलने लगे. हर धक्का अब तिरछा लग रहा था, मेरी छूट के नये हिस्सों को छ्छू रहा था. दर्द अब भी था, पर उसमें एक अजीब सी बेकरारी भी घुलने लगी थी, जैसे एक ज्वालामुखी मेरे अंदर फटने वाला हो, जिसका फटना भी सिर्फ़ दर्द और शोर ही दे. मैं अपनी कमर को उनकी कमर से मिला कर, हर धक्के पर खुद को उनकी तरफ धकेल रही थी, चाहती थी की ये दर्द और गहरा हो.

मैं (उनकी कमर को पकड़ कर, उनकी आँखों में देखते हुए): आअहह, ये दर्द. ये तड़प. पागल कर देगा मुझे, संग्राम जी. मेरी छूट फॅट रही है. मुझे छ्चोढ़ दो. मैं सिर्फ़ से रही हू. दर्द से मॅर रही हू.

चुदाई लंबी होती जेया रही थी. हम दोनो की साँसें फूल चुकी थी, और पूरा कमरा हमारी आहों और धक्को की आवाज़ से गूँज रहा था.

नयी आग, नयी हवस. मेरी छूट अब भी संग्राम जी के मोटे लंड से पूरी तरह भारी हुई थी. पिछले कुछ पलों का दर्द अब धीरे-धीरे एक अलग ही एहसास में बदल रहा था. मेरा जिस्म उसके आकार को अपनाने लगा था, और हर धक्के के साथ, वो तीखी चुभन अब एक मादक गर्मी और भरावट में तब्दील हो रही थी. मेरी साँसें जो पहले दर्द से रुक रही थी, अब कामुकता से तेज़ हो चुकी थी. मेरी आँखों से आँसू गायब हो चुके थे, और उनकी जगह एक चमक थी, हवस की चमक.

हम अब भी तिरछी पोज़िशन में थे, जहाँ उनका लंड मेरी छूट में गहराई तक घुसा हुआ था. मैने अपनी कमर को उनकी कमर से मिला कर, खुद को उनके धक्कों पर उछालना शुरू कर दिया. ये मेरी पहली अपनी मर्ज़ी की हरकत थी, और इसने उनके लंड को मेरी छूट में और भी गहराई तक रगड़ते हुए घुसाया. मेरी ज़बान से एक लंबी, रसीली सिसकारी निकल गयी.

मैं (मेरी आवाज़ अब पूरी तरह कामुक थी, साँसें तेज़): आह. संग्राम जी. और. और ज़ोर से दब्ाओ. मेरी छूट अब आपके लंड के लिए पागल हो रही है.

मेरी बात सुन कर संग्राम जी की आँखों में आग सी चमक उठी. उन्होने मेरी गांद को कस्स कर पकड़ा, और अपने धक्के और भी तेज़ कर दिए. उनका लंड मेरी छूट की गहराइयों में बार-बार टकराता, एक अजीब सी आग लगाता. उनके मूह से भी अब तेज़ आ-आ की आवाज़े निकल रही थी.

संग्राम जी (उनकी आवाज़ में तेज़ नशा और हवस थी): आअहह. तेरी छूट में तो जादू है. कितनी गरम है. और कस्स रही है.

मैं (अपनी कमर को गोल-गोल घूमते हुए, उन्हें और उत्तेजीटे करते हुए): हा. मैं भी आपके लंड के लिए बनी हू. मेरी छूट सिर्फ़ आपके लिए है. इसको अपनी मर्ज़ी से चलाओ. इसको इतना गहरा छोड़ो की इसकी सारी तड़प ख़तम हो जाए.

उन्होने एक झटके में मुझे सीधा किया, और फिर से मेरे उपर आ गये. उन्होने मेरी टाँगों को उठा कर अपने कंधों पर रख लिया. अब उनका लंड मेरी छूट में और भी गहराई तक घुस रहा था, हर धक्के के साथ मेरी छूट की हर नास्स को छ्छू रहा था. इस पोज़िशन ने उन्हें मेरी छूट में पूरी गहराई तक जाने का मौका दिया.

मैं (मेरी आवाज़ अब मादक नशा थी, साँसें उखड़ी हुई): उफफफफ्फ़. ये तो और भी गहरा है. और ज़ोर से, संग्राम जी. मेरी छूट की दीवारें फाड़ दो. इसको और भरो. आह.

संग्राम जी (तेज़ धक्के लगते हुए, मेरी चूचियों को मसालते हुए): तेरी हर बात मेरे लंड को और गरम कर रही है. आज तेरी छूट को ऐसा छोड़ूँगा की तू हमेशा याद रखेगी.

मैं (सिसकारियों के बीच, उनके मूह में मूह डाल कर): हा. याद रखेंगे. मुझे और तड़पाव अपनी चुदाई से. मेरी छूट को पूरा खा जाओ.

हम इसी पोज़िशन में कुछ देर तक और चलते रहे, जब तक की हम दोनो के जिस्म पूरी तरह से पसीने से भीग नही गये. फिर संग्राम जी ने एक बार फिर अपनी कमर उठाई, और इस बार उन्होने मुझे अपने उपर बैठने का इशारा किया. मैं बिना किसी झिझक के, अपने घुटनो के बाल उनके उपर आ कर बैठ गयी. उनका लंड अब मेरी छूट में पूरी तरह से समा चुका था, और मैं उसके हर इंच को महसूस कर रही थी. अब कंट्रोल मेरे हाथो में था.

मैं (उनके चेहरे पर झुक कर, आँखों में देख कर, धीमी, सेडक्टिव आवाज़ में): अब मैं आपको नचौँगी, संग्राम जी. मेरी हर हरकत पर आप तड़पेंगे.

मैने अपनी कमर को हिलना शुरू किया. पहले धीरे-धीरे, फिर तेज़. मेरी छूट उनके लंड पर उपर-नीचे हो रही थी. हर उछाल के साथ उनका लंड मेरी गहराइयों में उतरता, और हर नीचे आने पर और गहराई तक घुसता. मैं अपनी गांद को गोल-गोल घुमा रही थी, जिससे उनका लंड मेरी छूट के हर हिस्से पर रग़ाद खा रहा था. उनके मुँह से अब तेज़ आ-आ की आवाज़े निकल रही थी, जिसे सुन कर मुझे और मज़ा आ रहा था.

संग्राम जी (मेरी गांद को पकड़ कर, अपनी कमर उठाते हुए): आअहह. मेरी जान. तू तो पूरी रंडी बन गयी है. और ज़ोर से. मेरी जान निकाल दो आज.

मैं (हँसी, कामुक औरत की तरह): हा. मैं आपकी रंडी हू. और आप मेरे रंडी के प्यासे मर्द. आज आपको ऐसा चड़वौनगी की आप कभी भूलेंगे नही.

मेरी छूट अब पूरी तरह से खुल चुकी थी, और संग्राम जी का लंड उसमें पूरा समा कर आयेज-पीछे हो रहा था. मैं कभी उनके लंड पर उछालती, कभी धीरे से नीचे आकर उसे पूरा गहराई तक लेती. हर धक्के पर मेरी छूट से एक अलग ही रस्स निकलता, और उसकी चिकनाहट से चुदाई और भी मादक हो जाती.

संग्राम जी (उनका जिस्म काँप रहा था): बस संगीता. अब और नही. मैं झड़ने वाला हू.

मैं (अपनी कमर को और ज़ोर से घूमते हुए, उन्हें तड़पते हुए): नही संग्राम जी. अभी नही, अभी तो मैं आपको पूरा नचौँगी. अभी तो आपको और तड़पना है. मेरी छूट की हर नास्स को और मसल दो.

मैने अपनी स्पीड और बढ़ा दी, और उनकी साँसें फूल चुकी थी. वो आँखें बंद किए, बस मेरे हर धक्के पर तड़प रहे थे.

मैने अपनी कमर को तेज़ गति से हिलना जारी रखा. उनका मोटा लंड मेरी छूट की गहराइयों में बार-बार टकराता, और हर टक्कर पर उनके मूह से एक गहरी सिसकारी निकलती. उनका जिस्म पसीने से तार-बतर था, और उनकी नास्स-नास्स में कामुकता दौड़ रही थी. मैं उनके चेहरे पर झुकी, उनकी साँसों की गर्मी को अपने चेहरे पर महसूस कर रही थी.

मैं (शरारत भारी हँसी के साथ): क्या हुआ संग्राम जी? तक गये इतनी जल्दी? अभी तो पार्टी शुरू हुई है. मेरी छूट की प्यास तो अभी बुझी ही नही है.

संग्राम जी ने अपनी कमर को तोड़ा उठाया, और मेरे मूह में अपना मूह डाल दिया. उनकी गरम ज़ुबान मेरी ज़ुबान से टकराई, और हम दोनो के मूह में एक अजीब सा रस्स घुल गया. वो मुझे चूमते हुए भी धक्के लगते रहे, और हर धक्का मेरी छूट में और भी गहराई तक उतरता.

हम कुछ देर तक इसी पोज़िशन में चुदाई करते रहे, जब तक की संग्राम जी ने एक बार फिर मुझे पलटने का इशारा नही किया. वो फिर से मेरे उपर आ गये, और इस बार उन्होने मेरी टाँगों को अपनी कमर पर कस्स कर लपेट लिया. उनका लंड मेरी छूट में पूरा का पूरा धंसा हुआ था, और इस नयी पोज़िशन में वो और भी गहराई तक जा रहा था.

संग्राम जी (उनकी आवाज़ में तेज़ नशा था): तू तो जादू है. मेरी हर हड्द तोड़ दी तूने.

मैं (तेज़ साँसों के साथ, उनकी कमर को कस्स कर पकड़ते हुए): हा. और अब मैं आपको ऐसे छोड़ूँगी की आप हमेशा याद रखेंगे. मेरी छूट आपके लंड को कभी भूल नही पाएगी.

उनका जिस्म मेरे जिस्म से चिपका हुआ था, और उनके धक्के एक अलग ही ले में पद रहे थे. वो अपनी पूरी ताक़त लगा रहे थे, उनका लंड मेरी छूट की हर नास्स को मसल रहा था. मेरा जिस्म उनके धक्कों पर उछाल रहा था, और हम दोनो की आहों और कराहतों से पूरा कमरा गूँज रहा था.

मैं (ज़ोर से सिसकारी लेते हुए): आह. और ज़ोर से. मेरी छूट का रस निचोढ़ दो. इसको और भरो. आह.

संग्राम जी ने अपनी कमर को और तेज़ किया. उनका लंड मेरी चूत में आग लगा रहा था. वो अपने दाँत भींच कर, अपनी पूरी जान लगा रहे थे. मेरी छूट अब पूरी तरह से दहुक रही थी, उसमें एक बेचैनी थी जो सिर्फ़ उनके लंड से ही शांत हो सकती थी.

चुदाई और भी तेज़ हो चुकी थी. हम दोनो का जिस्म पसीने से चमक रहा था, और साँसें अब बिल्कुल फूल चुकी थी. संग्राम जी के धक्के अब और भी ज़ोरदार हो चुके थे. उनका लंड मेरी छूट में अंदर-बाहर हो रहा था, और हर हरकत पर मेरी छूट की दीवारें उसके साथ चिपक कर उसे और भी नशा दे रही थी.

मैं (एक लंबी, कामुक चीख के साथ): आअहह. संग्राम जी. अब और नही. मैं झड़ने वाली हू. आप भी. आअहह.

संग्राम जी ने मेरी कमर को और ज़ोर से दबाया, और अपने आखरी कुछ धक्के लगाए. उनका जिस्म काँप रहा था, और उन्होने एक लंबी कराहट के साथ, अपना गरम वीरया पूरी तरह से मेरी छूट में उधेल दिया. उनका लंड मेरी छूट में पूरा समाया हुआ था, और उसके बाद उनका जिस्म धीरे-धीरे ढीला पद गया.

मेरी छूट उनके गरम वीरया से भर चुकी थी, और मैं भी उसी पल झाड़ चुकी थी. मेरे जिस्म में एक तेज़ करेंट दौड़ा, और मेरी नास्स-नास्स में एक अजीब सा सुकून फैल गया. मैं पूरी तरह से निढाल हो कर संग्राम जी के उपर ही गिर गयी.

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