सेक्स स्टोरी का अगला भाग-
ज्योति मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अंदर एक कमरे में ले गयी. ये उसका बेडरूम था. जैसे ही हम अंदर आए, ज्योति ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया, जिसमें एक हल्की सी क्लिक की आवाज़ आई, और उस आवाज़ ने मेरे अंदर की बेचैनी को और बढ़ा दिया.
ज्योति: संगीता, मैने संग्राम भैया से बात कर ली है. और तेरी खूबसूरती ने उन पर ऐसा जादू किया है, की मैं बता नही सकती. जिस तरह वो तुझे घूर रहे थे ना, संगीता, आज वो तुझे पूरा निचोढ़ देंगे. तेरी हर बूँद निचोढ़ लेंगे.
उसके शब्दों में इतनी सच्चाई और उत्तेजना थी की मेरे पुर जिस्म में एक तेज़ झुरजुरी दौड़ गयी. मेरी छूट अब बुरी तरह से मचल रही थी, और उसमें गर्मी और गीलापन बढ़ता जेया रहा था. मैं सॉफ-सॉफ महसूस कर सकती थी की मेरी पनटी अब तक पूरी तरह से गीली हो चुकी थी. मेरे होंठ सूख रहे थे और साँसें तेज़ हो रही थी.
ज्योति ने एक मुस्कान दी और मेरी तरफ एक सॉफ, नरम टवल बढ़ाया. फिर उसने अलमारी खोली और उसमें से एक बाग निकाला और मुझे दिया.
ज्योति: चल, तू पहले नहा ले. फ्रेश हो जाएगी तो और मज़ा आएगा. और हा, नहाने के बाद ये पहन लेना.
मेरी हालत ऐसी हो गयी थी की मैं एक शब्द भी नही बोल पा रही थी. बस मेरी नज़रें उस टवल और बाग पर टिकी हुई थी. मेरे दिमाग़ में अब बस संग्राम जी का मर्दाना जिस्म और उनका लंड घूम रहा था, और इस बाग में जो भी था, उसे पहन कर उनके सामने जाने का ख़याल ही मेरे अंदर की आग को भड़का रहा था. मैने टवल और बाग लिया, और धीरे से बातरूम की तरफ बढ़ गयी.
बातरूम में घुसते ही गरम पानी की धार मेरे थके हुए जिस्म पर पड़ी. मेरी आँखें बंद थी, पर दिमाग़ में संग्राम जी का गोरा, मर्दाना जिस्म और उनकी बड़ी मूच्चें घूम रही थी. पानी की हर बूँद के साथ मेरे अंदर की आग और भड़क रही थी.
मैने अपने पुर जिस्म को साबुन से रगड़ा, हर अंग को महसूस किया, जैसे उसे आने वाले पलों के लिए तैयार कर रही हू. मेरी छूट तो पानी के नीचे भी मचल रही थी, और मैने उसे हल्के हाथो से रग़ाद कर तोड़ा शांत करने की कोशिश की. मैं जानती थी की आज, या शायद अभी दोपहर में ही, मेरे जिस्म को एक नया एहसास मिलने वाला था.
नहाने के बाद, मैं सिर्फ़ टवल लपेटे हुए बातरूम से बाहर निकली. मेरे बाल गीले थे और पानी की बूँदें मेरे सॉफ जिस्म पर चमक रही थी. टवल ने मेरे उभरे हुए बूब्स और भारी हुई गांद को मुश्किल से च्छूपा रखा था, और उनका उभार सॉफ दिख रहा था. मेरी साँसें तेज़ थी, और शरम के साथ-साथ एक बेकरारी भी थी.
मेरी नज़र बेड पर रखे हुए उस बाग पर पड़ी. मैने उसे उठाया और जब उसे खोला, तो अंदर से एक डार्क पिंक, रेशमी निघट्य सेट निकला. उसमें एक पतली-स्ट्रॅप्स वाली निघट्य थी और उसके उपर पहनने के लिए मॅचिंग रोब.
वो निघट्य रेशम जैसी चिकनी और बदन पर बैठने वाली थी, जो हर अंग को उभरती हुई लग रही थी. उसमें लेस का काम था जो मेरे बूब्स के उपर और छूट के हिस्से पर लगा हुआ था. ऐसी निघट्य पहनना तो डोर, मैने तो सपने में भी नही सोचा था की कभी ऐसा कुछ पहनुँगी.
ये मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था. पर मेरे अंदर की चाहत अब दर्र पर हावी हो चुकी थी. मैने धीरे से अपनी टवल उतारी और उस निघट्य को अपने बदन पर सरकया. जैसे ही वो मेरे जिस्म पर बैठी, उसकी ठंडक और नरम एहसास ने मुझे और मचलना शुरू कर दिया.
वो निघट्य मेरे बूब्स पर बिल्कुल चिपक गयी थी, उनकी गोलाई और निपल्स के उभार को सॉफ दिखा रही थी. मेरी पतली कमर और चौड़ी गांद उस रेशमी फॅब्रिक के नीचे से और भी आकर्षक लग रही थी. मेरी गांद का उभार भी उसमें से सॉफ दिख रहा था, जैसे वो खुद को आने वेल लंड के लिए तैयार कर रही हो. मुझे खुद अपने जिस्म की ये नंगी नुमाइश देख कर शरम आ रही थी, पर एक अजीब सा कॉन्फिडेन्स भी आ रहा था.
तभी, कमरे का दरवाज़ा खुला और ज्योति अंदर आई. उसकी आँखों में एक शरारती चमक थी.
ज्योति: मेरी जान, तू तो क़यामत लग रही है! मैने सोचा नही था की तू इतनी खूबसूरत दिखेगी इसमें. संग्राम भैया तुझे इस निघट्य में देखेंगे तो वो तो पागल हो जाएँगे. उनका लंड तो अभी से खड़ा हो गया होगा.
उसकी तारीफ और शरारती बातों ने मुझे और भी ज़्यादा शर्मा दिया, पर ज्योति नही रुकी.
ज्योति: आ इधर. तोड़ा और तैयार कर डू तुझे.
उसने मुझे वॅनिटी के सामने खड़ा किया और मेरे चेहरे पर हल्का मेकप लगाया – तोड़ा काजल, हल्का लीप ग्लॉस, और गालों पर हल्का ब्लश. वो मेरे बालों को भी ठीक करने लगी. जब मैने खुद को आईने में देखा, तो मैं चौंक गयी. ये मैं ही थी? मेरी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, मेरे होंठ लाल और आकर्षक लग रहे थे, और मेरी निघट्य में मेरा जिस्म एक असली मर्द के लिए तैयार लग रहा था.
ज्योति: अब तू बिल्कुल तैयार है, मेरी रानी. जेया, और संग्राम भैया को दिखा दे, तू क्या चीज़ है.
उसने मुझे रोब दिया, जो निघट्य के साथ ही था. मैने उस रोब को अपने जिस्म पर ओढ़ा, अपने नंगे जिस्म को हल्का सा कवर किया, और जैसे ही ज्योति कमरे से बाहर निकली. फिर मैं धीरे से बेड पर बैठ गयी. मेरे अंदर की बेचैनी अब अपने चरम पर थी, संग्राम जी के आने का इंतेज़ार करते हुए.
अचानक दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई. मेरा दिल उछाल कर मेरे गले में आ गया. मैं कुछ बोल नही पाई, बस दरवाज़े की तरफ देखती रही.
दरवाज़ा धीरे से खुला, और कमरे में संग्राम जी दाखिल हुए. उनको देखते ही मैं बेड से खड़ी हो गयी. उनकी नज़रें सीधे मुझ पर पड़ी. उनकी आँखों में वही तीखी चमक थी जो मैने पहले देखी थी, लेकिन अब उसमें एक गहरी हवस भी थी. वो मुझे उपर से नीचे तक घूरते रहे, और उनकी नज़रों में मेरी डार्क पिंक निघट्य में दिख रहे मेरे उभरे हुए बूब्स और भारी हुई गांद सॉफ नज़र आ रही थी.
उनकी आँखों की भूक देख कर मेरा पूरा जिस्म काँप गया. मैं शरम से अपनी नज़रें नीचे झुका ली, लेकिन मेरे अंदर की आग अब और भी तेज़ हो चुकी थी.
संग्राम जी ने धीरे से दरवाज़ा बंद किया और मेरी तरफ बढ़ने लगे. संग्राम जी धीरे-धीरे चलते हुए मेरे करीब आए. उनके हर कदम के साथ मेरी धड़कने और तेज़ होती जेया रही थी. वो मेरे सामने आ कर खड़े हो गये, इतने करीब की मैं उनकी मर्दाना खुश्बू महसूस कर सकती थी. उन्होने अपना बड़ा हाथ धीरे से आयेज बढ़ाया और मेरे गाल को बड़े ही नरम अंदाज़ में सहलाया. उनका स्पर्श एक बिजली की तरह मेरे पुर जिस्म में दौड़ गया.
संग्राम जी: तुम तो क़यामत हो. सच में, मैने अपने जीवन में तुम जैसी खूबसूरत और आकर्षक औरत कभी नही देखी.
उनकी आँखें मेरे बूब्स पर ठहरी हुई थी जो निघट्य में सॉफ उभर कर दिख रहे थे. उनका चेहरा अब मेरे चेहरे के और करीब आ गया. उनकी आँखों में एक ऐसी चमक थी, जो बता रही थी की वो मुझे पाने के लिए कितने बेकरार थे.
संग्राम जी: तुम्हारी ये रंगत, ये जिस्म, ये तो बस मर्द को पागल करने के लिए ही बना है. क्या बतौ, तुम्हें देख कर तो…
वो रुक गये, उन्होने अपनी ज़ुबान से अपने होंठो को गीला किया, जैसे वो अपनी बढ़ती हुई हवस को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे हो. उनकी नज़र अब मेरी कमर से होते हुए मेरी गोल गांद तक पहुँच गयी, जो निघट्य में और भी भारी और गोल दिख रही थी. एक पल के लिए उन्होने अपने होंठ दबोच लिए, जैसे खुद को रोक रहे हो.
मैं शरम से अपनी नज़रें नीचे झुकाए हुए थी, पर मेरे अंदर की आग अब उनकी बातों से और भी ज़्यादा भड़क चुकी थी. मेरी छूट अब बुरी तरह से मचल रही थी, और मैं बस उनके अगले कदम का इंतेज़ार कर रही थी.
संग्राम जी ने धीरे से अपना दूसरा हाथ भी मेरे गाल पर रखा, और उनके बड़े-बड़े हाथो में मेरा चेहरा घिर गया. उन्होने मेरी नज़रों में देखा, उनकी आँखों में एक गहरा नशा था. फिर वो धीरे-धीरे मेरे करीब झुके, उनके गरम साँसें मेरे होंठो पर पड़ने लगी. मेरी धड़कनें अब इतनी तेज़ थी की लग रहा था जैसे बाहर निकल आएँगी.
और फिर, उन्होने अपने नरम होंठ मेरे होंठो पर रख दिए. पहले स्पर्श में एक हल्का सा दबाव था, जैसे वो मेरी रज़ा पूच रहे हो. मैने उनकी बाहों में, उनके गरम होंठो के बीच, थोड़े ही टाइम में गरम हो गयी. एक अजीब सी झुरजुरी मेरे पुर बदन में दौड़ गयी, और मेरे गले से आ निकालने लगी. उनकी मर्दाना खुश्बू और उनके होंठो की गर्मी ने मुझे पूरी तरह से अपनी गिरफ़्त में ले लिया.
उन्होने अब और ज़ोर से मेरे होंठो को चूसना शुरू कर दिया. वो मेरे उपरी होंठ को चूस्टे, फिर निचले को, अपनी ज़बान से मेरे होंठो पर खेलते. मैं शुरू में थोड़ी झिझकी, पर मेरी अंदर की मचलन अब कंट्रोल से बाहर हो रही थी. धीरे-धीरे, मैने भी उनका साथ देना शुरू कर दिया. मेरे होंठ भी उनके होंठो का जवाब देने लगे, और मेरी ज़ुबान उनकी ज़ुबान को तलाश करने लगी.
वो चूमते जेया रहे थे, और मैं आहें भरते हुए उनके हर स्पर्श का जवाब दे रही थी. उनका एक हाथ अब धीरे से मेरी कमर पर सरक गया और उन्होने मुझे और भी करीब अपनी तरफ खींच लिया. मेरी निघट्य उनके जिस्म से चिपक गयी, और उनके लंड का हल्का सा दबाव मेरे पेट पर महसूस हुआ, जिससे मेरी छूट में और भी तेज़ मचलन शुरू हो गयी.
उनके होंठो का जादू मेरे पुर जिस्म पर च्छा चुका था. मेरी साँसें फूल रही थी, और मैं बस उनकी बाहों में सिमटी जेया रही थी. तभी, संग्राम जी ने धीरे से अपने होंठ अलग किए, और उनकी गरम साँसें अब भी मेरे चेहरे पर पद रही थी. उनकी आँखों में आग जल रही थी.
उन्होने अपना एक हाथ मेरे कंधे पर रखा और बड़े ही धीमे से मेरे रोब की डोरी को खोल दिया. रोब धीरे से मेरे जिस्म पर से सरकता हुआ नीचे गिर गया, और मेरा पूरा जिस्म, जो अब भी निघट्य में था, उनके सामने और भी ज़्यादा आकर्षक रूप में आ गया.
मेरी उभरे हुए बूब्स, पतली कमर और भारी हुई गांद निघट्य के अंदर से ही उनकी नज़रों के सामने थे. हर अंग निघट्य के पतले कपड़े के नीचे से उभर कर दिख रहा था.
संग्राम जी दो कदम पीछे हटे. उनकी नज़रें मेरे जिस्म पर गड़ गयी, जैसे वो निघट्य के हर इंच को निगल जाना चाहते हो. उनकी आँखों में एक अजीब सा जुनून था. उन्होने अपनी ज़ुबान से अपने होंठो को गीला किया और एक गहरी साँस ली.
संग्राम जी (उनकी आवाज़ अब हल्की और भारी हो चुकी थी, जैसे वो अपने आप को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे हो): ओह हो… क्या चीज़ बनाया है भगवान ने तुझे! मैने सोचा नही था की निघट्य में भी तू इतनी जवानी भारी दिखेगी. तेरी तो हर चीज़ क़यामत है, मेरी जान!
उनकी नज़रें मेरे बूब्स पर ठहर गयी. निघट्य के कपड़े के अंदर से भी उनके उभार और उनके निपल्स के हल्की निशान सॉफ झलक रहे थे.
संग्राम जी: देखो तो तुम्हारे ये रसीले चुचे! कितने बड़े और गोल है! मॅन कर रहा है की इस निघट्य को हटा कर अभी इन्हें मूह में भर लू और चूस लू इनके निपल. और ये तुम्हारी पतली कमर, और उसके नीचे ये तुम्हारी फूली हुई गांद… अफ! इस गांद को तो मैं आज छोड़-छोड़ कर लाल कर दूँगा. मेरी जान, तुम जैसी गरम औरत मैने ज़िंदगी में नही देखी. तुम तो बस मेरे लिए ही बनी हो.
उनकी बातों से मैं शरम से पानी-पानी हो गयी, पर मेरी छूट की आग अब इतनी बढ़ चुकी थी की मैं खुद को रोक नही पा रही थी. उनकी बातें मेरे अंदर की मचलन को और तेज़ कर रही थी. मेरा जिस्म काँप रहा था, पर अब दर्र नही, सिर्फ़ हवस थी. मेरी साँसें तेज़ थी और मेरे होंठ हल्की आहें भर रहे थे. मैं उनकी आँखों में देखते हुए बस उनके अगले हमले का इंतेज़ार कर रही थी.
उनकी हवस भारी नज़रों और उनकी गंदी बातों ने मेरे अंदर की आग को और भड़का दिया था. मैं जानती थी की अब रोकने का कोई फ़ायदा नही, और शायद मैं रोकना भी नही चाहती थी. मैने उनकी आँखों में देखा, एक हल्की, शरारती मुस्कान मेरे होंठो पर आ गयी.
जैसे ही संग्राम जी मेरी तरफ बढ़ने लगे. मैं धीरे से उनसे दो कदम पीछे हट गयी, मेरी मुस्कान और गहरी हो चुकी थी. उनकी आँखों में सवाल था, और मेरे इशारों में लालच.
मैं (मुस्कुराते हुए): क्या हुआ संग्राम जी? इतनी जल्दी तक गये? अभी तो खेल शुरू हुआ है.
संग्राम जी (आँखों में चमक के साथ, उनकी साँसें तेज़ थी): थकने का तो सवाल ही नही, मेरी जान. पर जब सामने इतनी गरम चीज़ हो, तो सबर करना मुश्किल हो जाता है. कहाँ भागोगी मुझसे? तुम तो बस मेरे लिए ही बनी हो.
मैने अपने होंठ हल्के से काटे, और अपनी नज़रों से उन्हें ललचाना शुरू कर दिया. मैं उन्हे अपने इशारों से ललचा रही थी, जैसे कह रही हो ‘आओ, मुझे पकड़ कर दिखाओ’. जब वो मुझे पकड़ने की कोशिश करते, मैं हल्का सा हेस्ट हुए, उनसे डोर भागने लगी, कमरे में इधर-उधर फिसलते हुए.
मेरी निघट्य मेरे जिस्म पर चिपकी हुई थी, और जैसे-जैसे मैं चलती या हल्का भागती, मेरी गांद एक अद्भुत अंदाज़ में हिल रही थी. हर कदम के साथ मेरी गोल, भारी हुई गांद उच्छलती और तिरकति, उनकी नज़रों को और भी ज़्यादा अपनी तरफ खींच रही थी. मैं मूड-मूड कर उन्हें देखती, अपनी गांद को और ज़्यादा हिलती, और कभी अपनी उंगलियों से अपने होंठो को छ्छूती, या फिर अपनी निघट्य के कपड़े को अपने बूब्स पर हल्का सा कस्स लेती, जिससे उनका उभार और भी सॉफ दिखता. हर नज़र, हर हरकत उन्हें पागल कर रही थी.
मैं (आयेज भागते हुए, एक ठुमके के साथ): इतनी जल्दी नही मिलूंगी, संग्राम जी. पहले ज़रा कोशिश तो कर लो.
संग्राम जी (हास्से, उनकी आवाज़ में एक गर्जन थी): ओह हो, तो ये बात है? तुम्हे शायद पता नही, जब संग्राम किसी चीज़ को पाने की तान ले, तो वो उसे पा कर ही रहता है. और तुम्हारी ये जवानी, ये तो मेरी है! कहाँ तक भागोगी? अब तो मैं तुम्हे ऐसे पाकडूँगा की तुम पूरी ज़िंदगी नही भूल पावगी.